अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)


रिफाइन तेल बनता कैसे हैं

किसी भी तेल को रिफाइन करने में 6से 7केमिकल का प्रयोग किया जाता है और डबल रिफाइन करने में ये संख्या 12 -13हो जाती है | ये सब केमिकल मनुष्य के द्वारा बनाये हुए हैं प्रयोगशाला में, भगवान का बनाया हुआ एक भी केमिकल इस्तेमाल नहीं होता, भगवान का बनाया मतलब प्रकृति का दिया हुआ जिसे हम आर्गेनिक कहते हैं | तेल को साफ़ करने के लिए जितने केमिकल इस्तेमाल किये जाते हैं सब Inorganic हैं और Inorganic केमिकल ही दुनिया में जहर बनाते हैं और उनका combination जहर के तरफ ही ले जाता है | इसलिए रिफाइन तेल, डबल रिफाइन तेल गलती से भी न खाएं | फिर आप कहेंगे कि, क्या खाएं ? तो आप शुद्ध तेल खाइए, तिल का, सरसों का, मूंगफली का, तीसी का, या नारियल का | अब आप कहेंगे कि शुद्ध तेल में बास बहुत आती है और दूसरा कि शुद्ध तेल बहुत चिपचिपा होता है | रिसर्च से पता चला कि तेल का चिपचिपापन उसका सबसे महत्वपूर्ण घटक है | तेल में से जैसे ही चिपचिपापन निकाला जाता है तो पता चला कि ये तो तेल ही नहीं रहा, तेल में जो बास आ रही है वो उसका प्रोटीन कंटेंट है, शुद्ध तेल में प्रोटीन बहुत है, दालों में ईश्वर का दिया हुआ प्रोटीन सबसे ज्यादा है, दालों के बाद जो सबसे ज्यादा प्रोटीन है वो तेलों में ही है, तो तेलों में जो बास आप पाते हैं वो उसका Organic content है प्रोटीन के लिए | 4 -5तरह के प्रोटीन हैं सभी तेलों में, आप जैसे ही तेल की बास निकालेंगे उसका प्रोटीन वाला घटक गायब हो जाता है और चिपचिपापन निकाल दिया तो उसका Fatty Acid गायब | अब ये दोनों ही चीजें निकल गयी तो वो तेल नहीं पानी है, जहर मिला हुआ पानी | और ऐसे रिफाइन तेल के खाने से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैं, घुटने दुखना, कमर दुखना, हड्डियों में दर्द, ये तो छोटी बीमारियाँ हैं, सबसे खतरनाक बीमारी है, हृदयघात (Heart Attack), पैरालिसिस, ब्रेन का डैमेज हो जाना, आदि, आदि | जिन-जिन घरों में पूरे मनोयोग से रिफाइन तेल खाया जाता है उन्ही घरों में ये समस्या आप पाएंगे, जिनके यहाँ रिफाइन तेल इस्तेमाल हो रहा है उन्ही के यहाँ Heart Blockage और Heart Attack की समस्याएं हो रही है |

आप खुद पढ़िए

अब आप अगर पढ़े लिखे हैं तो आप खुद इन्टरनेट पर सर्च कीजिये ‘The Truth: About Refined Cooking Oil’ आपको यहाँ कई तरह की रिपोर्ट पढ़ने को मिल जाएगी. सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिका और रूस जैसे देशों के वैज्ञानिकों ने भी दावा किया है कि रिफाइन आयल को बनाते वक़्त जिस तरह के केमिकल इस्तेमाल हो रहे हैं वह हमारे शरीर को अन्दर से खोखला बना रहे हैं. काई बार तो इसको बनाने में खास तरह का साबून उपयोग में लाया जा रहा है जिसकी वजह से हमारा पेट अक्सर खराब ही रहता है |

क्या कहते हैं AIIMS के डॉक्टर

जब सफोला का तेल लेबोरेटरी में टेस्ट किया, सूरजमुखी का तेल, अलग-अलग ब्रांड का टेस्ट किया तो AIIMS के भी कई डोक्टरों की रूचि इसमें पैदा हुई तो उन्होंने भी इस पर काम किया और उन डॉक्टरों ने बताया “तेल में से जैसे ही आप चिपचिपापन निकालेंगे, बास को निकालेंगे तो वो तेल ही नहीं रहता, तेल के सारे महत्वपूर्ण घटक निकल जाते हैं और डबल रिफाइन में कुछ भी नहीं रहता, वो छूँछ बच जाता है, और उसी को हम खा रहे हैं तो तेल के माध्यम से जो कुछ पौष्टिकता हमें मिलनी चाहिए वो मिल नहीं रहा है |” आप बोलेंगे कि तेल के माध्यम से हमें क्या मिल रहा ? हमको शुद्ध तेल से मिलता है HDL (High Density Lipoprotein), ये तेलों से ही आता है हमारे शरीर में, वैसे तो ये लीवर में बनता है लेकिन शुद्ध तेल खाएं तब | तो आप शुद्ध तेल खाएं तो आपका HDL अच्छा रहेगा और जीवन भर ह्रदय रोगों की सम्भावना से आप दूर रहेंगे |

तो शायद अब आप समझ गये होंगे कि आखिर क्यों हमारे पूर्वज शुद्ध सरसों का तेल खाने में उपयोग करते थे तभी उन दिनों हार्ट की समस्या इतनी कम होती थी और वह लोग 100 साल से ऊपर तक जीते थे.

 

 

 

 तांबे के बर्तन

 

आयुर्वेद के अनुसार, तांबे के बर्तन में रखे पानी को पीने से आपके शरीर ते तीनों दोश वात, कफ़ व पित्त दूर हो जाते हैं। इसके लिए तांबे के बर्तन में पानी को कम से कम आठ घंटे के लिए रखा जाना चाहिए। दरअसल, जब पानी को तांबे के बर्तन में रखा जाता है तो तांबा पानी में उतर आता है और उसके सारे अच्छे तत्व उस पानी में मिल जाते हैं। इस पानी की सबसे अच्छी बात ये है कि ये कभी बासी नहीं होता। इसे लंबे वक्त तक रखा जा सकता है। आइये जानते हैं तांबे के बर्तन में रखा पानी आपकी सेहत को किस तरह से फायदे पहुंचा सकता है।

पाचन क्रिया को बनाता है बेहतर

एसीडिटी और खाना पचाने में दिक्कत बहुत आम समस्याएं हैं। तांबे के बर्तन में रखे पानी को पीने से इनसे छुटकारा मिल सकता है। तांबे में ऐसे तत्व मौजूद होते हैं जो नुकसानदायक बैक्टीरिया को खत्म करते हैं और पेट की सूजन मिटाते हैं। अल्सर, अपच और इंफेक्शन जैसी पेट की समस्याओं के लिए ये एक असरदार उपाय है। आयुर्वेद के अनुसार, पेट के रोग मिटाने के लिए रात भर तांबे के बर्तन में रखे पानी को सुबह खाली पेट पीना चाहिए।

वजन घटाने में मदद

वजन कम करने के लिए असरदार माने जाने वाले फाइबरयुक्त चीज़ें खाने के बावजूद भी अगर आपका वजन कम नहीं होता तो नियमित रूप से तांबे के बर्तन में रखे पानी को पियें। इस पानी से आपके शरीर की चर्बी कम होती है।

जख्म जल्दी भरते हैं

तांबे में उच्च मात्रा एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-वायरल और एंटी इन्फ्लेमेटरी तत्व होने की वजह से इससे जख्म जल्दी भरते हैं। इसके अलावा तांबे से इम्यून सिस्टम मजबूत होता है और नई कोशिकाएं बनने में भी मदद होती है। तांबे का पानी पीने से पेट के अंदर के जख्म भी जल्दी ठीक हो जाते हैं।

एजिंग की रफ्तार कम करना

अगर आ चेहरे पर आती झुर्रियों से परेशान हैं तो तांबा आपके लिए प्राकृतिक उपचार साबित हो सकता है। बहुत उच्च मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट होने और कोशिका निर्माण की क्षमता की वजह से तांबा फ्री रेडिकल्स का सफाया करता है जो कि झुर्रियों का मुख्य कारण है। साथ ही इससे तांबे की मदद से पुरानी कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाएं ले लेती हैं।

दिल का रखे ख़्याल

दिल की बीमारियां इन दिनों आम हो चुकी हैं। तांबा दिल की बीमारी के जोखिम को कम कर सकता है। अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार, तांबे ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कनों को नियंत्रित रखने में मदद करता है। साथ ही साथ, कोलेस्ट्रॉल कम करता है। इसलिए अगर आपको दिल की बीमारी है या फिर आप इस बीमारी के जोखिम को कम करना चाहते हैं तो तांबे के बर्तन में रखा पानी पियें।

बैक्टीरिया का सफाया

तांबे में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो बहुत प्रभावी रूप से बैक्टीरिया का सफाया कर देते हैं। खासतौर पर ईकोली पर अपना असर दिखाते हैं जो हमारे पर्यावरण में पाए जाते हैं तो हमारे शरीर में प्रवेश करके उसे नुकसान पहुंचाते हैं। तांबे वाला पानी पीलिया, हैजा आदि बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करता है। अगर आपको लगता है कि आपका पानी पूरी तरह से शुद्ध नहीं है तो उसे तांबे के बर्तन में रात भर रखने के बाद इस्तेमाल करें।

मस्तिष्क के लिए अमृत

एक तंत्रिका कोशिका के दूसरे तंत्रिका कोशिका तक संदेश पहुंचाने से ही हमारा दिमाग काम कर पाता है। ये तंत्रिका कोशिकाएं मायलिन नाम के आवरण से ढंकी हुई होती हैं, जो इनकी संदेश पहुंचाने के काम में मदद करता है। तांबा इस मायलिन आवरण के तैयार होने में मदद करता है।

त्वचा के लिए फायदेमंद

आंखों, बालों व त्वचा के रंग को बेहतर बनाने वाला पिगमेंट मिलेनिन होता है। मिलेनिन त्वचा को सन डैमेज और निशानों से बचाता है। तांबा इसके निर्माण के लिए मुख्य घटक होता है। इसके अलावा, तांबा त्वचा की नई कोशिकाओं के निर्माण में भी मदद करता है। आयुर्वेद के अनुसार हर रोज सुबह तांबे का पानी पीने से त्वचा में बहुत फर्क आता है।

 

तांबे का बर्तन खरीदते हुए ध्यान रखें कि वो शुद्ध तांबे से बना हो। आप तांबे का जग, लोटा या ग्लास खरीद सकते हैं। तांबे के बर्तन में जब पानी डालकर रखें तो उसे ढंकना न भूलें। तांबे के बर्तन को धोने के लिए नींबू का इस्तेमाल करें।

 

केंसर का राम बन इलाज़

इस फल के सेवन से कोई भी बीमारी नही बच सकती, चाहे वो एड्स हो या कैंसर

बेशक नोनी (मोरिंडा सिट्रोफोलिया) नामक यह फल किसी बीमारी का इलाज़ तो नहीं मगर इसके सेवन से कोई भी बीमारी नही बच सकती, चाहे वो एड्स हो या कैंसर।

आज नोनी फल आम लोगों के लिए जितना गुमनाम है, सेहत के लिए उतना ही फायदेमंद। इसके रूप में वैज्ञानिकों को एक ऐसी संजीवनी हाथ लगी है जो स्वास्थ्य के लिए अमृत समान है।

अस्थमा, गठिया, मधुमेह, दिल की बीमारी, नपुंसकता, स्त्रियों की बीमारिया एवम् बांझपन सहित कई बीमारियों के इलाज में रामबाण साबित हो रहा है।

मात्र यही नही बल्कि पान-मसाला, गुटखा, तंबाकू की जिसे आदत है वे अगर नोनी खायेंगे या उसका जूस पिएंगे तो उनकी इस तरह की तरह आदतें छूट जाएँगी और कैंसर भी नही होगा। इस फल से प्रतिरोधक क्षमता इतनी अद्भुत  तरीके से बढ़ती है की फिर एड्स क्यों न हो उसको भी यह क्योर करने का दम रखता है।


अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)
 शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को प्रसन्न करने के उपाय इस प्रकार हैं...
1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।
2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।
3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।
4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।
यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में बांट देना चाहिए।
शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन-सा रस (द्रव्य) चढ़ाने से क्या फल मिलता है...
1. बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।
2. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं। 
3. शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है। 
4. शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।
5. शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से टीबी रोग में आराम मिलता है।
6. यदि शारीरिक रूप से कमजोर कोई व्यक्ति भगवान शिव का अभिषेक गाय के शुद्ध घी से करे तो उसकी कमजोरी दूर हो सकती है।
शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन-सा फूल चढ़ाने से क्या फल मिलता है...
1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
2. भगवान शिव की पूजा चमेली के फूल से करने पर वाहन सुख मिलता है। 
3. अलसी के फूलों से शिव की पूजा करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है। 
4. शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है। 
5. बेला के फूल से पूजा करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है। 
6. जूही के फूल से भगवान शिव की पूजा करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।
7. कनेर के फूलों से भगवान शिव की पूजा करने से नए वस्त्र मिलते हैं। 
8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।
9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है।
10. लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजा में शुभ माना गया है। 
11. दूर्वा से भगवान शिव की पूजा करने पर उम्र बढ़ती है।
इन उपायों से प्रसन्न होते हैं भगवान शिव
1. सावन में रोज 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ऊं नम: शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। इससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं।
2. अगर आपके घर में किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो सावन में रोज सुबह घर में गोमूत्र का छिड़काव करें तथा गुग्गुल का धूप दें।
3. यदि आपके विवाह में अड़चन आ रही है तो सावन में रोज शिवलिंग पर केसर मिला हुआ दूध चढ़ाएं। इससे जल्दी ही आपके विवाह के योग बन सकते हैं।
4. सावन में रोज नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाएं। इससे जीवन में सुख-समृद्धि आएगी और मन प्रसन्न रहेगा।
5. सावन में गरीबों को भोजन कराएं, इससे आपके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होगी तथा पितरों की आत्मा को शांति मिलेगी।
6. सावन में रोज सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निपट कर समीप स्थित किसी शिव मंदिर में जाएं और भगवान शिव का जल से अभिषेक करें और उन्हें काले तिल अर्पण करें। इसके बाद मंदिर में कुछ देर बैठकर मन ही मन में ऊं नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। इससे मन को शांति मिलेगी।                         
[11:25 AM, 8/19/2016] +91 85880 32669: भगवान श्री कृष्ण.....🌹
 
भगवान् श्री कृष्ण को अलग अलग स्थानों में अलग अलग नामो से जाना जाता है।
 
* उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामो से जानते है।
 
* राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है।
 
* महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है।
 
* उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है।
 
* बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है।
 
* दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है।
 
* गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है।
 
* असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।
 
* मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।
 
* गोविन्द या गोपाल में "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों , दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रिया हो वही गोविंद है गोपाल है।
 
* श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था..
 
