प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

🙏🙏J.K.छिंदुलिया🙏🙏
💐💐जन्माष्टमी का उपहार💐
((  बाँके बिहारी की गवाही  ))
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एक बार एक गरीब किसान था। उसने अपनी बेटी की शादी के लिए सेठ से पांच सौ रुपये उधार लिए। 
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गरीब किसान ने अपनी बेटी की शादी के बाद धीरे-धीरे सब पैसा ब्याज समेत चुकता कर दिया। लेकिन उस सेठ महाजन के मन में पाप आ गया। उसने सोचा ये किसान अनपढ़ है। इसे लूटा जाये।
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गरीब किसान ने कहा की मैंने आपका सारा रुपैया पैसे चुकता कर दिया है। अब सेठ गुस्सा हो गया और कोर्ट के द्वारा उस पर मुकदमा कर दिया।
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जब कोर्ट में हाजिर हुआ बांके बिहारी का परम भक्त। जज बोले की आप कह रहे हो की आपने एक एक रुपैया पैसा चुकता कर दिया। आपके पास कोई गवाह है ?
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लेकिन गाँव के किसी भी व्यक्ति ने सेठ के डर से किसी ने भी गवाही नही दी। उसने कहा की मेरे गवाह तो बिहारी लाल हैं।
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जज ने पूछा की-कहाँ रहता है बिहारी लाल ?
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किसान ने कहा- वो वृन्दावन में रहता है।
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कोर्ट से सम्मन लेकर कोर्ट का व्यक्ति वृन्दावन में बिहारी पूरा पहुंचा। और साइकिल पर सबसे पूछता घूम रहा है की यहाँ कोई बिहारी लाल रहता है। लेकिन कोई नही जानता।
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फिर वह व्यक्ति बांके बिहारी मंदिर के पीछे पहुंचा। वहां पर एक हाथी की सूंड बनी हुई है जहाँ से बांके बिहारी के चरणों का चरणामृत टपकता है। और लोग उसे अपने सर पर धारण करते हैं। 
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वहीँ पर एक 75 वर्ष के वृद्ध आये। जिनके हाथ में लाठी थी। और उस कोर्ट के कर्मचारी ने उससे पूछा की यहाँ कोई बिहारी लाल नाम का व्यक्ति रहता है ?
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उस बूढ़े आदमी ने कहा- मेरा नाम ही बिहारी लाल है। कर्मचारी ने कहा की आपके नाम सम्मन है। उसने सम्मन ले लिया और अपने हस्ताक्षर कर दिए।
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उस दिन कोर्ट में यही चर्चा थी की ऐसा कौन सा व्यक्ति बिहारी लाल है ? जो इसकी ओर से गवाही देगा। 
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गाँव के लोग भी इस चीज को देखने के लिए कचहरी में उपस्थित थे। सारा गाँव एकत्र हुआ है। 
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वो किसान भी आया। उसके लिए तो बिहारी लाल और कोई नही बांके बिहारी जी ही थे।
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जब मुकदमा नंबर पर आया तो कोर्ट में नाम बुलाया गया। बिहारी लाल हाजिर हो। बिहारी लाल हाजिर हो। दो बार आवाज लगी तो कोई नही आया।
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फिर आवाज लगी बिहारी लाल हाजिर हो। तो वही वृद्ध व्यक्ति कोर्ट में लाठी टेकता हुआ हाजिर हो गया। और उसने जज के सामने कहा की- हुजूर , इस किसान ने महाजन का पाई पाई चुकता कर दिया है।
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जज ने कहा की इसका सबूत (प्रमाण) क्या है ?
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उस वृद्ध व्यक्ति ने कहा- इसके घर में, फलाने कमरे में, फलानि अलमारी में, इतने नंबर की बही (हिसाब किताब वाली फाइल) रखी गई है। ये महाजन झूठ बोल रहा है।
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कोर्ट का कर्मचारी उसी समय महाजन के घर गया और वो बही लेकर आया।
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जब जज ने वो फाइल देखी तो सारा का सारा हिसाब-किताब चुकता था।
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लोग इस बात को देखकर बड़े अचम्भे में पड़े हुए थे। आपस में चर्चा कर रहे थे। लेकिन वो बिहारी लाल कोर्ट से अंतर्ध्यान हो चुके थे।
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जज ने किसान से पूछा- आपने ये बिहारी लाल नाम बताया। ये कौन हैं ? आपके कोई रिश्तेदार हैं क्या ?
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किसान ने कहा- हुजूर, मैं सच कहता हूँ की मुझे नही मालूम ये कौन थे ?
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जज ने कहा फिर आपने गवाही में बिहारी लाल नाम किसका लिखवाया ?
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किसान ने कहा की गाँव से कोई भी व्यक्ति मेरी और से गवाही देने को तैयार नही हुए। तो मेरा तो एक ही आश्रय थे। वो बाँके बिहारी ही मेरे बिहारी लाल थे। और किसी बिहारी लाल को मैं नही जानता हूँ।
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ये सुनते ही उस जज की आँखों में आंसू भर गए और जज ने कोर्ट में रिजाइन ने दिया। जिसकी कोर्ट में मुझे जाना था वो मेरी कोर्ट में आये।
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उसी समय वो वृन्दावन की यात्रा पर निकल पड़े। और वो जज , जज बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए। वहीँ वृन्दावन में बिहारी जी के मंदिर पर पड़े रहते थे। और बाँके बिहारी में उनका अनन्य प्रेम हो गया।
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  (((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
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प्रेरक कहानी (Inspiring Story)
कुछ सुन्दर पंक्तिया--    👌 एक बार किसी रेलवे प्लैटफॉर्म पर जब गाड़ी रुकी तो एक लड़का पानी बेचता हुआ निकला।
ट्रेन में बैठे एक सेठ ने उसे आवाज दी,ऐ लड़के इधर आ। 
 
लड़का दौड़कर आया।
 
उसने पानी का गिलास भरकर सेठ
की ओर बढ़ाया तो सेठ ने पूछा, 
कितने पैसे में? 
 
लड़के ने कहा - पच्चीस पैसे।
 
सेठ ने उससे कहा कि पंदह पैसे में देगा क्या?
 
यह सुनकर लड़का हल्की मुस्कान
दबाए पानी वापस घड़े में उड़ेलता हुआ आगे बढ़ गया।
 
उसी डिब्बे में एक महात्मा बैठे थे,
जिन्होंने यह नजारा देखा था कि लड़का मुस्कराय मौन रहा।
 
जरूर कोई रहस्य उसके मन में होगा।
 
महात्मा नीचे उतरकर उस लड़के के
पीछे- पीछे गए।
 
बोले : ऐ लड़के ठहर जरा, यह तो बता तू हंसा क्यों?
 
वह लड़का बोला, 
 
महाराज, मुझे हंसी इसलिए आई कि सेठजी को प्यास तो लगी ही नहीं थी। 
वे तो केवल पानी के गिलास का रेट पूछ रहे थे। 
 
महात्मा ने पूछा -
 
लड़के, तुझे ऐसा क्यों लगा कि सेठजी को प्यास लगी ही नहीं थी।
 
लड़के ने जवाब दिया -
 
महाराज, जिसे वाकई प्यास लगी हो वह कभी रेट नहीं पूछता। 
 
वह तो गिलास लेकर पहले पानी पीता है।
फिर बाद में पूछेगा कि कितने पैसे देने हैं? 
 
पहले कीमत पूछने का अर्थ हुआ कि प्यास लगी ही नहीं है।
 
वास्तव में जिन्हें ईश्वर और जीवन में
कुछ पाने की तमन्ना होती है, 
वे वाद-विवाद में नहीं पड़ते।
 
पर जिनकी प्यास सच्ची नहीं होती,
वे ही वाद-विवाद में पड़े रहते हैं। 
वे साधना के पथ पर आगे नहीं बढ़ते.
 
अगर भगवान नहीं हे तो उसका ज़िक्र क्यो??
 
और अगर भगवान हे तो फिर फिक्र क्यों ???

प्रेरक कहानी (Inspiring Story)
दिलीप कुमार ने एक बार अपने साक्षात्कार में यह बताया था
बात उन दिनों कि है जब मैं अपने करियर के शिखर पर था! उस समय लोगों में मेरी बहुत अच्छी पहचान थी और बॉलीवुड का एक प्रसिद्ध एक्टर था!
एक बार मैं हवाई जहाज से सफर कर रहा था ! मेरी बगल में बैठा हुआ व्यक्ति थोड़ा बुजुर्ग मालूम होता था! उसने सादा सिंपल पैंट शर्ट पहना था और सामान्य परिवार का व्यक्ति प्रतीत होता था !
वहाँ बैठे सारे लोगों की नजर मुझ पर थी लेकिन वो व्यक्ति मेरी तरफ देख भी नहीं रहा था। वह आराम से अख़बार पढ़ रहा था और बार बार खिड़की से झाँक कर देख रहा था। जब चाय का समय हुआ तो उसने चाय भी बहुत जल्दी पी ली।
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये व्यक्ति मेरी तरफ देख भी नहीं रहा है। मैं उसकी तरफ देखकर थोड़ा हँसा, फिर वो भी हँसा, धीरे धीरे दोनों में बात शुरू हुई। मैंने उस व्यक्ति से पुछा– ” क्या आप फ़िल्में देखते हैं?”
वो व्यक्ति बोला – हाँ, पर कभी कभी, बहुत सालों पहले देखी थी फिल्म !
मैंने बताया कि मैं फिल्मों में ही काम करता हूँ।
वह व्यक्ति बोला – ओह, बहुत अच्छा, आप क्या करते हैं फिल्मों में?
मैंने कहा – मैं फिल्मों में एक्टर हूँ। 
वाह क्या बात है- उस व्यक्ति ने कहा, 
मैंने उसे अभी तक अपना नाम नहीं बताया था, लेकिन वो व्यक्ति अभी भी दूसरे लोगों की तरह मुझे नहीं देख रहा था।
जब यात्रा समाप्त हुई तो मैंने उस व्यक्ति को अपने बारे में बताने के उद्देश्य से हाथ मिलाया और कहा – My name is Dilip Kumar।
उस व्यक्ति ने हँसते हुए मुझसे हाथ मिलाया और बोला -धन्यवाद, I am “J. R. D. Tata”
मैं सन्न रह गया !! उस दिन अहसास हुआ कि आप कितने भी बड़े हों, कोई फर्क नहीं पड़ता। आपसे भी बड़े बड़े लोग दुनियाँ में मौजूद हैं... !!!
 
_*किसी को कम मत आँकिए और हमेशा विनम्र बने रहिये !!

प्रेरक कहानी (Inspiring Story)
*3  ऐसे भक्त, जिनके शरीर का कुछ भी पता नहीं चल सका*
 
*कबीरदास*
(1398-1518)— 1518 में कबीर ने काशी के पास मगहर में देह त्याग दी। मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा। बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने। मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर की समाधि है।
 
*चैतन्य महाप्रभु* (1486-1534)— 15 जून, 1534 को रथयात्रा के दिन जगन्नाथपुरी में संकीर्तन करते हुए वह जगन्नाथ जी में लीन हो गए और शरीर का कुछ भी पता नहीं चल सका I
 
*मीराबाई* (1498-1547)— मीराबाई बहुत दिनों तक वृन्दावन में रहीं और जीवन के अंतिम दिनों में द्वारका चली गईं। जहाँ 1547 ई. में वह नाचते-नाचते श्री रणछोड़राय जी के मन्दिर के गर्भग्रह में प्रवेश कर गईं और मन्दिर के कपाट बन्द हो गये। जब द्वार खोले गये तो देखा कि मीरा वहाँ नहीं थी। उनका चीर मूर्ति के चारों ओर लिपट गया था और मूर्ति अत्यन्त प्रकाशित हो रही थी। मीरा मूर्ति में ही समा गयी थीं। मीराबाई का शरीर भी कहीं नहीं मिला।

प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

बी"वाणी पर नियंत्रण रखें"-

एक बार एक बूढ़े आदमी ने अफवाह फैलाई कि उसके पड़ोस में रहने वाला
नौजवान चोर है l
 
यह बात दूर - दूर तक फैल गई आस - पास के लोग उस नौजवान से बचने लगे l
 
 नौजवान परेशान हो गया कोई उस पर विश्वास ही नहीं करता था l
 
तभी गाँव में चोरी की एक वारदात हुई और शक उस नौजवान पर गया उसे गिरफ्तार कर लिया गया l
 
लेकिन कुछ दिनों के बाद सबूत के अभाव में वह निर्दोष साबित हो गया l
 
निर्दोष साबित होने के बाद वह नौजवान चुप नहीं बैठा उसने बूढ़े आदमी पर गलत आरोप लगाने के लिए मुकदमा दायर कर दिया पंचायत में बूढ़े आदमी ने अपने बचाव में सरपंच से कहा l
 
'मैंने जो कुछ कहा था, वह एक टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं था किसी को नुकसान पहुंचाना मेरा मकसद नहीं था l
सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा, 'आप एक कागज के टुकड़े पर वो सब बातें लिखें, जो आपने उस नौजवान के बारे में कहीं थीं, और जाते समय उस कागज के टुकड़े - टुकड़े करके घर के रस्ते पर फ़ेंक दें कल फैसला सुनने के लिए आ जाएँ बूढ़े व्यक्ति ने वैसा ही किय.. अगले दिन सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा कि फैसला सुनने से पहले आप बाहर जाएँ और उन कागज के टुकड़ों को, जो आपने कल बाहर फ़ेंक दिए थे, इकट्ठा कर ले आएं l
 
बूढ़े आदमी ने कहा मैं ऐसा नहीं कर सकता उन टुकड़ों को तो हवा कहीं से कहीं उड़ा कर ले गई होगी अब वे नहीं मिल सकेंगें मैं कहाँ - कहाँ उन्हें खोजने के लिए जाऊंगा ?
 
