भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

कुछ वैज्ञानिक तथ्य
 
 
एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं ? 
 
वैज्ञानिक कारण :--
 
एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक बीमारियों से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम देख रहा था, उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है "सेपरेशन ऑफ़ जींस" मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नही करना चाहिए क्योकि नजदीकी रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और जींस लिंकेज्ड बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और एल्बोनिज्म होने की १००% चांस होती है। फिर मुझे बहुत ख़ुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये
दिखाया गया की आखिर हिन्दूधर्म में हजारों सालों पहले जींस और डीएनए के बारे में कैसे लिखा गया है ? 
 
हिंदुत्व में कुल सात गोत्र होते है और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर सकते ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहें। उस वैज्ञानिक नेकहा की आज पूरे विश्व
को मानना पड़ेगा की हिन्दूधर्म ही विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है जो "विज्ञान पर आधारित" है !
 
हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क:
 
1- कान छिदवाने की परम्परा: 
 
भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क:--
दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।
 
2-: माथे पर कुमकुम/तिलक
 
महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं। 
वैज्ञानिक तर्क- आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता है। 
 
3- : जमीन पर बैठकर भोजन
 
भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है। 
वैज्ञानिक तर्क- पलती मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्त‍िष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से एक सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिये तैयार हो जाये।
 
4- हाथ जोड़कर नमस्ते करना
 
जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है, ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें। दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते। अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।
 
5-: भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से :--
 
जब भी कोई धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से होता है। 
वैज्ञानिक तर्क- तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।
 
6- पीपल की पूजा :--
 
तमाम लोग सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं। 
वैज्ञानिक तर्क- इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है। 
 
7. दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना :--
 
दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता है, तो लोग कहते हैं कि बुरे सपने आयेंगे, भूत प्रेत का साया आ जायेगा, आदि। इसलिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें। 
वैज्ञानिक तर्क- जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर संचारित होने लगता है। इससे अलजाइमर, परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है।
 
8-सूर्य नमस्कार
 
हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परम्परा है। 
वैज्ञानिक तर्क- पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं, तब हमारी आंखों की रौशनी अच्छी होती है।
 
9-सिर पर चोटी
 
हिंदू धर्म में ऋषि मुनी सिर पर चुटिया रखते थे। आज भी लोग रखते हैं। 
वैज्ञानिक तर्क- जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं। इससे दिमाग स्थ‍िर रहता है और इंसान को क्रोध नहीं आता, सोचने की क्षमता बढ़ती है।
 
10-व्रत रखना
 
कोई भी पूजा-पाठ या त्योहार होता है, तो लोग व्रत रखते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- आयुर्वेद के अनुसार व्रत करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन होता है, यानी उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय संबंधी रोगों, मधुमेह, आदि रोग भी जल्दी नहीं लगते।
 
11-चरण स्पर्श करना
 
हिंदू मान्यता के अनुसार जब भी आप किसी बड़े से मिलें, तो उसके चरण स्पर्श करें। यह हम बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे बड़ों का आदर करें। 
वैज्ञानिक तर्क- मस्त‍िष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है। इसे कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं। इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है, या तो बड़े के पैरों से होते हुए छोटे के हाथों तक या फिर छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक।
 
12-क्यों लगाया जाता है सिंदूर
 
शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं। 
वैज्ञानिक तर्क- सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है। यह मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है। चूंकि इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं, इसीलिये विधवा औरतों के लिये सिंदूर लगाना वर्जित है। इससे स्ट्रेस कम होता है।
 
13- तुलसी के पेड़ की पूजा
 
तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्ध‍ि आती है। सुख शांति बनी रहती है। 
वैज्ञानिक तर्क- तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा, तो इसकी पत्त‍ियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे बीमारियां दूर होती हैं।
 
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भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)
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     🌹🌻हर हर महादेव🌻🌹
 आईये समझते हैं, भगवान शिव के निवास-धाम कैलाश पर्वत को........
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पौराणिक कथाओं के अनुसार मानसरोवर के पास स्थित कैलाश पर्वत पर शिव-शंभु का धाम है। ‘परम रम्य गिरवरू कैलासू, सदा जहां शिव उमा निवासू।’ आप ये तो जानते होंगे की कैलाश पर्वत पर भगवान शिव अपने परिवार के साथ रहते हैं पर ये नहीं जानते होंगे की वह इस दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी पर्वत है जो की माना जाता है की अप्राकृतिक शक्तियों का भण्डार है। आइए जानें कैसे...
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2. कई शक्तियाँ हैं कैलाश पर्वत के आस-पास.........
एक्सिस मुंडी को ब्रह्मांड का केंद्र या दुनिया की नाभि के रूप में समझें। यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है जहाँ चारों दिशाएं मिल जाती हैं। और यह नाम, असली और महान, दुनिया के सबसे पवित्र और सबसे रहस्यमय पहाड़ों में से एक कैलाश पर्वत से सम्बंधित हैं। एक्सिस मुंडी वह स्थान है अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है और आप उन शक्तियों के साथ संपर्क कर सकते हैं रूसिया के वैज्ञानिक ने वह स्थान कैलाश पर्वत बताया है।
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3. शिव के धाम कैलाश के अनजाने रहस्य...........
इस पवित्र पर्वत की ऊंचाई 6714 मीटर है। और यह पास की हिमालय सीमा की चोटियों जैसे माउन्ट एवरेस्ट के साथ रेस तो नहीं लगा सकता पर इसकी भव्यता ऊंचाई में नहीं, लेकिन उसके आकार में है। उसकी छोटी की आकृति विराट शिवलिंग की तरह है। जिस पर सालभर बर्फ की सफेद चादर लिपटी रहती है। कैलाश पर्वत पर चढना निषिद्ध है पर 11 सदी में एक तिब्बती बौद्ध योगी मिलारेपा ने इस पर चढाई की थी।
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4. शिव के धाम कैलाश के अनजाने रहस्य........
कैलाश पर्वत चार महान नदियों के स्त्रोतों से घिरा है सिंध, ब्रह्मपुत्र, सतलज और कर्णाली या घाघरा तथा दो सरोवर इसके आधार हैं पहला मानसरोवर जो दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकर सूर्य के सामान है तथा राक्षस झील जो दुनिया की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार चन्द्र के सामान है।
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5. मानसरोवर झील और राक्षस झील..........
मानसरोवर झील और राक्षस झील, ये दोनों झीलें सौर और चंद्र बल को प्रदर्शित करते हैं जिसका सम्बन्ध सकारात्मक और नकारात्मक उर्जा से है। जब इन्हें दक्षिण की तरफ से देखते हैं तो एक स्वस्तिक चिन्ह वास्तव में देखा जा सकता है।
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6.चारों ओर एक अलौकिक शक्ति
कैलाश पर्वत और उसके आस पास के बातावरण पर अध्यन कर रहे वैज्ञानिक ज़ार निकोलाइ रोमनोव और उनकी टीम ने तिब्बत के मंदिरों में धर्मं गुरुओं से मुलाकात की उन्होंने बताया कैलाश पर्वत के चारों ओर एक अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है जिसमे तपस्वी आज भी आध्यात्मिक गुरुओं के साथ टेलिपेथी संपर्क करते है।
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7. ओम की ध्वनी........
पुराणों के अनुसार यहाँ शिवजी का स्थायी निवास होने के कारण इस स्थान को 12 ज्येतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कैलाश बर्फ़ से सटे 22,028 फुट ऊँचे शिखर और उससे लगे मानसरोवर को ‘कैलाश मानसरोवर तीर्थ’ कहते है और इस प्रदेश को मानस खंड कहते हैं। कैलाश-मानसरोवर उतना ही प्राचीन है, जितनी प्राचीन हमारी सृष्टि है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का समागम होता है, जो ‘ॐ’ की प्रतिध्वनि करता है।
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8. कैलाश का महत्व........
पांडवों के दिग्विजय प्रयास के समय अर्जुन ने इस प्रदेश पर विजय प्राप्त किया था। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में इस प्रदेश के राजा ने उत्तम घोड़े, सोना, रत्न और याक के पूँछ के बने काले और सफेद चामर भेंट किए थे। इस प्रदेश की यात्रा व्यास, भीम, कृष्ण, दत्तात्रेय आदि ने की थी। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक ऋषि मुनियों के यहाँ निवास करने का उल्लेख प्राप्त होता है। कुछ लोगों का कहना है कि आदि शंकराचार्य ने इसी के आसपास कहीं अपना शरीर त्याग किया था।
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9. जब आती है मृदुंग की आवाज़.....
गर्मी के दिनों में जब मानसरोवर की बर्फ़ पिघलती है, तो एक प्रकार की आवाज़ भी सुनाई देती है। श्रद्धालु मानते हैं कि यह मृदंग की आवाज़ है। मान्यता यह भी है कि कोई व्यक्ति मानसरोवर में एक बार डुबकी लगा ले, तो वह ‘रुद्रलोक’ पहुंच सकता है। कैलाश पर्वत, जो स्वर्ग है जिस पर कैलाशपति सदाशिव विराजे हैं, नीचे मृत्यलोक है, इसकी बाहरी परिधि 52 किमी है।
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10. मानसरोवर झील में है विष्णु का वास..........
मानसरोवर पहाड़ों से घिरी झील है, जो पुराणों में ‘क्षीर सागर’ के नाम से वर्णित है। क्षीर सागर कैलाश से 40 किमी की दूरी पर है व इसी में शेष शैय्या पर विष्णु व लक्ष्मी विराजित हो पूरे संसार को संचालित कर रहे है।
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11. कैलाश पर्वत का दर्शन......
कैलाश पर्वत को ‘गणपर्वत और रजतगिरि’ भी कहते हैं। मान्यता है कि यह पर्वत स्वयंभू है। कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है। यह हिमालय के उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत प्रदेश में स्थित एक तीर्थ है - जो चार धर्मों तिब्बती धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिन्दू का आध्यात्मिक केन्द्र है।
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12. कैलाश पर्वत की परिक्रमा.........
इसकी परिक्रमा का महत्त्व कहा गया है। कैलाश पर्वत कुल 48 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। कैलास परिक्रमा मार्ग 15500 से 19500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। मानसरोवर से 45 किलोमीटर दूर तारचेन कैलास परिक्रमा का आधार शिविर है। कैलाश की परिक्रमा कैलाश की सबसे निचली चोटी तारचेन से शुरू होती है और सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोम्पा पर पूरी होती है।
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13. कैलाश पर्वत की परिक्रमा......
घोडे और याक पर चढ़कर ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके कठिन रास्ते से होते हुये यात्री डेरापुफ पहुंचते हैं। जहां ठीक सामने कैलास के दर्शन होते हैं। यहां से कैलाश पर्वत को देखने पर ऐसा लगता है, मानों भगवान शिव स्वयं बर्फ़ से बने शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। इस चोटी को ‘हिमरत्न’ भी कहा जाता है।
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14. इतनी ठंडी जगह पर भी है गरम पानी के झरने
ड्रोल्मापास तथा मानसरोवर तट पर खुले आसमान के नीचे ही शिवशक्ति का पूजन भजन करते हैं। यहां कहीं कहीं बौद्धमठ भी दिखते हैं जिनमें बौद्ध भिक्षु साधनारत रहते हैं। दर्रा समाप्त होने पर तीर्थपुरी नामक स्थान है जहाँ गर्म पानी के झरने हैं। इन झरनों के आसपास चूनखड़ी के टीले हैं। कहा जाता है कि यहीं भस्मासुर ने तप किया और यहीं वह भस्म भी हुआ था।
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15. जहां देवी पार्वती ने किया था घोर तप
इसके आगे डोलमाला और देवीखिंड ऊँचे स्थान है। ड्रोल्मा से नीचे बर्फ़ से सदा ढकी रहने वाली ल्हादू घाटी में स्थित एक किलोमीटर परिधि वाला पन्ने के रंग जैसी हरी आभा वाली झील, गौरीकुंड है। यह कुंड हमेशा बर्फ़ से ढंका रहता है, मगर तीर्थयात्री बर्फ़ हटाकर इस कुंड के पवित्र जल में स्नान करना नहीं भूलते। साढे सात किलोमीटर परिधि तथा 80 फ़ुट गहराई वाली इसी झील में माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की थी।
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16. गंगा का स्थान
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह जगह कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के करकमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है, जहाँ प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं।
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17. मानसरोवर की महिमा
इस प्रकार यह झील सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के मन में उत्पन्न हुआ था। इसी कारण इसे ‘मानस मानसरोवर’ कहते हैं। दरअसल, मानसरोवर संस्कृत के मानस (मस्तिष्कद्ध) और सरोवर (झील) शब्द से बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- मन का सरोवर। मान्यता है कि ब्रह्ममुहुर्त (प्रातःकाल 3-5 बजे) में देवतागण यहां स्नान करते हैं।
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18. मानसरोवर की महिमा
ऐसा माना जाता है कि महाराज मानधाता ने मानसरोवर झील की खोज की और कई वर्षों तक इसके किनारे तपस्या की थी, जो कि इन पर्वतों की तलहटी में स्थित है। बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं। हिन्दू उसे ‘कल्पवृक्ष’ की संज्ञा देते हैं।
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19. मानसरोवर की महिमा...
झील लगभग 320 किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम में रक्षातल झील है। पुराणों के अनुसार मीठे पानी की मानसरोवर झील की उत्पत्ति भगीरथ की तपस्या से भगवान शिव के प्रसन्न होने पर हुई थी। ऐसी अद्भुत प्राकृतिक झील इतनी ऊंचाई पर किसी भी देश में नहीं है। पुराणों के अनुसार शंकर भगवान द्वारा प्रकट किये गये जल के वेग से जो झील बनी, उसी का नाम ‘मानसरोवर’ है।
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20. राक्षस ताल (रक्षातल)
राक्षस ताल (रक्षातल)
राक्षस ताल लगभग 225 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र, 84 किलोमीटर परिधि तथा 150 फुट गहरे में फैला है। प्रचलित है कि राक्षसों के राजा रावण ने यहां पर शिव की आराधना की थी। इसलिए इसे राक्षस ताल या रावणहृद भी कहते हैं। एक छोटी नदी गंगा-चू दोनों झीलों को जोडती है।

भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

ऋषि वाग्बट्ट के सूत्र (Health Sutras of rishi Bagbatt)
सबसे पहले आप हमेशा ये बात याद रखें कि शरीर मे सारी बीमारियाँ वात-पित्त और कफ के बिगड़ने से ही होती हैं !