* श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।
 
* श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।
 
* श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग में हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।।
 
* श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।
 
* दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।
 
* श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। श्री कृष्ण राधारानी से निष्काम और निश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी श्री कृष्ण से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अंतर था। श्री कृष्ण ने 14 वर्ष की उम्र में वृंदावन छोड़ दिया था।। और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले।
 
* श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सान्दीपनि से अलौकिक विद्याओ का ज्ञान अर्जित किया था।।
 
* श्री कृष्ण की कुल 125 वर्ष धरती पर रहे । उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था।
 
* श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे।
 
* श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।
 
* श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।
 
* श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।
 
* श्री कृष्ण को ज़रा नाम के शिकारी का बाण उनके पैर के अंगूठे मे लगा वो शिकारी पूर्व जन्म का बाली था,बाण लगने के पश्चात भगवान स्वलोक धाम को गमन कर गए।
 
* श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था।
 
* श्री कृष्ण ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यु खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी।
 
* श्री कृष्ण के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं।
 
* श्री कृष्ण अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्" न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था और न ही उनकी मृत्यु हुयी थी।
 
सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज
अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच--
( भगवद् गीता अध्याय 18 )
 
श्री कृष्ण : "सभी धर्मो का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मैं सभी पापो से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा,डरो मत
 
श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी 
हे नाथ नारायण वासुदेव ...👏🏼
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण..
कृष्ण कृष्ण हरे हरे..🌹
 
राधेकृष्ण राधेकृष्ण 🌹

अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)
मित्रो आयुर्वेद को छोड़ कर जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां है उनमे बनने वाली ओषधियों मे बहुत अधिक मांसाहार का प्रयोग होता है ,आप जितनी भी एलोपैथी ओषधियाँ लेते है उन मे जो कैप्सूल होते है वो सब के सब मांसाहारी होते हैं ।
 
दरअसल कैप्सूल के ऊपर जो कवर होता है उसके अंदर ओषधि भरी जाती है
वो कवर प्लास्टिक का नहीं होता आपको देखने मे जरूर लगेगा कि ये प्लास्टिक है लेकिन वो प्लास्टिक का नहीं है क्योंकि अगर ये प्लास्टिक का होगा तो आप उसको खाओगे तो अंदर जाकर घुलेगा ही नहीं ,क्योंकि प्लास्टिक 400 वर्ष तक घुलता नहीं है वो कैप्सूल ऐसे का ऐसे सुबह टॉइलेट के रास्ते बाहर आ जाएगा ।
तो मित्रो ये जो कैप्सूल के खाली कवर जिस कैमिकल से बनाये जाते है उसका नाम है gelatin (जिलेटिन ) । जिलेटिन से ये सब के सब कैप्सूल के कवर बनाये जाते है ,और जिलेटिन के बारे मे आप सब जानते है और बहुत बार आपने मेनका गांधी के मुंह से भी सुना होगा की जब गाय के बछड़े या गाय को कत्ल किया जाता है उसके बाद उसके पेट की बड़ी आंत से जिलेटिन बनाई जाती है तो ये सब के सब कैप्सूल मांसाहारी होते है ।
आप चाहे तो मेरी बात पर विश्वास ना करें आप google पर (capsules made of ) लिख कर search करें । 1 नहीं 2 नहीं सैंकड़ों link आपको मिल जाएंगे , जिससे आपको स्पष्ट हो जाएगा की कैप्सूल जिलेटिन से बनाये जाते है।
मित्रो आपने एक और बात पर ध्यान दिया होगा 90 % एलोपेथी ओषधियों पर कोई हरा या लाल निशान नहीं होता । कारण एक ही है इन ओषधियों मे बहुत अधिक मांसाहार का उपयोग होता है ,और कुछ दिन पहले कोर्ट ने कहा था की ओषधियों पर हरा या लाल निशान अनिवार्य होना चाहिए और ये सारी बड़ी एलोपेथी कंपनियाँ अपनी छाती कूटने लग गई थी ।
कैप्सूल के अतिरिक्त मित्रो एलोपेथी मे गोलियां होती है ( tablets ) । तो कुछ गोलियां जो होती है जिनको आप अपने हाथ पर रगड़ेगे तो उसमे से पाउडर निकलेगा ,हाथ सफ़ेद हो जाएगा पीला हो जाएगा ,वो तो ठीक है लेकिन कुछ गोलियां ऐसी होती है जिनको हाथ पर घसीटने से कुछ नहीं होता उन सबके ऊपर भी जिलेटिन का कोटिंग किया होता है वो भी कैप्सूल जैसा है । वो भी सब मांसाहारी है ।
थोड़ी सी कुछ गोलियां ऐसी है जिन पर जिलेटिन का कोटिंग नहीं होता ,लेकिन वो गोलियां इतनी खतरनाक है कि आपको कैंसर ,शुगर ,जैसे 100 रोग कर सकती हैं जैसे एक दवा है पैरासिटामोल । इस पर जिलेटिन का कोटिंग नहीं है , लेकिन ज्यादा प्रयोग किया तो ब्रेन हैमरेज हो जाएगा । ऐसे ही एक सिरदर्द की दवा है उस पर भी जिलेटिन का कोटिंग नहीं ज्यादा प्रयोग किया तो लीवर खराब हो जाएगा , ऐसे ही हार्ट के रोगियों को एक दवा दी जाती है उसमे भी कोटिंग नहीं लेकिन उसको ज्यादा खाओ तो किडनी खराब हो जाएगी ।
तो मित्रो जिनके ऊपर कोटिंग नहीं है वो वो दवा जहर है और जिनके ऊपर कोटिंग है वो दवा मांसाहारी है , तो अब प्रश्न उठता है तो हम खाएं क्या ?
मित्रो रास्ता एक ही आप अपनी चिकित्सा स्वयं करों अर्थात आपको पुनः
आयुर्वेद की ओर लौटना पड़ेगा ,
मित्रो दरअसल हमारे देश गौ ह्त्या मात्र मांस के लिए नहीं की जाती है इसके अतिरिक्त जो खून निकलता है,जो हड्डियों का चुरा होता है ,जो चर्बी से तेल निकलता है ,बड़ी आंत से जिलेटिन निकलती है ,चमड़ा निकलता है इन सब का प्रयोग कोसमेटिक (सोन्दर्य उत्पाद ),टूथपेस्ट ,नेलपालिश ,लिपस्टिक खाने पीने की चींजे , एलोपेथी ,दवाइयाँ जूते ,बैग आदि बनाने मे प्रयोग किया जाता है , जिसे हम सब लोग अपने दैनिक जीवन मे बहुत बार प्रयोग मे लाते है ,
तो गौ रक्षा की बात करने से पूर्व पहले हम सबको उन सब वस्तुओ का त्याग करना चाहिए जिनकी कारण जीव ह्त्या होती है , दैनिक जीवन मे प्रयोग होने वाली वस्तुओ की पहले अच्छे से परख करनी चाहिए फिर प्रयोग मे लाना चाहिए ।                         ⁠⁠[11:32 PM, 10/6/2016] +91 85880 3266

अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)
क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़ें  तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े 
तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे।
 
जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। 
 
इस ग्रन्थ को 
‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे
पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और 
विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक। 
 
पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।"
 
उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः
 
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥
 
अर्थातः 
मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं,
जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।
 
विलोमम्:
 
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥
 
अर्थातः 
मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के
चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ
विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।
 
 " राघवयादवीयम" के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-
 
राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥
 
विलोमम्:
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥
 
साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।
पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥
 
विलोमम्:
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।
राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥
 
कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।
सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥
 
विलोमम्:
भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।
कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥
 
रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।
नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥
 
विलोमम्:
यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।
तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥
 
यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥
 
विलोमम्:
तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।
सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥
 
मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।
काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥
 
विलोमम्:
तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।
तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥
 
रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।
कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥
 
विलोमम्:
मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।
तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥
 
सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।
साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥
 
विलोमम्:
हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।
यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥
 
सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।
सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥
 
विलोमम्:
सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।
यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥
 
तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।
यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥
 
विलोमम्:
हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।
सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥
 
वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।
भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥
 
विलोमम्:
सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।
होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥
 
यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।
सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥
 
विलोमम्:
भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।
वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥
 
रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।
यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥
 
विलोमम्:
नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।
हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥
 
यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।
सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥
 
विलोमम्:
यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।
गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥
 
दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।
ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥
 
विलोमम्:
नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥
 
सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।
तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥
 
विलोमम्:
हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।
जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥
 
सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।
न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७॥
 
विलोमम्:
तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।
सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥
 
तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।
वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥
 
विलोमम्:
केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।
ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥
 
गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।
सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥
 
विलोमम्:
हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।
यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥
 
हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।
राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥
 
विलोमम्:
घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।
धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥
 
ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।
 
हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि  ॥ २१॥
 
विलोमम्:
विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।
ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥
 
भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।
चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥
 
विलोमम्:
ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।
हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥
 
हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।
तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥
 
विलोमम्:
योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।
जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥
 
भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।
तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥
 
विलोमम्:
विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।
तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥
 
हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।
राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥
 
विलोमम्:
यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।
निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥
 
सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।
तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥
 
विलोमम्:
जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।
हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥
 
वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।
तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥
 
विलोमम्
नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।
सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥
 
हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।
चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥
 
विलोमम्
हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।
सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥
 
नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।
रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥
 
विलोमम्:
नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।
कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥
 
साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥
निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥
 
विलोमम्:
भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।स
गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥
 
॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री  ।।
 
कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें की दुनिया में कहीं भी ऐसा नही पाया गया ग्रंथ है ।
 
🙏शत् शत् प्रणाम ऐसे रचनाकार को।🙏⁠⁠⁠⁠

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क्या है मौत का राज? कैसे निकलते हैं शरीर से प्राण
 
नई दिल्ली। जिस प्राणी का जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है। मौत एक ऐसा अटल सत्य है जिसे जानने के बाद भी इंसान इससे घबरात है। वह ताउम्र मौत से बचने के लिए प्रयत्न करता रहता है। लेकिन मौत तो एक दिन आनी है और वह आकर रहती है। लेकिन मौत आने के भी कई कारण होते हैं। कुछ लोग इसे शरीर से प्राण निकलना कहते हैं तो कुछ इसे शारीरिक क्रिया मानते हैं। आज हम आपको मौत से जुड़ी कुछ ऐसी बातें बताएंगे जिसे जानकार आप भी हैरत में पड़ जाएंगे।
 
क्या है मौत का अर्थ?
अगर आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो मौत का अर्थ है शरीर से प्राण अर्थात आत्मा का निकल जाना। इसके बिना शरीर सिर्फ भौतिक वस्तु रह जाता है। इसे ही मौत कहते हैं। जबकि विज्ञान की दृष्टि से मृत्यु का अर्थ कुछ अलग है। उसके अनुसार शरीर में दो तरह की तरंगें होती हैं। पहली भौतिक तरंग और दूसरी मानसिक तरंग। जब किसी कारणवश इन दोनों का संपर्क टूट जाता है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।
 
साधारणत: मौत तीन प्रकार से होती है –
 
भौतिक मौत
किसी दुर्घटना या बीमारी से मृत्यु का होना भौतिक कारण की श्रेणी में आता है। इस समय भौतिक तरंग अचानक मानसिक तरंगों का साथ छोड़ देती है और शरीर प्राण त्याग देता है।
 
मानसिक मौत
जब अचानक किसी ऐसी घटना-दुर्घटना के बारे में सुनकर, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, मौत होती है तो ऐसे समय में भी भौतिक तरंगें मानसिक तरंगों से अलग हो जाती है और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यह मृत्यु का मानसिक कारण है।
 
आध्यात्मिक मौत
मौत का तीसरा कारण आध्यात्मिक है। आध्यात्मिक साधना में मानसिक तरंग का प्रवाह जब आध्यात्मिक प्रवाह में समा जाता है, तब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है क्योंकि भौतिक शरीर अर्थात भौतिक तरंग से मानसिक तरंग का तारतम्य टूट जाता है। ऋषि मुनियों ने इसे महामृत्यु कहा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार महामृत्यु के बाद नया जन्म नहीं होता और आत्मा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है।

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ज्ञान जा अथाह भण्डार....
ईशादि १०८ उपनिषदों की सूची -

१.ईश = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
२.केन उपनिषद् = साम वेद, मुख्य उपनिषद्
३.कठ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
४.प्रश्‍न उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
५.मुण्डक उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
६.माण्डुक्य उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
७.तैत्तिरीय उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
८.ऐतरेय उपनिषद् = ऋग् वेद, मुख्य उपनिषद्
९.छान्दोग्य उपनिषद् = साम वेद, मुख्य उपनिषद्
१०.बृहदारण्यक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
११.ब्रह्म उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
१२.कैवल्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
१३.जाबाल उपनिषद् (यजुर्वेद) = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
१४.श्वेताश्वतर उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
१५.हंस उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
१६.आरुणेय उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
१७.गर्भ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
१८.नारायण उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
१९.परमहंस उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
२०.अमृत-बिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
२१.अमृत-नाद उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
२२.अथर्व-शिर उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
२३.अथर्व-शिख उपनिषद् =अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
२४.मैत्रायणि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
२५.कौषीतकि उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
२६.बृहज्जाबाल उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
२७.नृसिंहतापनी उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
२८.कालाग्निरुद्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
२९.मैत्रेयि उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
३०.सुबाल उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३१.क्षुरिक उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
३२.मान्त्रिक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३३.सर्व-सार उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३४.निरालम्ब उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३५.शुक-रहस्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३६.वज्रसूचि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
३७.तेजो-बिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
३८.नाद-बिन्दु उपनिषद् = ऋग् वेद, योग उपनिषद्
३९.ध्यानबिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४०.ब्रह्मविद्या उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४१.योगतत्त्व उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४२.आत्मबोध उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
४३.परिव्रात् उपनिषद् (नारदपरिव्राजक) = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
४४.त्रिषिखि उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४५.सीता उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
४६.योगचूडामणि उपनिषद् = साम वेद, योग उपनिषद्
४७.निर्वाण उपनिषद् = ऋग् वेद, संन्यास उपनिषद्
४८.मण्डलब्राह्मण उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४९.दक्षिणामूर्ति उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
५०.शरभ उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
५१.स्कन्द उपनिषद् (त्रिपाड्विभूटि) = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
५२.महानारायण उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
५३.अद्वयतारक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
५४.रामरहस्य उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
५५.रामतापणि उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
५६.वासुदेव उपनिषद् = साम वेद, वैष्णव उपनिषद्
५७.मुद्गल उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
५८.शाण्डिल्य उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
५९.पैंगल उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
६०.भिक्षुक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
६१.महत् उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
६२.शारीरक उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
६३.योगशिखा उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
६४.तुरीयातीत उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
६५.संन्यास उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
६६.परमहंस-परिव्राजक उपनिषद् = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
६७.अक्षमालिक उपनिषद् = ऋग् वेद, शैव उपनिषद्
६८.अव्यक्त उपनिषद् = साम वेद, वैष्णव उपनिषद्
६९.एकाक्षर उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
७०.अन्नपूर्ण उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
७१.सूर्य उपनिषद् = अथर्व वेद, सामान्य उपनिषद्
७२.अक्षि उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
७३.अध्यात्मा उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
७४.कुण्डिक उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
७५.सावित्रि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
७६.आत्मा उपनिषद् = अथर्व वेद, सामान्य उपनिषद्
७७.पाशुपत उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
७८.परब्रह्म उपनिषद् = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
७९.अवधूत उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
८०.त्रिपुरातपनि उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
८१.देवि उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
८२.त्रिपुर उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
८३.कठरुद्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
८४.भावन उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
८५.रुद्र-हृदय उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
८६.योग-कुण्डलिनि उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
८७.भस्म उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
८८.रुद्राक्ष उपनिषद् = साम वेद, शैव उपनिषद्
८९.गणपति उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
९०.दर्शन उपनिषद् = साम वेद, योग उपनिषद्
९१.तारसार उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
९२.महावाक्य उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
९३.पञ्च-ब्रह्म उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
९४.प्राणाग्नि-होत्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
९५.गोपाल-तपणि उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
९६.कृष्ण उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
९७.याज्ञवल्क्य उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
९८.वराह उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
९९.शात्यायनि उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
१००.हयग्रीव उपनिषद् (१००) = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०१.दत्तात्रेय उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०२.गारुड उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०३.कलि-सन्तारण उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०४.जाबाल उपनिषद् (सामवेद) = साम वेद, शैव उपनिषद्
१०५.सौभाग्य उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
१०६.सरस्वती-रहस्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शाक्त उपनिषद्
१०७.बह्वृच उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
१०८.मुक्तिक उपनिषद् (१०८) = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्

।। जय श्री राम ।।


अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)

पारद का महत्त्व एवं विभिन्न उपाय
वैदिक रीतियों में, पूजन विधि में, समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति में पारद से बने शिवलिंग एवं अन्य आकृतियों का विशेष महत्त्व होता है।
वैदिक रीतियों में, पूजन विधि में, समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति में पारद से बने शिवलिंग एवं अन्य आकृतियों का विशेष महत्त्व होता है। पारद जिसे अंग्रेजी में एलम (Alum) भी कहते हैं , एक तरल पदार्थ होता है और इसे ठोस रूप में लाने के लिए विभिन्न अन्य धातुओं जैसे कि स्वर्ण, रजत, ताम्र सहित विभिन्न जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है। इसे बहुत उच्च तापमान पर पिघला कर स्वर्ण और ताम्र के साथ मिला कर, फिर उन्हें पिघला कर आकार दिया जाता है।

पारद को भगवान् शिव का स्वरूप माना गया है और ब्रह्माण्ड को जन्म देने वाले उनके वीर्य का प्रतीक भी इसे माना जाता है। धातुओं में अगर पारद को शिव का स्वरूप माना गया है तो ताम्र को माँ पार्वती का स्वरूप। इन दोनों के समन्वय से शिव और शक्ति का सशक्त रूप उभर कर सामने आ जाता है। ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमय हो जाता है। इसीलिए ऐसे शिवलिंग को "सुवर्ण रसलिंग" भी कहते हैं।

पारद के इस लिंग की महिमा का वर्णन कई प्राचीन ग्रंथों में जैसे कि रूद्र संहिता, पारद संहिता, रस्मर्तण्ड ग्रन्थ, ब्रह्म पुराण, शिव पुराण आदि में पाया गया है।

योग शिखोपनिषद ग्रन्थ में पारद के शिवलिंग को स्वयंभू भोलेनाथ का प्रतिनिधि माना गया है। इस ग्रन्थ में इसे "महालिंग" की उपाधि मिली है और इसमें शिव की समस्त शक्तियों का वास मानते हुए पारद से बने शिवलिंग को सम्पूर्ण शिवालय की भी मान्यता मिली है ।