सरपंच ने कहा 'ठीक इसी तरह, एक सरल - सी टिप्पणी भी किसी का मान - सम्मान उस सीमा तक नष्ट कर सकती है, जिसे वह व्यक्ति किसी भी दशा में दोबारा प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सकता l
 
इसलिए यदि किसी के बारे में कुछ अच्छा नहीं कह सकते, तो चुप रहें l
 
वाणी पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए, ताकि हम शब्दों के दास न बनें l'

प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

एक बार एक व्यक्ति ने महान दार्शनिक सुकरात से पूछा कि “सफलता का रहस्य (The Secret of Success) क्या है?”

सुकरात ने उस व्यक्ति को कहा कि वह कल सुबह नदी के पास मिले, वही पर उसे अपने सवाल का जवाब मिलेगा|

जब दूसरे दिन सुबह वह व्यक्ति नदी के पास मिला तो सुकरात ने उस व्यक्ति को नदी में उतरकर, नदी गहराई की गहराई मापने के लिए कहा|

वह व्यक्ति नदी में उतरकर आगे की तरफ जाने लगा| जैसे ही पानी उस व्यक्ति के नाक तक पहुंचा, पीछे से सुकरात ने आकर अचानक से उसका मुंह पानी में डुबो दिया| वह व्यक्ति बाहर निकलने के लिए झटपटाने लगा लेकिन सुकरात थोड़े शक्तिशाली थे| सुकरात ने उसे काफी देर तक पानी में डुबोए रखा|

कुछ समय बाद सुकरात ने उसे छोड़ दिया और उस व्यक्ति ने जल्दी से अपना मुंह पानी से बाहर निकालकर जल्दी जल्दी साँस ली|

सुकरात ने उस व्यक्ति से पूछा – “जब तुम पानी में थे तो तुम क्या चाहते थे”

व्यक्ति ने कहा – “जल्दी से बाहर निकलकर सांस लेना चाहता था”

सुकरात ने कहा – “यही तुम्हारे प्रश्न का उतर है| जब तुम सफलता को उतनी ही तीव्र इच्छा से चाहोगे जितनी तीव्र इच्छा से तुम सांस लेना चाहते है, तो तुम्हे सफलता निश्चित रूप से मिल जाएगी|”!


 

एक बार एक जीवविज्ञानी द्वारा एक एक्सपेरिमेंट किया गया | एक शार्क मछली को एक बड़े टैंक में डाला गया और कुछ छोटी मछलियों को उस टैंक में छोड़ा गया| जैसे ही शार्क ने छोटी मछलियों को टैंक में देखते ही हमला कर और उसे अपना भोजन बना लिया|

अब एक टैंक के बीचों-बीच एक मजबूत स्पष्ट कांच डालकर, टैंक को दो भागों में बाँट दिया गया| एक हिस्से में शार्क को छोड़ा गया और दूसरे हिस्से में छोटी छोटी मछलियों को छोड़ा गया|

छोटी मछलियों को देखकर, शार्क ने फिर हमला किया लेकिन बीच में स्पष्ट कांच की दीवार होने से शार्क उन छोटी मछलियों तक नहीं पहुँच पा रही थी| शार्क छोटी मछलियों तक पहुँचने का बार बार प्रयास करती और हर बार शार्क का मुंह उस कांच से टकरा जाता|

इस प्रयोग को कई हफ्तों तक दोहराया गया और हर बार शार्क छोटी मछलियों पर हमला करती लेकिन बीच में कांच की दीवार होने से वह वहां तक नहीं पहुँच पाती और कुछ समय बाद थककर हार मान लेती|

धीरे धीरे शार्क के प्रयास कम होते गए| शार्क यह समझ चुकी थी कि वह उन मछलियों तक नहीं पहुँच सकती| अब वह बहुत कम प्रयास करती और बहुत जल्द थककर हार मान लेती|

कुछ हफ़्तों बाद टैंक के बीच में लगे स्पष्ट कांच को हटा दिया गया| लेकिन आश्चर्य कि शार्क ने उन छोटी मछलियों पर हमला नहीं किया| शार्क यह मानने लगी थी कि वह कभी भी छोटी मछलियों तक नहीं पहुँच सकती और इसीलिए बीच में कोई अवरोध न होने के बावजूद शार्क ने कोई प्रयास नहीं किया|


हम भी प्रतिकूल परिस्थियों के कारण और कुछ प्रयासों के विफल हो जाने पर प्रयास करना छोड़ देते है| हम स्वंय को अपनी ही नकारात्मक सोच के बन्धनों में बाँध देते है और यह मानने लगते है कि हमारे प्रयास कभी सफल हो ही नहीं सकते|


हमें कोई नहीं रोक सकता| अगर हमें कोई रोक सकता है, तो वह है हमारी खुद की सोच| जब हम सच्चे दिल से प्रयास करते है तो सारी सृष्टि हमारी मदद करने लगती है और सारे बंद दरवाजे अपने आप खुल जाते है लेकिन कई बार दुर्भाग्य से हम थोड़ा सा प्रयास करके उन दरवाजों तक पहुँचने के प्रयास भी नहीं करते|


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

नजरिया--------

एक दिन एक अमीर व्यक्ति अपने बेटे को एक गाँव की यात्रा पर ले गया| वह अपने बेटे को यह बताना चाहता था वे कितने अमीर और भाग्यशाली है जबकि गाँवों के लोग कितने गरीब है| उन्होंने कुछ दिन एक गरीब के खेत पर बिताए और फिर अपने घर वापस लौट गए|

घर लौटते वक्त रास्ते में उस अमीर व्यक्ति ने अपने बेटे को पूछा – “तुमने देखा लोग कितने गरीब है और वे कैसा जीवन जीते है??  

बेटे ने कहा – “हां मैंने देखा”

 “हमारे पास एक कुता है और उनके पास चार है”

“हमारे पास एक छोटा सा स्वीमिंग पूल है और उनके पास एक पूरी नदी है”

“हमारे पास रात को जलाने के लिए विदेशों से मंगाई हुई कुछ महँगी लालटेन है और उनके पास रात को चमकने वाले अरबों तारें है”

“हम अपना खाना बाज़ार से खरीदते है जबकि वे अपना खाना खुद अपने खेत में उगाते है”

“हमारा एक छोटा सा परिवार है जिसमें पांच लोग है, जबकि उनका पूरा गाँव, उनका परिवार है”

“हमारे पास खुली हवा में घूमने के लिए एक छोटा सा गार्डन है और उनके पास पूरी धरती है जो कभी समाप्त नहीं होती”

“हमारी रक्षा करने के लिए हमारे घर के चारों तरफ बड़ी बड़ी दीवारें है और उनकी रक्षा करने के लिए उनके पास अच्छे-अच्छे दोस्त है”

अपने बेटे की बाते सुनकर अमीर व्यक्ति कुछ बोल नहीं पा रहा था| बेटे ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा –

“धन्यवाद पिताजी, मुझे यह बताने के लिए की हम कितने गरीब है”I


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

“हमारे साथ वही होता है जो हम मानते है|”

वैज्ञानिकों के अनुसार भौंरे (Bumblebee) का शरीर बहुत भारी होता है, इसलिए विज्ञान के नियमो के अनुसार वह उड़ नहीं सकता| लेकिन भौंरे को इस बात का पता नहीं होता एंव वह यह मानता है की वह उड़ सकता है इसलिए वह उड़ पाता है|

सबसे पहले हमें इस गलत धारणा (Wrong Belief) को बदलना होगा कि हमारे साथ वही होता है जो भाग्य (Bhagya) में लिखा होता है| क्योंकि ऐसा होता तो आज हम ईश्वर (God) की पूजा न कर रहे होते बल्कि उन्हें बदुआएं दे रहे होते|

दोस्तों हमारे साथ जो कुछ भी होता है उसके जिम्मेदार हम स्वंय होते है इसलिए खुश रहना या ना रहना हम पर ही निर्भर (depend) करता है|

“भगवान उसी की मदद करते है जो अपनी मदद खुद करता है”

 

अगरकोईव्यक्तियहसोचताहैकीहमारेसाथजोकुछभीहोताहै, वहहमारेहाथमेंनहींहैतोवहव्यक्ति इसगलतधारणा कोबदलदे


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

बादशाह अकबर अपने मंत्री बीरबल को बहुत पसंद करता था। बीरबल की बुद्धि के आगे बड़े-बड़ों की भी कुछ नहीं चल पाती थी। इसी कारण कुछ दरबारी बीरबल से जलते थे। वे बीरबल को मुसीबत में फँसाने के तरीके सोचते रहते थे।

 

अकबर के एक खास दरबारी ख्वाजा सरा को अपनी विद्या और बुद्धि पर बहुत अभिमान था। बीरबल को तो वे अपने सामने निरा बालक और मूर्ख समझते थे। लेकिन अपने ही मानने से तो कुछ होता नहीं! दरबार में बीरबल की ही तूती बोलती और ख्वाजा साहब की बात ऐसी लगती थी जैसे नक्कारखाने में तूती की आवाज़। ख्वाजा साहब की चलती तो वे बीरबल को हिंदुस्तान से निकलवा देते लेकिन निकलवाते कैसे!

 

एक दिन ख्वाजा ने बीरबल को मूर्ख साबित करने के लिए बहतु सोचे -विचार कर कुछ मुश्किल प्रश्न सोच लिए। उन्हें विश्वास था कि बादशाह के उन प्रश्नों को सुनकर बीरबल के छक्के छूट जाएँगे और वह लाख कोशिश करके भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाएगा। फिर बादशाह मान लेगा कि ख्वाजा सरा के आगे बीरबल कुछ नहीं है।

 

ख्वाजा साहब अचकन-पगड़ी पहनकर दाढ़ी सहलाते हुए अकबर के पास पहुँचे और सिर झुकाकर बोले, "बीरबल बड़ा बुद्धिमान बनता है। आप भी उसकी लंबी-चौड़ी बातों के धोखे में आ जाते हैं। मैं चाहता हूँ कि आप मेरे तीन सवालों के जवाब पूछकर उसके दिमाग की गहराई नाप लें। उस नकली अक्ल-बहादुर की कलई खुल जाएगी।

 

ख्वाजा के अनुरोध करने पर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उनसे कहा, "बीरबल! परम ज्ञानी ख्वाजा साहब तुमसे तीन प्रश्न पूछना चाहते हैं। क्या तुम उनके उत्तर दे सकोगे?"

 

बीरबल बोले, "जहाँपनाह! ज़रूर दूँगा। खुशी से पूछें।"

 

ख्वाजा साहब ने अपने तीनों सवाल लिखकर बादशाह को दे दिए।

 

अकबर ने बीरबल से ख्वाजा का पहला प्रश्न पूछा, "संसार का केंद्र

कहाँ है?"

 

बीरबल ने तुरंत ज़मीन पर अपनी छड़ी गाड़कर उत्तर दिया, "यही स्थान चारों ओर से दुनिया के बीचों-बीच पड़ता है। यदि ख्वाजा साहब को विश्वास न हो तो वे फ़ीते से सारी दुनिया को नापकर दिखा दें कि मेरी बात गलत है।"

 

अकबर ने दूसरा प्रश्न किया, "आकाश में कितने तारे हैं?"

 

बीरबल ने एक भेड़ मँगवाकर कहा, "इस भेड़ के शरीर में जितने बाल हैं, उतने ही तारे आसमान में हैं। ख्वाजा साहब को इसमें संदेह हो तो वे बालों को

गिनकर तारों की संख्या से तुलना कर लें।"

 

अब अकबर ने तीसरा सवाल किया, "संसार की आबादी कितनी है?"

 

बीरबल ने कहा, "जहाँपनाह! संसार की आबादी पल-पल पर घटती-बढ़ती रहती है क्योंकि हर पल लोगों का मरना-जीना लगा ही रहता है। इसलिए यदि

सभी लोगों को एक जगह इकट्ठा किया जाए तभी उनको गिनकर ठीक-ठीक संख्या बताई जा सकती है।"

 

बादशाह तो बीरबल के उत्तरों से संतुष्ट हो गया लेकिन ख्वाजा साहब नाक-भाैंह सिकोड़कर बोले, "ऐसे गोलमोल जवाबों से काम नहीं चलेगा जनाब!"