अब आप पूछेंगे ये वात-पित्त और कफ क्या होता है ???

बहुत ज्यादा गहराई मे जाने की जरूरत नहीं आप ऐसे समझे की सिर से लेकर छाती के बीच तक जितने रोग होते हैं वो सब कफ बिगड़ने के कारण होते हैं ! छाती के बीच से लेकर पेट और कमर के अंत तक जितने रोग होते हैं वो पित्त बिगड़ने के कारण होते हैं !और कमर से लेकर घुटने और पैरों के अंत तक जितने रोग होते हैं वो सब वात बिगड़ने के कारण होते हैं !

हमारे हाथ की कलाई मे ये वात-पित्त और कफ की तीन नाड़ियाँ होती हैं ! भारत मे ऐसे ऐसे नाड़ी विशेषज्ञ रहे हैं जो आपकी नाड़ी पकड़ कर ये बता दिया करते थे कि आपने एक सप्ताह पहले क्या खाया एक दिन पहले क्या खाया -दो पहले क्या खाया !! और नाड़ी पकड़ कर ही बता देते थे कि आपको क्या रोग है ! आजकल ऐसी बहुत ही कम मिलते हैं !

शायद आपके मन मे सवाल आए ये वात -पित्त कफ दिखने मे कैसे होते हैं ???

तो फिलहाल आप इतना जान लीजिये ! कफ और पित्त लगभग एक जैसे होते हैं ! आम भाषा मे नाक से निकलने वाली बलगम को कफ कहते हैं ! कफ थोड़ा गाढ़ा और चिपचिपा होता है ! मुंह मे से निकलने वाली बलगम को पित्त कहते हैं ! ये कम चिपचिपा और द्रव्य जैसा होता है !! और शरीर से निकले वाली वायु को वात कहते हैं !! ये अदृश्य होती है !

कई बार पेट मे गैस बनने के कारण सिर दर्द होता है तो इसे आप कफ का रोग नहीं कहेंगे इसे पित्त का रोग कहेंगे !! क्यूंकि पित्त बिगड़ने से गैस हो रही है और सिर दर्द हो रहा है ! ये ज्ञान बहुत गहरा है खैर आप इतना याद रखें कि इस वात -पित्त और कफ के संतुलन के बिगड़ने से ही सभी रोग आते हैं !

और ये तीनों ही मनुष्य की आयु के साथ अलग अलग ढंग से बढ़ते हैं ! बच्चे के पैदा होने से 14 वर्ष की आयु तक कफ के रोग ज्यादा होते है ! बार बार खांसी ,सर्दी ,छींके आना आदि होगा ! 14 वर्ष से 60 साल तक पित्त के रोग सबसे ज्यादा होते हैं बार बार पेट दर्द करना ,गैस बनना ,खट्टी खट्टी डकारे आना आदि !! और उसके बाद बुढ़ापे मे वात के रोग सबसे ज्यादा होते हैं घुटने दुखना ,जोड़ो का दर्द आदि


भारत मे 3 हजार साल पहले एक ऋषि हुए है उनका नाम था वाग्बट्ट ! उन्होने ने एक किताब लिखी जिसका नाम था अष्टांग हृदयं !! वो ऋषि 135 साल तक की आयु तक जीवित रहे थे ! अष्टांग हृदयं मे वाग्बट्टजी कहते हैं की जिंदगी मे वात्त,पित्त और कफ संतुलित रखना ही सबसे अच्छी कला है और कौशल्य है सारी जिंदगी प्रयास पूर्वक आपको एक ही काम करना है की हमारा वात्त,पित्त और कफ नियमित रहे,संतुलित रहे और सुरक्षित रहे|जितना चाहिए उतना वात्त रहे,जितना चाहिए उतना पित्त रहे और जितना चाहिए उतना कफ रहे|तो जितना चाहिए उतना वात्त,पित्त और कफ रहे उसके लिए क्या करना है
उसके लिए उन्होने 7000 सूत्र लिखे हैं उस किताब मे !
उसमे सबसे महत्व पूर्ण और पहला सूत्र है :

भोजनान्ते विषं वारी (मतलब खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है | )
अब समझते हैं क्या कहा वाग्बट्टजी ने !!

कभी भी खाना खाने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना !! अब आप कहेंगे हम तो हमेशा यही करते हैं ! 99% लोग ऐसे होते है जो पानी लिए बिना खाना नहीं खाते है |पानी पहले होता है खाना बाद मे होता है |बहुत सारे लोग तो खाना खाने से ज्यादा पानी पीते है दो-चार रोटी के टुकडो को खाया फिर पानी पिया,फिर खाया-फिर पानी पिया ! ऐसी अवस्था मे वाग्बट्टजी बिलकुल ऐसी बात करते हे की पानी ही नहीं पीना खाना खाने के बाद ! कारण क्या ? क्यों नहीं पीना है ??


ये जानना बहुत जरुरी है ...हम पानी क्यों ना पीये खाना खाने के बाद क्या कारण है |

बात ऐसी है की हमारा जो शरीर है शरीर का पूरा केंद्र है हमारा पेट|ये पूरा शरीर चलता है पेट की ताकत से और पेट चलता है भोजन की ताकत से|जो कुछ भी हम खाते है वो ही हमारे पेट की ताकत है |हमने दाल खाई,हमने सब्जी खाई, हमने रोटी खाई, हमने दही खाया लस्सी पी कुछ भी दूध,दही छाझ लस्सी फल आदि|ये सब कुछ भोजन के रूप मे हमने ग्रहण किया ये सब कुछ हमको उर्जा देता है और पेट उस उर्जा को आगे ट्रांसफर करता है |आप कुछ भी खाते है पेट उसके लिए उर्जा का आधार बनता है |अब हम खाते है तो पेट मे सब कुछ जाता है|पेट मे एक छोटा सा स्थान होता है जिसको हम हिंदी मे कहते है अमाशय|उसी स्थान का संस्कृत नाम है जठर|उसी स्थान को अंग्रेजी मे कहते है epigastrium |ये एक थेली की तरह होता है और यह जठर हमारे शरीर मे सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि सारा खाना सबसे पहले इसी मे आता है ये |बहुत छोटा सा स्थान हैं इसमें अधिक से अधिक 350GMS खाना आ सकता है |हम कुछ भी खाते सब ये अमाशय मे आ जाता है|


अब अमाशय मे क्या होता है खाना जैसे ही पहुँचता है तो यह भगवान की बनाई हुई व्यवस्था है जो शरीर मे है की तुरंत इसमें आग(अग्नि) जल जाती है |आमाशय मे अग्नि प्रदीप्त होती है उसी को कहते हे जठराग्नि|ये जठराग्नि है वो अमाशय मे प्रदीप्त होने वाली आग है |ये आग ऐसी ही होती है जेसे रसोई गेस की आग|आप की रसोई गेस की आग है ना की जेसे आपने स्विच ओन किया आग जल गयी|ऐसे ही पेट मे होता है जेसे ही आपने खाना खाया की जठराग्नि प्रदीप्त हो गयी |यह ऑटोमेटिक है,जेसे ही अपने रोटी का पहला टुकड़ा मुँह मे डाला की इधर जठराग्नि प्रदीप्त हो गई|ये अग्नि तब तक जलती हे जब तक खाना पचता है |आपने खाना खाया और अग्नि जल गयी अब अग्नि खाने को पचाती है |वो ऐसे ही पचाती है जेसे रसोई गेस|आपने रसोई गेस पर बरतन रखकर थोडा दूध डाल दिया और उसमे चावल डाल दिया तो जब तक अग्नि जलेगी तब तक खीर बनेगी|इसी तरह अपने पानी डाल दिया और चावल डाल दिए तो जब तक अग्नि जलेगी चावल पकेगा|


अब अपने खाते ही गटागट पानी पी लिया और खूब ठंडा पानी पी लिया|और कई लोग तो बोतल पे बोतल पी जाते है |अब होने वाला एक ही काम है जो आग(जठराग्नि) जल रही थी वो बुझ गयी|आग अगर बुझ गयी तो खाने की पचने की जो क्रिया है वो रुक गयी|अब हमेशा याद रखें खाना पचने पर हमारे पेट मे दो ही क्रिया होती है |एक क्रिया है जिसको हम कहते हे Digation और दूसरी है fermentation|फर्मेंटेशन का मतलब है सडना और डायजेशन का मतलब हे पचना|

आयुर्वेद के हिसाब से आग जलेगी तो खाना पचेगा,खाना पचेगा तो उसका रस बनेगा|जो रस बनेगा तो उसी रस से मांस,मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र और अस्थि बनेगा और सबसे अंत मे मेद बनेगा|ये तभी होगा जब खाना पचेगा|


अब ध्यान से पढ़े इन् शब्दों को मांस की हमें जरुरत है हम सबको,मज्जा की जरुरत है ,रक्त की भी जरुरत है ,वीर्य की भी जरुरत है ,अस्थि भी चाहिए,मेद भी चाहिए|यह सब हमें चाहिए|जो नहीं चाहिए वो मल नहीं चाहिए और मूत्र नहीं चाहिए|मल और मूत्र बनेगा जरुर ! लेकिन वो हमें चाहिए नहीं तो शरीर हर दिन उसको छोड़ देगा|मल को भी छोड़ देगा और मूत्र को भी छोड़ देगा बाकि जो चाहिए शरीर उसको धारण कर लेगा|

ये तो हुई खाना पचने की बात अब जब खाना सड़ेगा तब क्या होगा..?

अगर आपने खाना खाने के तुरंत बाद पानी पी लिया तो जठराग्नि नहीं जलेगी,खाना नहीं पचेगा और वही खाना फिर सड़ेगा|और सड़ने के बाद उसमे जहर बनेंगे|

खाने के सड़ने पर सबसे पहला जहर जो बनता है वो हे यूरिक एसिड(uric acid )|कई बार आप डॉक्टर के पास जाकर कहते है की मुझे घुटने मे दर्द हो रहा है ,मुझे कंधे-कमर मे दर्द हो रहा है तो डॉक्टर कहेगा आपका यूरिक एसिड बढ़ रहा है आप ये दवा खाओ,वो दवा खाओ यूरिक एसिड कम करो|यह यूरिक एसिड विष (जहर ) है और यह इतना खतरनाक विष है की अगर अपने इसको कन्ट्रोल नहीं किया तो ये आपके शरीर को उस स्थिति मे ले जा सकता है की आप एक कदम भी चल ना सके|आपको बिस्तर मे ही पड़े रहना पड़े पेशाब भी बिस्तर मे करनी पड़े और संडास भी बिस्तर मे ही करनी पड़े यूरिक एसिड इतना खतरनाक है |इस लिए यह इतना खराब विष हे नहीं बनना चाहिए |

और एक दूसरा उदाहरण खाना जब सड़ता है तो यूरिक एसिड जेसा ही एक दूसरा विष बनता है जिसको हम कहते हे LDL (Low Density lipoprotive) माने खराब कोलेस्ट्रोल(cholesterol )|जब आप ब्लड प्रेशर(BP) चेक कराने डॉक्टर के पास जाते हैं तो वो आपको कहता है (HIGH BP )हाय बीपी है आप पूछोगे कारण बताओ? तो वो कहेगा कोलेस्ट्रोल बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है |आप ज्यादा पूछोगे की कोलेस्ट्रोल कौनसा बहुत है ? तो वो आपको कहेगा LDL बहुत है |

इससे भी ज्यादा खतरनाक विष हे वो है VLDL(Very Low Density lipoprotive)|ये भी कोलेस्ट्रॉल जेसा ही विष है |अगर VLDL बहुत बढ़ गया तो आपको भगवान भी नहीं बचा सकता|
खाना सड़ने पर और जो जहर बनते है उसमे एक ओर विष है जिसको अंग्रेजी मे हम कहते है triglycerides|जब भी डॉक्टर आपको कहे की आपका triglycerides बढ़ा हुआ हे तो समज लीजिए की आपके शरीर मे विष निर्माण हो रहा है |

तो कोई यूरिक एसिड के नाम से कहे,कोई कोलेस्ट्रोल के नाम से कहे,कोई LDL - VLDL के नाम से कहे समज लीजिए की ये विष हे और ऐसे विष 103 है |ये सभी विष तब बनते है जब खाना सड़ता है |

मतलब समझ लीजिए किसी का कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे ध्यान आना चाहिए की खाना पच नहीं रहा है ,कोई कहता हे मेराtriglycerides बहुत बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे डायग्नोसिस कर लीजिए आप ! की आपका खाना पच नहीं रहा है |कोई कहता है मेरा यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट लगना चाहिए समझने मे की खाना पच नहीं रहा है |

क्योंकि खाना पचने पर इनमे से कोई भी जहर नहीं बनता|खाना पचने पर जो बनता है वो है मांस,मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र,अस्थि और खाना नहीं पचने पर बनता है यूरिक एसिड,कोलेस्ट्रोल,LDL-VLDL| और यही आपके शरीर को रोगों का घर बनाते है !