इसका पूजन करने से संसार के समस्त द्वेषों से मुक्ति मिल जाती है। कई जन्मों के पापों का उद्धार हो जाता है। इसके दर्शन मात्र से समस्त परेशानियों का अंत हो जाता है। ऐसे शिवलिंग को समस्त शिवलिंगों में सर्वोच्च स्थान मिला हुआ है और इसका यथाविधि पूजन करने से

मानसिक, शारीरिक, तामसिक या अन्य कई विकृतियां स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है।

पौराणिक ग्रंथों में जैसे कि "रस रत्न समुच्चय" में ऐसा माना गया है कि 100 अश्वमेध यज्ञ, चारों धामों में स्नान, कई किलो स्वर्ण दान और एक लाख गौ दान से जो पुण्य मिलता है वो बस पारे के बने इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही उपासक को मिल जाता है।

अगर आप अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहते हों, योग और ध्यान में आपका मन लगता हो और मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा हो तो आपको पारे से बने शिव लिंग की उपासना करनी चाहिए। ऐसा करने से आपको मोक्ष की प्राप्ति भी हो जाती है।

पारद एक ऐसा शुद्ध पदार्थ माना गया है जो भगवान भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है। इसकी महिमा केवल शिवलिंग से ही नहीं बल्कि पारद के कई और अचूक प्रयोगों के द्वारा भी मानी गयी है।

धातुओं में सर्वोत्तम पारा अपनी चमत्कारिक और हीलिंग प्रॉपर्टीज के लिए वैज्ञानिक तौर पर भी मशहूर है।

पारद के शिवलिंग को शिव का स्वयंभू प्रतीक भी माना गया है। रूद्र संहिता में रावण के शिव स्तुति की जब चर्चा होती है तो पारद के शिवलिंग का विशेष वर्णन मिलता है। रावण को रस सिद्ध योगी भी माना गया है, और इसी शिवलिंग का पूजन कर उसने अपनी लंका को स्वर्ण की लंका में तब्दील कर दिया था।

कुछ ऐसा ही वर्णन बाणासुर राक्षस के लिए भी माना जाता है। उसे भी पारे के शिवलिंग की उपासना के तहत अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने का वर प्राप्त हुआ था।

ऐसी अद्भुत महिमा है पारे के शिवलिंग की। आप भी इसे अपने घर में स्थापित कर घर में समस्त दोषों से मुक्त हो सकते हैं। लेकिन ध्यान अवश्य रहे कि साथ में शिव परिवार को भी रख कर पूजन करें।

पारद के कुछ अचूक उपायों का विवरण निम्नलिखित है, जिन्हें आप स्वयं प्रयोग कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति कर सकते हैं:

1. अगर आप अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहते हों, योग और ध्यान में आपका मन लगता हो और मोक्ष के प्राप्ति की इच्छा हो तो आपको पारे से बने शिवलिंग की उपासना करनी चाहिए। ऐसा करने से आपको मोक्ष की प्राप्ति भी हो जाती है।

2. अगर आपको जीवन में कष्टों से मुक्ति नहीं मिल रही हो, बीमारियों से आप ग्रस्त रहते हों, लोग आपसे विश्वासघात कर देते हों, बड़ी-बड़ी बीमारियों से ग्रस्त हों तो पारद के शिवलिंग को यथाविधि शिव परिवार के साथ पूजन करें। ऐसा करने से आपकी समस्त परेशानियां ख़त्म हो जाएंगी और बड़ी से बड़ी बीमारियों से भी मुक्ति मिल जाएगी।

3. अगर आपको धन सम्पदा की कमी बनी रहती है तो आपको पारे से बने हुए लक्ष्मी और गणपति को पूजा स्थान में स्थापित करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि जहां पारे का वास होता है वहां माँ लक्ष्मी का भी वास हमेशा रहता है। उनकी उपस्थिति मात्र से ही घर में धन लक्ष्मी का हमेशा वास रहता है।

4. अगर आपके घर में हमेशा अशांति, क्लेश आदि बना रहता हो, अगर आप को नींद ठीक से नहीं आती हो, घर के सदस्यों में अहंकार का टकराव और वैचारिक मतभेद बना रहता हो तो आपको पारद निर्मित एक कटोरी में जल डाल कर घर के मध्य भाग में रखना चाहिए। उस जल को रोज़ बाहर किसी गमले में डाल दें। ऐसा करने से धीरे-धीरे घर में सदस्यों के बीच में प्रेम बढ़ना शुरू हो जाएगा और मानसिक शान्ति की अनुभूति भी होगी।

पारद को पाश्चात्य पद्धति में उसके गुणों की वजह से Philospher's stone भी बोला जाता है। आयुर्वेद में भी इसके कई उपयोग हैं।

5. अगर आप उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, हृदय रोग से परेशान हैं, या फिर अस्थमा, डायबिटीज जैसी जानलेवा बीमारियों से ग्रसित हैं तो आपको पारद से बना मणिबंध जिसे कि ब्रेसलेट भी कहते हैं, अच्छे शुभ मुहूर्त में पहननी चाहिए। ऐसा करने से आपकी बीमारियों में सुधार तो होगा ही आप शान्ति भी महसूस करेंगे और रोगमुक्त भी हो जाएंगे।

पारे के शिवलिंग के पूजन की महिमा तो ऐसी है कि उसे बाणलिंग से भी उत्तम माना गया है। जीवन की समस्त समस्याओं के निदान के लिए पारद के उपयोग एवं इससे सम्बंधित उपाय अत्यंत प्रभावशाली हैं। यदि इनका आप यथाविधि अभिषेक कर, पूर्ण श्रद्धा से पूजन करेंगे तो जीवन में सुख और शान्ति अवश्य पाएंगे।