 

बीरबल बोले, "ऐसे सवालों के ऐसे ही जवाब होते हैं। पहले मेरे जवाबों को गलत साबित कीजिए, तब आगे बढ़िए।"

 

ख्वाजा साहब से फिर कुछ बोलते नहीं बना।


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

एक घने जंगल में एक बड़ा-सा नाग रहता था। वह चिड़ियों के अंडे, मेढ़क तथा छिपकलियों जैसे छोटे-छोटे जीव-जंतुओं को खाकर अपना पेट भरता था। रातभर वह अपने भोजन की तलाश में रहता और दिन निकलने पर अपने बिल में जाकर सो रहता। धीरे-धीरे वह मोटा होता गया। वह इतना मोटा हो गया कि बिल के अंदर-बाहर आना-जाना भी दूभर हो गया।

आखिरकार, उसने बिल को छोड़कर एक विशाल पेड़ के नीचे रहने की सोची लेकिन वहीं पेड़ की जड़ में चींटियों की बांबी थी और उनके साथ रहना नाग के लिए असंभव था। सो, वह नाग उन चींटियों की बांबी के निकट जाकर बोला, ‘‘मैं सर्पराज नाग हूँ, इस जंगल का राजा। मैं तुम चींटियों को आदेश देता हूं कि यह जगह छोड़कर चले जाओ।''

 

वहां और भी जानवर थे, जो उस भयानक सांप को देखकर डर गए और जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे लेकिन चींटियों ने नाग की इस धमकी पर कोई ध्यान न दिया।

वे पहले की तरह अपने काम-काज में जुटी रहीं। नाग ने यह देखा तो उसके क्रोध की सीमा न रही।

 

वह गुस्से में भरकर बांबी के निकट जा पहुँचा। यह देख हजारों चींटियाँ उस बांबी से निकल, नाग से लिपटकर उसे काटने लगीं। उनके डंकों से परेशान नाग बिलबिलाने लगा। उसकी पीड़ा असहनीय हो चली थी और शरीर पर घाव होने लगे। नाग ने चींटियों को हटाने की बहुत कोशिश की लेकिन असफल रहा। कुछ ही देर में उसने वहीं तड़प-तड़प कर जान दे दी।

 

शिक्षा- बुद्धि से कार्य करने पर शक्तिशाली शत्रु को भी ध्वस्त किया जा सकता है।


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

एक घड़ा मिट्टी का बना था, दूसरा पीतल का। दोनों नदी के किनारे रखे थे। इसी समय नदी में बाढ़ आ गई, बहाव में दोनों घड़े बहते चले। बहुत समय मिट्टी के घड़े ने अपने को पीतलवाले से काफी फासले पर रखना चाहा।

 

पीतलवाले घड़े ने कहा, ''तुम डरो नहीं दोस्त, मैं तुम्हें धक्के न लगाऊँगा।''

 

मिट्टीवाले ने जवाब दिया, ''तुम जान-बूझकर मुझे धक्के न लगाओगे, सही है; मगर बहाव की वजह से हम दोनों जरूर टकराएंगे। अगर ऐसा हुआ तो तुम्हारे बचाने पर भी मैं तुम्हारे धक्कों से न बच सकूँगा और मेरे टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। इसलिए अच्छा है कि हम दोनों अलग-अलग रहें।''

 

शिक्षा - जिससे तुम्हारा नुकसान हो रहा हो, उससे अलग ही रहना अच्छा है, चाहे वह उस समय के लिए तुम्हारा दोस्त भी क्यों न हो।

- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)
एक  नगर  में  एक  मशहूर  चित्रकार  रहता था । 
 चित्रकार  ने  एक  बहुत  सुन्दर तस्वीर  बनाई और उसे  नगर  के  चौराहे  मे  लगा  दिया  और   नीचे  लिख  दिया  कि  जिस किसी  को , जहाँ  भी   इस में  कमी  नजर  आये  वह  वहाँ  निशान  लगा  दे ।
 जब  उसने  शाम  को  तस्वीर देखी   उसकी  पूरी  तस्वीर  पर  निशानों  से  ख़राब  हो  चुकी थी । 
यह  देख  वह  बहुत  #दुखी  हुआ ।
 उसे कुछ  समझ  नहीं  आ  रहा  था  कि  अब  क्या  करे  वह  दुःखी  बैठा  हुआ  था  । 
 तभी  उसका एक मित्र  वहाँ  से  गुजरा  उसने  उस  के  दुःखी होने  का  कारण  पूछा  तो  उसने  उसे  पूरी  घटना बताई ।
  उसने कहा  एक  काम  करो कल दूसरी  तस्वीर  बनाना  और  उस मे  लिखना  कि जिस  किसी  को  इस  तस्वीर  मे जहाँ  कहीं  भी कोई  कमी  नजर  आये  उसे  सही  कर  दे  ।
   उसने  अगले  दिन  यही  किया  ।  शाम  को  जब उसने  अपनी  तस्वीर  देखी  तो  उसने  देखा  की  तस्वीर  पर  किसी  ने  कुछ  नहीं  किया ।                                                                               वह  संसार  की # रीति  समझ गया ।   
   "कमी  निकालना ,  निंदा  करना ,   बुराई  करना आसान   लेकिन  उन  कमियों  को  दूर  करना  अत्यंत  कठिन  होता  ह                     This is life........
जब दुनिया यह कह्ती है कि 
      ‘हार मान लो’
 तो आशा धीरे से कान में कह्ती है  कि.,,,,
 ‘एक बार फिर प्रयास करो’
      और यह ठीक भी है..,,,
 "जिंदगी आईसक्रीम की तरह है, टेस्ट करो तो भी पिघलती है;.,,,
 वेस्ट करो तो भी पिघलती है,,,,,,
 इसलिए जिंदगी को टेस्ट करना  सीखो, 
    वेस्ट तो हो ही रही है.,,,,

इट ने कुछ कथित

 

चश्मदीद गवाहों के बयान जारी किए हैं जिनसे ऐसा लगता है कि इस स्वतंत्रता सेनानी का ताईवान में हुए विमान हादसे में निधन हुआ।

पांच चश्मदीदों के हवाले से यह पुष्टि करने का प्रयास किया गया है कि 18अगस्त, 1945को ताईपई में हवाई अडडे के बाहरी क्षेत्र में विमान हादसे में इंडियन नेशनल आर्मी के संस्थापक का निधन हुआ। इन चश्मदीदों में

नेताजी के एक करीब सहयोगी, दो जापानी डॉक्टर, एक दुभाषिया और एक ताईवानी नर्स शामिल हैं।

डब्ल्यू डॉट डब्ल्यू डॉट डब्ल्यू डॉट बोसफाइल्स डॉट इंफो ने एक बयान में कहा है, ‘इस बात को लेकर इन पांचों में कोई दो राय नहीं है कि 18अगस्त, 1945की रात को बोस का देहांत हो गया।’ बोस के सहायक कर्मी कर्नल हबीबुर रहमान ने इन हादसे के

छह दिन बाद 24अगस्त 1945को एक लिखित और हस्ताक्षरित बयान दिया था जिसमें उनसे बोस द्वारा कहे गए अंतिम शब्दों की पुष्टि होती है। रहमान हादसे के दिन बोस के साथ थे लेकिन वह बाल बाल बच गए।

 

रहमान के बयान में कहा गया है, ‘निधन से पहले उन्होंने (बोस ने) मुझसे कहा था कि उनका अंत समीप है और उन्होंने मुझसे उनकी ओर से यह संदेश देशवासियों को देने कहा था- ‘मैं भारत की आजादी के लिए अंत तक लड़ा और अब मैं उसी प्रयास में अपना जीवन दे रहा हूं। देशवासी स्वतंत्रता संघर्ष जारी रखें जबतक कि देश स्वतंत्र न हो जाए। आजाद हिंद जिंदाबाद’।’

सितंबर, 1945में पुलिस अधिकारियों- फिनली और डेविस की अगुवाई में दो भारतीय खुफिया टीमें जांच के लिए बैंकाक,

साईगोन और ताईपे गयीं। ये टीमें इस निष्कर्ष पर पहुंची थीं कि बोस की मौत विमान हादसे के फलस्वरूप हुई थी। टीमों ने एच के रॉय एवं के पी डे से भी सहयोग लिया था। उन्हें

जापानी सदर्न आर्मी के चीफ ऑफ स्टाफ से हिकारी किकान को भेजे गए एक टेलीग्राम की प्रति मिली। हिकारी किकान एक ऐसा निकाय था जो जापान सरकार और बोस की

‘अंतरिम स्वतंत्रत भारत सरकार’ के बीच संपर्क सेतु का काम करता था।

बीस अगस्त, 1945के इस केबल में बोस के लिए ‘टी’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए लिखा गया है,

‘18तारीख को ‘टी’ राजधानी (टोक्यो) लौटने के दौरान ताईहोकु (ताईपे का जापानी नाम) में अपने विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने से गंभीर रूप से घायल हो गए और उसी दिन

आधी रात को उनकी मृत्यु हो गयी।’ मई-जुलाई, 1946के दौरान ब्रिटिश सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल जे जी फिग्गेस ने इस हादसे के सिलसिले में जापानी डॉक्टर तोयोशी सुरुता समेत

छह जापानी अधिकारियों से पूछताछ की थी। सुरुता दुर्घटना स्थल के समीप के नानमोन सैन्य अस्तपाल में थे जहां हादसे के बाद बोस को ले जाया गया था।

डॉ. सुरुता ने फिग्गेस से कहा, ‘बोस ने अग्रेजी में उनसे पूछा कि क्या वह पूरी रात उनके पास बैठेंगे। लेकिन शाम सात बजे के तुरत बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ने ली। वैसे डॉक्टर ने उन्हें एक बार

फिर कपूर की सूई लगायी लेकिन वह कोमा में चले गए और इसके शीघ्र बाद उनकी मौत हो गयी।’ उसी अस्पताल की नर्स सान पी शा ने सितंबर, 1946में मुम्बई के ‘फ्री प्रेस जर्नल’ के पत्रकार हरीन शाम के सामने भी यही बात बतायी। शाह इस मामले की छानबीन के लिए ताईपे पहुंचे थे।

नर्स शान ने कहा, ‘उनकी यहां मृत्यु हो गयी। मैं उनके पास ही थी। वह (सुभाष चंद्र बोस) पिछले साल 18अगस्त (1945) को चल बसे।’ उन्होंने कहा, ‘मैं सर्जिकल नर्स हूं और मैंने उनकी मृत्यु तक उनकी देखभाल की। मुझे निर्देश दिया गया था कि मैं उनके पूरे शरीर पर जैतून का तेल लगाउं और मैंने ऐसा ही किया।’ उन्होंने कहा, ‘जब कभी उन्हें थोड़ी देर के लिए होश आता, वह प्यास महसूस करते थे। कराहते

हुए वह पानी मांगते थे। मैंने उन्हें कई बार पानी पिलाया।’ शान उसके बाद शाह को इस वार्ड के दक्षिण पश्चिम कोने में ले गयीं और उन्होंने उन्हें वह बिस्तर दिखाया जहां बोस ने अंतिम सांस ली।

इस अस्पताल के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी जापानी सेना के कैप्टन तानेयोशी योशिमी थे। डॉ. योशिमी ने प्रथम कई गवाहियां हांगकांग के स्टानली गाओल में 19 अक्तूबर, 1946को दीं जहां उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जेल में डाल दिया था। इसे ताईवान के युद्ध अपराध संपर्क खंड के कैप्टन अल्फ्रेड टर्नर ने रिकार्ड किया।

उन्होंने कहा, ‘जब उन्हें (अस्पताल के) बिस्तर पर लिटाया गया तब मैंने ही तेल से उनके (बोस के) शरीर का जख्म साफ किया और उनकी ड्रेसिंग की। उनका पूरा शरीर बहुत जल चुका था, सबसे गंभीर रूप से उनका सिर, छाती और जांघ जले थे। उनके सिर पर बहुत कम बाल या अन्य कोई निशान था।’ उन्होंने कहा, ‘चूंकि ज्यादातर बातें वह अंग्रेजी में बोल रहे थे अतएव एक दुभाषिये का अनुरोध किया गया और नागरिक सरकार कार्यालय से नाकमुरा नामक एक दुभाषिया भेजा गया। नाकमुरा ने बताया कि वह अक्सर सुभाष चंद्र बोस के लिए दुभाषिये के रूप में काम कर चुके हैं और उनकी उनसे कई बार बातचीत हो चुकी है। इस बात में कहीं कोई संदेह नहीं जान पड़ा कि जिस व्यक्ति से वह बात कर रहे थे,

वह सुभाष चंद्र बोस ही थे।’ 

 