पेट मे बनने वाला यही जहर जब ज्यादा बढ़कर खून मे आते है ! तो खून दिल की नाड़ियो मे से निकल नहीं पाता और रोज थोड़ा थोड़ा कचरा जो खून मे आया है इकट्ठा होता रहता है और एक दिन नाड़ी को ब्लॉक कर देता है जिसे आप heart attack कहते हैं !


तो हमें जिंदगी मे ध्यान इस बात पर देना है की जो हम खा रहे हे वो शरीर मे ठीक से पचना चाहिए और खाना ठीक से पचना चाहिए इसके लिए पेट मे ठीक से आग(जठराग्नि) प्रदीप्त होनी ही चाहिए|क्योंकि बिना आग के खाना पचता नहीं हे और खाना पकता भी नहीं है |रसोई मे आग नहीं हे आप कुछ नहीं पका सकते और पेट मे आग नहीं हे आप कुछ नहीं पचा सकते|

महत्व की बात खाने को खाना नहीं खाने को पचाना है |आपने क्या खाया कितना खाया वो महत्व नहीं हे कोई कहता हे मैंने 100 ग्राम खाया,कोई कहता है मैंने 200 ग्राम खाया,कोई कहता है मैंने 300 ग्राम खाया वो कुछ महत्व का नहीं है लेकिन आपने पचाया कितना वो महत्व है |आपने 100 ग्राम खाया और 100 ग्राम पचाया बहुत अच्छा है |और अगर आपने 200 ग्राम खाया और सिर्फ 100 ग्राम पचाया वो बहुत बेकार है |आपने 300 ग्राम खाया और उसमे से 100 ग्राम भी पचा नहीं सके वो बहुत खराब है !!

खाना पच नहीं रहा तो समझ लीजिये विष निर्माण हो रहा है शरीर में ! और यही सारी बीमारियो का कारण है ! तो खाना अच्छे से पचे इसके लिए वाग्भट्ट जी ने सूत्र दिया !!

भोजनान्ते विषं वारी (मतलब खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है )

इसलिए खाने के तुरंत बाद पानी कभी मत पिये !

अब आपके मन मे सवाल आएगा कितनी देर तक नहीं पीना ???

तो 1 घंटे 48 मिनट तक नहीं पीना ! अब आप कहेंगे इसका क्या calculation हैं ??
बात ऐसी है ! जब हम खाना खाते हैं तो जठराग्नि द्वारा सब एक दूसरे मे मिक्स होता है और फिर खाना पेस्ट मे बदलता हैं है ! पेस्ट मे बदलने की क्रिया होने तक 1 घंटा 48 मिनट का समय लगता है ! उसके बाद जठराग्नि कम हो जाती है ! (बुझती तो नहीं लेकिन बहुत धीमी हो जाती है )

पेस्ट बनने के बाद शरीर मे रस बनने की परिक्रिया शुरू होती है ! तब हमारे शरीर को पानी की जरूरत होती हैं तब आप जितना इच्छा हो उतना पानी पिये !!

जो बहुत मेहनती लोग है (खेत मे हल चलाने वाले ,रिक्शा खीचने वाले पत्थर तोड़ने वाले !! उनको 1 घंटे के बाद ही रस बनने लगता है उनको एक घंटे बाद पानी पीना चाहिए !

अब आप कहेंगे खाना खाने के पहले कितने मिनट तक पानी पी सकते हैं ???

तो खाना खाने के 45 मिनट पहले तक आप पानी पी सकते हैं ! अब आप पूछेंगे ये 45 मिनट का calculation ????


बात ऐसी ही जब हम पानी पीते हैं तो वो शरीर के प्रत्येक अंग तक जाता है ! और अगर बच जाये तो 45 मिनट बाद मूत्र पिंड तक पहुंचता है ! तो पानी - पीने से मूत्र पिंड तक आने का समय 45 मिनट का है ! तो आप खाना खाने से 45 मिनट पहले ही पाने पिये !
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)
पुरानी परम्परा की ओर लौटें|
प्राचीन भारत के ऋषियों ने भोजन विज्ञानं, माता और बहनों की स्वास्थ को ध्यान में रखते हुए सिल बट्टा का अविष्कार किया ! यह तकनीक का विकास समाज की प्रगति और पर्यावरण की रक्षा को ध्यान में रखते हुए किया गया। आधुनिक काल में भी सिल बट्टे का प्रयोग बहुत लाभकारी है -
1 .. सिल बट्टा पत्थर से बनता है, पत्थर में सभी प्रकार की खनिजों की भरपूर मात्रा होती है, इसलिए सिल बट्टे से पिसा हुआ मसाले से बना भोजन का स्वाद सबसे उत्तम होता है।
2 .. सिल बट्टे में मसाले पिसते वक्त जो व्यायाम होता है उससे पेट बाहर नही निकलता और जिम्नासियम का खर्चा बचता है।
3 .. माताए और बहने जब सिल बट्टे का प्रयोग करते है तो उनके यूटेरस का व्यायाम होता है जिससे कभी सिजेरियन डिलीवरी नही होती, हमेशा नोर्मल डिलीवरी होती है। इससे अस्पताल का खर्चा बच जाता है । दो बच्चे ही सिजेरियन से हो पाते है , शरीर की क्षमता समाप्त हो जाती है, वजन बढ़ने लगता है । सिजेरियन से बचे ।
4 .. सिल बट्टे का प्रयोग करने से मिक्सर चलाने की बिजली का खर्चा भी बचता है।
5 .. सिल बट्टे पर बनी चटनी और पिसा मसाला बहुत स्वादिष्ट होता है ।
6 .. बिजली का खर्च एवं सिजेरियन करने का खर्चा नहीं होता जिस से स्वाथ्य सुंदर रहता है ।
आपके सिल बट्टा खरीदने से गाँव के गरीब कारीगरों को सीधा रोजगार मिलेगा उनके जिन्दगी की तकलीफे दूर होंगी।

भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)
भगवान श्री कृष्ण.....🌹
 
भगवान् श्री कृष्ण को अलग अलग स्थानों में अलग अलग नामो से जाना जाता है।
 
* उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामो से जानते है।
 
* राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है।
 
* महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है।
 
* उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है।
 
* बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है।
 
* दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है।
 
* गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है।
 
* असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।
 
* मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।
 
* गोविन्द या गोपाल में "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों , दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रिया हो वही गोविंद है गोपाल है।
 
* श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था..
 
* श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।
 
* श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।
 
* श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग में हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।।
 
* श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।
 
* दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।
 
* श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। श्री कृष्ण राधारानी से निष्काम और निश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी श्री कृष्ण से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अंतर था। श्री कृष्ण ने 14 वर्ष की उम्र में वृंदावन छोड़ दिया था।। और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले।
 
* श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सान्दीपनि से अलौकिक विद्याओ का ज्ञान अर्जित किया था।।
 
* श्री कृष्ण की कुल 125 वर्ष धरती पर रहे । उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था।
 
* श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे।
 
* श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।
 
* श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।
 
* श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।
 
* श्री कृष्ण को ज़रा नाम के शिकारी का बाण उनके पैर के अंगूठे मे लगा वो शिकारी पूर्व जन्म का बाली था,बाण लगने के पश्चात भगवान स्वलोक धाम को गमन कर गए।
 
* श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था।
 
* श्री कृष्ण ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यु खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी।
 
* श्री कृष्ण के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं।
 
* श्री कृष्ण अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्" न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था और न ही उनकी मृत्यु हुयी थी।
 
सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज
अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच--
( भगवद् गीता अध्याय 18 )
 
श्री कृष्ण : "सभी धर्मो का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मैं सभी पापो से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा,डरो मत
 
श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी 
हे नाथ नारायण वासुदेव ...👏🏼
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण..
कृष्ण कृष्ण हरे हरे..🌹
 
राधेकृष्ण राधेकृष्ण 🌹

भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)
शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को प्रसन्न करने के उपाय इस प्रकार हैं...
1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।
2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।
3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।
4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।
यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में बांट देना चाहिए।
शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन-सा रस (द्रव्य) चढ़ाने से क्या फल मिलता है...
1. बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।
2. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं। 
3. शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है। 
4. शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।
5. शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से टीबी रोग में आराम मिलता है।
6. यदि शारीरिक रूप से कमजोर कोई व्यक्ति भगवान शिव का अभिषेक गाय के शुद्ध घी से करे तो उसकी कमजोरी दूर हो सकती है।
शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन-सा फूल चढ़ाने से क्या फल मिलता है...
1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
2. भगवान शिव की पूजा चमेली के फूल से करने पर वाहन सुख मिलता है। 
3. अलसी के फूलों से शिव की पूजा करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है। 
4. शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है। 
5. बेला के फूल से पूजा करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है। 
6. जूही के फूल से भगवान शिव की पूजा करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।
7. कनेर के फूलों से भगवान शिव की पूजा करने से नए वस्त्र मिलते हैं। 
8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।
9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है।
10. लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजा में शुभ माना गया है। 
11. दूर्वा से भगवान शिव की पूजा करने पर उम्र बढ़ती है।
इन उपायों से प्रसन्न होते हैं भगवान शिव
1. सावन में रोज 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ऊं नम: शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। इससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं।
2. अगर आपके घर में किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो सावन में रोज सुबह घर में गोमूत्र का छिड़काव करें तथा गुग्गुल का धूप दें।
3. यदि आपके विवाह में अड़चन आ रही है तो सावन में रोज शिवलिंग पर केसर मिला हुआ दूध चढ़ाएं। इससे जल्दी ही आपके विवाह के योग बन सकते हैं।
4. सावन में रोज नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाएं। इससे जीवन में सुख-समृद्धि आएगी और मन प्रसन्न रहेगा।
5. सावन में गरीबों को भोजन कराएं, इससे आपके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होगी तथा पितरों की आत्मा को शांति मिलेगी।
6. सावन में रोज सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निपट कर समीप स्थित किसी शिव मंदिर में जाएं और भगवान शिव का जल से अभिषेक करें और उन्हें काले तिल अर्पण करें। इसके बाद मंदिर में कुछ देर बैठकर मन ही मन में ऊं नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। इससे मन को शांति मिलेगी।

भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)
🙏    वैदिक प्रश्नोत्तरी  🙏
         
         ॥ ॐ ॥
ॐ यह मुख्य परमेश्वर का निज नाम है, जिस नाम के साथ अन्य सब नाम लग जाते हैं।
 
प्र.1-  वेद किसे कहते है ?
उत्तर-  ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है।
 
प्र.2-  वेद-ज्ञान किसने दिया ?
उत्तर-  ईश्वर ने दिया।
 
प्र.3-  ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?
उत्तर-  ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।
 
प्र.4-  ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण         के लिए।
 
प्र.5-  वेद कितने है ?
उत्तर- चार ।                                                  1-ऋग्वेद 
2 - यजुर्वेद  
3- सामवेद
4 - अथर्ववेद
 
प्र.6-  वेदों के ब्राह्मण ।
      वेद              ब्राह्मण
1 - ऋग्वेद      -     ऐतरेय
2 - यजुर्वेद     -     शतपथ
3 - सामवेद     -    तांड्य
4 - अथर्ववेद    -   गोपथ
 
 
प्र.7-  वेदों के उपवेद कितने है।
उत्तर -  चार।
      वेद                     उपवेद
    1- ऋग्वेद       -     आयुर्वेद
    2- यजुर्वेद       -    धनुर्वेद
    3 -सामवेद     -     गंधर्ववेद
    4- अथर्ववेद    -     अर्थवेद
 
प्र 8-  वेदों के अंग हैं ।
उत्तर -  छः ।
1 - शिक्षा
2 - कल्प
3 - निरूक्त
4 - व्याकरण
5 - छंद
6 - ज्योतिष
 
प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?
उत्तर- चार ऋषियों को।
      वेद                    ऋषि
1- ऋग्वेद        -      अग्नि
2 - यजुर्वेद      -       वायु
3 - सामवेद      -      आदित्य
4 - अथर्ववेद     -     अंगिरा
 
 
प्र.10-  वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?
उत्तर- समाधि की अवस्था में।
 
प्र.11-  वेदों में कैसे ज्ञान है ?
उत्तर-  सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान।
 