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पारद निर्मित शिवलिंग

शताश्वमेधेन् कृतेन पुण्यं, गोकोटिभिः स्वर्ण सहस्त्र दानात् नृणां भवेत्सूतक दर्शनेन्, यत्सर्वतीर्थेषु कृता भिषेकात्।। अर्थात् 100 अश्वमेघ यज्ञ, कोटि गायों के दान, अनेक स्वर्ण मुद्राओं के दान तथा चार धाम की यात्रा व तीर्थ स्नान से जो पुण्य मिलता है वह पुण्य पारद शिवलिंग के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है। जब पारद से बने शिवलिंग की पूजा विधि विधान, पूर्ण विश्वास व उत्साह के साथ की जाती है तो शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक उन्नति होती है साथ ही प्राकृतिक आपदाओं व अन्य बाहरी दुष्प्रभावों से रक्षा भी होती है। संत ज्ञानदेव के अनुसार सफलता व उन्नति प्राप्ति के उद्देश्य से पारद शिवलिंग रखना सर्वश्रेष्ठ है। आधुनिक युग में व्यक्ति सब कुछ खरीद सकता है लेकिन पवित्र किया हुआ, भली भांति पूजित, यंत्र सिद्ध व प्राण प्रतिष्ठित शिवलिंग किसी विरले भाग्यशाली के पास ही हो सकता है। संसार के सभी साधु, महात्मा पुरूषों ने ये माना है कि पारद शिवलिंग के स्पर्श व पूजन से सभी प्रकार के सांसारिक, आध्यात्मिक सुखों के साथ-साथ मोक्ष की प्राप्ति भी सुलभ हो जाती है। इसी कारण से सभी ऐश्वर्यवान लोग, राजनीतिज्ञ, फिल्मी सितारे, साधु संन्यासी आदि सभी शुद्ध पारद शिवलिंग की प्राप्ति की इच्छा रखते हैं। आयुर्वेद व अन्य पौराणिक ग्रंथांे से उद्धृत निम्नांकित श्लोकों द्वारा उपरोक्त विश्वास को बल मिलता है - विभिन्न शास्त्रों में ऐसे विविध उल्लेख मिलते हैं जिसके अनुसार यदि पारद शिवलिंग को घर के पूजा स्थल, पवित्र सामाजिक स्थल या किसी मंदिर में स्थापित किया जाय तो इसके शुभ प्रभाव से सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि की प्राप्ति तथा भगवती लक्ष्मी के सान्निध्य से न केवल स्थापित करने वाला अपितु उसकी आने वाली पीढ़ियां भी लाभान्वित होती हैं। इसके अतिरिक्त व्यक्ति को उसके शारीरिक, आध्यात्मिक अथवा मनोवैज्ञानिक कष्टों से भी छुटकारा मिल जाता है। शास्त्रों में ऐसा भी कहा गया है कि सुयोग्य गुरु अथवा भगवान शिव की कृपा से ही पारद शिवलिंग की प्राप्ति होती है तथा व्यक्ति को सौभाग्य व शुभ कर्मों के संपादन में सफलता के साथ-साथ अंत में परम मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। रसमार्तण्ड में लिखा है - भली भांति शुद्ध व पूजा किये गये पारद शिवलिंग के दर्शन व पूजा का फल अन्य कोटि प्रकार के शिवलिंग से कोटि (करोड़) गुणा अधिक होता है। भगवान शिव के कथनानुसार इसके दर्शन व स्पर्श मात्र से ब्रह्महत्या, गौ हत्या जैसे जघन्य पापों से तुरंत ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है। रसरत्नसमुच्चय ग्रंथ के अनुसार पारद शिवलिंग के दर्शन मात्र से आयुष्य, समृद्धि की प्राप्ति तथा सभी पापों से मुक्ति प्राप्त होती है। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक पारद शिवलिंग का पूजन करता है उसे तीनों लोकों में प्रतिष्ठित शिवलिंग की कृपा प्राप्त होती है तथा वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। पारद शिवलिंग के स्पर्श, दान, ध्यान व पूजन से इस जन्म व पूर्व जन्मार्जित सभी पापों का नाश हो जाता है। योगशिखोपनिषद ग्रंथ के अनुसार - पारद शिवलिंग महालिंग तथा शिव की शक्तियों का निवास स्थल माना जाता है अतः इसकी प्राप्ति से ऐश्वर्य व सर्वविध सफलता प्राप्त होती है। सर्वदर्शन संग्रह ग्रंथानुसार - भगवान शिव ने पार्वती से कहा कि जो व्यक्ति पारद शिवलिंग की पूजा करेगा भय, मृत्यु आदि उसके समीप नहीं आ सकते तथा उसके घर में कभी भी दारिद्रî नहीं आ सकेगा। ब्रह्मपुराण के अनुसार - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र सभी जन शिवलिंग की पूजा करके उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार - जबतक इस ब्रह्मांड में चंद्र व सूर्य रहेंगे तब तक इसकी पूजा करने वाले मनुष्य को जीवनपर्यंत सभी सुख जैसे धन सम्पति, समृद्धि, सफलता, सम्मान, सत्कार, संतान, सद्बुद्धि आदि प्राप्त होते हैं व अंत में मोक्ष लाभ होता है। शिवपुराणानुसार - पारद शिवलिंग का अर्चन गौ हत्या, भ्रूण हत्या तथा अन्य पाप कर्म जैसे माता-पिता व दूसरों को कष्ट पहुंचाना आदि पाप कर्मों से भी मुक्ति देता है। वायव्य पुराण के अनुसार - पारद शिवलिंग की पूजा, अर्चना करने से आयु, आरोग्य तथा अन्य सभी इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है। शारंगधर संहिता अध्याय 12 सूत्र 1 के अनुसार पारद शिवलिंग में समस्त आध्यात्मिक शक्तियां यथा वैभव, अष्टसिद्धि, नवनिधि आदि सभी शक्तियों की पवित्रता निहित हैं। एकनाथ भागवत अध्याय 15 व रस रत्न सम्मुच्चय के अनुसार - जिस प्रकार किसी देवता की पूजा, अर्चना करने से मनुष्य आनंद विभोर हो जाता है और उस देवता की पूजा के प्रभाव से उत्पन्न होने वाले वातावरण से अनेक प्रकार के दोष शांत हो जाते हैं उसी प्रकार का अनुभव पारद शिवलिंग के दर्शन मात्र से सुलभ हो जाता है। इसमें आगे कहा गया है कि इस प्रकार के अमृतमय व पवित्र तथा दुर्लभ पारद शिवलिंग की अवश्य ही पूजा होनी चाहिए। इसकी पूजा, अर्चना करने से मनुष्य को न केवल अनंत आनंद की प्राप्ति होती है अपितु रोग, शोक, पीड़ा, जन्म, जरा, मृत्यु आदि से भी निवृत्ति हो जाती है। पारद शिवलिंग को शिवशक्ति की संयुक्त शक्ति का उपोत्पाद माना जाता है। रसार्णव तंत्रानुसार - पारद शिवलिंग की पूजा करने वाले मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चतुर्विध पुरूषार्थ स्वतः सुलभ हो जाते हंै। आगे कहा गया है कि पारद शिवलिंग की उपासना से प्राप्त होने वाली प्रसन्नता व ऐश्वर्य अन्य प्रसिद्ध शिवलिंगों से कोटि गुणा अधिक होती है। शिवनिर्णय रत्नाकरानुसार - स्वर्ण से बने शिवलिंग की पूजा से प्राप्त होने वाला पुण्य पत्थर से बने शिवलिंग की पूजा से कोटि गुणा अधिक होता है। रत्न से बना शिवलिंग स्वर्ण शिवलिंग से प्राप्त होने वाले पुण्य का कोटि गुणा अधिक शुभ फलदायी होता है। बाणलिंग नर्मदेश्वर से बना शिवलिंग रत्न निर्मित शिवलिंग से कोटि गुणा अधिक पुण्य देता है। अंत में कहा गया है कि पूर्णतया शुद्ध किये गये पारे से बना शिवलिंग बाणलिंग नर्मदेश्वर से कोटि गुणा पुण्यफलदायी होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि पारद शिवलिंग विभिन्न प्रकार के अन्य शिवलिंगों में सर्वश्रेष्ठ है। इसके जैसा प्रभावशाली शिवलिंग कोई अन्य न है न होगा। अनेक धातुओं एवं काष्ठ तथा पत्थर एवं रत्नों से भी शिवलिंग का निर्माण होता है। सर्वाधिक महत्व पार्थिव शिवलिंग एवं पारद शिवलिंग का है। पार्थिव शिवलिंग मिट्टी से निर्मित किया जाता है तथा पारद शिवलिंग पारा द्रव को ठोस बनाकर निर्मित किया जाता है। पारद शिवलिंग का स्पर्श करने मात्र से अनेक रोगों से मुक्ति मिलती है। इसका अभिषेक करने से अन्य शिवलिंगों की अपेक्षा हजारों गुना अधिक फल मिलता है। इसे घर में स्थापित कर नित्य बिल्व पत्र अर्पित करने से धन की वृद्धि होती है। पारद शिव लिंग पर पानी का असर नहीं होता। इसे धूप में देखने पर इंद्रधनुषी आभा दिखाई देती है। पारद अपने आप में सिद्ध पदार्थ माना गया है। रत्न समुच्चय में पारद शिव लिंग की महिमा का विशद उल्लेख है। इसकी आराधना से सभी रोग दूर हो जाते हैं। निष्कर्षतः पारद शिवलिंग व अन्य पारद निर्मित मूर्तियों की साधना से सफलता शीघ्र प्राप्त होती है। वर्तमान भौतिक युग में विविध क्षेत्रों में साधनारत जातक चमत्कारी सफलताएं पाते देखे गये हैं। जीवन तो ऐसा विलक्षण क्षेत्र है, जो जड़ जगत के किसी मूल्यवान घटक से अधिक बहुमूल्य है। शिव पुराण में पारे को शिव का पौरुष कहा गया है। इसके दर्शन मात्र से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि शास्त्रों में इसे इतना अधिक महत्व दिया गया है। उपयोग एवं लाभ जैसे एक ही रोग की हजारों दवाइयां होती हैं, उसी प्रकार पारद सामग्री का उपयोग भी अनेक प्रकार से किया जा सकता है, जैसे सामग्री के सम्मुख स्तोत्र, मंत्र, कवच, पूजन, जप, अभिषेक, सामान्य रूप से नमन्, स्पर्श एवं दर्शन आदि जातक को लाभ प्रदान करते हैं। यह धातु शिव की है, अतः शिव के किसी भी मंत्र द्वारा इसकी पूजा की जा सकती है। पारद सामग्री - एक नजर में 1. पारदशिवलिंग - सभी क्षेत्रों में सफलता 2. पारद लक्ष्मी - धन की प्राप्ति 3. पारद गणेश - विघ्न नाश, ऋद्धि, सिद्धि व धन की प्राप्ति 4. पारद श्रीयंत्र - सुंदरता, धन, ज्ञान 5. पारद पिरामिड - नकारात्मक शक्ति को दूर करने तथा वास्तु में सुधार हेतु 6. पारद लक्ष्मी गणेश - सभी तरह की सफलता 7. पारद शिव - बीमारी से छुटकारा, मृत्यु और गंभीर खतरे से बचाव 8. पारद शंख - भाग्योन्नति 9. पारद दुर्गा - दुःख, रोग और दारिद्रî से मुक्ति, शत्रु नाश 10. पारद शिव परिवार - चारों ओर सफलता और कल्याण 11. पारद लक्ष्मी पादुका - लक्ष्मी का अशीर्वाद प्राप्त करने के लिए 12. पारद वैभव लक्ष्मी चैकी - लक्ष्मी प्राप्ति 13. पारद हनुमान - शक्ति, बल, सुरक्षा, शत्रुनाश 14. पारद पंचमुखी हनुमान - शक्ति, बल, सुरक्षा, शत्रुनाश 15. पारद गोली - आकस्मिक दुर्भाग्य से सुरक्षा 16. पारद कार्तिकेय - शत्रुनाश, मुकदमे आदि में विजय पारद शिवलिंग की परख * पारद शिवलिंग का प्रत्यक्ष प्रमाण स्पर्श करने मात्र से पता चल जाता है इसका तापमान बहुत कम होता है। * पारद शिवलिंग को छूने से बर्फ के समान ठण्डा और वजन में यह बहुत भारी होता है। * पारद शिवलिंग को माइक्रोस्कोप से देखने पर इसमें कुछ छोटे-छोटे धब्बे दिखते हैं। पारद शिव परिवार भारतीय संस्कृति में शिव परिवार की स्थापना का बड़ा महत्व है। शिव परिवार की स्थापना सभी प्रकार के कष्टों से छुटकारा देने वाली तथा सुख-समृद्धि व वैभव की प्राप्ति कराती है। शिव परिवार में भगवान शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय व नंदी सभी साथ होते हैं। दाम्पत्य सुख व संतान प्राप्ति के लिए पारद शिव परिवार की पूजा अत्यंत ही लाभकारी होती है। अधिकतर हिंदू परिवारों में इसकी स्थापना होती है। इसकी स्थापना शिवरात्रि, प्रदोष, नागपंचमी आदि शुभ मुहूर्तों में की जा सकती है। पारद शिवलिंग व पारद शिव परिवार की उपासना हेतु निम्नांकित मंत्र का प्रतिदिन 11 अथवा 108 बार जप करें। मंत्र: ओम त्रयम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम्। उर्वारूकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।। पारद लक्ष्मी इनकी कृपा से धन प्राप्ति में आने वाली संपूर्ण विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं जिससे धनागम के द्वार खुल जाते हैं। पारद धातु स्वयंसिद्ध धातु होने से इस से बनी देव मूर्तियों की विशेष पूजा, प्राण प्रतिष्ठा आदि करने की आवश्यकता नहीं होती। इस धातु में बनी लक्ष्मी की पूजा करने से शीघ्र धन प्राप्ति के अवसर प्राप्त होते हैं। पारद लक्ष्मी को अपने घर के अतिरिक्त व्यवसाय स्थल, फैक्ट्री, दुकान, कार्यालय आदि में भी स्थापित कर सकते हैं। इनके प्रभाव से आमदनी में वृद्धि, व्यावसायिक संपर्कों में सुधार होता है। मंत्र: ओम महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्। पारद गणेश गणेश जी ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि के दाता, सकल विघ्नों के विनाशक हैं। पारद गणेश जी को अपने घर के अतिरिक्त व्यवसाय स्थल, फैक्ट्री, दुकान, कार्यालय आदि में भी स्थापित कर सकते हैं। इनके प्रभाव से समस्त विघ्नों का शमन, आमदनी में वृद्धि, व्यावसायिक संपर्कों में सुधार व व्यापार में वृद्धि होकर ऐश्वर्यशाली जीवन व्यतीत होता है। मंत्र: एकदंताय विद्महे वक्र तुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।। पारद श्री यंत्र श्री यंत्र को स्थापित करने से आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। इस यंत्र के प्रभाव से जीवन के अनेक अभाव दूर होते हैं। यदि नौकरी में अधिकारियों से मतभेद, मनमुटाव तथा तरक्की में विलंब हो तो ये बाधाएं दूर होती हैं। मंत्र- ऊँ श्रीं ह्रीं क्लीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ऊँ ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः। पारद पिरामिड विभिन्न दिशाओं से प्रवेश करने वाली आकाशीय ऊर्जा अवरुद्ध होने से वास्तु के नियम भंग होते हैं तथा आकाशीय ऊर्जा की कमी हो जाती है। इसे वास्तु दोष कहते हैं। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि जिन घरों में आकाशीय ऊर्जा अवरुद्ध, या प्रभावित होती है, उन घरों में वास्तु दोष माना जाता है। वास्तु दोष को कम करने तथा आकाशीय ऊर्जा बढ़ाने के लिए अनेक उपाय करने होते हैं, अथवा घर को पुनः तोड़ कर नये ढंग से बनाना होता है। ऐसी स्थिति में आर्थिक हानि भी होती है। पारद पिरामिड अल्प मूल्य का उपाय है। घर, कार्यालय अथवा कोई भी कार्यस्थल हो, वहां यह पिरामिड रखने से आकाशीय ऊर्जा अधिक मिलती है, जिसके फलस्वरूप शरीर की अनेक बीमारियां धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं, घर में शांति का वातावरण बना रहता है, आर्थिक स्थिति स्वतः सुधरने लग जाती है तथा व्यक्ति दीर्घायु और सुखी जीवन व्यतीत करता है। पारद लक्ष्मी गणेश लक्ष्मी एवं गणेश जी का आर्थिक समृद्धि के लिए विशेष महत्व है। पारद लक्ष्मी गणेश की पूजा अर्चना से धन प्राप्ति में आने वाली संपूर्ण विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं जिससे धनागम के द्वार खुल जाते हैं। मंत्र: ओम लक्ष्मी विनायकाय नमः। पारद शिव भगवान शिव परमयोगी, परमगुरु, परमेश्वर, मृत्युंजय, महादेव, सर्वशक्तिमान, त्रैलोक्य स्वामी आदि नामों से जाने जाते हैं। पारद शिव की उपासना या दर्शन मात्र से व्यक्ति को सैकड़ों गायों के दान, हजारों स्वर्ण मुद्राओं के दान तथा काशी आदि तीर्थों के स्नान करने जितना फल मिलता है। भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि जो मेरी आराधना करता है उसके घर में कभी दरिद्रता नहीं आती न ही जीवन में उसे मृत्यु भय रहता है। पारद शिव की पूजा से व्यक्ति को यश, मान, पद, प्रतिष्ठा, पुत्र आदि में पूर्णता प्राप्त करते हुए अंत में मुक्ति की प्राप्ति होती है। मंत्र: ओम नमः शिवाय। पारद शंख पारद शंख को भगवान कुबेर का प्रतीक माना जाता है। इसका नित्य पूजा-पाठ व अन्य वैदिक अनुष्ठानों में पूजन किया जाता है। शंख को देवताओं का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। पारद शंख की स्थापना से व्यक्ति को मानसिक शांति व आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति तथा चिरस्थायी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। ऐसी भी मान्यता है कि पारद शंख की स्थापना से वास्तु दोषों का निराकरण भी होता है। पारद दुर्गा पारद दुर्गा की स्थापना व पूजा से चोर भय, प्रेत भय, शत्रु भय, रोग भय, बन्धन भय आदि से छुटकारा पाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त शक्तिमान, भूमिवान बनने व सभी सिद्धियों की प्राप्ति के साथ-साथ चतुर्विध पुरूषार्थ हेतु इनकी उपासना करनी चाहिए। मंत्र: ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै। पारद लक्ष्मी पादुका पारद धातु में बनी लक्ष्मी पादुकाएं विशेष शुभदायी मानी जाती हैं। घर में अथवा व्यवसाय स्थल पर इनका पूजन करने से आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। इन चरण पादुकाओं को बिछाकर मन ही मन देवी लक्ष्मी से अपने घर में अथवा व्यवसाय स्थल आदि में स्थिर रूप से पधारने की प्रार्थना करें। इन पादुकाओं में अंकित समस्त चिह्न जैसे- स्वास्तिक, कमल, कलश, चक्र, मत्स्य, त्रिकोण, त्रिशूल, शंख, सूर्य, ध्वजा आदि शुभ एवं लाभ के प्रतीक हैं। नित्य उन्हें प्रणाम करें, दर्शन करें और सिर पर स्पर्श करें। इस प्रकार, नित्य पूजन, दर्शन आदि करने से घर में लक्ष्मी का वास बना रहता है। पारद वैभव लक्ष्मी चैकी यह चैकी पारद धातु से निर्मित है, इसके आसन पर यंत्र राज श्रीयंत्र बना है तथा ऊपरी भाग पर अष्ट लक्ष्मी के चित्र अंकित हैं। इस सिद्ध चैकी पर यंत्र हमेशा जागृत रहता है, जिसके प्रभाव से जीवन में धन, वैभव की कभी कमी नहीं होती। पारद हनुमान पारद धातु से निर्मित पारद हनुमान जी की पूजा किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक समस्याओं, वाद-विवाद, भूत-प्रेत व वाहन दुर्घटना तथा शनि, राहु के दुष्प्रभावों आदि को दूर करने में विशेष लाभकारक है। इनकी पूजा के लिए मंगलवार को हनुमान चालीसा, रामचरित मानस व सुंदर कांड का पाठ अवश्य करें। ऐसा करने से व्यक्ति को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। मंत्र: हं हनुमते रूद्रात्मकाय हुं फट्। पारद पंचमुखी हनुमान यह शत्रुनाश, कोर्ट कचहरी के मामलों में विजय, वाहन दुर्घटना व रोग से रक्षा के अतिरिक्त ऊपरी बाधा, बुरी नजर, जादू टोना इत्यादि से रक्षा में अत्यंत प्रभावशाली होते हैं। चिंता, भय, मानसिक तनाव, दुःख, दारिद्रî, संकट, खतरा व दुर्भाग्य नाश के लिए पंचमुखी पारद हनुमान की उपासना सर्वश्रेष्ठ है। इसके लिए निम्नांकित मंत्र का जप करें - मंत्र: हं हनुमते रूद्रात्मकाय हुं फट्। पारद गोली इसे जादू, टोना, बुरी नजर तथा आकस्मिक दूर्भाग्य से सुरक्षा हेतु जेब में रखा जाता है। इसके अतिरिक्त इसे अनाज की विभिन्न प्रकार से कीटों से रक्षा के उद्देश्य से कृषक अपने अनाज भण्डारों में रखते हैं। पारद कार्तिकेय कार्तिकेय भगवान शिव के पुत्र हैं। पारद कार्तिकेय की स्थापना व पूजन से भगवान शिव व मंगल ग्रह की कृपा होती है। वाद -विवाद, शत्रुनाश तथा कोर्ट कचहरी के मामलों में भी सफलता प्राप्त होती है। निष्कर्ष पारद सामग्री घर, व्यवसाय, वाहन आदि में रखने से उसकी दैवीय शक्ति जातक को लाभ प्रदान करती है। घर में पारद सामग्री रखना ज्यादा उचित होता है। पारद सामग्री का तापमान हमेशा ही न्यूनतम् ्होता है, जिसे छूते ही उसकी गुणवत्ता का आभास हो जाता है। पारद धातु में वे अनुपम एवं असीमित गुण पाये जाते हैं, जो मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं। पारद से निर्मित वस्तुओं को सूक्ष्मता से देखने पर उन पर छोटे-छोटे धब्बे दिखते हैं। वजन में यह लोहे से सोलह गुना अधिक भार का होता है। पारद सामग्री को बर्फ के बीच में रखने से वह अपने भार के अनुपात में बर्फ को शोषित कर लेता है। पारद सामग्री के निर्माण में अत्यंत कठिनाइयां आती हैं। अनेक औषधियों के संयोग, मिश्रण, घर्षण एवं विमलीकरण से इसे ठोस बनाया जाता है। ठोस होने पर इसे आलौकिक, दुर्लभ, मूल्यवान एवं शुद्ध माना जाता है। पारद तरल होता है, इसकी विशेषता यह है कि यह अपना रंग हर धातु पर चढ़ा देती है चाहे सोना, चांदी, पीतल, तांबा आदि कोई भी धातु क्यों न हो। शिवपुराण में पारा धातु को भगवान शिव का वीर्य कहा गया है। शास्त्रकारों ने इसे साक्षात् शिव कहा है।

 
अति चमत्कारिक दिव्य पारद शिवलिंग::---
🙏
प्रिय दोस्तो पारद(पारा)को रसराज कहा जाता है। पारद से बने शिवलिंग
की पूजा करने से बिगड़े काम भी बन जाते हैं। धर्मशास्त्रों के
अनुसार पारद शिवलिंग साक्षात भगवान शिव का ही रूप है
इसलिए इसकी पूजा विधि-विधान से करने से कई गुना फल
प्राप्त होता है तथा हर मनोकामना पूरी होती है। इसे घर में
स्थापित करने से भी कई लाभ हैं,जो इस प्रकार हैं-
-पारद शिवलिंग को घर में रखने से सभी प्रकार के वास्तु दोष
स्वत:ही दूर हो जाते हैं साथ ही घर का वातावरण भी शुद्ध
होता है।
-पारद शिवलिंग साक्षात भगवान शिव का स्वरूप माना गया
है। इसलिए इसे घर में स्थापित कर प्रतिदिन पूजन करने से किसी
भी प्रकार के तंत्र का असर घर में नहीं होता और न ही साधक पर
किसी तंत्र क्रिया का प्रभाव पड़ता है।
-यदि किसी को पितृ दोष हो तो उसे प्रतिदिन पारद
शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए। इससे पितृ दोष समाप्त हो
जाता है।
-पारद शिवलिंग की साधना से विवाह बाधा भी दूर होती है।
घर में
पारद
शिवलिंग सौभाग्य, शान्ति, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए
अत्यधिक सौभाग्यशाली है। शिवलिंग के मात्र दर्शन ही
सौभाग्यशाली होता है। इसके लिए किसी प्राणप्रतिष्ठा
की आवश्कता नहीं हैं। 
|| ॐ ह्रीं तेजसे श्रीं कामसे क्रीं पूर्णत्व सिद्धिं
पारदाय क्रीं श्रीं ह्रीं ॐ ||
कम से कम १०८ बार पारद शिवलिंग पर आचमनी से जल
चढ़ाएं।
हर बार चढाते समय मंत्र का उच्चारण करें।
पूरा होने पर उस जल को अपने मुह आँख तथा शारीर पर
छिडकें।
ऐसा कम से कम १२० दिन तक करें।
जटिलतम रोगों में भी लाभप्रद है।
ारद शिवलिंग (रसलिंग) का महत्व
पारद शिवलिंग दर्शन मात्र से ही मोक्ष का दाता है
इसके पूजा गृह में रहने मात्र से ही सुयश, आजीविका में
सफलता, सम्मान. पद प्रतिष्ठा ऐवम लक्ष्मी का सतत
आगमन होता है।
भारतीय संस्कृति का विशिष्टय है कि इसका निर्माण
अध्यात्म की सुदृढ़ भित्ती पर उन महर्षियों के द्वारा
किया गया है जो की राग – द्वेष से रहित ,
त्रिकालदर्शी एवं दिव्य दृष्टि सम्पन्न थे | इन्होंने अपनी
तपः पूत बुद्धि से दिव्य ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त कर ऐसी
युक्तियों का एवं साधनाओं का ज्ञान हमें दिया है जो
सामान्य मानव की बुद्धि से परे है |
 