डॉ. योशिमी ने कहा, ‘(अस्पताल में भर्ती किये जाने के) चौथे घंटे में ऐसा लगा कि उनकी हालत बिगड़ रही है। वह अपनी कोमा की दशा में कुछ फुसफुसाए, बड़बड़ाए लेकिन वह कभी होश में नहीं लौटे। करीब रात ग्यारह बजे वह चल बसे।’ डॉ. योशिमी 1956में मेजर जनरल शाह नवाज की अगुवाई वाली नेताजी जांच समिति और 1974में न्यायमूर्ति जी डी खोसला आयोग में पेश हुए।

 

डब्ल्यू डॉट डब्ल्यू डॉट डब्ल्यू डॉट बोस फाईल्स डॉट इंफो के संस्थापक आशीष राय के साथ अपने बाद के साक्षात्कारों में से एक में डॉ. योशिमी ने कहा, ‘नोनोमिया नामक एक लेफ्टिनेंट ने मुझे बताया कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति सुभाष चंद्र बोस ही हैं और मुझे किसी भी कीमत पर उनकी जान बचानी चाहिए। और इस तरह मुझे पता चला कि वह कौन थे।’ उन्होंने पुरानी चीजों को याद करते हुए कहा कि जब उन्हें ऐसा लगा कि बोस की हालत बिल्कुल बिगड़ रही है तो उन्होंने मरीज से कहा, ‘मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं।’ बोस ने जवाब दिया, ‘मुझे महसूस हो रहा है कि मेरे मस्तिष्क में तेजी से रक्त जा रहा है, मैं कुछ देर के लिए सोना चाहता हूं।’ डॉ. योशिमी ने उन्हें एक सूई लगायी और कुछ देर बाद वह चल बसे।

दुभाषिया नाकमुरा जांच समिति के सामने पेश हुए और उन्होंने कहा कि उन्होंने

जबान से कभी दर्द या पीड़ा की शिकायत नहीं थी। नेताजी का यह मानसिक संतुलन देख हम सभी दंग थे।’ उन्होंने कहा कि बोस चल बसे और कमरे में जापानी अधिकारी एक कतार में खड़े हो गए और उन्होंने उनके पार्थिव शरीर को सलामी दी।


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

*संघर्ष और सफलता*

पिकासो (Picasso) स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं।

एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो पर पड़ी और संयोग से उस महिला ने उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ी हुई उनके पास आयी और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूँ। आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनायेंगे ?'

पिकासो हँसते हुए बोले, 'मैं यहाँ खाली हाथ हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा।'

लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिये, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊँगी या नहीं।'

पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उसपर कुछ बनाने लगे। करीब 10 सेकेण्ड के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनायीं और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।'

महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 सेकेण्ड में जल्दी से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और बिना कुछ बोले अपने घर आ गयी।

उसे लगा पिकासो उसको पागल बना रहा है। वह बाजार गयी और उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी।

वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आयी और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।'

पिकासो ने हँसते हुए कहा, 'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।'

वह महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिये और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिये। जैसे आपने 10 सेकेण्ड में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 सेकेण्ड में न सही, 10 मिनट में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूँ, मुझे ऐसा बना दीजिये।'

पिकासो ने हँसते हुए कहा, 'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 सेकेण्ड में बनायी है, इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है। मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं। तुम भी दो, सीख जाओगी।

वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गयी।

दोस्तो, जब हम दूसरों को सफल होता देखते हैं,तो हमें यह सब बड़ा आसान लगता है। हम कहते हैं, 'यार, यह इंसान तो बड़ी जल्दी और बड़ी आसानी से सफल हो गया।' लेकिन मेरे दोस्त, उस एक सफलता के पीछे कितने वर्षों की मेहनत छिपी है, यह कोई नहीं देख पाता !

सफलता तो बड़ी आसानी से मिल जाती है, शर्त यह है कि सफलता की तैयारी में अपना जीवन कुर्बान करना होता है। जो खुद को तपा कर, संघर्ष कर अनुभव हासिल करता है, वह कामयाब हो जाता है लेकिन दूसरों को लगता है कि वह कितनी आसानी से सफल हो गया।

मेरे दोस्त, परीक्षा तो केवल 3 घंटे की होती है,लेकिन उन 3 घण्टों के लिए पूरे साल तैयारी करनी पड़ती है। तो फिर आप रातों-रात सफल होने का सपना कैसे देख सकते हो ? सफलता अनुभव और संघर्ष मांगती है। और, अगर आप देने को तैयार हैं, तो आपको आगे जाने से कोई नहीं रोक सकता Gud morning frnds🙏


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और प्रसिद्ध नीलवर्ण अरबी मूल के घोड़े का नाम चेतक था। एेक व्यापारी अरबी नस्ल के तीन घोडे चेतक,त्राटक और अटक लेकर आया।अटक परीक्षण में काम आ गया। त्राटक महाराणा प्रताप ने उनके छोटे भाई शक्ती सिंह को दे दिया और चेतक को स्वयं रख लिया। हल्दी घाटी-(१५७६) के युद्ध में चेतक ने अपनी अद्वितीय स्वामिभक्ति, बुद्धिमत्ता एवं वीरता का परिचय दिया था। युद्ध में बुरी तरह घायल हो जाने पर भी महाराणा प्रताप को सुरक्षित रणभूमि से निकाल लाने में सफल वह एक बरसाती नाला उलांघ कर अन्ततः वीरगति को प्राप्त हुआ। हिंदी कवि श्याम नारायण पाण्डेय द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य हल्दी घाटी में चेतक के पराक्रम एवं उसकी स्वामिभक्ति की मार्मिक कथा वर्णित हुई है। आज भी चित्तौड़ की हल्दी घाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है, जहाँ स्वयं प्रताप और उनके भाई शक्तिसिंह ने अपने हाथों से इस अश्व का दाह-संस्कार किया था। चेतक की स्वामिभक्ति पर बने कुछ लोकगीत मेवाड़ में आज भी गाये जाते हैं।


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

, वीरांगना पन्ना धाय

पन्ना धाय राणा साँगा के पुत्र राणा उदयसिंह की धाय माँ थीं। पन्ना धाय किसी राजपरिवार की सदस्य नहीं थीं। अपना सर्वस्व स्वामी को अर्पण करने वाली वीरांगना पन्ना धाय का जन्म कमेरी गावँ में हुआ था। राणा साँगा के पुत्र उदयसिंह को माँ के स्थान पर दूध पिलाने के कारण पन्ना 'धाय माँ' कहलाई थी। पन्ना का पुत्र चन्दन और राजकुमार उदयसिंह साथ-साथ बड़े हुए थे। उदयसिंह को पन्ना ने अपने पुत्र के समान पाला था। पन्नाधाय ने उदयसिंह की माँ कर्मावती के सामूहिक आत्म बलिदान द्वारा स्वर्गारोहण पर बालक की परवरिश करने का दायित्व संभाला था। पन्ना ने पूरी लगन से बालक की परवरिश और सुरक्षा की। पन्ना चित्तौड़ के कुम्भा महल में रहती थी।

पुत्र का बलिदान
चित्तौड़ का शासक, दासी का पुत्र बनवीर बनना चाहता था। उसने राणा के वंशजों को एक-एक कर मार डाला। बनवीर एक रात महाराजा विक्रमादित्य की हत्या करके उदयसिंह को मारने के लिए उसके महल की ओर चल पड़ा। एक विश्वस्त सेवक द्वारा पन्ना धाय को इसकी पूर्व सूचना मिल गई। पन्ना राजवंश और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग थी व उदयसिंह को बचाना चाहती थी। उसने उदयसिंह को एक बांस की टोकरी में सुलाकर उसे झूठी पत्तलों से ढककर एक विश्वास पात्र सेवक के साथ महल से बाहर भेज दिया। बनवीर को धोखा देने के उद्देश्य से अपने पुत्र को उदयसिंह के पलंग पर सुला दिया। बनवीर रक्तरंजित तलवार लिए उदयसिंह के कक्ष में आया और उसके बारे में पूछा। पन्ना ने उदयसिंह के पलंग की ओर संकेत किया जिस पर उसका पुत्र सोया था। बनवीर ने पन्ना के पुत्र को उदयसिंह समझकर मार डाला।
पन्ना अपनी आँखों के सामने अपने पुत्र के वध को अविचलित रूप से देखती रही। बनवीर को पता न लगे इसलिए वह आंसू भी नहीं बहा पाई। बनवीर के जाने के बाद अपने मृत पुत्र की लाश को चूमकर राजकुमार को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए निकल पड़ी। स्वामिभक्त वीरांगना पन्ना धन्य हैं! जिसने अपने कर्तव्य-पूर्ति में अपनी आँखों के तारे पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ राजवंश को बचाया।

मेवाड़ का वैधानिक महाराणा
पुत्र की मृत्यु के बाद पन्ना उदयसिंह को लेकर बहुत दिनों तक सप्ताह शरण के लिए भटकती रही पर दुष्ट बनबीर के खतरे के डर से कई राजकुल जिन्हें पन्ना को आश्रय देना चाहिए था, उन्होंने पन्ना को आश्रय नहीं दिया। पन्ना जगह-जगह राजद्रोहियों से बचती, कतराती तथा स्वामिभक्त प्रतीत होने वाले प्रजाजनों के सामने अपने को ज़ाहिर करती भटकती रही। कुम्भलगढ़ में उसे यह जाने बिना कि उसकी भवितव्यता क्या है शरण मिल गयी। उदयसिंह क़िलेदार का भांजा बनकर बड़ा हुआ। तेरह वर्ष की आयु में मेवाड़ी उमरावों ने उदयसिंह को अपना राजा स्वीकार कर लिया और उसका राज्याभिषेक कर दिया। उदय सिंह 1542 में मेवाड़ के वैधानिक महाराणा बन गए।

स्वामिभक्त
मेवाड़ के इतिहास में जिस गौरव के साथ प्रात: स्मरणीय महाराणा प्रताप को याद किया जाता है, उसी गौरव के साथ पन्ना धाय का नाम भी लिया जाता है, जिसने स्वामीभक्ति को सर्वोपरि मानते हुए अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दे दिया था। इतिहास में पन्ना धाय का नाम स्वामिभक्ति के शिरमोरों में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है | 


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

रानी पद्मिनी, चित्तौड़ की रानी थी। रानी पद्मिनि के साहस और बलिदान की गौरवगाथा इतिहास में अमर है। सिंहल द्वीप के राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की बेटी पद्मिनी चित्तौड़ के राजा रतनसिंह के साथ ब्याही गई थी। रानी पद्मिनी बहुत खूबसूरत थी और उनकी खूबसूरती पर एक दिन दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नजर पड़ गई।[1] अलाउद्दीन किसी भी कीमत पर रानी पद्मिनी को हासिल करना चाहता था, इसलिए उसने चित्तौड़ पर हमला कर दिया। रानी पद्मिनी ने आग में कूदकर जान दे दी, लेकिन अपनी आन-बान पर आँच नहीं आने दी। ईस्वी सन् १३०३ में चित्तौड़ के लूटने वाला अलाउद्दीन खिलजी था जो राजसी सुंदरी रानी पद्मिनी को पाने के लिए लालयित था। श्रुति यह है कि उसने दर्पण में रानी की प्रतिबिंब देखा था और उसके सम्मोहित करने वाले सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गया था। लेकिन कुलीन रानी ने लज्जा को बचाने के लिए जौहर करना बेहतर समझा।[2]

इनकी कथा कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अवधी भाषा में पद्मावत ग्रंथ रूप में लिखl

पद्मिनी सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की अद्वितीय सुंदरी राजकन्या तथा चित्तौड़ के राजा भीमसिंह अथवा रत्नसिंह की रानी थी। उसके रूप, यौवन और जौहर व्रत की कथा, मध्यकाल से लेकर वर्तमान काल तक चारणों, भाटों, कवियों, धर्मप्रचारकों और लोकगायकों द्वारा विविध रूपों एवं आशयों में व्यक्त हुई है। पद्मिनी संबंधी कथाओं में सर्वत्र यह स्वीकार किया गया है कि अलाउद्दीन ऐसा कर सकता था लेकिन किसी विश्वसनीय तथा लिखित प्रमाण के अभाव में ऐतिहासिक दृष्टि से इसे पूर्णतया सत्य मान लेना कठिन है।