प्र.12-  वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-   चार ।
       वेद      विषय
1-  ऋग्वेद    -    ज्ञान
2-  यजुर्वेद   -    कर्म
3-  सामवे    -    उपासना
4-  अथर्ववेद -    विज्ञान
 
प्र.13-  वेदों में।
     ऋग्वेद में।
1-  मंडल      -  10
2 - अष्टक     -   08
3 - सूक्त        -  1028
4 - अनुवाक  -   85 
5 - ऋचाएं     -  10589
          यजुर्वेद में।
1- अध्याय    -  40
2- मंत्र           - 1975
          सामवेद में।
1-  आरचिक     -  06
2 - अध्याय     -   06
3-  ऋचाएं       -  1875
            अथर्ववेद में।
1- कांड      -    20
2- सूक्त       -   731
3 - मंत्र       -   5977
          
प्र.14-  वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ?                                                                                                                                                              उत्तर-  मनुष्य-मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है।
 
प्र.15-  क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?
उत्तर-  बिलकुल भी नहीं।
 
प्र.16-  क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?
उत्तर-  नहीं।
 
प्र.17-  सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?
उत्तर-  ऋग्वेद।
 
प्र.18-  वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?
उत्तर-  वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व । 
 
प्र.19-  वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का
क्या नाम है ?
उत्तर- 
1-  न्याय दर्शन  - गौतम मुनि।
2- वैशेषिक दर्शन  - कणाद मुनि।
3- योगदर्शन  - पतंजलि मुनि।
4- मीमांसा दर्शन  - जैमिनी मुनि।
5- सांख्य दर्शन  - कपिल मुनि।
6- वेदांत दर्शन  - व्यास मुनि।
 
प्र.20-  शास्त्रों के विषय क्या है ?
उत्तर-  आत्मा,  परमात्मा, प्रकृति,  जगत की उत्पत्ति,  मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक  ज्ञान-विज्ञान आदि।
 
प्र.21-  प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?
उत्तर-  केवल ग्यारह।
 
प्र.22-  उपनिषदों के नाम बतावे ?
उत्तर-  
1-ईश ( ईशावास्य )  2- केन  3-कठ  4-प्रश्न  5-मुंडक  6-मांडू  7-ऐतरेय  8-तैत्तिरीय 9- छांदोग्य 
10-वृहदारण्यक 11- श्वेताश्वतर ।
 
प्र.23-  उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?
उत्तर- वेदों से।
प्र.24- चार वर्ण।
उत्तर- 
1- ब्राह्मण
2- क्षत्रिय
3- वैश्य
4- शूद्र
 
प्र.25- चार युग।
1- सतयुग - 17,28000  वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।
2- त्रेतायुग- 12,96000  वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।
3- द्वापरयुग- 8,64000  वर्षों का नाम है।
4- कलयुग- 4,32000  वर्षों का नाम है।
कलयुग के  4,976  वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।
4,27024 वर्षों का भोग होना है। 
 
           पंच महायज्ञ
       1- ब्रह्मयज्ञ   
       2- देवयज्ञ
       3- पितृयज्ञ
       4- बलिवैश्वदेवयज्ञ
       5- अतिथियज्ञ
 
 
   
 स्वर्ग  -  जहाँ सुख है।
 नरक  -  जहाँ दुःख है।⁠⁠⁠⁠

भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)
भूत-प्रेतो को निमंत्रण देता है घर के
फ्रिज में रखा हुआ आटा ।
वर्तमान में बहुत सी गृहिणियां खाना
बनाते समय रात को बचा हुआ अतिरिक्त
आटा गोल लोई बनाकर उसे फ्रिज में रख
देती है और उसका प्रयोग अगले दिन करती
है। कई बार सुबह के समय भी आटा बचने पर
ऎसा ही किया जाता है। धर्मशास्त्रों
के अनुसार गूंथा हुआ आटा पिण्ड माना
जाता है जिसे मृतात्मा के भक्षण के
लिए अर्पित किया जाता है।
जिन भी घरों में लगातार या अक्सर
गूंथा हुआ आटा फ्रिज में रखने की
परंपरा बन जाती है वहां पर भूत, प्रेत
तथा अन्य ऊपरी हवाएं भोजन करने के लिए
आने लग जाती है। इनमें अधिकतर वे
आत्माएं होती है जिन्हें उनके
घरवालों ने भुला दिया या जिनकी अब
तक मुक्ति नहीं हो सकी है। ऎसी
आत्माओं के घर में आने के साथ ही घर
में अनेकों समस्याएं भी आनी शुरू हो
जाती हैं।
बचे हुए आटे को इस तरह रखने वाले सभी
घरों में किसी न किसी प्रकार के
अनिष्ट देखने को मिलते हैं। वहां
अक्सर बीमारियां, क्रोध, आलस आदि बने
रहते हैं और घर में रहने वालों की भी
तरक्की नहीं हो पाती है।
शास्त्रों के अनुसार ऎसे किसी भी
चीज को घर में स्थान नहीं देना चाहिए
जो मृतात्माओं का भोजन हो अथवा
उन्हें किसी भी प्रकार से आमंत्रित
करने की क्षमता रखती हो। इसके ही रात
के बासी बचे आटे से रोटी बनाना शरीर
के लिए भी नुकसानदेह होता है। ऎसा
भोजन तामसिकता को तो बढ़ावा देता
ही है साथ में शरीर को भी रोगों का घर
बना देता है जबकि ताजा बना भोजन शरीर
को स्फूर्ति, शक्ति और स्वास्थ्य
देता है। इन सभी चीजों को देखते हुए
हमें घर में बासी आटा नही रखना चहिये ।
यह बहुत अच्छा Msg है Please इसे सब ग्रुपस में Frwd कर दिया जाये,नहीं आ सकता दुबारा क्योंकि इस साल फरवरी में चार रविवार, चार सोमवार, चार मंगलवार, चार बुधवार, चार बृहस्पतिवार, चार शुक्रवार, चार शनिवार. यह प्रत्येक 823 साल में एक बार होता है। यह धन की पोटली कहलाता है। इसलिए कम से कम पाँच लोगों को या पाँच ग्रुप में भेजें और पैसा चार दिन में आयेगा। चाॅयनिज पर आधारित है। पढ़ने के 1 1 मिनट के अंदर भेजे                         ⁠⁠[11:32 PM, 10/6/2016] +91 85880 3266

भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

हिंदू परम्पराओं से जुड़े

ये वैज्ञानिक तर्क:

कान छिदवाने की परम्परा:

भारत में लगभग सभी धर्मों मेंकान छिदवाने कीपरम्परा है।

वैज्ञानिक तर्क-

दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है। जबकिडॉक्टरों का मानना है कि इससे बोलीअच्छी होती है औरकानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस कारक्त संचार नियंत्रित रहता है।

2- माथे पर कुमकुम/तिलक

महिलाएं एवं पुरुष माथे परकुमकुम या तिलक लगाते हैं

वैज्ञानिक तर्क-

आंखों के बीच मेंमाथे तक एक नस जाती है।कुमकुम या तिलक लगाने सेउस जगह की ऊर्जा बनी रहती है।माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है।इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता

3-जमीन पर बैठकर भोजन

भारतीय संस्कृति के अनुसारजमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है

वैज्ञानिक तर्क-

पलती मारकर बैठना

************

एक प्रकार का योग आसन है।इसपोजीशन में बैठने सेमस्त‍िष्क शांत रहता है औरभोजन करते वक्त

अगर दिमाग शांत हो तोपाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते हीखुद-ब-खुद दिमाग से सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिये तैयार हो जाये

4-हाथ जोड़कर नमस्ते करना

जब किसी से मिलते हैं तोहाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।

वैज्ञानिक तर्क-

जब सभी उंगलियों के शीर्षएक दूसरे के संपर्क में आते हैंऔर उन पर दबाव पड़ता है।एक्यूप्रेशर के कारण उसकासीधा असरहमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है, ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें।

दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते

हैंतो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते।अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।

5-भोजन की शुरुआत तीखे से औरअंत मीठे से

जब भी कोई धार्मिक यापारिवारिक अनुष्ठान होता है तोभोजन की शुरुआत तीखे से औरअंत मीठे से होता है।

वैज्ञानिक तर्क-

तीखा खाने सेहमारे पेट के अंदर  पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैंइससेपाचन तंत्र ठीक से संचालित होता हैअंत मेंमीठा खाने सेअम्ल की तीव्रता कम हो जाती हैइससे पेट में जलन नहीं होती है

6-पीपल की पूजा

तमाम लोग सोचते हैं कि  पीपल की पूजा करने सेभूत-प्रेत दूर भागते हैं।

वैज्ञानिक तर्क-

इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकिइस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़ेऔरउसे काटें नहीं

पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जोरात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है

7-दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना

दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता हैतो लोग कहते हैं किबुरे सपने आयेंगेभूत प्रेत का साया आयेगा,

आदिइस लिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें

वैज्ञानिक तर्क-

जब हमउत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब  हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है।शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहादिमाग की ओर संचारित होने लगता हैइससे अलजाइमर,

परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता हैयही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है


ना तो जनवरी साल का पहला मास है और ना ही 1जनवरी पहला दिन ..

जो आज तक जनवरी को पहला महीना मानते आए है वो जरा इस बात पर विचार करिए ..

सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ, 8वाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है .. ये क्रम से 9वाँ,10वाँ,11वां और बारहवाँ महीना है .. हिन्दी में सात को सप्त, आठ को अष्ट कहा जाता है, इसे अग्रेज़ी में sept(सेप्ट) तथा oct(ओक्ट) कहा जाता है .. इसी से september तथा October बना नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के "नव" को ले लिया गया है तथा दस अंग्रेज़ी में "Dec" बन जाता है जिससे December बन गया ऐसा इसलिए कि 1752के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था। इसका एक प्रमाण और है जरा विचार करिए कि 25दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है?इसका उत्तर ये है की "X" रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना .. चूंकि दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया इन सब बातों से ये निष्कर्ष निकलता है की या तो अंग्रेज़ हमारे पंचांग के अनुसार ही चलते थे या तो उनका 12के बजाय 10महीना ही हुआ करता था साल को 365के बजाय 305दिन

का रखना तो बहुत बड़ी मूर्खता है तो ज्यादा संभावना इसी बात की है कि प्राचीन काल में अंग्रेज़ भारतीयों के प्रभाव में थे इस कारण सब कुछ भारतीयों जैसा ही करते थे और इंगलैण्ड ही क्या पूरा विश्व ही भारतीयों के प्रभाव में था जिसका प्रमाण ये है कि नया साल भले ही वो 1जनवरी को माना लें पर उनका नया बही-खाता 1अप्रैल से शुरू होता है लगभग पूरे विश्व में वित्त-वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च तक होता है यानि मार्च में अंत और अप्रैल से शुरू भारतीय अप्रैल में अपना नया साल मनाते थे तो क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरे विश्व को भारतीयों ने अपने अधीन रखा था। इसका अन्य प्रमाण देखिए-अंग्रेज़ अपना तारीख या दिन 12बजे रात से बदल देते है .. दिन की शुरुआत सूर्योदय से

होती है तो 12बजे रात से नया दिन का क्या तुक बनता है ?तुक बनता है भारत में नया दिन सुबह से गिना जाता है, सूर्योदय से करीब दो-ढाई घंटे पहले के समय को ब्रह्म-मुहूर्त्त

की बेला कही जाती है और यहाँ से नए दिन की शुरुआत होती है.. यानि की करीब 5-5.30के आस-पास और इस समय इंग्लैंड में समय 12बजे के आस-पास का होता है।चूंकि वो भारतीयों के प्रभाव में थे इसलिए वो अपना दिन भी भारतीयों के दिन से मिलाकर रखना चाहते थे इसलिए उन लोगों ने रात के 12बजे से ही दिन नया दिन और तारीख बदलने का नियम अपना लिया जरा सोचिए वो लोग अब तक हमारे अधीन हैं, हमारा अनुसरण करते हैं,और हम राजा होकर भी खुद अपने अनुचर का, अपने अनुसरणकर्ता का या सीधे-सीधी कहूँ तो अपने दास का ही हम दास बनने को बेताब हैं कितनी बड़ी विडम्बना है ये मैं ये नहीं कहूँगा कि आप आज 31दिसंबर को रात के 12बजने का बेशब्री से इंतजार ना करिए,मैं बस ये कहूँगा कि देखिए खुद को आप, पहचानिए अपने आपको हम भारतीय गुरु हैं, सम्राट हैं किसी का अनुसरी नही करते है .. अंग्रेजों का दिया हुआ नया साल हमें नहीं चाहिये, जब सारे त्यौहार भारतीय संस्कृति के रीती रिवाजों के अनुसार ही मानते हैं तो नया साल क्यों नहीं?