मनुष्य को प्रयत्नों से भौतिक सुख तो प्राप्त हो सकते है
किन्तु आत्म बोध ईश्वर की अनुकम्पा से ही सम्भव है।
पारद शिवलिंग (रसलिंग) भुक्ति एवं मुक्ति का दाता है
एवं इनकी प्राप्ति में ही जीवन की पूर्ण सार्थकता है।
इसकी प्राप्ति, दर्शन, अर्चन से पूर्व जन्म के पाप नष्ट
होते हैं ,एवं भाग्य का उदय होता है| पारद का शोधन कर
उसे ठोस रूप में परिणत करना अत्यंत कठिन एवं असम्भव
को सम्भव में बदल देना है अतः पारद शिवलिंग अत्यंत
दुर्लभ है। तथापि सौभाग्य से जो व्यक्ति इस दुर्लभ
पारद शिवलिंग को प्राप्त कर अपने घर में इसकी पूजा
करते हैं वे अपनी कई पीड़ियों तक को सुसम्पन्न बना देते
हैं। साथ ही वे व्यक्ति स्वयं भी इस जगत में धन धान्य
पूर्ण तथा सुख सुविधा पूर्ण जीवन यापन करते हैं। जीवन
में जो लोग उन्नति के शिखर पर पहुचना चाहते हैं। या जो
लोग आर्थिक, राजनौतिक, व्यापारिक सफलता चाहते
हैं उन्हें पारद शिवलिंग (रसलिंग) का पूजन अपने घर में
अवश्य करना चाहिये। यह मोक्ष प्राप्ति का अद्वितीय
एवम सुनिश्चित साधन है।
रुद्रसंहिता के अनुसार बाणासुर एवं रावण जैसे शिव
भक्तों ने अपनी वांछित अभिलाषाओं को पारद
शिवलिंग (रसलिंग) के पूजन के द्वारा ही प्राप्त किया
एवम लंका को स्वर्णमयी बनाकर विश्व को चकित कर
दिया | अध्यात्म में ऐसी अनेक अन्य क्रियायें भी हैं
किन्तु उनका अब हमें ज्ञान नहीं। इसका कारण है कि
या तो लोगों ने राज को राज ही बनाये रखा या फिर
सद्गुरु को सुपात्र का अभाव रहा |
 पारद पूर्ण
जीवित धातु है इसके साथ सोना रख देने पर सोने को
खा जाता है| दो चार दिन में ही सोना राख़ के रूप में
आपके सामने होगा एवं मात्र पारद ही उस पात्र में
बचेगा| पारद का मात्र स्पर्श ही सोने पर आश्चर्यचकित
हासोन्मुखी प्रभाव डालता है| पारद हाथ में लीजिए
एक मिनिट में ही आपकी अंगूठी का रंग सफ़ेद हो
जाएगा इसकी सजीवता का इससे बड़ा प्रत्यक्ष प्रमाण
क्या हो सकता है| पारद शिवलिंग का वजन अत्यधिक
होता है दूसरी कोई धातु इतनी वजनी नहीं होती|
विश्व में ऐसे भाग्यवान लोगों की संख्या कम ही है,
जिन्होंने कंगाल के घर जन्म लेकर भी अपने घर में पारद
शिवलिंग का पूजन किया और जीवन में पूर्णता प्राप्त
की | असंभव को संभव में बदला | पारद शिवलिंग
साक्षात् शिव का स्वरुप है एवं जिसके घर में पारद
शिवलिंग हैं उसके यहाँ साक्षात् उमा महेश्वर
विराजमान रहते हैं |
सनातन धर्म के कितने ही महत्वपूर्ण ग्रंथों में इस पारद
शिवलिंग की महत्ता को पढ़ा जा सकता है |
शिवपुराण :-
गोध्नाश्चैव कृतघ्नाश्चैव वीरहा भ्रूणहापि वा
शरणागतघातीच मित्रविश्रम्भघातकः
दुष्टपापसमाचारी मातृपितृप्रहापिवा
अर्चनात रसलिङ्गेन् तक्तत्पापात प्रमुच्यते |
अर्थात् गौ का हत्यारा , कृतघ्न , वीरघती गर्भस्थ शिशु
का हत्यारा, शरणगत का हत्यारा, मित्रघाती,
विश्वासघाती, दुष्ट, पापी अथवा माता-पिता को
मारने वाला भी यदि पारद शिवलिंग की पूजन करता है
तो वह भी तुरंत सभी पापों से मुक्त हो जाता है |
ब्रम्हपुराण :-
धन्यास्ते पुरुषः लोके येSर्चयन्ति रसेश्वरं |
सर्वपापहरं देवं सर्वकामफलप्रदम्॥
अर्थात् संसार में वे मनुष्य धन्य हैं जो समस्त पापों को
नष्ट करने वाले तथा समस्त मनोवांछित फलों को प्रदान
करने वाले पारद शिवलिंग की पूजन करते हैं और पूर्ण
भौतिक सुख प्राप्त कर परम गति को प्राप्त कर सकते हैं।
वायवीय संहिता :-
आयुरारोग्यमैश्वर्यं यच्चान्यदपि वाञ्छितं,
रसलिन्गाचर्णदिष्टं सर्वतो लभतेऽनरः
अर्थात् आयु आरोग्य ऐश्वर्य तथा और जो भी
मनोवांछित वस्तुएं हैं उन सबको पारद शिवलिंग की
पूजा से सहज में ही प्राप्त किया जा सकता है|
शिवनिर्णय रत्नाकर :-
मृदा कोटिगुणं सवर्णम् स्वर्णात् कोटिगुणं मणे:|
मणात् कोटिगुणं त् कोटिगुणं वाणो वनत्कोतिगुनं रसः|
रसात्परतरं लिङ्गं न् भूतो न भविष्यति||
अर्थात् मिट्टी या पाषाण से करोड़ गुना अधिक फल
स्वर्ण निर्मित शिवलिंग के पूजन से मिलता है | स्वर्ण से
करोड़ गुना अधिक मणि और मणि से करोड़ गुना अधिक
फल बाणलिंग नर्मदेश्वर के पूजन से मिलता है |स्वर्ण से
करोड़ो गुना अधिक मणि और मणि से करोड़ो गुना
अधिक फल बाणलिंग नर्मदेश्वर के पूजन से प्राप्त होता
है |नर्मदेश्वर बाणलिंग से भी करोड़ो गुना अधिक फल
पारद निर्मित शिवलिंग (रसलिंग) से प्राप्त होता है |
इससे श्रेष्ठ शिवलिंग न तो संसार में हुआ है और न हो
सकता है|
रसर्णवतन्त्र :-
धर्मार्थकाममोक्षाख्या पुरुषार्थश्चतुर्विधा:
सिद्ध्यन्ति नात्र सन्देहो रसराजप्रसादत:
अर्थात जो मनुष्य पारद शिवलिंग की एक बार भी पूजन
कर लेता है। उसे इस जीवन में ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
इन चारों प्रकार के पुरुषार्थो की प्राप्ति हो जाती
है। इसमें संदेह करने का लेशमात्र भी कारण नहीं है।
श्लोक:-
स्वयम्भुलिन्ग्सह्सैर्यत्फ़लम् संयगर्चनात
तत् फलं कोटिगुणितं रसलिंगार्चनाद भवेत्।
अर्थात~ हजारों प्रसिद्ध लिंगों की पूजा से जो फल
मिलता है। उससे करोड़ो गुना फल पारद निर्मित
शिवलिंग (रसलिंग ) की पूजा से मिलता है।
सर्वदर्शन संग्रह:-
अभ्रकं तव बीजं तु मम बीजं तु पारद:
बद्धो पारद्लिङ्गोयं मृत्युदारिद्रयनाशनम्|
स्वयं भगवान शिवशंकर भगवती पार्वती से कहते हैं कि
पारद को ठोस करके तथा लिंगाकार स्वरुप देकर जो
पूजन करता है उसे जीवन में मृत्यु भय व्याप्त नहीं होता
और किसी भी हालत में उसके घर दरिद्रता नहीं रहती।
ब्रह्मवैवर्तपुराण:-
पूजयेत् कालत्रयेन यावच्चन्द्रदिवाकरौ।
कृत्वालिङ्गं सकृत पूज्यं वसेत्कल्पशतं दिवि॥
प्रजावान भूमिवान विद्द्वान पुत्रबान्धववास्तथा।
ज्ञानवान् मुक्तिवान् साधु: रसलिंगार्चनाद भवेत् ॥
अर्थात् जो ऐक बार भी पारद शिवलिंग का विधि
विधान से पूजन कर लेता है वह जब तक सूर्य और चन्द्रमा
रहते हैं तब तक शिवलोक में वास करता है तथा उसके
जीवन में यश, मान, पद, प्रतिष्ठा,पुत्र, पौत्र, बन्धु-
बान्धव, जमीन-जायदाद, विद्या आदि में कोई कमी
नहीं रहती और अन्त में वह निश्चय ही मुक्ति प्राप्त
करता है।
अर्थात् पारद शिवलिंग एक महान उपलब्धि है। यह
आदिदेव महादेव का प्रत्यक्ष रुप है क्योंकि पारद शुभं
बीज माना जाता है। इसकी उत्पत्ति के बारे में कहा
गया है कि शिव के सत्व से उत्पन्न हुआ है। यही कारण है
कि शास्त्रकारों ने इसे साक्षात् शिव माना है।
विशुद्ध पारद को संस्कार द्वारा बाधित करके यदि
किसी भी देवी-देवता की प्रतिमा बनाई जाए तो वह
स्वयं सिद्ध होती है। वाग्भट्ट के अनुसार जो व्यक्ति
पारद शिवलिङ्ग का भक्तिपूर्वक पूजन करता है उसे
तीनों लोकों में स्थित शिवलिङ्गो के पूजन का फल
प्राप्त होता है। इसके दर्शन मात्र सैकड़ो अश्वमेघ यज्ञ,
करोड़ो गोदान एवं हजारों स्वर्ण मुद्राओं के दान करने
का फल मिलता है| पारद शिवलिंग का जिस घर में
नित्य पूजन होता है ,वहा सभी प्रकार के लौकिक-
पारलौकिक सुखो की सहज प्राप्ति होती है। पारद
शिवलिंग आध्यात्मिक तथा भौतिक पूर्णता को
साकार करने में पूर्ण समर्थ है। प्राचीनकाल से ही
देव,दानव, मानव, गन्धर्व, किन्नर सभी ने महोदव को
अपनी साधना ,एवं तपस्या से प्रसन्न कर श्रेठता को
प्राप्त किया ,एवं काल को अपने वश में कर संसार में
अजेय होकर अपनी विजय पताका फहराई।
आदिदेव महादेव ही ,ऐसे दयालु हैं जो भक्त के दोषो को
अनदेखा करते हुए अल्पायु मानव को अमरत्व का वरदान
प्रदान कर देते हैं।
ब्रह्मा के लेख के विरुद्ध जो अदेय है, उसे भी महादेव सहज
में ही दे देते हैं।
भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारि।

अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)

*दुनिया के अंत की भविष्यवाणियां.*
                                                             *💎ऐस्ट्रोजेम्स
*🗣ये तो हम सब जानते हैं कि एक ना एक दिन दुनिया का अंत होना तय है ज्यादातर धर्म शास्त्रों में दुनिया के विनाश या प्रलय का जिक्र मिलता है एक दिन इस पूरी दुनिया का विनाश होना है |सभी धर्मों और देशों के अनुसार प्रलय के लिए अलग-अलग परिभाषाएं बताई गई है |*

*इन्हीं को आधार बनाकर अब तक कई बार दुनिया के विनाश की भविष्यवाणीया की गई लेकिन कयामत का दिन कब आएगा इसकी एकदम सटीक भविष्यवाणी करना लगभग नामुमकिन है | जहां धार्मिक ग्रंथों को आधार बनाकर कई भविष्य वक्ताओं ने दुनिया के अंत की भविष्यवाणीयाँ की है |*

*वही कुछ प्रख्यात वैज्ञानिकों ने वैज्ञानिक आधार लेकर इसका समय बताने की कोशिश की है | आज के एपिसोड में बात करेंगे दुनिया के अंत की कुछ भविष्यवाणियो के बारे में जो मानव जाति को हमेशा से डराती आई है | इनमे से कुछ का वक्त निकल चुका है लेकिन कुछ अब भी भविष्य में दुनिया के खत्म होने का इंतजार कर रही है |*


*1:- LEONARDO DA VINCI 4006*
*दूसरे भविष्यवक्ताओं के साथ ही LEONARDO DA VINCI ने भी दुनिया के अंत की भविष्यवाणी की है DA VINCI के अनुसार दुनिया का अंत करने के लिए सन 4006 में एक भयंकर बाढ़ आएगी और सारी दुनिया का सफाया हो जाएगा | LEONARDO DA VINCI इतालवी पुनर्जागरण के सबसे बड़े ज्ञाताओ में से एक माने जाते हैं |*

*DA VINCI एक पेंटर ,चित्रकार ,इंजीनियर ,संगीतज्ञ ,वैज्ञानिक ,गणितज्ञ ,आविष्कारक और बहुत कुछ थे | DA VINCI के मुताबिक दुनिया के खत्म होने की शुरुआत एक भयंकर वैश्विक बाढ़ से 21 मार्च 4006 को शुरू होगी और 1 नवंबर 4006 तक पूरी दुनिया जलमग्न हो जाएगी और इस तरह से दुनिया का खत्मा हो जाएगा DA VINCI कहते हैं कि इस तरह से धरती पर फिर से एक नए जीवन की शुरुआत होगी |*

*2:- MAYA CIVILIZATION 21 DEC. 2012*
*भविष्यवाणी की गई थी कि 2012 में दुनिया का अंत हो जाएगा | मेक्सिको की माया सभ्यता के कैलेंडर के हिसाब से यह घोषणा की गई थी . माया सभ्यता की प्रमाणिकता इतनी थी कि उसकी भविष्यवाणी को ज्यादातर लोगों ने सच मान लिया था . लेकिन दूसरी भविष्यवाणीयो की तरह 2011 में चर्चा में आई ये भविष्यवाणी भी गलत साबित हुई |*
*ऐसा कहा जा रहा था कि माया सभ्यता का कैलेंडर इसी दिन समाप्त हो रहा है माया कैलेंडर में 21 दिसंबर 2012 के बाद की तारीख का जिक्र नहीं मिलता कैलेंडर के अनुसार यह दिन धरती का आखिरी दिन था इस पर यकीन करने वाले कहते हैं कि हजारों साल पहले ही अनुमान लगा लिया गया था कि 21 दिसंबर 2012 को धरती पर महा प्रलय आ सकती है |*

*यह सभ्यता गणित और खगोल विज्ञान की मामले में बेहद उन्नत थी | इस सभ्यता के कैलेंडर में पृथ्वी की उम्र 5126 साल आकी गई थी |*

*3:- BABA VANGA 5079*
*बुलगारिया की भविष्यवक्ता BABA VANGA इन दिनों चर्चाओ में है | VANGA को बाल्कन की नास्त्रेदमस के नाम से भी जाना जाता है इन्होंने जितनी भी भविष्यवाणीयाँ की है वह सभी सच हुई है बाबा ने पिछले दिनों फ्रांस और अमेरिका में 911 आतंकी हमले से लेकर सुनामी फुकुशिमा हादसे और आइसिस जैसे आतंकी संगठनों के सामने आने की भविष्यवाणीयाँ की थी जो सभी सच निकली |*
*लेकिन उन्होंने धरती को लेकर जो भविष्यवाणी की थी वह सच में चौंका देने वाली थी बाबा ने भविष्यवाणी की थी किस सन 5079 में दुनिया खत्म हो जाएगी ऐसा उन्होंने एकदम से नहीं कहा था . बल्कि इसके साथ ही बाबा ने सन 5079 से पहले की शताब्दी में होने वाली सभी घटनाओं की भविष्यवाणी की थी जिसमें उन्होंने बताया कि अगले 100 सालों में मानव कृत्रिम सूरज बना लेगा उसके अगले 200 सालों में हम एलियन सभ्यताओ से मिल पाएंगे | साल 3005 में मंगल ग्रह पर सबसे बड़ा मानव युद्ध होगा और 5079 में दुनिया खत्म हो जाएगी |*
*4:- END TIME PROPHECIES*
*जीवन की रोजमर्रा की समस्याओं के बीच एक बार फिर हाल ही में दुनिया के तबाह होने की भविष्यवाणी की गई थी | इस भविष्यवाणी के मुताबिक 29 जुलाई 2016 को पूरी दुनिया खत्म होने वाली थी |*

*END TIME PROPHECIES नाम की संस्था की भविष्यवाणी के अनुसार यह कहा गया था कि पृथ्वी के चुंबकीय धुर्वो के पलटने से इस आपदा की शुरुआत होगी | इससे पहले END TIME PROPHECIES की एक और भविष्यवाणी में यह कहा गया था कि इस दिन एक विशाल उल्कापिंड धरती से टकरा सकता है लेकिन किस्मत से ऐसा कुछ नहीं हुआ और धरती यूं ही सुरक्षित बनी हुई है |*

*5 :- ISAAC NEWTON 2060*
*हममें से ज्यादातर लोग ISAAC NEWTON को आधुनिक विज्ञान के महान वैज्ञानिको में से एक मानते हैं वह दुनिया के सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिकों में से एक थे . पर जहां एक तरफ NEWTON भौतिक विज्ञान के नियमों को देने के लिए जाने जाते हैं वही दूसरी तरफ NEWTON का झुकाव धर्म शास्त्रों में लिखे दुनिया के अंत की तरफ भी था |*
*वह बाइबल को पढ़ते हुए अपना काफी वक्त यह खोजने में बिताते थे की आखिर यह दुनिया का अंत कब होगा | बाइबल के अध्ययन के बाद उन्होंने माना कि दुनिया का अंत सन 2060 से होना शुरू हो जाएगा उनके मुताबिक यह समय रोमन एंपायर के गठन से ठीक 1260 साल बाद का है |*
*इस बात से यह पता चलता है के NEWTON की इस थ्योरी के पीछे वैज्ञानिक आधार से ज्यादा धार्मिक विश्वास जुड़ा हुआ था | खोज कर्ताओ ने NEWTON के इस पर लिखे हजारों लेखों का अध्यन करके पता लगाया किस सन 1704 में न्यूटन के लिखे एक लेख में 2060 में दुनिया की अंत की भविष्यवाणी की गई है उनके मुताबिक इस वक्त के आसपास आते ही दुनिया के अंत की शुरुआत हो जाएगी |*