सुल्तान के साथ चित्तौड़ की चढ़ाई में उपस्थित अमीर खुसरो में एक इतिहासलेखक की स्थिति से न तो 'तारीखे अलाई' में और न सहृदय कवि के रूप में अलाउद्दीन के बेटे खिज्र खाँ और गुजरात की रानी देवलदेवी की प्रेमगाथा 'मसनवी खिज्र खाँ' में ही इसका कुछ संकेत किया है। इसके अतिरिक्त परवर्ती फारसी इतिहासलेखकों ने भी इस संबध में कुछ भी नहीं लिखा है। केवल फरिश्ता ने चित्तौड़ की चढ़ाई (सन् १३०३) के लगभग ३०० वर्ष बाद और जायसीकृत 'पद्मावत' (रचनाकाल १५४० ई.) की रचना के ७० वर्ष पश्चात् सन् १६१० में 'पद्मावत्' के आधार पर इस वृत्तांत का उल्लेख किया जो तथ्य की दृष्टि से विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। ओझा जी का कथन है कि पद्मावत, तारीखे फरिश्ता और इतिहासकार टाड के संकलनों में तथ्य केवल यहीं है कि चढ़ाई और घेरे के बाद अलाउद्दीन ने चित्तौड़ को विजित किया, वहाँ का राजा रत्नसेन मारा गया और उसकी रानी पद्मिनी ने राजपूत रमणियों के साथ जौहर की अग्नि में आत्माहुति दी। इसके अतिरिक्त अन्य सब बातें कल्पित हैं।

सिंहल द्वीप की राजकन्य के रूप में पद्मिनी की स्थिति तो घोर अनैतिहासिक है (ओझा)। इतिहासकार ओझा जी ने रत्नसिंह की अवस्थिति सिद्ध करने के लिये कुंभलगढ़ का जो प्रशस्तिलेख प्रस्तुत किया है, उसमें उसे मेवाड़ का स्वामी और समरसिंह का पुत्र लिखा गया है, यद्यपि यह लेख भी रत्नसिंह की मृत्यु (१३०३) के १५७ वर्ष पश्चात् सन् १४६० में उत्कीर्ण हुआ था। लेकिन औपन्यासिक शैली में लिखा गया प्रख्यात शोध ग्रंथ अग्नि की लपटे में प्रख्यात इतिहासकार तेजपाल सिंह धामा ने उन्हें ऐतिहासिक संदर्भो एवं जाफना से प्रकाशित ग्रंथों के आधार श्रीलंका की राजकुमारी ही सिद्ध किया है। भट्टकाव्यों, ख्यातों और अन्य प्रबंधों के अलावा परवर्ती काव्यों में प्रसिद्ध 'पद्मिनी के महल' और 'पद्मिनी के तालाब' जैसे स्मारकों के बाबजूद किसी ठोस ऐतिहासिक प्रमाण के बिना रत्नसिंह की रानी को पद्मिनी नाम दे देना अथवा पद्मिनी को हठात् उसके साथ जोड़ देना असंगत है। संभव है, सतीत्वरक्षा के निमित्त जौहर की आदर्श परंपरा की नेत्री चित्तौड़ की अज्ञातनामा रानी को, चारणों
आदि ने, शास्त्रप्रसिद्ध सर्वश्रेष्ठ नायिका पद्मिनी नाम देकर तथा सतीप्रथा संबंधी पुरावृत्त के आधार पर इस कथा को रोचक तथा कथारुढ़िसंमत बनाने के लिये, रानी की अभिजात जीवनी के साथ अन्यान्य प्रसंग गढ़ लिए हों। अस्तु, सैंदर्य तथा आदर्श के लोकप्रसिद्ध प्रतीक तथा काव्यगत कल्पित पात्र के रूप में ही पद्मिनी नाम स्वीकार किया जाना ठीक लगता है। 


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

एक औरत को आखिर .........
क्या चाहिए होता है?
एक बार जरुर पढ़े ये छोटी सी कहानी:
राजा हर्षवर्धन युद्ध में हार गए।
हथकड़ियों में जीते हुए पड़ोसी राजा के सम्मुख पेश किए गए। पड़ोसी देश का राजा अपनी जीत से प्रसन्न था और उसने हर्षवर्धन के सम्मुख एक प्रस्ताव रखा...
यदि तुम एक प्रश्न का जवाब हमें लाकर दे दोगे तो हम तुम्हारा राज्य लौटा देंगे, अन्यथा उम्र कैद के लिए तैयार रहें।
प्रश्न है.. एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ?
इसके लिए तुम्हारे पास एक महीने का समय है हर्षवर्धन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया..
वे जगह जगह जाकर विदुषियों, विद्वानों और तमाम घरेलू स्त्रियों से लेकर नृत्यांगनाओं, वेश्याओं, दासियों और रानियों, साध्वी सब से मिले और जानना चाहा कि एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ? किसी ने सोना, किसी ने चाँदी, किसी ने हीरे जवाहरात, किसी ने प्रेम-प्यार, किसी ने बेटा-पति-पिता और परिवार तो किसी ने राजपाट और संन्यास की बातें कीं, मगर हर्षवर्धन को सन्तोष न हुआ।
महीना बीतने को आया और हर्षवर्धन को कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला..
किसी ने सुझाया कि दूर देश में एक जादूगरनी रहती है, उसके पास हर चीज का जवाब होता है शायद उसके पास इस प्रश्न का भी जवाब हो..
हर्षवर्धन अपने मित्र सिद्धराज के साथ जादूगरनी के पास गए और अपना प्रश्न दोहराया।
जादूगरनी ने हर्षवर्धन के मित्र की ओर देखते हुए कहा.. मैं आपको सही उत्तर बताऊंगी परंतु इसके एवज में आपके मित्र को मुझसे शादी करनी होगी ।
जादूगरनी बुढ़िया तो थी ही, बेहद बदसूरत थी, उसके बदबूदार पोपले मुंह से एक सड़ा दाँत झलका जब उसने अपनी कुटिल मुस्कुराहट हर्षवर्धन की ओर फेंकी ।
हर्षवर्धन ने अपने मित्र को परेशानी में नहीं डालने की खातिर मना कर दिया, सिद्धराज ने एक बात नहीं सुनी और अपने मित्र के जीवन की खातिर जादूगरनी से विवाह को तैयार हो गया
तब जादूगरनी ने उत्तर बताया..
"स्त्रियाँ, स्वयं निर्णय लेने में आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं | "
यह उत्तर हर्षवर्धन को कुछ जमा, पड़ोसी राज्य के राजा ने भी इसे स्वीकार कर लिया और उसने हर्षवर्धन को उसका राज्य लौटा दिया
इधर जादूगरनी से सिद्धराज का विवाह हो गया, जादूगरनी ने मधुरात्रि को अपने पति से कहा..
चूंकि तुम्हारा हृदय पवित्र है और अपने मित्र के लिए तुमने कुरबानी दी है अतः मैं चौबीस घंटों में बारह घंटे तो रूपसी के रूप में रहूंगी और बाकी के बारह घंटे अपने सही रूप में, बताओ तुम्हें क्या पसंद है ?
सिद्धराज ने कहा.. प्रिये, यह निर्णय तुम्हें ही करना है, मैंने तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया है, और तुम्हारा हर रूप मुझे पसंद है ।
जादूगरनी यह सुनते ही रूपसी बन गई, उसने कहा.. चूंकि तुमने निर्णय मुझ पर छोड़ दिया है तो मैं अब हमेशा इसी रूप में रहूंगी, दरअसल मेरा असली रूप ही यही है।
बदसूरत बुढ़िया का रूप तो मैंने अपने आसपास से दुनिया के कुटिल लोगों को दूर करने के लिए धरा हुआ था ।
अर्थात, सामाजिक व्यवस्था ने औरत को परतंत्र बना दिया है, पर मानसिक रूप से कोई भी महिला परतंत्र नहीं है।
इसीलिए जो लोग पत्नी को घर की मालकिन बना देते हैं, वे अक्सर सुखी देखे जाते हैं। आप उसे मालकिन भले ही न बनाएं, पर उसकी ज़िन्दगी के एक हिस्से को मुक्त कर दें। उसे उस हिस्से से जुड़े निर्णय स्वयं लेने दें।


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

(((( राम नाम की महिमा ))))
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एक संत महात्मा श्यामदासजी रात्रि के समय में ‘श्रीराम’ नाम का अजपाजाप करते हुए अपनी मस्ती में चले जा रहे थे। जाप करते हुए वे एक गहन जंगल से गुज़र रहे थे।
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विरक्त होने के कारण वे महात्मा बार-बार देशाटन करते रहते थे। वे किसी एक स्थान में अधिक समय नहीं रहते थे। वे इश्वर नाम प्रेमी थे। इस लिये दिन-रात उनके मुख से राम नाम जप चलता रहता था। स्वयं राम नाम का अजपाजाप करते तथा औरों को भी उसी मार्ग पर चलाते।
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श्यामदासजी गहन जंगल में मार्ग भूल गये थे पर अपनी मस्ती में चले जा रहे थे कि जहाँ राम ले चले वहाँ….। दूर अँधेरे के बीच में बहुत सी दीपमालाएँ प्रकाशित थीं। महात्मा जी उसी दिशा की ओर चलने लगे।
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निकट पहुँचते ही देखा कि वटवृक्ष के पास अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र बज रहे हैं, नाच -गान और शराब की महफ़िल जमी है। कई स्त्री पुरुष साथ में नाचते-कूदते-हँसते तथा औरों को हँसा रहे हैं। उन्हें महसूस हुआ कि वे मनुष्य नहीं प्रेतात्मा हैं।
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श्यामदासजी को देखकर एक प्रेत ने उनका हाथ पकड़कर कहाः ओ मनुष्य ! हमारे राजा तुझे बुलाते हैं, चल। वे मस्तभाव से राजा के पास गये जो सिंहासन पर बैठा था। वहाँ राजा के इर्द-गिर्द कुछ प्रेत खड़े थे।
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प्रेतराज ने कहाः तुम इस ओर क्यों आये ? हमारी मंडली आज मदमस्त हुई है, इस बात का तुमने विचार नहीं किया ? तुम्हें मौत का डर नहीं है ?
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अट्टहास करते हुए महात्मा श्यामदासजी बोलेः मौत का डर ? और मुझे ? राजन् ! जिसे जीने का मोह हो उसे मौत का डर होता हैं। हम साधु लोग तो मौत को आनंद का विषय मानते हैं। यह तो देहपरिवर्तन हैं जो प्रारब्धकर्म के बिना किसी से हो नहीं सकता।
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प्रेतराजः तुम जानते हो हम कौन हैं ?
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महात्माजीः मैं अनुमान करता हूँ कि आप प्रेतात्मा हो।
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प्रेतराजः तुम जानते हो, लोग समाज हमारे नाम से काँपता हैं।
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महात्माजीः प्रेतराज ! मुझे मनुष्य में गिनने की ग़लती मत करना। हम ज़िन्दा दिखते हुए भी जीने की इच्छा से रहित, मृततुल्य हैं।
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यदि ज़िन्दा मानो तो भी आप हमें मार नहीं सकते। जीवन-मरण कर्माधीन हैं। मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ ?
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महात्मा की निर्भयता देखकर प्रेतों के राजा को आश्चर्य हुआ कि प्रेत का नाम सुनते ही मर जाने वाले मनुष्यों में एक इतनी निर्भयता से बात कर रहा हैं। सचमुच, ऐसे मनुष्य से बात करने में कोई हरकत नहीं।
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प्रेतराज बोलाः पूछो, क्या प्रश्न है ?
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महात्माजीः प्रेतराज ! आज यहाँ आनंदोत्सव क्यों मनाया जा रहा है ?
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प्रेतराजः मेरी इकलौती कन्या, योग्य पति न मिलने के कारण अब तक कुआँरी हैं। लेकिन अब योग्य जमाई मिलने की संभावना हैं। कल उसकी शादी हैं इसलिए यह उत्सव मनाया जा रहा हैं।
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महात्मा (हँसते हुए): तुम्हारा जमाई कहाँ हैं ? मैं उसे देखना चाहता हूँ।”
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प्रेतराजः जीने की इच्छा के मोह के त्याग करने वाले महात्मा ! अभी तो वह हमारे पद (प्रेतयोनी) को प्राप्त नहीं हुआ हैं। वह इस जंगल के किनारे एक गाँव के श्रीमंत (धनवान) का पुत्र है।
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महादुराचारी होने के कारण वह इसवक्त भयानक रोग से पीड़ित है। कल संध्या के पहले उसकी मौत होगी। फिर उसकी शादी मेरी कन्या से होगी। इस लिये रात भर गीत-नृत्य और मद्यपान करके हम आनंदोत्सव मनायेंगे।
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श्यामदासजी वहाँ से विदा होकर श्रीराम नाम का अजपाजाप करते हुए जंगल के किनारे के गाँव में पहुँचे। उस समय सुबह हो चुकी थी। एक ग्रामीण से महात्मा नें पूछा "इस गाँव में कोई श्रीमान् का बेटा बीमार हैं ?"
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ग्रामीणः हाँ, महाराज ! नवलशा सेठ का बेटा सांकलचंद एक वर्ष से रोगग्रस्त हैं। बहुत उपचार किये पर उसका रोग ठीक नहीं होता।
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महात्मा नवलशा सेठ के घर पहुंचे सांकलचंद की हालत गंभीर थी। अन्तिम घड़ियाँ थीं फिर भी महात्मा को देखकर माता-पिता को आशा की किरण दिखी। उन्होंने महात्मा का स्वागत किया।
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सेठपुत्र के पलंग के निकट आकर महात्मा रामनाम की माला जपने लगे। दोपहर होते-होते लोगों का आना-जाना बढ़ने लगा।
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महात्मा: क्यों, सांकलचंद ! अब तो ठीक हो ?
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सांकलचंद ने आँखें खोलते ही अपने सामने एक प्रतापी संत को देखा तो रो पड़ा। बोला "बापजी ! आप मेरा अंत सुधारने के लिए पधारे हो।
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मैंने बहुत पाप किये हैं। भगवान के दरबार में क्या मुँह दिखाऊँगा ? फिर भी आप जैसे संत के दर्शन हुए हैं, यह मेरे लिए शुभ संकेत हैं।" इतना बोलते ही उसकी साँस फूलने लगी, वह खाँसने लगा।
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"बेटा ! निराश न हो भगवान राम पतित पावन है। तेरी यह अन्तिम घड़ी है। अब काल से डरने का कोई कारण नहीं। ख़ूब शांति से चित्तवृत्ति के तमाम वेग को रोककर श्रीराम नाम के जप में मन को लगा दे। अजपाजाप में लग जा। शास्त्र कहते हैं-
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चरितम् रघुनाथस्य शतकोटिम् प्रविस्तरम्।
एकैकम् अक्षरम् पूण्या महापातक नाशनम्।।
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अर्थातः सौ करोड़ शब्दों में भगवान राम के गुण गाये गये हैं। उसका एक-एक अक्षर ब्रह्महत्या आदि महापापों का नाश करने में समर्थ हैं।
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दिन ढलते ही सांकलचंद की बीमारी बढ़ने लगी। वैद्य-हकीम बुलाये गये। हीरा भस्म आदि क़ीमती औषधियाँ दी गयीं। किंतु अंतिम समय आ गया यह जानकर महात्माजी ने थोड़ा नीचे झुककर उसके कान में रामनाम लेने की याद दिलायी।
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राम बोलते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये। लोगों ने रोना शुरु कर दिया। शमशान यात्रा की तैयारियाँ होने लगीं। मौक़ा पाकर महात्माजी वहाँ से चल दिये।
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नदी तट पर आकर स्नान करके नामस्मरण करते हुए वहाँ से रवाना हुए। शाम ढल चुकी थी। फिर वे मध्यरात्रि के समय जंगल में उसी वटवृक्ष के पास पहुँचे। प्रेत समाज उपस्थित था।
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प्रेतराज सिंहासन पर हताश होकर बैठे थे। आज गीत, नृत्य, हास्य कुछ न था। चारों ओर करुण आक्रंद हो रहा था, सब प्रेत रो रहे थे।
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महात्मा ने पूछा "प्रेतराज ! कल तो यहाँ आनंदोत्सव था, आज शोक-समुद्र लहरा रहा हैं। क्या कुछ अहित हुआ हैं ?"
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प्रेतराजः हाँ भाई ! इसीलिए रो रहे हैं। हमारा सत्यानाश हो गया। मेरी बेटी की आज शादी होने वाली थी। अब वह कुँआरी रह जायेगी
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महात्मा: प्रेतराज ! तुम्हारा जमाई तो आज मर गया हैं। फिर तुम्हारी बेटी कुँआरी क्यों रही ?
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प्रेतराज ने चिढ़कर कहाः तेरे पाप से। मैं ही मूर्ख हूँ कि मैंने कल तुझे सब बता दिया। तूने हमारा सत्यानाश कर दिया।
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महात्मा ने नम्रभाव से कहाः मैंने आपका अहित किया यह मुझे समझ में नहीं आता। क्षमा करना, मुझे मेरी भूल बताओगे तो मैं दुबारा नहीं करूँगा।
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प्रेतराज ने जलते हृदय से कहाः यहाँ से जाकर तूने मरने वाले को नाम स्मरण का मार्ग बताया और अंत समय भी राम नाम कहलवाया। इससे उसका उद्धार हो गया और मेरी बेटी कुँआरी रह गयी।
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महात्माजीः क्या ? सिर्फ़ एक बार नाम जप लेने से वह प्रेतयोनि से छूट गया ? आप सच कहते हो ?
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प्रेतराजः हाँ भाई ! जो मनुष्य राम नामजप करता हैं वह राम नामजप के प्रताप से कभी हमारी योनि को प्राप्त नहीं होता। भगवन्नाम जप में नरकोद्धारिणी शक्ति हैं।
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प्रेत के द्वारा रामनाम का यह प्रताप सुनकर महात्माजी प्रेमाश्रु बहाते हुए भाव समाधि में लीन हो गये। उनकी आँखे खुलीं तब वहाँ प्रेत-समाज नहीं था, बाल सूर्य की सुनहरी किरणें वटवृक्ष को शोभायमान कर रही थीं।