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

हिन्दू विवाह के सात वचन :
1. तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी
– कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थ यात्रा में जाएँ, या कोई व्रत इत्यादि करें अथवा कोई भी धार्मिक कार्य करें तो मुझे अपने बाएँ भाग में जरुर स्थान दें. यदि आप ऐसा करने का वचन देते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
2. पुज्यो यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम
– दूसरे वचन में कन्या वर से वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें और परिवार की मर्यादा के अनुसार, धार्मिक अनुष्ठान करते हुए भगवान के भक्त बने रहें, यदि आप ऐसा करने का वचन देते हैं, तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
3. जीवनम अवस्थात्रये पालनां कुर्यात
वामांगंयामितदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृतीयं
– तीसरे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं: युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में मेरा पालन करने का वचन देते हैं. तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
4. कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ:
– चौथे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप परिवार का पालन-पोषण करने और परिवार के प्रति अपने सारे दायित्वों का पालन करने का वचन देते हैं, तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
5. स्वसद्यकार्ये व्यहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या
– पांचवें वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप अपने घर के कामों में, लेन-देन में या किसी दूसरे काम के लिए खर्च करते समय मेरी भी सलाह लेने का वचन देते हैं, तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
6. न मेपमानमं सविधे सखीना द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्वेत
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम
– छठे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों या अन्य स्त्रियों के बीच बैठी रहूँ, तो आप वहाँ सबके सामने मेरा अपमान नहीं करेंगे. आप जुआ या किसी भी प्रकार की बुरी आदतों से खुद को दूर रखेंगे. यदि आप ऐसा करने का वचन देते हैं, तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
7. परस्त्रियं मातूसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कूर्या
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तमंत्र कन्या
– सातवें वचन में कन्या वर से कहती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और पति-पत्नी के प्रेम के बीच में किसी और को नहीं आने देंगे. यदि आप ऐसा करने का वचन देते हैं, तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

जानकारी विशेष
जम्बूद्वीप अर्थात सनातन साम्राज्य !

इस विषय में हमारा वायु पुराण कहता है....—

सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत।
(वायु 31-37, 38)

महाभारत में पृथ्वी (जम्बूद्वीप) का पूरा मानचित्र
हजारों वर्ष पूर्व ही दे दिया गया था।

महाभारत में कहा गया है कि -
यह पृथ्वी चन्द्रमंडल में देखने पर दो अंशों मे
खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पिप्पल (पत्तों)
के रुप में दिखायी देती है-

उक्त मानचित्र ११वीं शताब्दी में रामानुजचार्य
द्वारा महाभारत के निम्नलिखित श्लोक को
पढ्ने के बाद बनाया गया था-

"सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।

"अर्थात हे कुरुनन्दन !
सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार
स्थित है,जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है,
उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है।
इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान
शश(खरगोश) दिखायी देता है।"

अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर
व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन
जाता है,जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र
से शत प्रतिशत समानता दिखाता है।

ऋषि पाराशर के अनुसार ये पृथ्वी सात महाद्वीपों
में बंटी हुई है...
(आधुनिक समय में भी ये ७ Continents में
विभाजित है यानि -
Asia, Africa,North America,South
America,Antarctica,Europe,and
Australia)

ऋषि पाराशर के अनुसार इन महाद्वीपों के
नाम हैं -

1.जम्बूद्वीप
2.प्लक्षद्वीप
3.शाल्मलद्वीप
4.कुशद्वीप
5.क्रौंचद्वीप
6.शाकद्वीप
7.पुष्करद्वीप

ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी,नाना
प्रकार के द्रव्यों और मीठे जल के समुद्रों से घिरे हैं।
ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने
हैं,और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं।

जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।

इनमे से जम्बुद्वीप का सबसे विस्तृत वर्णन
मिलता है...
इसी में हमारा भारतवर्ष स्थित है...

सभी द्वीपों के मध्य में जम्बुद्वीप स्थित है।
इस द्वीप के मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत
स्थित है।

इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है और नीचे कई
ओर यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के अन्दर घुसा
हुआ है।
इसका विस्तार,ऊपरी भाग में बत्तीस हजार योजन
है,तथा नीचे तलहटी में केवल सोलह हजार योजन है।
इस प्रकार यह पर्वत कमल रूपी पृथ्वी की कर्णिका
के समान है।

सुमेरु के दक्षिण में हिमवान,हेमकूट तथा निषध
नामक वर्ष पर्वत हैं,जो भिन्न भिन्न वर्षों का भाग
करते हैं।
सुमेरु के उत्तर में नील,श्वेत और शृंगी वर्षपर्वत हैं।
इनमें निषध और नील एक एक लाख योजन तक
फ़ैले हुए हैं।
हेमकूट और श्वेत पर्वत नब्बे नब्बे हजार योजन
फ़ैले हुए हैं।
हिमवान और शृंगी अस्सी अस्सी हजार योजन
फ़ैले हुए हैं।

मेरु पर्वत के दक्षिण में पहला वर्ष भारतवर्ष
कहलाता है,दूसरा किम्पुरुषवर्ष तथा तीसरा
हरिवर्ष है।
इसके दक्षिण में रम्यकवर्ष,हिरण्यमयवर्ष और
तीसरा उत्तरकुरुवर्ष है।
उत्तरकुरुवर्ष द्वीपमण्डल की सीमा पार होने के
कारण भारतवर्ष के समान धनुषाकार है।

इन सबों का विस्तार नौ हजार योजन
प्रतिवर्ष है।
इन सब के मध्य में इलावृतवर्ष है,जो कि सुमेरु
पर्वत के चारों ओर नौ हजार योजन फ़ैला हुआ है।
एवं इसके चारों ओर चार पर्वत हैं,जो कि ईश्वरीकृत
कीलियां हैं,जो कि सुमेरु को धारण करती हैं,

ये सभी पर्वत इस प्रकार से हैं:-

पूर्व में मंदराचल
दक्षिण में गंधमादन
पश्चिम में विपुल
उत्तर में सुपार्श्व

ये सभी दस दस हजार योजन ऊंचे हैं।
इन पर्वतों पर ध्वजाओं समान क्रमश: कदम्ब,
जम्बु, पीपल और वट वृक्ष हैं।

इनमें जम्बु वृक्ष सबसे बड़ा होने के कारण इस द्वीप
का नाम जम्बुद्वीप पड़ा है।
यहाँ से जम्बु नद नामक नदी बहती है।
उसका जल का पान करने से बुढ़ापा अथवा
इन्द्रियक्षय नहीं होता।
उसके किनारे की मृत्तिका (मिट्टी) रस से मिल जाने
के कारण सूखने पर जम्बुनद नामक सुवर्ण बनकर
सिद्धपुरुषों का आभूषण बनती है।

प्लक्षद्वीप का वर्णन -

प्लक्षद्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है।
यहां बीच में एक विशाल प्लक्ष वृक्ष लगा हुआ है।
यहां के स्वामि मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं।

ये थे:शान्तहय,शिशिर,सुखोदय,आनंद,शिव,
क्षेमक,ध्रुव ।

यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात
पुत्रों में सात भाग बांटे गये,जो उन्हीं के नामों पर
रखे गये थे: शान्तहयवर्ष,इत्यादि।

इनकी मर्यादा निश्चित करने वाले सात पर्वत हैं:

गोमेद,चंद्र,नारद,दुन्दुभि,सोमक,सुमना और
वैभ्राज।

इन वर्षों की सात ही समुद्रगामिनी नदियां हैं अनुतप्ता,शिखि,विपाशा,त्रिदिवा,अक्लमा,
अमृता और सुकृता।
इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और
नदियां हैं।
इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है।
सदा त्रेतायुग समान रहता है।
यहां चार जातियां आर्यक,कुरुर,विदिश्य और
भावी क्रमशः ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र हैं।
यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष
(पाकड़) वृक्ष है।
इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।

प्लक्षद्वीप अपने ही परिमाण वाले इक्षुरस के
सागर से घिरा हुआ है।

शाल्मल द्वीप का वर्णन

इस द्वीप के स्वामि वीरवर वपुष्मान थे।

इनके सात पुत्रों :
श्वेत,हरित,जीमूत,रोहित,वैद्युत,मानस और
सुप्रभ के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात
भागों के नाम हैं।
इक्षुरस सागर अपने से दूने विस्तार वाले
शाल्मल द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है।

यहां भी सात पर्वत,सात मुख्य नदियां और
सात ही वर्ष हैं।

इसमें महाद्वीप में कुमुद,उन्नत,बलाहक,
द्रोणाचल,कंक,महिष,ककुद्मान नामक
सात पर्वत हैं।

इस महाद्वीप में -
योनि,तोया,वितृष्णा,चंद्रा,विमुक्ता,विमोचनी
एवं निवृत्ति नामक सात नदियां हैं।

यहाँ - श्वेत,हरित,जीमूत,रोहित,वैद्युत,मानस
और सुप्रभ नामक सात वर्ष हैं।

यहां - कपिल,अरुण,पीत और कृष्ण नामक
चार वर्ण हैं।

यहां शाल्मल (सेमल) का अति विशाल
वृक्ष है।
यह महाद्वीप अपने से दुगुने विस्तार वाले
सुरासमुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

कुश द्वीप का वर्णन

इस द्वीप के स्वामि वीरवर ज्योतिष्मान थे।

इनके सात पुत्रों :
उद्भिद,वेणुमान,वैरथ,लम्बन,धृति,प्रभाकर,
कपिल,,

इनके नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों
के नाम हैं।
मदिरा सागर अपने से दूने विस्तार वाले कुश
द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है।

यहां भी सात पर्वत,सात मुख्य नदियां और
सात ही वर्ष हैं।

पर्वत - विद्रुम,हेमशौल,द्युतिमान,पुष्पवान,
कुशेशय,हरि और मन्दराचल नामक सात
पर्वत हैं।

नदियां - धूतपापा,शिवा,पवित्रा,सम्मति,
विद्युत,अम्भा और मही नामक सात नदियां हैं।

सात वर्ष - उद्भिद,वेणुमान,वैरथ,लम्बन,धृति,
प्रभाकर,कपिल नामक सात वर्ष हैं।

वर्ण - दमी,शुष्मी,स्नेह और मन्देह नामक चार
वर्ण हैं।

यहां कुश का अति विशाल वृक्ष है।
यह महाद्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे
समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

क्रौंच द्वीप का वर्णन -

इस द्वीप के स्वामि वीरवर द्युतिमान थे।

इनके सात पुत्रों :
कुशल,मन्दग,उष्ण,पीवर,अन्धकारक,मुनि
और दुन्दुभि के नाम संज्ञानुसार ही इसके
सात भागों के नाम हैं।

यहां भी सात पर्वत,सात मुख्य नदियां और
सात ही वर्ष हैं।

पर्वत - क्रौंच,वामन,अन्धकारक,घोड़ी के
मुख समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत,दिवावृत,
पुण्डरीकवान, महापर्वत दुन्दुभि नामक सात
पर्वत हैं।

नदियां - गौरी,कुमुद्वती,सन्ध्या,रात्रि,मनिजवा,
क्षांति और पुण्डरीका नामक सात नदियां हैं।

सात वर्ष - कुशल,मन्दग,उष्ण,पीवर,
अन्धकारक,मुनि और दुन्दुभि ।

वर्ण - पुष्कर,पुष्कल,धन्य और तिष्य नामक
चार वर्ण हैं।

यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र
से चारों ओर से घिरा हुआ है।
यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले शाक द्वीप
से घिरा है।

शाकद्वीप का वर्णन -

इस द्वीप के स्वामि भव्य वीरवर थे।

इनके सात पुत्रों :
जलद,कुमार,सुकुमार,मरीचक,कुसुमोद,मौदाकि
और महाद्रुम के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात
भागों के नाम हैं।

यहां भी सात पर्वत,सात मुख्य नदियां और
सात ही वर्ष हैं।

पर्वत - उदयाचल,जलाधार,रैवतक,श्याम,
अस्ताचल,आम्बिकेय और अतिसुरम्य गिरिराज
केसरी नामक सात पर्वत हैं।

नदियां - सुमुमरी,कुमारी,नलिनी,धेनुका,इक्षु,
वेणुका और गभस्ती नामक सात नदियां हैं।

सात वर्ष - जलद,कुमार,सुकुमार,मरीचक,
कुसुमोद,मौदाकि और महाद्रुम ।

वर्ण - वंग,मागध,मानस और मंगद नामक चार
वर्ण हैं।

यहां अति महान शाक वृक्ष है,जिसके वायु के
स्पर्श करने से हृदय में परम आह्लाद उत्पन्न
होता है।
यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र
से चारों ओर से घिरा हुआ है।
यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले पुष्कर
द्वीप से घिरा है।

पुष्करद्वीप का वर्णन -

इस द्वीप के स्वामि सवन थे।

इनके दो पुत्र थे: महावीर और धातकि।

यहां एक ही पर्वत और दो ही वर्ष हैं।

पर्वत -

मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष पर्वत है।
यह वर्ष के मध्य में स्थित है ।
यह पचास हजार योजन ऊंचा और इतना ही सब
ओर से गोलाकार फ़ैला हुआ है।
इससे दोनों वर्ष विभक्त होते हैं,और वलयाकार ही
रहते हैं।

नदियां -
यहां कोई नदियां या छोटे पर्वत नहीं हैं।

वर्ष - महवीर खण्ड और धातकि खण्ड।

महावीरखण्ड वर्ष पर्वत के बाहर की ओर है,
और बीच में धातकिवर्ष है ।

वर्ण - वंग,मागध,मानस और मंगद नामक चार
वर्ण हैं।

यहां अति महान न्यग्रोध (वट) वृक्ष है,जो ब्रह्मा
जी का निवासस्थान है यह द्वीप अपने ही बराबर
के मीठे पानी से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा
हुआ है।

समुद्रो का वर्णन -

यह सभी सागर सदा समान जल राशि से भरे
रहते हैं, इनमें कभी कम या अधिक नही होता।
हां चंद्रमा की कलाओं के साथ साथ जल बढ़्ता
या घटता है।
(ज्वार-भाटा) यह जल वृद्धि और क्षय 510
अंगुल तक देखे गये हैं।

पुष्कर द्वीप को घेरे मीठे जल के सागर के पार
उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिखलाई देती है।
वहां दस सहस्र योजन वाले लोक-आलोक
पर्वत हैं।
यह पर्वत ऊंचाई में भी उतने ही सहस्र योजन है।
उसके आगे पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए घोर
अन्धकार छाया हुआ है।
यह अन्धकार चारों ओर से ब्रह्माण्ड कटाह से
आवृत्त है।
(अन्तरिक्ष) अण्ड-कटाह सहित सभी द्वीपों को
मिलाकर समस्त भू-मण्डल का परिमाण पचास
करोड़ योजन है। (सम्पूर्ण व्यास)

आधुनिक नामों की दृष्टी से विष्णु पुराण का
सन्दर्भ देंखे तो...
हमें कई समानताएं सिर्फ विश्व का नक्शा देखने
भर से मिल जायेंगी...