*6:- STEPHEN HAWKING NEXT 1000 YEAR*
*सदी के सबसे महान वैज्ञानिकSTEPHEN HAWKING के अनुसार मानव के पास अपना अस्तित्व बचाने के लिए सिर्फ एक हजार साल और बचे हैं | ऑक्सफ़ोर्ड में दी गई अपनी एक स्पीच के दौरान STEPHEN ने कहा कि अगले 1000 सालों में धरती का अंत होना तय है |*
*उनके हिसाब से हमारी धरती अब उतनी मजबूत नहीं है जो आने वाली भयंकर विपदाओ का सामना कर सके स्टीफन हॉकिंग ने कहा कि हम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके ग्लोबल वार्मिंग,परमाणु हमलों ,बीमारियों और भयंकर बाढ़ से भले ही बजाएं पर हम हर बार भाग्यशाली साबित हो यह जरूरी नहीं है |*

*STEPHEN के मुताबिक मानव को अगले 1000 सालों में धरती जैसे किसी दूसरे प्लेनेट की खोज करके वहां बस्तियां बसानी होंगी अगर ऐसा नहीं हुआ तो समूचे ब्रह्मांड में अपनी जैसी अकेली मानव सभ्यता का अंत होना तय है |* 🕉🙏💎💎💎💎💎🙏🕉
                


अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)

*दिमाग’ से जुड़े 35 ग़ज़ब रोचक तथ्य* 👉👉👉👉👉

1. अगर 5 से 10 मिनट तक दिमाग में ऑक्सीजन की कमी हो जाए तो यह हमेशा के लिए Damage हो सकता हैं.
2. दिमाग पूरे शरीर का केवल 2% होता हैं लेकिन यह पूरी बाॅडी का 20% खून और ऑक्सीजन अकेला इस्तेमाल कर लेता हैं.
3. हमारा दिमाग़ 40 साल की उम्र तक बढ़ता रहता हैं.
4. हमारे दिमाग के 60% हिस्से में चर्बी होती हैं इसलिए यह शरीर का सबसे अधिक चर्बी वाला अंग हैं.
5. सर्जरी से हमारा आधा दिमाग़ हटाया जा सकता हैं और इससे हमारी यादों पर भी कुछ असर नही पडेगा.
6. जो बच्चे पाँच साल का होने से पहले दो भाषाएँ सीखते है उनके दिमाग की संरचना थोड़ी सी बदल जाती हैं.
7. दिमाग की 10% प्रयोग करने वाली बात भी सच नही हैं बल्कि दिमाग के सभी हिस्सों का अलग-अलग काम होता हैं.
8. दिमाग़ के बारे में सबसे पहला उल्लेख 6000 साल पहले सुमेर से मिलता हैं.
9. 90 मिनट तक पसीने में तर रहने से आप हमेशा के लिये एक मनोरोगी बन सकते हो.
10. बचपन के कुछ साल हमें याद नही रहते क्योकिं उस समय तक “HIPPOCAMPUS” डेवलप नही होता, यह किसी चीज को याद रखने के लिए जरूरी हैं.
11. छोटे बच्चे इसलिए ज्यादा सोते हैं क्योंकि उनका दिमाग़ उनके शरीर द्वारा बनाया गया 50% ग्लूकोज इस्तेमाल करता हैं.
12. 2 साल की उम्र में किसी भी उम्र से ज्यादा Brain cells होती हैं.
13. अगर आपने पिछली रात शराब पीयी थी और अब आपको कुछ याद नही हैं तो इसका मतलब ये नही हैं कि आप ये सब भूल गए हो बल्कि ज्यादा शराब पीने के बाद आदमी को कुछ नया याद ही नही होता.
14. एक दिन में हमारे दिमाग़ में 70,000 विचार आते हैं और इनमें से 70% विचार Negative (उल्टे) होते हैं.
15. हमारे आधे जीन्स दिमाग़ की बनावट के बारे में बताते हैं और बाकी बचे आधे जीन्स पूरे शरीर के बारे में बताते हैं.
16. हमारे दिमाग की memory unlimited होती हैं यह कंप्यूटर की तरह कभी नही कहेगा कि memory full हो गई.
17. अगर शरीर के आकार को ध्यान में रखा जाए तो मनुष्य का दिमाग़ सभी प्रणीयों से बड़ा हैं। हाथी के दिमाग का आकार उसके शरीर के मुकाबले सिर्फ 0.15% होता हैं बल्कि मनुष्य का 2%.
18. एक जिन्दा दिमाग बहुत नर्म होता है और इसे चाकू से आसानी से काटा जा सकता हैं.
19. जब हमे कोई इगनोर या रिजेक्ट करता हैं तो हमारे दिमाग को बिल्कुल वैसा ही महसूस होता हैं जैसा चोट लगने पर.
20. Right brain/Left brain जैसा कुछ नही हैं ये सिर्फ एक मिथ हैं. पूरा दिमाग़ इकट्ठा काम करता हैं.
21. चाॅकलेट की खूशबू से दिमाग़ में ऐसी तरंगे उत्पन्न होती हैं जिनसे मनुष्य आराम (Relax) महसूस करता हैं.
22. जिस घर में ज्यादा लड़ाई होती हैं उस घर के बच्चों के दिमाग पर बिल्कुल वैसा ही असर पड़ता हैं जैसा युद्ध का सैनिकों पर.
23. टी.वी. देखने की प्रक्रिया में दिमाग़ बहुत कम इस्तेमाल होता है और इसलिए इससे बच्चों का दिमाग़ जल्दी विकसित नहीं होता. बच्चों का दिमाग़ कहानियां पढ़ने से और सुनने से ज्यादा विकसित होता है क्योंकि किताबों को पढ़ने से बच्चे ज्यादा कल्पना करते हैं.

24. हर बार जब हम कुछ नया सीखते है तो दिमाग में नई झुर्रियां विकसित होती हैं और यह झुरिया ही IQ का सही पैमाना हैं.
25. अगर आप खुद को मना ले कि हमने अच्छी नींद ली हैं तो हमारा मस्तिष्क भी इस बात को मान जाता हैं.
26. हमारे पलक झपकने का समय 1 सैकेंड के 16वें हिस्से से कम होता है पर दिमाग़ किसी भी वस्तु का चित्र सैकेंड के 16वें हिस्से तक बनाए रखता हैं.
27. हेलमेट पहनने के बाद भी दिमाग को चोट लगने की संभावना 80% होती हैं.
28. मनुष्य के दिमाग़ में दर्द की कोई भी नस नही होती इसलिए वह कोई दर्द नही महसूस नही करता.
29. एक ही बात को काफी देर तक tension लेकर सोचने से हमारा दिमाग कुछ समय के लिए सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता को खो देता हैं.
31. दिमाग तेज करने के लिए सिर में मेहंदी लगाए और दही खाए. क्योकिं दही में अमीनो ऐसिड होता हैं जिससे टेंशन दूर होती हैं और दिमाग़ की क्षमता बढ़ती हैं.
32. अगर आप अपने स्मार्टफ़ोन पर लम्बे समय तक काम करते हैं तब आपके दिमाग़ में ट्यूमर होने का खतरा बड़ जाता हैं.
33. अगर दिमाग़ से “Amygdala” नाम का हिस्सा निकाल दिया जाए तो इंसान का किसी भी चीज से हमेशा के लिए डर खत्म हो जाएगा.
34. Brain (दिमाग) और Mind (मन) दो अलग-अलग चीजे हैं वैज्ञानिक आज तक पता नही लगा पाए कि मन शरीर के किस हिस्से में हैं.
35. हमारे दिमाग़ में एक “मिडब्रेन डोपामाइन सिस्टम” (एमडीएस) होता है, जो घटने वाली घटनाओं के बारे में मस्तिष्क को संकेत भेजता हैं हो सकता की हम इसे ही अंतर्ज्ञान अथवा भविष्य के पूर्वानुमान कहते हैं. जिस व्यक्ति के दिमाग में यह सिस्टम जितना ज्यादा विकसित होता है वह उतनी ही सटीक भविष्यवाणी कर सकता हैं.
Q. दिमाग तेज करने का सबसे आसान उपाय ?
Ans. दीमाग तेज करने का सबसे आसान उपाय हैं, जमकर पानी पाएँ। 1 गिलास पानी पीने से दिमाग 14% तेजी से काम करता हैं. जब तक प्यास शांत नही होती तब तक मनुष्य के दिमाग को ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होती हैं.
*दिमाग़ को ठण्डा रखिये* !!!
 


अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)

मणिपूरक चक्र अग्नि तत्व का केंद्र है इसे संतुलित कर के त्वचा रोगों का निदान कर सकते हैं -
1- अगर आपके चेहरे पर मुँहासे है तो एक रुई का छोटा सा टुकड़ा लीजिए और उसे नीम के तेल में भिगोकर उसे नाभि पर लगा लीजिए, ऐसा कुछ दिन
कीजिए. आपके मुहासे ठीक हो जायेंगे
2- दोस्तों अगर आपके होंठ फटे हुए है, या काले पड़ गए है तो आपके लिए बहुत ही सरल उपाय है, सुबह नहाने से पहले सरसों का तेल अपनी नाभि में
लगाए फिर नहाए, अगर आप ऐसा करते है तो कभी भी आपके होंठ नहीं फटेंगे
3- अगर आप अपने चेहरे का ग्लो और चमक वापिस पानाचहाते है तो अपनी नाभि में बादाम का तेल लगाए
4- कई बार चेहरा कठोर हो जाता है, ये अक्षर मौसम में हुए बदलाव के कारण होता है, चेहरे को मुलायम रखने के लिए शुद्ध देशी घी नाभि में लगाये
5- अगर चेहरे पर दाग़ धब्बे हो गए है तो उनको मिटाने के लिए नीम्बू का रस नाभि में लगाये
6- अगर चेहरे पर सफ़ेद चकत्ते (ललौसी) हैं तो नीम का तेल नाभि पे लगाएंमणिपूरक चक्र अग्नि तत्व का केंद्र है इसे संतुलित कर के त्वचा रोगों का निदान कर सकते हैं -
1- अगर आपके चेहरे पर मुँहासे है तो एक रुई का छोटा सा टुकड़ा लीजिए और उसे नीम के तेल में भिगोकर उसे नाभि पर लगा लीजिए, ऐसा कुछ दिन
कीजिए. आपके मुहासे ठीक हो जायेंगे
2- दोस्तों अगर आपके होंठ फटे हुए है, या काले पड़ गए है तो आपके लिए बहुत ही सरल उपाय है, सुबह नहाने से पहले सरसों का तेल अपनी नाभि में
लगाए फिर नहाए, अगर आप ऐसा करते है तो कभी भी आपके होंठ नहीं फटेंगे
3- अगर आप अपने चेहरे का ग्लो और चमक वापिस पानाचहाते है तो अपनी नाभि में बादाम का तेल लगाए
4- कई बार चेहरा कठोर हो जाता है, ये अक्षर मौसम में हुए बदलाव के कारण होता है, चेहरे को मुलायम रखने के लिए शुद्ध देशी घी नाभि में लगाये
5- अगर चेहरे पर दाग़ धब्बे हो गए है तो उनको मिटाने के लिए नीम्बू का रस नाभि में लगाये
6- अगर चेहरे पर सफ़ेद चकत्ते (ललौसी) हैं तो नीम का तेल नाभि पे लगाएंमणिपूरक चक्र अग्नि तत्व का केंद्र है इसे संतुलित कर के त्वचा रोगों का निदान कर सकते हैं -
1- अगर आपके चेहरे पर मुँहासे है तो एक रुई का छोटा सा टुकड़ा लीजिए और उसे नीम के तेल में भिगोकर उसे नाभि पर लगा लीजिए, ऐसा कुछ दिन
कीजिए. आपके मुहासे ठीक हो जायेंगे
2- दोस्तों अगर आपके होंठ फटे हुए है, या काले पड़ गए है तो आपके लिए बहुत ही सरल उपाय है, सुबह नहाने से पहले सरसों का तेल अपनी नाभि में
लगाए फिर नहाए, अगर आप ऐसा करते है तो कभी भी आपके होंठ नहीं फटेंगे
3- अगर आप अपने चेहरे का ग्लो और चमक वापिस पानाचहाते है तो अपनी नाभि में बादाम का तेल लगाए
4- कई बार चेहरा कठोर हो जाता है, ये अक्षर मौसम में हुए बदलाव के कारण होता है, चेहरे को मुलायम रखने के लिए शुद्ध देशी घी नाभि में लगाये
5- अगर चेहरे पर दाग़ धब्बे हो गए है तो उनको मिटाने के लिए नीम्बू का रस नाभि में लगाये
6- अगर चेहरे पर सफ़ेद चकत्ते (ललौसी) हैं तो नीम का तेल नाभि पे लगाएंमणिपूरक चक्र अग्नि तत्व का केंद्र है इसे संतुलित कर के त्वचा रोगों का निदान कर सकते हैं -
1- अगर आपके चेहरे पर मुँहासे है तो एक रुई का छोटा सा टुकड़ा लीजिए और उसे नीम के तेल में भिगोकर उसे नाभि पर लगा लीजिए, ऐसा कुछ दिन

कीजिए. आपके मुहासे ठीक हो जायेंगे

2- दोस्तों अगर आपके होंठ फटे हुए है, या काले पड़ गए है तो आपके लिए बहुत ही सरल उपाय है, सुबह नहाने से पहले सरसों का तेल अपनी नाभि में

लगाए फिर नहाए, अगर आप ऐसा करते है तो कभी भी आपके होंठ नहीं फटेंगे

3- अगर आप अपने चेहरे का ग्लो और चमक वापिस पानाचहाते है तो अपनी नाभि में बादाम का तेल लगाए

4- कई बार चेहरा कठोर हो जाता है, ये अक्षर मौसम में हुए बदलाव के कारण होता है, चेहरे को मुलायम रखने के लिए शुद्ध देशी घी नाभि में लगाये

5- अगर चेहरे पर दाग़ धब्बे हो गए है तो उनको मिटाने के लिए नीम्बू का रस नाभि में लगाये

6- अगर चेहरे पर सफ़ेद चकत्ते (ललौसी) हैं तो नीम का तेल नाभि पे लगाएंमणिपूरक चक्र अग्नि तत्व का केंद्र है इसे संतुलित कर के त्वचा रोगों का निदान कर सकते हैं -

1- अगर आपके चेहरे पर मुँहासे है तो एक रुई का छोटा सा टुकड़ा लीजिए और उसे नीम के तेल में भिगोकर उसे नाभि पर लगा लीजिए, ऐसा कुछ दिन

कीजिए. आपके मुहासे ठीक हो जायेंगे

2- दोस्तों अगर आपके होंठ फटे हुए है, या काले पड़ गए है तो आपके लिए बहुत ही सरल उपाय है, सुबह नहाने से पहले सरसों का तेल अपनी नाभि में

लगाए फिर नहाए, अगर आप ऐसा करते है तो कभी भी आपके होंठ नहीं फटेंगे

3- अगर आप अपने चेहरे का ग्लो और चमक वापिस पानाचहाते है तो अपनी नाभि में बादाम का तेल लगाए

4- कई बार चेहरा कठोर हो जाता है, ये अक्षर मौसम में हुए बदलाव के कारण होता है, चेहरे को मुलायम रखने के लिए शुद्ध देशी घी नाभि में लगाये

5- अगर चेहरे पर दाग़ धब्बे हो गए है तो उनको मिटाने के लिए नीम्बू का रस नाभि में लगाये

6- अगर चेहरे पर सफ़ेद चकत्ते (ललौसी) हैं तो नीम का तेल नाभि पे लगाएंमणिपूरक चक्र अग्नि तत्व का केंद्र है इसे संतुलित कर के त्वचा रोगों का निदान कर सकते हैं -

1- अगर आपके चेहरे पर मुँहासे है तो एक रुई का छोटा सा टुकड़ा लीजिए और उसे नीम के तेल में भिगोकर उसे नाभि पर लगा लीजिए, ऐसा कुछ दिन

कीजिए. आपके मुहासे ठीक हो जायेंगे

2- दोस्तों अगर आपके होंठ फटे हुए है, या काले पड़ गए है तो आपके लिए बहुत ही सरल उपाय है, सुबह नहाने से पहले सरसों का तेल अपनी नाभि में

लगाए फिर नहाए, अगर आप ऐसा करते है तो कभी भी आपके होंठ नहीं फटेंगे

3- अगर आप अपने चेहरे का ग्लो और चमक वापिस पानाचहाते है तो अपनी नाभि में बादाम का तेल लगाए

4- कई बार चेहरा कठोर हो जाता है, ये अक्षर मौसम में हुए बदलाव के कारण होता है, चेहरे को मुलायम रखने के लिए शुद्ध देशी घी नाभि में लगाये

5- अगर चेहरे पर दाग़ धब्बे हो गए है तो उनको मिटाने के लिए नीम्बू का रस नाभि में लगाये

6- अगर चेहरे पर सफ़ेद चकत्ते (ललौसी) हैं तो नीम का तेल नाभि पे लगाएं


अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)

अमुक भगवान के तिथि एवं वार

को निर्दिष्ट पेडों की पत्री न तोडें।
उदाहरणर्थ

,चतुर्थी को दूर्वा

,एकादशी को तुलसी

तथा प्रदोष के दिन बेल के पत्र आदि नहीं तोडने चाहिए।

यदि किसी कारणवश इन दिनाकं पत्री जमा करनी पडें तो उन पेडों से क्षमा मांगकर एवं प्रथना करके तोडें। 


अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)

*हाथ की पांच उंगलिया*

हमारे हाथ की पांचो उंगलिया शरीर के अलग अलग अंगों से जुडी होती है | इसका मतलब आप को दर्द नाशक दवाइयां खाने की बजाए इस आसान और प्रभावशाली तरीके का इस्तेमाल करना चाहिए | आज इस लेख के माध्यम से हम आपको बताऐंगे कि शरीर के किसी हिस्से का दर्द सिर्फ हाथ की उंगली को रगड़ने से कैसे दूर होता है |👇

हमारे हाथ की अलग अलग उंगलिया अलग अलग बिमारियों और भावनाओं से जुडी होती है | शायद आप को पता न हो, हमारे हाथ की उंगलिया चिंता, डर और चिड़चिड़ापन दूर करने की क्षमता रखती है | उंगलियों पर धीरे से दबाव डालने से शरीर के कई अंगो पर प्रभाव पड़ेगा |

*1. अंगूठा*
*– The Thumb*
हाथ का अंगूठा हमारे फेफड़ो से जुड़ा होता है ।अगर आपके दिल की धड़कन तेज है तो हल्के हाथों से अंगूठे पर मसाज करें और हल्का सा खींचे ।इससे आप को आराम मिलेगा |

*2. तर्जनी*
*– The Index Finger*
ये उंगली आंतों (gastro intestinal tract) से जुडी होती है | अगर आप के पेट में दर्द है तो इस उंगली को हल्का सा रगड़ें , दर्द गायब हो जायेगा।

*3. बीच की उंगली*
*– The Middle Finger*
ये उंगली परिसंचरण तंत्र तथा circulation system से जुडी होती है | अगर आप को चक्कर आ रहा है या आपका जी घबरा रहा है तो इस उंगली पर मालिश करने से तुरंत रहत मिलेगी |

*4. तीसरी उंगली*
*– The Ring Finger*
ये उंगली आपकी मनोदशा से जुडी होती है ।अगर किसी कारण आपकी मनोदशा अच्छी नहीं है या शांति चाहते हो तो इस उंगली को हल्का सा मसाज करे और खींचे, आपको जल्द ही इस के अच्छे नतीजे प्राप्त हो जाएंगे, आप का मूड खिल उठे गा।

*5. छोटी उंगली*
*– The Little Finger*
छोटी उंगली का किडनी और सिर के साथ सम्बन्ध होता है | अगर आप को सिर में दर्द है तो इस उंगली को हल्का सा दबाये और मसाज करे, आप का सिर दर्द गायब हो जायेगा | इसे मसाज करने से किडनी भी तंदरुस्त रहती है |

पोस्ट अच्छी लगे तो कम से कम अपने मित्रो और परिचितों तक भेजे और स्वस्थ भारत के निर्माण मैं अपना पूर्ण योगदान दे।

🌸 धन्यवाद 🌸 


अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)

आज से 5 या 10 साल पहले ऐसी कोई ऐसी जगह नहीं होती थी जहां PCO न हो। फिर जब सब की जेब में मोबाइल फोन आ गया, तो PCO बंद होने लगे.. फिर उन सब PCO वालों ने फोन का recharge बेचना शुरू कर दिया।अब तो रिचार्ज भी ऑन लाइन होने लगा है।

आपने कभी ध्यान दिया है..?

आजकल बाज़ार में हर तीसरी दूकान आजकल मोबाइल फोन की है।
sale, service, recharge , accessories, repair, maintenance की।

अब सब Paytm से हो जाता है.. अब तो लोग रेल का टिकट भी अपने फोन से ही बुक कराने लगे हैं.. अब पैसे का लेनदेन भी बदल रहा है.. Currency Note की जगह पहले Plastic Money ने ली और अब Digital हो गया है लेनदेन।

दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है.. आँख कान नाक खुले रखिये वरना आप पीछे छूट जायेंगे..।

1998 में Kodak में 1,70,000 कर्मचारी काम करते थे और वो दुनिया का 85% फ़ोटो पेपर बेचते थे..चंद सालों में ही Digital photography ने उनको बाज़ार से बाहर कर दिया.. Kodak दिवालिया हो गयी और उनके सब कर्मचारी सड़क पे आ गए।

आपको अंदाजा है कि आने वाले 10 सालों में दुनिया पूरी तरह बदल जायेगी और आज चलने वाले 70 से 90% उद्योग बंद हो जायेंगे।

चौथी औद्योगिक क्रान्ति में आपका स्वागत है...

Uber सिर्फ एक software है। उनकी अपनी खुद की एक भी Car नहीं इसके बावजूद वो दुनिया की सबसे बड़ी Taxi Company है।

Airbnb दुनिया की सबसे बड़ी Hotel Company है, जब कि उनके पास अपना खुद का एक भी होटल नहीं है।

US में अब युवा वकीलों के लिए कोई काम नहीं बचा है, क्यों कि IBM Watson नामक Software पल भर में ज़्यादा बेहतर Legal Advice दे देता है। अगले 10 साल में US के 90% वकील बेरोजगार हो जायेंगे... जो 10% बचेंगे... वो Super Specialists होंगे।

Watson नामक Software मनुष्य की तुलना में Cancer का Diagnosis 4 गुना ज़्यादा Accuracy से करता है। 2030 तक Computer मनुष्य से ज़्यादा Intelligent हो जाएगा।

2018 तक Driverless Cars सड़कों पे उतरने लगेंगी। 2020 तक ये एक अकेला आविष्कार पूरी दुनिया को बदलने की शुरुआत कर देगा।

अगले 10 सालों में दुनिया भर की सड़कों से 90% cars गायब हो जायेंगी... जो बचेंगी वो या तो Electric Cars होंगी या फिर Hybrid...सडकें खाली होंगी,Petrol की खपत 90% घट जायेगी,सारे अरब देश दिवालिया हो जायेंगे।

आप Uber जैसे एक Software से Car मंगाएंगे और कुछ ही क्षणों में एक Driverless कार आपके दरवाज़े पे खड़ी होगी...उसे यदि आप किसी के साथ शेयर कर लेंगे तो वो ride आपकी Bike से भी सस्ती पड़ेगी।

Cars के Driverless होने के कारण 99% Accidents होने बंद हो जायेंगे.. इस से Car Insurance नामक धन्धा बंद हो जाएगा।

ड्राईवर जैसा कोई रोज़गार धरती पे नहीं बचेगा।जब शहरों और सड़कों से 90% Cars गायब हो जायेंगी, तो Traffic और Parking जैसी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जायेंगी...क्योंकि एक कार आज की 20 Cars के बराबर होगी।

*समय के साथ बदलने की तैयारी करो।*
 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

HMT *(घडी)*
BAJAJ *(स्कूटर)*
DYNORA *(टीवी)*
MURPHY *(रेडियो)*
NOKIA *(मोबाइल)*
RAJDOOT *(बाईक)*
AMBASDOR *( कार)*

👉 मित्रों..इन सभी की गुणवक्ता में कोई कमी नहीं थी फिर भी बाजार से बाहर हो गए.!!
कारण...
*समयके साथ बदलाव*
*नहीं किया.!!*

इसलिए...
व्यक्तिको समयानुसार अपने व्यापार एवं अपने
*स्वभावमें भी बदलाव*
करते रहना चाहिएँ.!!
👉 *Update & Upgrade*
*Time to Time.!!*
समयके साथ चलिये और सफल रहिये
*अगर आप भी अपने काम में परिवर्तन करना चाहते है तो*

 


अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)

कितने गुप्त तरीके से छुपा कर रखा गया है दुनिया की सबसे ताकत वर शक्ति को

· August 19, 2015

अगर आप से कोई कहे की दुनिया की सबसे ताकत वर शक्ति आपके पास ही है बस आपको उसे इस्तेमाल करना नहीं आता और अगर कोई आपको उसे इस्तेमाल करना बता भी दे तो आप को विशेष फायदा नहीं होगा क्योंकि उसको इस्तेमाल करना कोई बच्चों का खेल नहीं है उसके लिए बड़ी मेहनत करना पड़ता है, तो आपको कैसा महसूस होगा !

पर हाँ अगर एक बार आपको उस शक्ति का इस्तेमाल करना आ जाय तो फिर तो आप गजब – गजब कमाल कर सकते है ! दुनिया के असम्भव काम चुटकियों में कर सकते है !

तो इस शक्ति के बारे में जानने के लिए आपको उत्सुकता तो बहुत हो रही होगी पर हो सकता है इस शक्ति का नाम सुनकर आपको थोडा सा निराशा हो की अरे यही है सबसे बड़ी शक्ति ! पर वास्तव में उस शक्ति के बारे में पूरी जानकारी बहुत कम लोगों को होती है और होती भी तो वो उसका सही से इस्तेमाल करना नहीं जानते |

तो दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है, आपका “मन” , सुनकर आपको झटका लग रहा होगा की मन कैसे शक्ति हो गया पर आप अंदाजा नहीं लगा सकते की मन की शक्ति इतनी प्रचण्ड है की भगवान को इसको बहुत ज्यादा चंचल बनाना पड़ा जिससे इसका गलत इस्तेमाल ना हो सके क्योकी मन की प्रचण्ड शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए केवल एक काम करना पड़ता की अपने मन को पूरी तरह से एकाग्र (मतलब मन में किसी और चीज का बिल्कुल भी ख्याल ना हों) करना पड़ता है |

अगर मन 100 % एकाग्र हो जाय किसी भी एक चीज पर वो भी सिर्फ एक सेकंड के लिए तो गजब चमत्कार हो सकता है !

श्री राम चरित मानस लिखने वाले श्री गोस्वामी तुलसी दास जी का कहना है कि –

“ राम राम सब कोई कहे, दशरथ कहे ना कोई |
एक बार दशरथ कहे, तो जन्म मरण ते मुक्त होय ||”

मतलब – राम भगवान का नाम तो सब कोई जपते हैं पर दशरथ से कोई नहीं कहता, यहाँ दशरथ का मतलब है दस इन्द्रिया, मतलब शरीर में जो दश इन्द्रिया (मतलब 100 परसेंट एकाग्रता) है उनसे अगर प्रभु श्री राम का नाम सिर्फ एक बार कोई ले ले तो उसी क्षण उसको अति दुर्लभ मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है |

तो कहने का मतलब है की एक बार भी आदमी 100 % अपने मन को या अपनी सोच को कंसन्ट्रेट या एकाग्र कर ले तो उसे अदभुत आश्चर्यजनक फायदे मिलते हैं पर इस एक सेकंड के मन को एकाग्र करने के लिए कई कई महीने प्रैक्टिस करनी पड़ सकती है और इस अभ्यास का सबसे आसान तरीका है जप करना |

मनोमय कोश की स्थिति एवं एकाग्रता के लिए जप का साधन बड़ा ही उपयोगी है। इसकी उपयोगिता इससे निर्विवाद है कि सभी धर्म, मजहब, सम्प्रदाय इसकी आवश्यकता को स्वीकार करते हैं। जप करने से मन की प्रवृत्तियों को एक ही दिशा में लगा देना सरल हो जाता है।

कहते हैं कि एक बार एक मनुष्य ने किसी भूत को सिद्ध कर लिया। भूत बड़ा बलवान् था। उसने कहा- ‘मैं तुम्हारे वश में आ गया, ठीक है, जो आज्ञा होगी सो करूँगा; पर एक बात है, मुझसे बेकार नहीं बैठा जाता, यदि बेकार रहा तो आपको ही खा जाऊँगा। यह मेरी शर्त अच्छी तरह समझ लीजिए।’ उस आदमी ने भूत को बहुत काम बताए, उसने थोड़ी- थोड़ी देर में सब काम कर दिए।

भूत की बेकारी से उत्पन्न होने वाला संकट उस सिद्ध को बेतरह परेशान कर रहा था। तब वह दुःखी होकर अपने गुरु के पास गया। गुरु ने सिद्ध को बताया कि आँगन में एक बाँस गाड़ दिया जाए और भूत से कह दो कि जब तक दूसरा काम न बताया जाए, तब तक उस बाँस पर बार- बार चढ़े और बार- बार उतरे। यह काम मिल जाने पर भूत से काम लेते रहने की भी सुविधा हो गई और सिद्ध के आगे उपस्थित रहने वाला संकट हट गया।

मन भी ऐसा ही भूत है। यह जब भी निरर्थक बैठता है, तभी कुछ न कुछ खुराफात करता है। इसलिए यह जब भी काम से छुट्टी पाए, तभी इसे जप पर लगा देना चाहिए। जप केवल समय काटने के लिए ही नहीं है, वरन् वह एक बड़ा ही उत्पादक एवं निर्माणात्मक मनोवैज्ञानिक श्रम है। निरन्तर पुनरावृत्ति करते रहने से मन में उस प्रकार का अभ्यास एवं संस्कार बन जाता है जिससे वह स्वभावतः उसी ओर चलने लगता है।

पत्थर को बार- बार रस्सी की रगड़ लगने से उसमें गड्ढा पड़ जाता है। पिंजड़े में रहने वाला कबूतर बाहर निकाल देने पर भी लौटकर उसी में वापस आ जाता है। गाय को जंगल में छोड़ दिया जाए तो भी वह रात को स्वयमेव लौट आती है। निरन्तर अभ्यास से मन भी ऐसा अभ्यस्त हो जाता है कि अपने दीर्घकाल तक सेवन किए गए कार्यक्रम में अनायास ही प्रवृत्त हो जाता है।

अनेक निरर्थक कल्पना- प्रपञ्चों में उछलते- कूदते फिरने की अपेक्षा आध्यात्मिक भावना की एक सीमित परिधि में भ्रमण करने के लिए जप का अभ्यास करने से मन एक ही दिशा में प्रवृत्त होने लगता है। आत्मिक क्षेत्र में मन लगा रहना, उस दिशा में एक दिन पूर्ण सफलता प्राप्त होने का सुनिश्चित लक्षण है। मन रूपी भूत बड़ा बलवान् है।

यह सांसारिक कार्यों को भी बड़ी सफलतापूर्वक करता है और जब आत्मिक क्षेत्र में जुट जाता है, तो भगवान् के सिंहासन को हिला देने में भी नहीं चूकता। मन की उत्पादक, रचनात्मक एवं प्रेरक शक्ति इतनी विलक्षण है कि उसके लिए संसार की कोई वस्तु असम्भव नहीं। भगवान् को प्राप्त करना भी उसके लिए बिलकुल सरल है। कठिनाई केवल एक नियत क्षेत्र में जमने की है, सो जप के व्यवस्थित विधान से वह भी दूर हो जाती है।

हमारा मन कैसा ही उच्छृंखल क्यों न हो, पर जब उसको बार- बार किसी भावना पर केन्द्रित किया जाता रहेगा, तो कोई कारण नहीं कि कालान्तर में उसी प्रकार का न बनने लगे। लगातार प्रयत्न करने से सरकस में खेल दिखाने वाले बन्दर, सिंह, बाघ, रीछ जैसे उद्दण्ड जानवर मालिक की मर्जी पर काम करने लगते हैं, उसके इशारे पर नाचते हैं, तो कोई कारण नहीं कि चंचल और कुमार्गगामी मन को वश में करके इच्छानुवर्ती न बनाया जा सके।

पहलवान लोग नित्यप्रति अपनी नियत मर्यादा में दण्ड- बैठक आदि करते हैं। उनकी इस क्रियापद्धति से उनका शरीर दिन- दिन हृष्ट- पुष्ट होता जाता है और एक दिन वे अच्छे पहलवान बन जाते हैं। नित्य का जप एक आध्यात्मिक व्यायाम है, जिससे आध्यात्मिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ और सूक्ष्म शरीर को बलवान् बनाने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है।

एक- एक बूँद जमा करने से घड़ा भर जाता है। चींटी एक- एक दाना ले जाकर अपने बिलों में मनों अनाज जमा कर लेती है। एक- एक अक्षर पढ़ने से थोड़े दिनों में विद्वान् बना जा सकता है। एक- एक कदम चलने से लम्बी मंजिल पार हो जाती है। एक- एक पैसा जोड़ने से खजाने जमा हो जाते हैं। एक- एक तिनका मिलने से मजबूत रस्सी बन जाती है।

जप में भी वही होता है। माला का एक- एक दाना फेरने से बहुत जमा हो जाता है। इसलिए योग- ग्रन्थों में जप को यज्ञ बताया गया है। उसकी बड़ी महिमा गाई है और आत्ममार्ग पर चलने की इच्छा करने वाले पथिक के लिए जप करने का कर्त्तव्य आवश्यक रूप से निर्धारित किया गया है।

गीता के अध्याय १० श्लोक २५ में कहा गया है—‘‘यज्ञों में जप- यज्ञ श्रेष्ठ है।’’ मनुस्मृति में, अध्याय २ श्लोक ८६ में बताया गया है कि होम, बलिकर्म, श्राद्ध, अतिथि- सेवा, पाकयज्ञ, विधियज्ञ, दर्शपौर्णमासादि यज्ञ, सब मिलकर भी जप- यज्ञ के सोलहवें भाग के बराबर नहीं होते। महर्षि भरद्वाज ने गायत्री व्याख्या में कहा है—‘‘समस्त यज्ञों में जप- यज्ञ अधिक श्रेष्ठ है। अन्य यज्ञों में हिंसा होती है, पर जप- यज्ञ में नहीं होती।