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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

घमंड और साधना
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संत कबीर गांव के बाहर झोपड़ी बनाकर अपने पुत्र कमाल के साथ रहते थे. संत कबीर जी का रोज का नियम था- नदी में स्नान करके गांव के सभी मंदिरों में जल चढाकर दोपहर बाद भजन में बैठते, शाम को देर से घर लौटते.
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वह अपने नित्य नियम से गांव में निकले थे. इधर पास के गांव के जमींदार का एक ही जवान लडका था जो रात को अचानक मर गया. रात भर रोना-धोना चला.
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आखिर में किसी ने सुझाया कि गांव के बाहर जो बाबा रहते हैं उनके पास ले चलो. शायद वह कुछ कर दें. सब तैयार हो गए. लाश को लेकर पहुंचे कुटिया पर. देखा बाबा तो हैं नहीं, अब क्या करें ?
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तभी कमाल आ गए. उनसे पूछा कि बाबा कब तक आएंगे ? कमाल ने बताया कि अब उनकी उम्र हो गई है. सब मंदिरों के दर्शन करके लौटते-लौटते रात हो जाती है. आप काम बोलो क्या है ?
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लोगों ने लड़के के मरने की बात बता दी. कमाल ने सोचा कोई बीमारी होती तो ठीक था पर ये तो मर गया है. अब क्या करें ! फिर भी सोचा लाओ कुछ करके देखते हैं. शायद बात बन जाए.
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कमाल ने कमंडल उठाया. लाश की तीन परिक्रमा की. फिर तीन बार गंगा जल का कमंडल से छींटी मारा और तीन बार राम नाम का उच्चारण किया. लडका देखते ही देखते उठकर खड़ा हो गया. लोगों की खुशी की सीमा न रही.
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इधर कबीर जी को किसी ने बताया कि आपके कुटिया की ओर गांव के जमींदार और सभी लोग गए हैं. कबीर जी झटकते कदमों से बढ़ने लगे. उन्हें रास्ते में ही लोग नाचते कूदते मिले. कबीर जी कुछ समझ नही पाए.
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आकर कमाल से पूछा कया बात हुई ? तो कमाल तो कुछ ओर ही बताने लगा. बोला- गुरु जी बहुत दिन से आप बोल रहे थे ना की तीर्थ यात्रा पर जाना है तो अब आप जाओ यहां तो मैं सब संभाल लूंगा.
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कबीर जी ने पूछा क्या संभाल लेगा ? कमाल बोला- बस यही मरे को जिंदा करना, बीमार को ठीक करना. ये तो सब अब मैं ही कर लूंगा. अब आप तो यात्रा पर जाओ जब तक आप की इच्छा हो.
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कबीर ने मन ही मन सोचा- चेले को सिद्धि तो प्राप्त हो गई है पर सिद्धि के साथ ही साथ इसे घमंड भी आ गया है. पहले तो इसका ही इलाज करना पडेगा बाद मे तीर्थ यात्रा होगी क्योंकि साधक में घमंड आया तो साधना समाप्त हो जाती है.
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कबीर जी ने कहा ठीक है. आने वाली पूर्णमासी को एक भजन का आयोजन करके फिर निकल जाउंगा यात्रा पर. तब तक तुम आस-पास के दो चार संतो को मेरी चिट्ठी जाकर दे आओ. भजन में आने का निमंत्रण भी देना.
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कबीर जी ने चिट्ठी मे लिखा था-
कमाल भयो कपूत,
कबीर को कुल गयो डूब.
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कमाल चिट्ठी लेकर गया एक संत के पास. उनको चिट्ठी दी. चिट्ठी पढ के वह समझ गए. उन्होंने कमाल का मन टटोला और पूछा कि अचानक ये भजन के आयोजन का विचार कैसे हुआ ?
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कमाल ने अहं के साथ बताया- कुछ नहीं. गुरू जी की लंबे समय से तीर्थ पर जाने की इच्छा थी. अब मैं सब कर ही लेता हूं तो मैने उन्हें कहा कि अब आप जाओ यात्रा कर आओ. तो वह जा रहे है ओर जाने से पहले भजन का आयोजन है.
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संत दोहे का अर्थ समझ गए. उन्होंने कमाल से पूछा- तुम क्या क्या कर लेते हो ? तो बोला वही मरे को जिंदा करना बीमार को ठीक करना जैसे काम.
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संत जी ने कहा आज रूको और शाम को यहां भी थोडा चमत्कार दिखा दो. उन्होंने गांव में खबर करा दी. थोडी देर में दो तीन सौ लोगों की लाईन लग गई. सब नाना प्रकार की बीमारी वाले. संत जी ने कमाल से कहा- चलो इन सबकी बीमारी को ठीक कर दो.
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कमाल तो देख के चौंक गया. अरे, इतने सारे लोग हैं. इतने लोगों को कैसे ठीक करूं. यह मेरे बस का नहीं है. संत जी ने कहा- कोई बात नहीं. अब ये आए हैं तो निराश लौटाना ठीक नहीं. तुम बैठो.
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संत जी ने लोटे में जल लिया और राम नाम का एक बार उच्चारण करके छींट दिया. एक लाईन में खड़े सारे लोग ठीक हो गए. फिर दूसरी लाइन पर छींटा मारा वे भी ठीक. बस दो बार जल के छींटे मार कर दो बार राम बोला तो सभी ठीक हो के चले गए.
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संत जी ने कहा- अच्छी बात है कमाल. हम भजन में आएंगे. पास के गांव में एक सूरदास जी रहते हैं. उनको भी जाकर बुला लाओ फिर सभी इक्ठ्ठे होकर चलते हैं भजन में.
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कमाल चल दिया सूरदास जी को बुलाने. सारे रास्ते सोचता रहा कि ये कैसे हुआ कि एक बार राम कहते ही इतने सारे बीमार लोग ठीक हो गए. मैंने तीन बार प्रदक्षिणा की. तीन बार गंगा जल छिड़क कर तीन बार राम नाम लिया तब बात बनी.
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यही सोचते-सोचते सूरदास जी की कुटिया पर पहुंच गया. जाके सब बात बताई कि क्यों आना हुआ. कमाल सुना ही रहा था कि इतने में सूरदास बोले- बेटा जल्दी से दौड के जा. टेकरी के पीछे नदी में कोई बहा जा रहा है. जल्दी से उसे बचा ले.
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कमाल दौड के गया. टेकरी पर से देखा नदी में एक लडका बहा आ रहा था. कमाल नदी में कूद गया और लडके को बाहर निकाल कर अपनी पीठ जी लादके कुटिया की तरफ चलने लगा.
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चलते- चलते उसे विचार आया कि अरे सूरदास जी तो अंधे हैं. फिर उन्हें नदी और उसमें बहता लडका कैसे दिख गया. उसका दिमाग सुन्न हो गया था. लडके को भूमि पर रखा तो देखा कि लडका मर चुका था.
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सूरदास ने जल का छींटा मारा और बोला- “रा”. तब तक लडका उठ के चल दिया. अब तो कमाल अचंभित की अरे इन्हें तो पूरा राम भी नहीं बोला. खाली रा बोलते ही लडका जिंदा हो गया.
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तब कमाल ने वह चिट्ठी खोल के खुद पढी की इसमें क्या लिखा है जब उसने पढा तो सब समझ मे आ गया.
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वापस आ के कबीर जी से बोला गुरु जी संसार मे एक से एक सिद्ध हैं उनके आगे मैं कुछ नहीं हूं. गुरु जी आप तो यहीं रहिए. अभी मुझे जाकर भ्रमण करके बहुत कुछ सीखने समझने की जरूरत है.
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कथा का तात्पर्य कि गुरू की कृपा से सिद्धियां मिलती हैं. उनका आशीर्वाद होता है तो साक्षात ईश्वर आपके साथ खड़े होते हैं. गुरू, गुरू ही रहेंगे. वह शिष्य के मन के सारे भाव पढ़ लेते हैं और मार्गदर्शक बनकर उन्हें पतन से बचाते हैं.
जय जय श्री राधे