१. विष्णु पुराण में पारसीक - ईरान को कहा
गया है।
२. गांधार वर्तमान अफगानिस्तान था।
३. महामेरु की सीमा चीन तथा रशिया को
घेरे है।
४. निषध को आज अलास्का कहा जाता है।
५. प्लाक्ष्द्वीप को आज यूरोप के नाम से जाना
जाता है।
६. हरिवर्ष की सीमा आज के जापान को घेरे थी।
७. उत्तरा कुरव की स्तिथि को देंखे तो ये फ़िनलैंड
प्रतीत होता है

इसी प्रकार विष्णु पुराण को पढ़कर विश्व का
एक सनातनी मानचित्र तैयार किया जा सकता है...
ये थी हमारे ऋषियों की महानता !!
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

1 अगस्त/पुण्य-तिथि


उपन्यासकार बाबू देवकीनन्दन खत्री


हिन्दी में ग्रामीण पृष्ठभूमि पर सामाजिक समस्याओं को जाग्रत करने वाले उपन्यास लिखने के लिए जहाँ प्रेमचन्द को याद किया जाता है; वहाँ जासूसी उपन्यास विधा को लोकप्रिय करने का श्रेय बाबू देवकीनन्दन खत्री को है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में एक समय ऐसा भी आया था, जब खत्री जी के उपन्यासों को पढ़ने के लिए ही लाखों लोगों ने हिन्दी सीखी थी।


बाबू देवकीनन्दन खत्री का जन्म अपने ननिहाल पूसा (मुजफ्फरपुर, बिहार) में 18 जून, 1861 को हुआ था। इनके पिता श्री ईश्वरदास तथा माता श्रीमती गोविन्दी थीं। इनके पूर्वज मूलतः लाहौर निवासी थे। महाराजा रणजीत सिंह के देहान्त के बाद उनके पुत्र शेरसिंह के राज्य में वहाँ अराजकता फैल गयी। अतः ये लोग काशी में बस गये। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने ननिहाल में उर्दू-फारसी में ही हुई। काशी आकर इन्होंने हिन्दी,संस्कृत व अंग्रेजी सीखी।


गया के टिकारी राज्य में इनकी पैतृक व्यापारिक कोठी थी। वहाँ रहकर इन्होंने अच्छा कारोबार किया। टिकारी का प्रबन्ध अंग्रेजों के हाथ में जाने के बाद ये स्थायी रूप से काशी आ गये। काशी नरेश श्री ईश्वरी नारायण सिंह जी से इनके बहुत निकट सम्बन्ध थे। चकिया तथा नौगढ़ के जंगलों के ठेके मिलने पर इन्होंने वहाँ प्राचीन किले, गुफाओं, झाड़ियों आदि का भ्रमण किया। भावुक प्रवृति के खत्री जी को इन निर्जन और बीहड़ जंगलों में व्याप्त रहस्यों ने ऐसी प्रेरणा दी कि वे ठेकेदारी छोड़कर साहित्य की साधना में लग गये।


उन दिनों सामान्य शिक्षित वर्ग उर्दू तथा फारसी की शिक्षा को ही महत्व देता था। चारों ओर उर्दू शायरी,कहानी, उपन्यास आदि का प्रचलन था; पर इसमें शराब तथा शबाब का प्रचुर वर्णन होता था। इसका नयी पीढ़ी पर बहुत खराब असर पड़ रहा था। ऐसे में 1888 में प्रकाशित श्री देवकीनन्दन खत्री के उपन्यासों ने साहित्य की दुनिया में प्रवेशकर धूम मचा दी। उन दिनों बंगला उपन्यासों के हिन्दी अनुवाद भी बहुत लोकप्रिय थे; पर हिन्दी में उपन्यास विधा का पहला मौलिक लेखक इन्हें ही माना जाता है।


इनके उपन्यासों के ‘गूढ़ पुरुष’ सदा अपने राजा के पक्ष की रक्षा तथा शत्रु-पक्ष को नष्ट करने की चालें चलते रहते हैं। इसकी प्रेरणा उन्हें संस्कृत के नीति साहित्य से मिली। उन्होंने चन्द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता सन्तति के अतिरिक्त नरेन्द्र मोहिनी, वीरेन्द्र वीर, कुसुम कुमारी,कटोरा भर खून, लैला-मजनू, अनूठी बेगम, काजर की कोठरी, नौलखा हार, भूतनाथ, गुप्त गोदना नामक उपन्यास भी लिखे। 


चन्द्रकान्ता सन्तति के 24 खण्ड प्रकाशित हुए। भूतनाथ के छह खण्ड इनके सामने तथा 15 इनके बाद प्रकाशित हुए। इनमें रहस्य, जासूसी और कूटनीति के साथ तत्कालीन राजपूती आदर्श और फिर पतनशील राजपूती जीवन का जीवन्त वर्णन है। आगे चलकर इन्होंने सुदर्शन, साहित्य सुधा तथा उपन्यास लहरी नामक साहित्यिक पत्र भी निकाले थे।


गत वर्षों में दूरदर्शन ने अनेक साहित्यिक कृतियों को प्रसारित किया। इनमें चन्द्रकान्ता पर बना धारावाहिक बहुत लोकप्रिय हुआ। रामायण और महाभारत के बाद लोकप्रियता के क्रम में चन्द्रकान्ता का ही नाम लिया जाता है। अपनी यशस्वी लेखनी से हिन्दी में रहस्य को जीवित-जाग्रत कर हिन्दी को लोकप्रिय करने वाले अमर उपन्यासकार श्री देवकीनन्दन खत्री का एक अगस्त, 1913 को देहावसान हो गया।


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

एक वेबसाइट रिपोर्ट के अनुसार फ्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने *हवन* पर रिसर्च की, जिसमें उन्हें पता चला कि हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है, जोकि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है तथा वातावरण को शुद्ध करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला। गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।

टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया कि यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च करी कि क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्ध होता है और जीवाणु नाश होता है अथवा नही? उन्होंने ग्रंथों में वर्णित हवन-सामग्री जुटाई और जलने पर पाया कि ये विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी 1 किलो जलने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन-सामग्री डाल कर जलायी गयी, एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर 94 प्रतिशत कम हो गया। यही नहीं, उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजूद जीवाणुआंे का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाजे खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के 24 घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से 96 प्रतिशत कम था।

बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था। ’यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (Resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर 2007 में छप चुकी है। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों, फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले बैक्टीरिया का नाश होता है, जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।

क्या हो हवन की समिधा (जलने वाली लकड़ी) :-
समिधा के रूप में आम की लकड़ी सर्वमान्य है परन्तु अन्य समिधाएँ भी विभिन्न कार्यों हेतु प्रयुक्त होती हैं। सूर्य की समिधा मदार की, चन्द्रमा की पलाश की, मंगल की खैर की, बुध की चिरचिरा की, बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गूलर की, शनि की शमी की, राहु दूर्वा की और केतु की कुशा की समिधा कही गई है। मदार (आक) की समिधा रोग को नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) कराने वाली, गूलर (औदुम्बर) की स्वर्ग देने वाली, शमी (खेजडी) की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा (डाभ) की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है।

हव्य (आहुति देने योग्य द्रव्यों) के प्रकार :-
प्रत्येक ऋतु में आकाश में भिन्न-भिन्न प्रकार के वायुमण्डल रहते हैं- सर्दी, गर्मी, नमी, वायु का भारीपन हल्कापन, धूल, धुँआ, बर्फ आदि का भरा होना। विभिन्न प्रकार के कीटाणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है। इसलिए कई बार वायुमण्डल स्वास्थ्यकर होता है, कई बार अस्वास्थ्यकर हो जाता है। इस प्रकार की विकृतियों को दूर करने और अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं, जो इस उद्देश्य को भली प्रकार पूरा कर सकती हैं।

होम (हवन) द्रव्य :-
हवन सामग्री वह जल सकने वाला पदार्थ है जिसे यज्ञ (हवन-होम) की अग्नि में मन्त्रों के साथ डाला जाता है-
1. ’सुगन्धित’: केशर, अगर, तगर, चन्दन, इलायची, जायफल, जावित्री, छड़ीला, कपूर, कचरी, बालछड़, पानड़ी आदि।
2. ’पुष्टिकारक’: घृत, गुग्गुल ,सूखे फल, जौ, तिल, चावल शहद नारियल आदि।
3. ’मिष्ट (मीठे): शक्कर, छुहारा, दाख आदि।
4. ’रोगनाशक’: गिलोय, जायफल, सोमवल्ली, ब्राह्मी, तुलसी, अगर, तगर, तिल, इंद्र जव, आमला, मालकांगनी, हरताल, तेजपत्र, प्रियंगु, केसर, सफेद चन्दन, जटामांसी आदि।
उपरोक्त चारों प्रकार की वस्तुएँ हवन में प्रयोग होनी चाहिए। अन्नों के हवन से मेघमालाएँ अधिक अन्न उपजाने वाली वर्षा करती हैं। सुगन्धित द्रव्यों से विचारों शुद्ध होते हैं, मिष्ट पदार्थ स्वास्थ्य को पुष्ट एवं शरीर को आरोग्य प्रदान करते हैं, इसलिए चारों प्रकार के पदार्थों को समान महत्व दिया जाना चाहिए। यदि अन्य वस्तुएँ उपलब्ध न हों, तो जो मिले उसी से अथवा केवल तिल, जौ, चावल से भी काम चल सकता है।

सामान्य हवन सामग्री :-
तिल, जौं, सफेद चन्दन का चूरा, अगर, तगर, गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र, पानड़ी, लौंग, बड़ी इलायची, गोला, छुहारे, नागरमोथा, इन्द्र जौ, कपूर, कचरी, आँवला, गिलोय, जायफल, ब्राह्मी। 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

*_यूरोप की विवशता हमारी मूर्खता बन गयी_*

*अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सभी कारों , दुपहिया वाहनों पर हेड लाइट को ऑन कर दिया है , यूरोपियन देशों में 9 माह मौसम साफ नहीं होता लेकिन हमारे देश में हमेशा साफ मौसम के बाद भी यह मूर्खता पूर्ण लाइट ऑन रखने का निर्णय थोपा गया ।*

*आठ महीने ठण्ड पड़ने के कारण कोट - पेंट पहनना उनकी विवशता है , और शादी बाले दिन भरी गर्मीं में कोट - पेंट डाल कर बरात लेकर जाना हमारी मुर्खता है ।*

*ठण्ड में नाक बहते रहने के कारण टाई लगाना युरोप की विवशता है , और दूसरों को प्रभावित करनें के लिऐ जून महींनें में टाई कस के घर से निकलना हमारी मुर्खता है !*

*काले कपड़े ऊष्मा के अच्छे सुचालक होते हैं इसलिए यूरोपियन देशों में वकील काले कोट पहनते हैं यह उनकी विवशता है , लेकिन भारत में प्रचंड गर्मी में काला कोट पहनना हमारी मूर्खता है ।*

*ताजा भोजन उपलब्ध ना होने के कारण यूरोप सड़े हुए आटे से पिज्जा, बर्गर, नूडल्स आदि खाना युरोप की विवशता है, और हम लोग 56 भोग छोड 400/- की सढी रोटी (पिज्जा ) खाना हमारी मुर्खता है ।*

*ताज़ा भोजन की कमी के कारण फ्रीज़ का इस्तेमाल करना यूरोप की विवशता है , और रोज दो समय ताजी सब्जी बाजार में मिलनें पर भी हफ्ते भर की सब्जी मंडी से लेकर फ्रीज में ठूंस - ठूंसकर सड़ा - सड़ा कर उसे खाते हैं यह हमारी मुर्खता है !*

*जड़ी बूटियों का ज्ञान ना होने के कारण... जीव जंतुओं के हाड़ - मॉस से दवाये बनाना उनकी विवशता है , और आयुर्वेद जैसा महान चिकित्सा ग्रंथ होनें के बाउजूद उन हाड़ - मांस की दवाईयां उपयोग करना हमारी महांमुर्खता है ।*