जितने कर्म, यज्ञ, दान, तप हैं, सब जप- यज्ञ की सोलहवीं कला के समान भी नहीं होते। समस्त पुण्य साधना में जप- यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है।’’ इस प्रकार के अगणित प्रमाण शास्त्रों में उपलब्ध हैं। उन शास्त्र वचनों में जप- यज्ञ की उपयोगिता एवं महत्ता को बहुत जोर देकर प्रतिपादन किया गया है।

कारण यह है कि जप, मन को वश में करने का रामबाण अस्त्र है और यह सर्वविदित तथ्य है कि मन को वश में करना इतनी बड़ी सफलता है कि उसकी प्राप्ति होने पर जीवन को धन्य माना जा सकता है। समस्त आत्मिक और भौतिक सम्पदाएँ संयत मन से ही तो उपलब्ध की जाती हैं।

जप- यज्ञ के सम्बन्ध में कुछ आवश्यक जानकारियाँ नीचे दी जाती हैं—

(१) जप के लिए प्रातःकाल एवं ब्राह्ममुहूर्त सर्वोत्तम काल है। दो घण्टे रात के रहने से सूर्योदय तक ब्राह्ममुहूर्त कहलाता है। सूर्योदय से दो घण्टे दिन चढ़े तक प्रातःकाल होता है। प्रातःकाल से भी ब्राह्ममुहूर्त अधिक श्रेष्ठ है।

(२) जप के लिए पवित्र, एकान्त स्थान चुनना चाहिए। मन्दिर, तीर्थ, बगीचा, जलाशय आदि एकान्त के शुद्ध स्थान जप के लिए अधिक उपयुक्त हैं। घर में यह करना हो तो भी ऐसी जगह चुननी चाहिए, जहाँ अधिक खटपट न हो।

(३) सन्ध्या को जप करना हो तो सूर्यास्त से एक घण्टा उपरान्त तक जप कर लेना चाहिए। प्रातःकाल के दो घण्टे और सायंकाल का एक घण्टा इन तीनों घण्टों को छोड़कर रात्रि के अन्य भागों में गायत्री मन्त्र नहीं जपा जाता।

(४) जप के लिए शुद्ध शरीर और शुद्ध वस्त्रों से बैठना चाहिए। साधारणतः स्नान द्वारा ही शरीर की शुद्धि होती है, पर किसी विवशता, ऋतु प्रतिकूलता या अस्वस्थता की दशा में मुँह धोकर या गीले कपड़े से शरीर पोंछकर भी काम चलाया जा सकता है। नित्य धुले वस्त्रों की व्यवस्था न हो सके तो रेशमी या ऊनी वस्त्रों से काम लेना चाहिए।

(५) जप के लिए बिना बिछाए न बैठना चाहिए। कुश का आसन, चटाई आदि घास के बने आसन अधिक उपयुक्त हैं। पशुओं के चमड़े, मृगछाला आदि आजकल उनकी हिंसा से प्राप्त होते हैं, इसलिए वे निषिद्ध हैं।

(६) पद्मासन में पालथी मारकर मेरुदण्ड को सीधा रखते हुए जप के लिए बैठना चाहिए। मुँह प्रातः पूर्व की ओर और सायंकाल पश्चिम की ओर रहे।

(७) माला तुलसी की या चन्दन की लेनी चाहिए। कम से कम एक माला नित्य जपनी चाहिए। माला पर जहाँ बहुत आदमियों की दृष्टि पड़ती हो, वहाँ हाथ को कपड़े से या गोमुखी से ढक लेना चाहिए।

(८) माला जपते समय सुमेरु (माला के प्रारम्भ का सबसे बड़ा केन्द्रीय दाना) का उल्लंघन न करना चाहिए। एक माला पूरी होने पर उसे मस्तिष्क तथा नेत्रों से लगाकर अंगुलियों को पीछे की तरफ उलटकर वापस जप आरम्भ करना चाहिए। इस प्रकार माला पूरी होने पर हर बार उलटकर नया आरम्भ करना चाहिए।

(९) लम्बे सफर में, स्वयं रोगी हो जाने पर, किसी रोगी की सेवा में संलग्न होने पर, जन्म- मृत्यु का सूतक लग जाने पर स्नान आदि पवित्रताओं की सुविधा नहीं रहती। ऐसी दशा में मानसिक जप चालू रखना चाहिए। मानसिक जप बिस्तर पर पड़े- पड़े, रास्ता या किसी भी पवित्र- अपवित्र दशा में किया जा सकता है।

(१०) जप नियत समय पर, नियत संख्या में, नियत स्थान पर, शान्त चित्त एवं एकाग्र मन से करना चाहिए। पास में जलाशय या जल से भरा पात्र होना चाहिए। आचमन के पश्चात् जप आरम्भ करना चाहिए। किसी दिन अनिवार्य कारण से जप स्थगित करना पड़े, तो दूसरे दिन प्रायश्चित्त स्वरूप एक माला अधिक जपनी चाहिए।

(११) जप इस प्रकार करना चाहिए कि कण्ठ से ध्वनि होती रहे, होठ हिलते रहें, परन्तु समीप बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से मन्त्र को सुन न सके। मल- मूत्र त्याग या किसी अनिवार्य कार्य के लिए साधना के बीच में ही उठना पड़े, तो शुद्ध जल से साफ होकर तब दोबारा बैठना चाहिए। जपकाल में यथासम्भव मौन रहना उचित है। कोई बात कहना आवश्यक हो तो इशारे से कह देनी चाहिए।

(१२) जप के समय मस्तिष्क के मध्य भाग में इष्टदेव का, प्रकाश ज्योति का ध्यान करते रहना चाहिए। साधक का आहार तथा व्यवहार सात्त्विक होना चाहिए। शारीरिक एवं मानसिक दोषों से बचने का यथासम्भव पूरा प्रयत्न करना चाहिए।

(१३) जप के लिए किसी सच्चे गुरु द्वारा ग्रहण किया हुआ मन्त्र सफल होता है और अगर कोई गुरु ना मिले तो भगवान का कोई भी नाम जपा जा सकता है। स्वेच्छापूर्वक मनचाही विधि से मनचाहा मन्त्र जपने से विशेष लाभ नहीं होता, इसलिए अपनी स्थिति के अनुकूल आवश्यक विधान, किसी अनुभवी पथ प्रदर्शक से मालूम कर लेना चाहिए।

उपरोक्त नियमों के आधार पर किया हुआ जप मन को वश में करने एवं मन की शक्ति को सुविकसित करने में बड़ा महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है।


अन्य महत्वपूर्ण (Other Impotent)

ब्रज के सुप्रसिद्ध १२ वनों के नाम

1. मधुवन, 2.तालवन, 3. कुमुदवन, 4. वहुलावन, 5. कामवन, 6. खदिरवन, 7. वृन्दावन, 8. भद्रवन, 9. भांडीरवन, 10. बेलवन, 11. लोहवन और 12. महावन हैं.

इनमें से आरंभ के 7 वन यमुना नदी के पश्चिम में हैं और अन्त के 5 व न उसके पूर्व में हैं. इनका संक्षिप्त वृतांत इस प्रकार है -
1. मधुवन - यह ब्रज का सर्वाधिक प्राचीन वनखंड है. इसका नामोल्लेख प्रगैतिहासिक काल से ही मिलता है. राजकुमार ध्रुव इसी वन में तपस्या की थी. शत्रुधन ने यहां के अत्याचारी राजा लवणासुर को मारकर इसी वन के एक भाग में मथुरापुरी की स्थापना की थी. वर्तमान काल में उक्त विशाल वन के स्थान पर एक छोटी सी कदमखंडी शेष रह गई है और प्राचीन मथुरा के स्थान पर महोली नामक ब्रज ग्राम वसा हुआ है, जो कि मथुरा तहसील में पड़ता है.

2. तालवन - प्राचीन काल में यह ताल के वृक्षों का यह एक बड़ा वन था, और इसमें जंगली गधों का बड़ा उपद्रव रहता था. भागवत में वर्णित है, बलराम ने उन गधों का संहार कर उनके उत्पात को शांत किया था. कालान्तर में उक्त वन उजड़ गया और शताब्दियों के पश्चात् वहां तारसी नामक एक गाँव बस गया, जो इस समय मथुरा तहसील के अंतर्गत है.

3. कुमुदवन - प्राचीन काल में इस वन में कुमुद पुष्पों की बहुलता थी, जिसके कारण इस वन का नाम 'कुमुदवन' पड़ गया था. वर्तमान काल में इसके समीप एक पुरानी कदमखड़ी है, जो इस वन की प्राचीन पुष्प-समृद्धि का स्मरण दिलाती है.

4. बहुलावन - इस वन का नामकरण यहाँ की एक वहुला गाय के नाम पर हुआ है. इस गाय की कथा 'पदम पुराण' में मिलती है. वर्तमान काल में इस स्थान पर झाड़ियों से घिरी हुई एक कदम खंड़ी है, जो यहां के प्राचीन वन-वैभव की सूचक है. इस वन का अधिकांश भाग कट चुका है और आजकल यहां बाटी नामक ग्राम बसा हुआ है.

5. कामवन - यह ब्रज का अत्यन्त प्राचीन और रमणीक वन था, जो पुरातन वृन्दावन का एक भाग था. कालांतर में वहां बस्ती बस गई थी. इस समय यह राजस्थान के भरतपुर जिला की ड़ीग तहसील का एक बड़ा कस्बा है. इसके पथरीले भाग में दो 'चरण पहाड़िया' हैं, जो धार्मिक स्थली मानी जाती हैं.

6. खदिरवन - यह प्राचीन वन भी अब समाप्त हो चुका है और इसके स्थान पर अब खाचरा नामक ग्राम बसा हुआ है. यहां पर एक पक्का कुंड और एक मंदिर है.

7. वृन्दावन - प्राचीन काल में यह एक विस्तृत वन था, जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य और रमणीक वन के लिये विख्यात था. जव मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के आतंक से नंद आदि गोपों को वृद्धवन (महावन) स्थित गोप-बस्ती (गोकुल) में रहना असंभव हो गया, तव वे सामुहिक रुप से वहां से हटकर अपने गो-समूह के साथ वृन्दावन में जा कर रहे थे.

भागवत् आदि पुराणों से और उनके आधार पर सूरदास आदि ब्रज-भाषा कावियों की रचनाओं से ज्ञात होता है कि उस वृन्दावन में गोवर्धन पहाड़ी थी और उसके निकट ही यमुना प्रवाहित होती थी. यमुना के तटवर्ती सघन कुंजों और विस्तृत चारागाहों में तथा हरी-भरी गोवर्धन पहाड़ी पर वे अपनी गायें चराया करते थे.

वह वृन्दावन पंचयोज अर्थात बीस कोस परधि का तथा ॠषि मुनियों के आश्रमों से युक्त और सघन सुविशाल वन था. ३ वहाँ गोप समाज के सुरक्षित रुप से निवास करने की तथा उनकी गायों के लिये चारे घास की पर्याप्त सुविधा थी. ४ उस वन में गोपों ने दूर-दूर तक अने व स्तियाँ व साई थीं. उस काल का वृन्दाव न गोव र्धन-राधाकुंड से लेकर नंदगाँव-वरसाना और कामव न तक विस्तृत था.

संस्कृत साहित्य में प्राचीन वृंदावन के पर्याप्त उल्लेख मिलते हैं, जिसमें उसके धार्मिक महत्व के साथ ही साथ उसकी प्राकृतिक शोभा का भी वर्णन किया गया है. महाकवि कालिदास ने उसके वन-वैभव और वहाँ के सुन्दर फूलों से लदे लता-वृक्षों की प्रशंसा की है. उन्होंने वृन्दावन को कुबेर के चैत्ररथ नामक दिव्य उद्यान के सदृश वतलाया है.

वृन्दावन का महत्व सदा से श्रीकृष्ण के प्रमुख लीला स्थल तथा ब्रज के रमणीक वन और एकान्त तपोभूमि होने के कारण रहा है. मुसलमानी शासन के समय प्राचीन काल का वह सुरम्य वृन्दाव न उपेक्षित और अरक्षित होकर एक बीहड़ वन हो गया था.
पुराणों में वर्णित श्रीकृष्ण-लीला के विविध स्थल उस विशाल वन में कहाँ थे, इसका ज्ञान बहुत कम था.
8. भद्रवन, 9. भांडीरवन, 10. बेलवन - ये तीनों वन यमुना की बांयी ओर ब्रज की उत्तरी सीमा से लेकर वर्तमान वृन्दावन के सामने तक थे. वर्तमान काल में उनका अधिकांश भाग कट गया है और वहाँ पर छोटे-बड़े गाँव वबस गये हैं. उन गाँवों में टप्पल, खैर, बाजना, नौहझील, सुरीर, भाँट पानी गाँव उल्लेखनीय है.


11. लोहवन - यह प्राचीन वन वर्तमान मथुरा नगर के सामने यमुना के उस पार था. वर्तमान काल में वहाँ इसी नाम का एक गाँव वसा है.

 

12. महावन - प्राचीन काल में यह एक विशाल सघन वन था, जो वर्तमान मथुरा के सामने यमुना के उस पार वाले दुर्वासा आश्रम से लेकर सुदूर दक्षिण तक विस्तृत था. पुराणों में इसका उल्लेख बृहद्वन, महावन, नंदकानन, गोकुल, गौब्रज आदि नामों से हुआ है.

उस वन में नंद आदि गोपों का निवास था, जो अपने परिवार के साथ अपनी गायों को चराते हुए विचरण किया करते थे. उसी वन की एक गोप बस्ती (गोकुल) में कंस के भय से बालक कृष्ण को छिपाया गया था. श्रीकृष्ण के शैशव-काल की पुराण प्रसिद्ध घटनाएँ - पूतना वध, तृणावर्त वध, शंकट भंजन, यमलार्जुन उद्धार आदि इसी वन के किसी भाग में हुई थीं. वर्तमान काल में इस वन का अधिकांश भाग कट गया है और वहाँ छोटे-बड़े कई गाँव वस गये हैं. उन गावों में महावन, गोकुल और रावल के नाम से उल्लेखनीय है
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फटी हुई जींस पहनना इसलिए है अशुभ

by admin - 4 days ago in सामान्य जानकारी
इन दिनों हम सभी यंगस्टर्स के बीच फटी हुई जींस पहनने का ट्रेंड देख रहे हैं। फेंगशुई में इसे बुरा माना जाता है और कहा जाता है कि इस तरह के कपड़े हमारे लिए बैड लक लेकर आते हैं। यही नहीं, इनफैक्ट कोई भी फटा हुआ या फेडेड कपड़ा कभी नहीं पहनना चाहिए फिर चाहे वह कितना भी फैशनेबल क्यों ना हो।

इस तरह के कपड़े पहनकर आप अपने फ्रेंड्स के बीच भले ही अच्छे लगें लेकिन ये आपके गुड लक को बैड लक में बदल सकता है। इस तरह के कपड़े पहनना दरिद्रता को न्योता देता है। यह सिर्फ बाहर जाने को लेकर ही बुरा नहीं माना जाता बल्कि अगर घर पर हैं या घर से ही काम कर करते हैं तो भी आपको फटे और पुराने कपड़े नहीं पहनने चाहिए।

इसके अलावा जब आप रोजाना सुबह उठें तो आपको सबसे पहले अपनी नाइट ड्रेस को उतारकर कुछ प्रॉपर और ऐसे कपड़े पहनने चाहिए जो आंखो को अच्छा लगें। ऐसा करने से आप पॉजिटिव वाइब्रेशंस से भर जाएंगे और जब आप ऐसा रोजाना करने लगेंगे तो यह आपके लिए गुड लक भी लेकर आएगा।

अपने दिन की शुरुआत हमेशा एक अच्छी स्माइल और साफ-सुथरे कपड़ों के साथ करनी चाहिए। इतना ही नहीं कपड़ों को धोने के बाद उन्हें हमेशा धूप में सुखाना चाहिए, इससे उनमें वाइब्रेंट एनर्जी आती है।

धुले और सूखे हुए कपड़ों को कभी भी रात में बाहर नहीं छोडऩा चाहिए क्योंकि रात में एनर्जी निगेटिव हो जाती है, जो कपड़ों में भी आ जाती है और जब हम उन कपड़ों को पहनते हैं तो उसका असर हम पर भी होता है।

महीने में कम से कम एक बार अपने तकियों और गद्दों को भी धूप में राना चाहिए। इससे इनमें जमे हुए जर्स और बैक्टीरियाज भी मरते हैं और इनमें अच्छी वाइब्रेशंस भी आती हैं।

अगर घर में कोई बीमार है तो वह व्यक्ति जिस बेड पर रहता है, उसके गद्दे और चादरों को भी धूप दिखानी चाहिए ताकि निगेटिव एनर्जी बाहर निकल सके। इन छोट�
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