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किसी गाँव में दो साधू रहते थे. वे दिन भर भीख मांगते और मंदिर में पूजा करते थे। एक दिन गाँव में आंधी आ गयी और बहुत जोरों की बारिश होने लगी; दोनों साधू गाँव की सीमा से लगी एक झोपडी में निवास करते थे, शाम को जब दोनों वापस पहुंचे तो देखा कि आंधी-तूफ़ान के कारण उनकी आधी झोपडी टूट गई है। यह देखकर पहला साधू क्रोधित हो उठता है और बुदबुदाने लगता है ,” भगवान तू मेरे साथ हमेशा ही गलत करता है… में दिन भर तेरा नाम लेता हूँ , मंदिर में तेरी पूजा करता हूँ फिर भी तूने मेरी झोपडी तोड़ दी… गाँव में चोर – लुटेरे झूठे लोगो के तो मकानों को कुछ नहीं हुआ , बिचारे हम साधुओं की झोपडी ही तूने तोड़ दी ये तेरा ही काम है …हम तेरा नाम जपते हैं पर तू हमसे प्रेम नहीं करता….”
तभी दूसरा साधू आता है और झोपडी को देखकर खुश हो जाता है नाचने लगता है और कहता है भगवान् आज विश्वास हो गया तू हमसे कितना प्रेम करता है ये हमारी आधी झोपडी तूने ही बचाई होगी वर्ना इतनी तेज आंधी – तूफ़ान में तो पूरी झोपडी ही उड़ जाती ये तेरी ही कृपा है कि अभी भी हमारे पास सर ढंकने को जगह है…. निश्चित ही ये मेरी पूजा का फल है , कल से मैं तेरी और पूजा करूँगा , मेरा तुझपर विश्वास अब और भी बढ़ गया है… तेरी जय हो !
मित्रों एक ही घटना को एक ही जैसे दो लोगों ने कितने अलग-अलग ढंग से देखा … हमारी सोच हमारा भविष्य तय करती है , हमारी दुनिया तभी बदलेगी जब हमारी सोच बदलेगी। यदि हमारी सोच पहले वाले साधू की तरह होगी तो हमें हर चीज में कमी ही नजर आएगी और अगर दूसरे साधू की तरह होगी तो हमे हर चीज में अच्छाई दिखेगी ….अतः हमें दूसरे साधू की तरह विकट से विकट परिस्थिति में भी अपनी सोच सकारात्मक बनाये रखनी चाहिए।

*Jai shri krishna ji*
💞 🍃 🍃 🍃 🍃 🍃 🍃 🍃
*एक बहुत पुरानी कहानी है*
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*एक राजा बहुत दिनो से पुत्र की प्राप्ती के लिये आशा लगाये बैठा था,पर पुत्र नही हुआ ।उसके सलाहकारों ने तांत्रिकों से सहयोग की बात बताई ।सुझाव मिला कि किसी बच्चे की बलि दे दी जाये तो पुत्र प्राप्ती हो जायेगी ।*
💝💝💝💝💝💝
*राजा ने राज्य में ये बात फैलाई कि जो अपना बच्चा देगा उसे बहुत सारे धन दिये जायेगे ।एक परिवार में कई बच्चें थे ,गरीबी भी थी,एक ऐसा बच्चा भी था जो ईश्वर पर आस्था रखता था तथा सन्तों के संग सत्संग में ज्यादा समय देता था ।*
⛳⛳⛳⛳⛳⛳⛳
*परिवार को लगा कि इसे राजा को दे दिया जाये क्योंकि ये कुछ काम भी नही करता है,हमारे किसी काम का भी नही ।इससे राजा प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा ।ऐसा ही किया गया बच्चा राजा को दे दिया गया ।*
💧💧💧💧💧💧💧
*राजा के तात्रिकों द्वारा बच्चे की बलि की तैयारी हो गई,राजा को भी बुलाया गया ,बच्चे से पुछा गया कि तुम्हारी आखरी इच्छा क्या है ?क्योंकि अाज तुम्हारा जीवन का अन्तिम दिन है।*
💦💦💦💦💦💦
*बच्चे ने कहा कि ठीक है मेरे लिये रेत मगा दिया जाये,रेत अा गया ।बच्चे ने रेत से चार ढ़ेर* *बनाये ,एक-एक करके तीन रेत के ढ़ेर को तोड़ दिया और चौथे के सामने हाथ जोड़कर बैठ गया और कहा कि अब जो करना है करे ।*
📿📿📿📿📿📿
*ये सब देखकर तॉत्रिक डर गये बोले कि ये तुमने क्या किया है पहले बताओं ।राजा ने भी पुछा तो बच्चे ने कहा कि पहली ढ़ेरी मेरे माता पिता की है,मेरी रक्षा करना उनका कर्तब्य था पर उन्होने पैसे के लिये मुझे बेच दिया ।इसलिये मैने ये ढ़ेरी तोड़ी,दुसरा मेरे सगे-सम्बन्धियों का था,उन्होंने भी मेरे माता-पिता को नही समझाया तीसरा आपका है राजा क्योंकि राज्य के सभी इंसानों की रक्षा करना राजा का ही काम होता है पर राजा ही मेरी बलि देना चाह रहा है तो ये ढ़ेरी भी मैने तोड़ दी ।अब सिर्फ मेरे सत्गुरु और ईश्वर पर मुझे भरोसा है इसलिये ये एक ढ़ेरी मैने छोड़ दी है ।*
🙏 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏
*राजा ने सोचा कि पता नही बच्चे की बलि से बाद भी पुत्र प्राप्त हो या न हो क्यों ना इस बच्चे को ही अपना पुत्र बना ले,इतना समझदार और ईश्वर भक्त बच्चा है ।इससे अच्छा बच्चा कहा मिलेगा ।*
🙏 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏
*राजा ने उस बच्चे को अपना बेटा बना लिया और राजकुमार घोषित कर दिया*
💞 🍃 💞 🍃 💞
*कहानी का भाव कि जो ईश्वर और सत्गुरु पर यकीन रखते है,उनका बाल भी बाका नही होता है,हर मुश्किल में एक का ही जो आसरा लेते है उनका कही से किसी प्रकार का कोई अहित नही होता है* 💐
*आप सभी ठाकुर प्रेमियो को राधे राधे* 


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

*आज इस पोस्ट को पढ़कर सारी ज़िन्दगी की टेंशन खत्म हो जायेगी*।

*बस धैर्य ओर शांति से पढ़े*।

*POWER OF POSITIVE THOUGHT*

*एक व्यक्ति काफी दिनों से चिंतित चल रहा था जिसके कारण वह काफी चिड़चिड़ा तथा तनाव में रहने लगा था। वह इस बात से परेशान था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी ना किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ आना जाना लगा ही रहता है,

*इन्ही बातों को सोच सोच कर वह काफी परेशान रहता था तथा बच्चों को अक्सर डांट देता था तथा अपनी पत्नी से भी ज्यादातर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा चलता रहता था*।

*एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये, वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था तो उसने बेटे को डांट कर भगा दिया लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा शांत हुआ तो वह बेटे के पास गया तो देखा कि बेटा सोया हुआ है और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है। उसने कॉपी लेकर देखी और जैसे ही उसने कॉपी नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी*।

*होमवर्क का टाइटल था* *********************

*वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं लेकिन बाद में वे अच्छी ही होती हैं*।

*इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया बच्चे ने लिखा था* •••

● *मैं अपने फाइनल एग्जाम को बहुंत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन इनके बाद स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जाती हैं*।

● *मैं ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाइयों को बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं*।

● *मैं सुबह - सुबह जगाने वाली उस अलार्म घड़ी को बहुत धन्यवाद् देता हूँ जो मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ*।

● *मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बहुत बुरी लगती है लेकिन वो मेरे लिए खिलौने लाते हैं, मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे अच्छी अच्छी चीजें खिलाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त सोहन के तो पिता ही नहीं हैं*।

*बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग गया हो। उसकी सोच बदल सी गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार बार घूम रही थी। खासकर वह last वाली लाइन। उसकी नींद उड़ गयी थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में सोचना शुरू किया*।

●● *मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि मेरे पास घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास घर नहीं है*।

●● *मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, इसका मतलब है कि मेरा परिवार है, बीवी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो दुनियाँ में बिल्कुल अकेले हैं*।

●● *मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक हैसियत है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले लोग हैं*।

*हे ! मेरे भगवान् ! तेरा बहुंत बहुंत शुक्रिया ••• मुझे माफ़ करना, मैं तेरी कृपा को पहचान नहीं पाया।*

_*इसके बाद उसकी सोच एकदम से बदल गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म हो गयी। वह एकदम से बदल सा गया। वह भागकर अपने बेटे के पास गया और सोते हुए बेटे को गोद में उठाकर उसके माथे को चूमने लगा और अपने बेटे को तथा ईश्वर को धन्यवाद देने लगा*।_

*हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक नज़रिये से देखते रहेंगे तब तक हम परेशानियों से घिरे रहेंगे लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्तिथियों को सकारात्मक नज़रिये से देखेंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए - नए रास्ते दिखाई देने लगेंगे।*
💐💐

*अगर आपको बात अच्छी लगे तो उसका अनुकरण करके जिन्दगीको खुशहाल बनाइये*.
 


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

*अगर एक छिपकली ऐसा कर सकती है, तो हम क्यों नहीं कर सकते?*

सुनने में आया हैं की ये जापान में घटी सच्ची घटना है।
जापान में एक व्यक्ति अपने घर को तोड़ कर दोबारा बनवा रहा था।
जापान में घरों में लकड़ी की दीवारों में आमतौर पर खाली जगह रहती है।
जब उस घर की दीवारों को तोड़ रहे थे तो उस दीवार की खाली जगह में एक छिपकली फंसी हुई मिली। उस छिपकली के पैर में दीवार के बाहर की तरफ से निकल कर एक कील घुसी हुई थी।
जब उस छिपकली को देखा तो उस पर तरस तो आया ही साथ ही एक जिज्ञासा भी हुई क्योंकि जब कील को जांचा गया तो पता चला कि ये कील मकान बनाते समय 5 वर्ष पहले ठोकी गई थी।
क्या हुआ था?
छिपकली 5 वर्षों से एक ही जगह फंसी रहने के बावजूद जिन्दा थी!!
दीवार के एक छोटे से अँधेरे हिस्से में बिना हिले-डुले 5 वर्षों तक जिन्दा रहना असम्भव था।
ये वाकई हैरानी की बात थी कि छिपकली 5 वर्षों से जिन्दा कैसे थी! वो भी बिना एक कदम हिलाये, क्योंकि पैर दीवार से निकली कील में फंसा हुआ था।
सो वहाँ काम रोक दिया गया और छिपकली को देखने लगे कि वो क्या करती है और क्या और कैसे खाती है।
थोड़ी देर बाद पता नहीं कहाँ से एक और छिपकली आ गई जिसके मुंह में खाना था।
ये देख कर लोग हैरानी से सुन्न हो गये और ये बात उनके दिल को छू गई।
जो छिपकली पैर में कील घुसी होने की वजह से एक ही जगह फंस गई थी, दूसरी छिपकली पिछले 5 वर्षों से उसका पेट भर रही थी!!!!
अद्भुत! एक छिपकली द्वारा अपने साथी के प्रति बिना उम्मीद छोड़े ये सेवा पिछले 5 वर्षों से लगातार बिना थके चल रही थी।
अब आप सोचिये कि एक नन्हा सा जीव जो काम कर सकता है क्या कोई बुद्धिमान व्यक्ति उस काम को नहीं कर सकता।
*कृपया अपने प्रियजनों का परित्याग ना करें।*
जब उन्हें आपकी जरूरत हो उस समय उन्हें यह ना कहें कि आप व्यस्त हैं और आपके पास उनके लिये समय नहीं है।
*हो सकता है कि आपके कदमों तले सारी दुनिया हो लेकिन उनके लिये केवल आप ही उनकी दुनिया हो*
आपकी उपेक्षा का एक पल उनके दिल को तोड़ सकता है जो आपके दिल में बसते हैं।
_*कुछ कहने से पहले ये याद रखें कि कुछ तोड़ने में केवल एक पल लगता है जबकि बनाने में पूरा जीवन लग जाता है।*
 


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

 1 सिक्ख = 1.25 लाख मुगल -- जानने के लिये पुरी पोस्ट पढ़ें

धरती की सबसे मंहंगी जगह सरहिंद (पंजाब), जिला फतेहगढ़ साहब में है, यहां पर श्री गुरुगोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों का अंतिम संस्कार
किया गया था।

सेठ दीवान टोंडर मल ने यह जगह 78000 सोने की मोहरे (सिक्के)
जमीन पर फैला कर मुस्लिम बादशाह से ज़मीन खरीदी थी।

सोने की कीमत के मुताबिक इस 4 स्कवेयर मीटर जमीन की कीमत 2500000000 (दो अरब पचास
करोड़) बनती है।

दुनिया की सबसे मंहंगी जगह खरीदने का रिकॉर्ड आज सिख धर्म के इतिहास में दर्ज करवाया गया है। आजतक दुनिया के इतिहास में इतनी मंहंगी जगह कही नही खरीदी गयी।


दुनिया के इतिहास में ऐसा युद्ध ना कभी किसी ने पढ़ा होगा ना ही सोचा होगा, जिसमे 10 लाख की फ़ौज का सामना महज 42 लोगों के साथ हुआ था

और जीत किसकी होती है..??