*पर्याप्त अनाज ना होने के कारण जानवरों को खाना उनकी विवशता और 1600 किस्मों की फसलें होनें के बाबजुद जीभ के स्वाद के लिऐ किसी निरिह प्राणी को मारकर उसे खाना हमारी मुर्खता है ।*

*लस्सी, दूध, जूस आदि ना होने के कारण कोल्ड ड्रिंक को पीना उनकी विवशता है और 36 तरह के पेय पदार्थ होते हुऐ भी इस कोल्ड ड्रिंक नामक जहर को पीकर खुद को आधुनिक समझ कर इतराना हमारी महां मुर्खता है !*

*पेड़ -पौधे , वनस्पतियों की अपेक्षा रासायनिक प्रक्रिया द्वारा टूथ पेस्ट बनाना , ठंड से त्वचा के लिए क्रीम लगाना उनकी विवशता है लेकिन पर्याप्त वनस्पतियों के बाउजूद कृतिम साधनों को अपनाना हमारी मूर्खता है ।*

*घुटने ना मुड़ने के कारण कंबोर्ड सीट पर बैठना उनकी विवशता है , लेकिन जमीन पर बैठकर भोजन ना करना , उकड़ू बैठकर शौच ना करना हमारी मूर्खता है ।*

*मजदूरों की कमी के कारण मशीनों के द्वारा फैक्ट्री चलना उनकी विवशता है और मजदूरों की भरमार होते हुऐ भी मशीनें लगाना , देश में बेरोजगारी का स्तर बढाना हमारी मुर्खता है !*

*मुँह की असमर्थता के कारण संस्कृत ना बोल पाना और जोड़ तोड़ वाली अंग्रेजी से काम चलना उनकी विवशता लेकिन महान संस्कृति भाषा को छोड़ना हमारी मूर्खता है ।*

*गुड़, खांड ना बना पाने के कारण चीनी का इस्तेमाल करना उनकी विवशता है , लेकिन हम अपने जलवायु के विपरीत चीनी , रिफाइंड , खाकर रोगी हो रहे हैं यह हमारी मूर्खता है ।*

*असभ्य, लालची , संस्कार विहीन व स्वार्थी स्वभाव के कारण माँ बाप से अलग रहना उनके साथ दुर्व्यवहार करना।*
*क्या हम भारतियों को ये सब करने की जरुरत है ???*

*मेरा भारत महान था महान है* किंतु महान तब रहेगा जब इस देश के वासी ऐसी मूर्खताओं को त्याग कर अपने देश की महानता को समझेंगे


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े 11 फैक्ट्स :-
1. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं। दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप (सुंदर) रूप में विराजमान हैं। इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है।

2. देवी भगवती के दाहिनी ओर विराजमान होने से मुक्ति का मार्ग केवल काशी में ही खुलता है। यहां मनुष्य को मुक्ति मिलती है और दोबारा गर्भधारण नहीं करना होता है। भगवान शिव खुद यहां तारक मंत्र देकर लोगों को तारते हैं। अकाल मृत्यु से मरा मनुष्य बिना शिव अराधना के मुक्ति नहीं पा सकता।

3. श्रृंगार के समय सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं, जो अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

4. विश्वनाथ दरबार में गर्भ गृह का शिखर है। इसमें ऊपर की ओर गुंबद श्री यंत्र से मंडित है। तांत्रिक सिद्धि के लिए ये उपयुक्त स्थान है। इसे श्री यंत्र-तंत्र साधना के लिए प्रमुख माना जाता है।

5. बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार इस प्रकार हैं :- 1. शांति द्वार। 2. कला द्वार। 3. प्रतिष्ठा द्वार। 4. निवृत्ति द्वार। इन चारों द्वारों का तंत्र में अलग ही स्थान है। पूरी दुनिया में ऐसा कोई जगह नहीं है जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हों और तंत्र द्वार भी हो।

6. बाबा का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में ईशान कोण में मौजूद है। इस कोण का मतलब होता है, संपूर्ण विद्या और हर कला से परिपूर्ण दरबार। तंत्र की 10 महा विद्याओं का अद्भुत दरबार, जहां भगवान शंकर का नाम ही ईशान है।

7. मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण मुख पर है और बाबा विश्वनाथ का मुख अघोर की ओर है। इससे मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवेश करता है। इसीलिए सबसे पहले बाबा के अघोर रूप का दर्शन होता है। यहां से प्रवेश करते ही पूर्व कृत पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं।

8. भौगोलिक दृष्टि से बाबा को त्रिकंटक विराजते यानि त्रिशूल पर विराजमान माना जाता है। मैदागिन क्षेत्र जहां कभी मंदाकिनी नदी और गौदोलिया क्षेत्र जहां गोदावरी नदी बहती थी। इन दोनों के बीच में ज्ञानवापी में बाबा स्वयं विराजते हैं। मैदागिन-गौदौलिया के बीच में ज्ञानवापी से नीचे है, जो त्रिशूल की तरह ग्राफ पर बनता है। इसीलिए कहा जाता है कि काशी में कभी प्रलय नहीं आ सकता।

9. बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजमान है। वह दिनभर गुरु रूप में काशी में भ्रमण करते हैं। रात्रि नौ बजे जब बाबा का श्रृंगार आरती किया जाता है तो वह राज वेश में होते हैं। इसीलिए शिव को राजराजेश्वर भी कहते हैं।

10. बाबा विश्वनाथ और मां भगवती काशी में प्रतिज्ञाबद्ध हैं। मां भगवती अन्नपूर्णा के रूप में हर काशी में रहने वालों को पेट भरती हैं। वहीं, बाबा मृत्यु के पश्चात तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं। बाबा को इसीलिए ताड़केश्वर भी कहते हैं।

11. बाबा विश्वनाथ के अघोर दर्शन मात्र से ही जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। शिवरात्रि में बाबा विश्वनाथ औघड़ रूप में भी विचरण करते हैं। उनके बारात में भूत, प्रेत, जानवर, देवता, पशु और पक्षी सभी शामिल होते हैंl
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

महामृत्युंजय मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि
वशिष्ठ के अनुसार 33 कोटि(प्रकार) देवताओं के द्योतक हैं
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है

मंत्र इस प्रकार है

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
महामृत्युंजय मंत्र ( संस्कृत: महामृत्युंजय मंत्र

"मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र") जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, ऋग्वेद का एक श्लोक है।
यह त्रयंबक "त्रिनेत्रों वाला", रुद्र का विशेषण (जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया)को संबोधित है।
यह श्लोक यजुर्वेद में भी आता है।
गायत्री मंत्र के साथ यह समकालीन हिंदू धर्म का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है।
शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है।
इसे मृत्यु पर विजय पाने वाला महा मृत्युंजय मंत्र कहा जाता है।
इस मंत्र के कई नाम और रूप हैं।
इसे शिव के उग्र पहलू की ओर संकेत करते हुए रुद्र मंत्र कहा जाता है;
शिव के तीन आँखों की ओर इशारा करते हुए त्रयंबकम मंत्र और इसे कभी कभी मृत-संजीवनी
मंत्र के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह कठोर तपस्या पूरी करने के बाद पुरातन ऋषि शुक्र को प्रदान की गई "जीवन बहाल" करने वाली विद्या
का एक घटक है।

ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का
ह्रदय कहा है।
चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है।
महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ
त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक)
यजामहे = हम पूजते हैं,सम्मान करते हैं,हमारे श्रद्देय
सुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
पुष्टि = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली,समृद्ध जीवन की परिपूर्णता
वर्धनम = वह जो पोषण करता है,शक्ति देता है, (स्वास्थ्य,धन,सुख में) वृद्धिकारक;जो हर्षित करता है,आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है,
एक अच्छा माली
उर्वारुकम= ककड़ी (कर्मकारक)
इव= जैसे,इस तरह
बंधना= तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)
मृत्युर = मृत्यु से
मुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
मा= न
अमृतात= अमरता, मोक्

सरल अनुवाद
हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है।
ककड़ी की तरह हम इसके तने से अलग ("मुक्त") हों,अमरत्व से नहीं बल्कि मृत्यु से हों।

||महा मृत्‍युंजय मंत्र ||
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं
यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव
बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!
||महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ ||
''समस्‍त संसार के पालनहार,तीन नेत्र वाले शिव
की हम अराधना करते हैं।
विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्‍यु
न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।''
महामृत्युंजय मंत्र के वर्णो (अक्षरों) का अर्थ महामृत्युंघजय मंत्र के वर्ण पद वाक्यक चरण
आधी ऋचा और सम्पुतर्ण ऋचा-इन छ: अंगों
के अलग-अलग अभिप्राय हैं।
ओम त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि
वशिष्ठर के अनुसार 33 कोटि(प्रकार) देवताओं
के घोतक हैं।
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु
तो प्राप्त करता ही हैं।
साथ ही वह नीरोग,ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है।
महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है।
भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।
त्रि – ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में
स्थित है।
यम – अध्ववरसु प्राण का घोतक है,जो मुख
में स्थित है।
ब – सोम वसु शक्ति का घोतक है,जो दक्षिण
कर्ण में स्थित है।
कम – जल वसु देवता का घोतक है,जो वाम
कर्ण में स्थित है।
य – वायु वसु का घोतक है,जो दक्षिण बाहु
में स्थित है।
जा अग्नि वसु का घोतक है,जो बाम बाहु
में स्थित है।
म – प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है,
जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
हे – प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
सु वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है।
दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
ग शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त्
अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
न्धिम् गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है।
बायें हाथ के मूल में स्थित है।
पु अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है।
बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
ष्टि – अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है,बाम हस्त
के मणिबन्धा में स्थित है।
व – पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है।
बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
र्ध – भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है,बाम हस्त
अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
नम् – कपाली रुद्र का घोतक है।
उरु मूल में
स्थित है।
उ दिक्पति रुद्र का घोतक है।
यक्ष जानु में स्थित है।
र्वा – स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष
गुल्फ् में स्थित है।
रु – भर्ग रुद्र का घोतक है,जो चक्ष
पादांगुलि मूल में स्थित है।
क – धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
मि – अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो
वाम उरु मूल में स्थित है।
व – मित्र आदित्यद का घोतक है जो
वाम जानु में स्थित है।
ब – वरुणादित्या का बोधक है जो वाम
गुल्फा में स्थित है।
न्धा – अंशु आदित्यद का घोतक है।
वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
नात् – भगादित्यअ का बोधक है।
वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
मृ – विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि
में स्थित है।
र्त्यो् – दन्दाददित्य् का बोधक है।
वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
मु – पूषादित्यं का बोधक है।
पृष्ठै भगा में स्थित है।
क्षी – पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है।
नाभि स्थिल में स्थित है।
य – त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है।
गुहय भाग में स्थित है।
मां – विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह
शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
मृ – प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग
में स्थित है।
तात् – अमित वषट्कार का घोतक है जो
हदय प्रदेश में स्थित है।
उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्तध देवता,
वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं।
जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग – अंग (जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं) उनकी रक्षा
होती है।
मंत्रगत पदों की शक्तियाँ जिस प्रकार मंत्रा में अलग अलग वर्णो (अक्षरों) की शक्तियाँ हैं। उसी प्रकार अलग – अल पदों की भी शक्तियाँ है।
त्र्यम्‍‍बकम् – त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है
जो सिर में स्थित है।
यजा सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है।
महे माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।
सुगन्धिम् – सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।
पुष्टि – पुरन्दिरी शकित का द्योतक है जो मुख में स्थित है।
वर्धनम – वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है।
उर्वा – ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है।
रुक – रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।
मिव रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है।
बन्धानात् – बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है।
मृत्यो: – मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।
मुक्षीय – मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है।
मा – माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है।
अमृतात – अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।

महामृत्युजय प्रयोग के लाभ :-
कलौकलिमल ध्वंयस सर्वपाप हरं शिवम्।
येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।
स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।
मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।
देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत।
यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रध्दायान्वित।।
जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत्।
कलियुग में केवल शिवजी की पूजा फल देने
वाली है।
समस्त पापं एवं दु:ख भय शोक आदि का हरण
करने के लिए महामृत्युजय की विधि ही श्रेष्ठ है।
ॐ नमः शिवाय
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

 जानिए क्यों शिव जी ने माता पार्वती को बताया बिना बुलाये किसी के यहाँ नहीं जाना चाहिए।

जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न संदेहा॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गए कल्यानु न होई॥
            यद्यपि इसमें संदेह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए भी जाना चाहिए तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता।
दक्ष प्रजापति की कई पुत्रियाँ थीं फिर भी दक्ष को ऐसी कन्या की अभिलाषा थी जो बहुत शक्तिशाली और सर्व विजयी होने के साथ गुणवती और आलौकिक सौन्दर्य की धनी हो।

 अपनी इच्छा पूर्ति हेतु दक्ष ने माँ भगवती के तप के लिए वन में चले गये। वर्षो तक साधना करने के बाद माँ भगवती उनके तप से प्रसन्न हो कर यह वरदान दिया की मैं तुम्हारे घर में पुत्री रूप में जन्म लूंगी यह सुन कर दक्ष प्रजापति बहुत अधिक खुश हुए और अपने घर वापस आ गए।