उन 42 सूरमो की !

यह युद्ध 'चमकौर युद्ध' (Battle of Chamkaur) के नाम से भी जाना जाता है जो कि मुग़ल योद्धा वज़ीर खान की अगवाई में 10 लाख की फ़ौज का सामना सिर्फ 42
सिखों के सामने 6 दिसम्बर 1704 को हुआ जो की गुरु गोबिंद सिंह जी की अगवाई में तैयार हुए थे !


नतीजा यह निकलता है की उन 42 शूरवीर की जीत होती है जो की मुग़ल हुकूमत की नीव जो की बाबर ने रखी थी , उसे जड़ से उखाड़ दिया और भारत को आज़ाद भारत का दर्ज़ा दिया।

औरंगज़ेब ने भी उस वक़्त गुरु गोबिंद सिंह जी के आगे घुटने टेके और मुग़ल राज का अंत हुआ हिन्दुस्तान से ।

तभी औरंगजेब ने एक प्रश्न किया गुरुगोबिंद सिंह जी के सामने। कि यह कैसी फ़ौज तैयार की आपने जिसने 10 लाख की फ़ौज को उखाड़ फेंका।

गुरु गोबिंद सिंह जी ने जवाब दिया

"चिड़ियों से मैं बाज लडाऊं , गीदड़ों को मैं शेर बनाऊ।"
"सवा लाख से एक लडाऊं तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ !!"


गुरु गोबिंद सिंह जी ने जो कहा वो किया, जिन्हे आज हर कोई शीश झुकता है , यह है हमारे भारत की अनमोल विरासत जिसे हमने कभी पढ़ा ही नहीं !

अगर आपको यकीन नहीं होता तो एक बार जरूर गूगल में लिखे 'बैटल ऑफ़ चमकौर' और सच आपको पता लगेगा ,

आपको अगर थोड़ा सा भी अच्छा लगा और आपको भारतीय होने का गर्व है तो जरूर इसे आगे शेयर करे जिससे की हमारे भारत के
गौरवशाली इतिहास के बारे में दुनिया को पता लगे !

***कुछ आगे *##***

चमकौर साहिब की जमीन आगे चलकर एक सिख परिवार ने खरीदी उनको इसके इतिहास का कुछ पता नहीं था । इस परिवार में आगे चलकर जब उनको पता चला के यहाँ गुरु गोबिंद सिंह जी के दो बेटे शहीद हुए है तो उन्हों ने यह जमीन गुरु जी के बेटो की यादगार ( गुरुद्वारा साहिब) के लिए देने का मन बनाया ....जब अरदास करने के समय उस सिख से पूछा गया के अरदास में उनके लिए गुरु साहिब से क्या बेनती करनी है ....

तो उस सिख ने कहा के गुरु जी से बेनती करनी है के मेरे घर कोई औलाद ना हो ताकि मेरे वंश में कोई भी यह कहने वाला ना हो के यह जमीन मेरे बाप दादा ने दी है ।

वाहेगुरु....और यही अरदास हुई और बिलकुल ऐसा ही हुआ उन सिख के घर कोई औलाद नहीं हुई......

अब हम अपने बारे में सोचे 50....100 रु. दे कर क्या माँगते है । वाहे गुरु....

🙏वाहेगुरु जी का खालसा,
वाहेगुरु जी की फतेह जी 🙏
 


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

_*"आखिर यह भी तो नहीं रहेगा।"*_

_एक फकीर अरब में हज के लिए पैदल निकला। रात हो जाने पर एक गांव में शाकिर नामक व्यक्ति के दरवाजे पर रूका। शाकिर ने फकीर की खूब सेवा किया। दूसरे दिन शाकिर ने बहुत सारे उपहार दे कर विदा किया। फकीर ने दुआ किया -"खुदा करे तू दिनों दिन बढता ही रहे।"_
_सुन कर शाकिर हंस पड़ा और कहा -"अरे फकीर! जो है यह भी नहीं रहने वाला है"। यह सुनकर फकीर चला गया ।_
_दो वर्ष बाद फकीर फिर शाकिर के घर गया और देखा कि शाकिर का सारा वैभव समाप्त हो गया है। पता चला कि शाकिर अब बगल के गांव में एक जमींदार के वहाँ नौकरी करता है। फकीर शाकिर से मिलने गया। शाकिर ने अभाव मे भी फकीर का स्वागत किया। झोपड़ी में फटी चटाई पर बिठाया। खाने के लिए सूखी रोटी दिया।_

_दूसरे दिन जाते समय फकीर की आखों में आँसू थे। फकीर कहने लगा "अल्लाह ये तूने क्या क्रिया?"_
_शाकिर पुनः हंस पड़ा और बोला -"फकीर तू क्यों दुखी हो रहा है? महापुरुषों ने कहा है - "खुदा इन्सान को जिस हाल मे रखे खुदा को धन्यावाद दे कर खुश रहना चाहिए। समय सदा बदलता रहता है" और सुनो यह भी नहीं रहने वाला है"।_
_फकीर सोचने लगा -"मैं तो केवल भेष से फकीर हूँ सच्चा फकीर तो शाकिर तू ही है।"_
_दो वर्ष बाद फकीर फिर यात्रा पर निकला और शाकिर से मिला तो देख कर हैरान रह गया कि शाकिर तो अब जमींदारों का जमींदार बन गया है। मालूम हुआ कि जमींदार जिसके वहा शाकिर नौकरी करता था वह संतान विहीन था मरते समय अपनी सारी जायदाद शाकिर को दे गया।_
_फकीर ने शाकिर से कहा - "अच्छा हुआ वो जमाना गुजर गया।_ _अल्लाह करे अब तू ऐसा ही बना रहे।"_
_यह सुनकर शाकिर फिर हंस पड़ा और कहने लगा - "फकीर! अभी भी तेरी नादानी बनी हुई है"।_
_फकीर ने पूछा क्या यह भी नहीं रहने वाला है? शाकिर ने उत्तर दिया "या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा। कुछ भी रहने वाला नहीं है। और अगर शाश्वत कुछ है तो वह हैं परमात्मा और इसका अंश आत्मा।" फकीर चला गया ।_

_डेढ साल बाद लौटता है तो देखता है कि शाकिर का महल तो है किन्तु कबूतर उसमें गुटरगू कर रहे हैं। शाकिर कब्रिस्तान में सो रहा है। बेटियां अपने-अपने घर चली गई है। बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है।_
_"कह रहा है आसमां यह समा कुछ भी नहीं।_
_रो रही है शबनमे नौरंगे जहाँ कुछ भी नहीं।_
_जिनके महलों मे हजारो रंग के जलते थे फानूस।_
_झाड उनके कब्र पर बाकी निशा कुछ भी नहीं।"_
_फकीर सोचता है - "अरे इन्सान ! तू किस बात का अभिमान करता है? क्यों इतराता है? यहाँ कुछ भी टिकने वाला नहीं है दुःख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता।"_
_तू सोचता है - "पड़ोसी मुसीबत में है और मैं मौज मे हूँ। लेकिन सुन न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा।_
_"सच्चे इन्सान है वे जो हर हाल में खुश रहते हैं।_
_मिल गया माल तो उस माल मे खुश रहते हैं।_
_हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश रहते है।"_
_धन्य है शाकिर तेरा सत्संग और धन्य हैं तुम्हारे सद्गुरु। मैं तो झूठा फकीर हुँ। असली फकीर तो तेरी जिन्दगी है।_
_अब मैं तेरी कब्र देखना चाहता हूँ। कुछ फूल चढ़ा कर दुआ तो मांग लूँ।_
_*फकीर कब्र पर जाता है तो देखता है कि शाकिर ने अपनी कब्र पर लिखवा रखा है- आखिर यह भी तो नहीं रहेगा।*_

_|| 🙏स्नेह वन्दन ||_


प्रेरक कहानी (Inspiring Story)

प्रेरक कहानी

" अच्छे अच्छे महलों मे भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते है ...
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सेठ घनश्याम के दो पुत्रों में जायदाद और ज़मीन का बँटवारा चल रहा था और एक चार पट्टी के कमरे को लेकर विवाद गहराता जा रहा था , एकदिन दोनो भाई मरने मारने पर उतारू हो चले , तो पिता जी बहुत जोर से हँसे। पिताजी को हँसता देखकर दोनो भाई लड़ाई को भूल गये, और पिताजी से हँसी का कारण पुछा।
तो पिताजी ने कहा-- इस छोटे से ज़मीन के टुकडे के लिये इतना लड़ रहे हो छोड़ो इसे आओ मेरे साथ एक अनमोल खजाना बताता हूँ मैं तुम्हे !

पिता घनश्याम जी और दोनो पुत्र पवन और मदन उनके साथ रवाना हुये पिताजी ने कहा देखो यदि तुम आपस मे लड़े तो फिर मैं तुम्हे उस खजाने तक नही लेकर जाऊँगा और बीच रास्ते से ही लौटकर आ जाऊँगा !
अब दोनो पुत्रों ने खजाने के चक्कर मे एक समझौता किया की चाहे कुछ भी हो जाये पर हम लड़ेंगे नही प्रेम से यात्रा पे चलेंगे !

गाँव जाने के लिये एक बस मिली पर सीट दो की मिली, और वो तीन थे, अब पिताजी के साथ थोड़ी देर पवन बैठे तो थोड़ी देर मदन ऐसे चलते-चलते लगभग दस घण्टे का सफर तय किया फिर गाँव आया।
घनश्याम दोनो पुत्रों को लेकर एक बहुत बड़ी हवेली पर गये हवेली चारों तरफ से सुनसान थी। घनश्याम ने जब देखा की हवेली मे जगह जगह कबूतरों ने अपना घोसला बना रखा है, तो घनश्याम वहीं पर बैठकर रोने लगे।
दोनो पुत्रों ने पुछा क्या हुआ पिताजी आप रो क्यों रहे है ?
तो रोते हुये उस वृद्ध पिता ने कहा जरा ध्यान से देखो इस घर को, जरा याद करो वो बचपन जो तुमने यहाँ बिताया था , तुम्हे याद है पुत्र इस हवेली के लिये मैं ने अपने भाई से बहुत लड़ाई की थी, सो ये हवेली तो मुझे मिल गई पर मैंने उस भाई को हमेशा के लिये खो दिया , क्योंकि वो दूर देश में जाकर बस गया और फिर वक्त्त बदला और एक दिन हमें भी ये हवेली छोड़कर जाना पड़ा !
अच्छा तुम ये बताओ बेटा की जिस सीट पर हम बैठकर आये थे, क्या वो बस की सीट हमें मिल जायेगी ? और यदि मिल भी जाये तो क्या वो सीट हमेशा-हमेशा के लिये हमारी हो सकती है ? मतलब की उस सीट पर हमारे सिवा कोई न बैठे। तो दोनो पुत्रों ने एक साथ कहा की ऐसे कैसे हो सकता है , बस की यात्रा तो चलती रहती है और उस सीट पर सवारियाँ बदलती रहती है। पहले कोई और बैठा था , आज कोई और बैठा होगा और पता नही कल कोई और बैठेगा। और वैसे भी उस सीट में क्या धरा है जो थोड़ी सी देर के लिये हमारी है !
पिताजी फिर हँसे फिर रोये और फिर वो बोले देखो यही तो मैं तुम्हे समझा रहा हूँ ,कि जो थोड़ी देर के लिये तुम्हारा है , तुमसे पहले उसका मालिक कोई और था बस थोड़ी सी देर के लिये तुम हो और थोड़ी देर बाद कोई और हो जायेगा।
बस बेटा एक बात ध्यान रखना की इस थोड़ी सी देर के लिये कही अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना, यदि कोई प्रलोभन आये तो इस घर की इस स्थिति को देख लेना की अच्छे अच्छे महलों में भी एक दिन कबूतर अपना घोसला बना लेते है। बस बेटा मुझे यही कहना था --कि बस की उस सीट को याद कर लेना जिसकी रोज उसकी सवारियां बदलती रहती है उस सीट के खातिर अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना जिस तरह से बस की यात्रा में तालमेल बिठाया था बस वैसे ही जीवन की यात्रा मे भी तालमेल बिठा लेना !
दोनो पुत्र पिताजी का अभिप्राय समझ गये, और पिता के चरणों में गिरकर रोने लगे !

शिक्षा :-

मित्रों, जो कुछ भी ऐश्वर्य - सम्पदा हमारे पास है वो सबकुछ बस थोड़ी देर के लिये ही है , थोड़ी-थोड़ी देर मे यात्री भी बदल जाते है और मालिक भी। रिश्तें बड़े अनमोल होते है छोटे से ऐश्वर्य या सम्पदा के चक्कर मे कहीं किसी अनमोल रिश्तें को न खो देना .... 



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