कुछ समय बाद दक्ष के घर एक अदभुत सुंदर कन्या ने जन्म लिया, कुछ सालों बाद कन्या बड़ी हुई तो दक्ष को अपनी पुत्री के विवाह की चिंता हुई ब्रह्मा जी के कहने पर दक्षप्रजापति अपनी कन्या का विवाह भगवान शिव से करने के लिए मान गये। क्योंकि वे जानते थे कि सती आदिशक्ति माँ भगवती का अवतार थी और भगवान शिव आदि पुरुष हैं इसलिए वो इस विवाह से खुश थे।

विवाह के बाद देवी सती भगवान शंकर के साथ कैलाश पर्वत पर ख़ुशी रहने लगी। एक बार ब्रह्मा जी ने एक सभा का आयोजन किया जिसमें सभी देवता यक्ष, गन्धर्व, और भगवान शंकर जी भी शामिल हुए। जब दक्ष प्रजापति आये तो अभी देवता उनके सम्मान में खड़े हुए और शिव जी ध्यान मुद्रा में अपने स्थान पर बैठे रहे और न ही उन्होंने दक्षप्रजापति को नमस्कार किया।

यह सब देख कर दक्षप्रजापति ने अपना अपमान समझा और वह मन ही मन में शिव जी से दुश्मनी का भाव मानने लगे। सती को भी इस बात का धीरे धीरे आभास होने लगा कि दक्ष प्रजापति और शिव के बीच में मतभेद उत्पन्न हो गये हैं।

शिव जी को नीचा दिखाने और अपमानित करने हेतु दक्ष प्रजापति ने एक यज्ञ आयोजन किया जिसमें सभी देवी देवता को बुलाया गया लेकिन शिव जी और सती को नहीं। जब सती ने देखा कि सब देवी देवता सज धज कर अपने विमान पर सवार होकर कनखल (दक्ष प्रजापति के महल) की ओर जा रहे हैं।

तो उन्होंने भी शिव जी से आग्रह किया कि हम यज्ञ में शामिल होने के लिए चलते हैं पर शिव जी ने कहा कि बिन बुलाये हमें किसी के घर में जाना उचित नहीं होगा, इस पर सती जी ने कहा की वो मेरे पिता हैं और पिता के घर जाने के लिए मुझे किसी निमन्त्रण की जरूरत नहीं है।

इस पर शिव जी ने कहा कि एक पिता पर पुत्री का तब तक ही अधिकार होता है जब तक उसकी शादी नहीं हो जाती, पर सती ने हठ कर कि मुझे तो जाना है अपने पिता के घर। वहाँ पर मेरी सारी बहनें भी आयी होंगी और मुझे अपने माता पिता और अपनी बहनों से मिले बहुत दिन हो गये हैं तो मैं जरुर अपने पिता के घर जाऊंगी।

तब भगवान शंकर ने सती के साथ अपने गणों को भी भेज दिया वहाँ जाकर सती ने देखा कि उसे देख कर सिर्फ उसकी माता और बहनें ही खुश हैं और उसके पिता ने देखने के बाद भी अनदेखा कर दिया। उसके बाद भी सती जब अपने पिता के पैर छूने गई तो पिता ने भगवान शिव और सती का घोर अपमान किया जिसे वो सहन नहीं कर पाई और उसी यज्ञ वेदी में कूद कर अपने आप को भस्म कर दिया।

जब यह समाचार शिवजी के पास गया तो उन्होंने अपने गणों के साथ यज्ञ स्थल पर जा कर विध्वंस कर दिया और दक्ष प्रजापति का त्रिशूल से सिर धड़ से अलग कर दिया। जब दक्ष प्रजापति को अपनी भूल का अनुभव हुआ तो भगवान शंकर जी से माफ़ी मांग ली उस घटना के बाद सती की माता और दक्ष प्रजापति ने सारा जीवन भोले नाथ की भक्ति को समर्पित कर दिया।

और तब भोले नाथ माता सती के जले हुए शव को लेकर ब्रह्मांड में यहाँ वहां भटकने लगे तब भगवान विष्णु जी ने अपने सुदर्शन को आदेश दिया की तुम माता सती के शव को नष्ट कर दो और जिस भी स्थान पर माता के शरीर का अंग कट कर गिरा वहाँ पर ही शक्ति पीठ बना भारत वर्ष में कुल इक्यावन शक्ति पीठ हैं।

उसके बाद माता सती ने दोबारा हिमालय पर्वत के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया जिनका नाम शैलपुत्री पुत्री था और आगे चल कर माँ पार्वती के नाम से विख्यात हुयीं।
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

 "" संस्कार ""

जनेऊ पहनने के लाभ !!

पूर्व में बालक की उम्र आठ वर्ष होते
ही उसका यज्ञोपवित संस्कार कर दिया
जाता था।

वर्तमान में यह प्रथा लोप सी गयी है।
जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से
सीधा संबंध है।

विवाह से पूर्व तीन धागों की तथा
विवाहोपरांत छह धागों की जनेऊ
धारण की जाती है।

पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात
ही बालक को पढऩे का अधिकार
मिलता था।

मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों
पर कस कर तीन बार लपेटना पड़ता है।

इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका
संबंध पेट की आंतों से है।

आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल
देती है।

जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता
है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल
मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित
होता है।

जनेऊ उसके वेग को रोक देती है,जिससे
कब्ज, एसीडीटी,पेट रोग,मूत्रन्द्रीय रोग,
रक्तचाप,हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक
रोग नहीं होते।

जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है।
वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ
उतार नहीं सकता।

जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले।
अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही
जनेऊ कान से उतारता है।

यह सफाई उसे दांत,मुंह,पेट,कृमि,जिवाणुओं के
रोगों से बचाती है।
जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को
होता है।

यज्ञोपवीत (जनेऊ) एक संस्कार है।
इसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय
करने का अधिकार प्राप्त होता है।

यज्ञोपवीत धारण करने के मूल में एक वैज्ञानिक
पृष्ठभूमि भी है।
शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक
प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह
कार्य करती है।
यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक
स्थित होती है।
यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है।
इसका स्वरूप लाजवंती वनस्पति की तरह
होता है।
यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य
काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लांघ पाता।

अपने कंधे पर यज्ञोपवीत है इसकी मात्र
अनुभूति होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से परावृत्त
होने लगता है।

यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के
कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो
कोई आश्चर्य नहीं है।

इसीलिए सभी हिंदुओं में किसी न किसी कारण
वश यज्ञोपवीत धारण किया जाता है।
सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध प्रतिमा का सूक्ष्म
निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत
की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है।

यज्ञोपवीत केवल धर्माज्ञा ही नहीं बल्कि
आरोग्य का पोषक भी है,अतएव इसे सदैव
धारण करना चाहिए।

शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी
किया गया है।

आदित्य,वसु,रूद्र,वायु,अगि्न,धर्म,वेद,आप,
सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं
कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ
स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त
होता है।

यदि ऎसे पवित्र दाएं कान पर यज्ञोपवीत
रखा जाए तो अशुचित्व नहीं रहता।

यज्ञोपवीत
(संस्कृत संधि विच्छेद= यज्ञ+उपवीत)
शब्द के दो अर्थ हैं-

उपनयन संस्कार जिसमें जनेऊ पहना जाता है
और विद्यारंभ होता है।
मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार
के अंग होते हैं।

जनेऊ पहनाने का संस्कार

सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीत
धारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा
के नीचे पहनता है।

यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया उपवीत,
यज्ञसूत्र या जनेऊ

यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि
से ग्रन्थित करके बनाया जाता है।
इसमें सात ग्रन्थियां लगायी जाती हैं ।
ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है।

तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा
के बाद हमेशा धारण किया जाता है।
तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा,विष्णु और महेश
के प्रतीक होते हैं।

तीन सूत्र हमारे ऊपर तीन प्रकार के ऋणों
का बारम्बार स्मरण कराते हैं कि उन्हें भी
हमें चुकाना है।

1 - पितृ ऋण
2 - मातृ ऋण
3 - गुरु ऋण

अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया
जाता है।
बिना यज्ञोपवीत धारण किये अन्न जल
गृहण नहीं किया जाता।

यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं
प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं
यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

जनेऊ को लेकर लोगों में कई भ्रांति मौजूद है|

लोग जनेऊ को धर्म से जोड़ दिए हैं जबकि
सच तो कुछ और ही है।

जानें कि सच क्या है ?
जनेऊ पहनने से आदमी को लकवा से सुरक्षा
मिल जाती है।
क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ
धारण करने वाले को लघुशंका करते समय
दाँत पर दाँत बैठा कर रहना चाहिए अन्यथा
अधर्म होता है।

दरअसल इसके पीछे साइंस का गहरा रह्स्य
छिपा है।
दाँत पर दाँत बैठा कर रहने से आदमी को
लकवा नहीं मारता।

आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है,
एक पुरुष को बताता है कि उसे दो लोगों का
भार या ज़िम्मेदारी वहन करना है,एक पत्नी
पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात्
पति पक्ष का।

अब एक एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं।

जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी
पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन
करना है।

अब इन 9-9 धांगों के अंदर से 1-1 धागे
निकालकर देंखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं।

अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27
नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है।

अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो
27+9 = 36 होता है,जिसको एकल अंक
बनाने पर 36 = 3+6 = 9 आता है,
जो एक पूर्ण अंक है।

अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात
2 और जोड़ दें तो 9 + 2 = 11 होगा जो हमें
बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो
लोगों अर्थात् पति और पत्नी ( 1 और 1 ) के
मिलने सेबना है | 1 + 1 = 2 होता है जो अंक
विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है और चंद्रमा
हमें शीतलता प्रदान करता है।

जब हम अपने दोनो पक्षों का ऋण वहन कर
लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो
जाती है|

यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं
कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।

अर्थात अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय
दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है।

अपनी अशुचि अवस्था को सूचित करने के
लिए भी यह कृत्य उपयुक्त सिद्ध होता है।

हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके जनेऊ
कान पर से उतारें।

इस नियम के मूल में शास्त्रीय कारण यह
है कि शरीर के नाभि प्रदेश से ऊपरी भाग
धार्मिक क्रिया के लिए पवित्र और उसके
नीचे का हिस्सा अपवित्र माना गया है।

दाएं कान को इतना महत्व देने का वैज्ञानिक
कारण यह है कि इस कान की नस,गुप्तेंद्रिय
और अंडकोष का आपस में अभिन्न संबंध है।

मूत्रोत्सर्ग के समय सूक्ष्म वीर्य स्त्राव होने की
संभावना रहती है।
दाएं कान को ब्रह्म सूत्र में लपेटने पर शुक्र
नाश से बचाव होता है।

यह बात आयुर्वेद की दृष्टि से भी सिद्ध हुई है।

यदि बार-बार स्वप्नदोष होता हो तो दायां
कान बम्ह्रसूत्र से बांधकर सोने से रोग दूर
हो जाता है।

बिस्तर में पेशाब करने वाले लडकों को दाएं
कान में धागा बांधने से यह प्रवृत्ति रूक जाती है।

किसी भी उच्छृंखल जानवर का दायां कान
पकडने से वह उसी क्षण नरम हो जाता है।

अंडवृद्धि के सात कारण हैं।
मूत्रज अंडवृद्धि उनमें से एक है।
दायां कान सूत्रवेष्टित होने पर मूत्रज
अंडवृद्धि का प्रतिकार होता है।

इन सभी कारणों से मूत्र तथा पुरीषोत्सर्ग करते
समय दाएं कान पर जनेऊ रखने की शास्त्रीय
आज्ञा है।
----#साभारसंकलित;;
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

 मुख्य द्वार पर शुभ चिह्न क्यों जरूरी?
शास्त्रों और वास्तु में कई शुभ चिह्न बताए गए हैं जो घर को सभी परेशानियों को दूर रखते हैं। घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहे इसलिए कई प्रकार के चिह्न बनाए जाते हैं।
इन्हीं चिह्नों में स्वस्तिक, ॐ, ॐ नमः शिवाय, श्रीगणेश आदि शामिल हैं।
* मान्यता है कि घर के मुख्य द्वार पर स्वस्तिक बनाकर शुभ-लाभ लिखने से घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है।
* स्वस्तिक के साथ ही शुभ-लाभ का चिह्न भी धनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।
* स्वस्तिक का चिह्न बनाने से हमारे आसपास से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। इसलिए स्वस्तिक के साथ ही हर-त्योहार पर घर के मुख्य द्वार पर सिन्दूर से शुभ-लाभ लिखा जाता है।
* शास्त्रों के अनुसार गणेश प्रथम पूज्य हैं और शुभ व लाभ यानी शुभ व क्षेम को उनका पुत्र माना गया है।
* वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के मुख्य द्वार पर श्रीगणेश का चित्र या स्वस्तिक बनाने से घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है। ऐसे घर में हमेशा गणेशजी की कृपा रहती है और धन-धान्य की कमी नहीं होती।
इसी वजह से घर के मुख्य द्वार पर श्रीगणेश का छोटा चित्र लगाएं या स्वस्तिक या अपने धर्म के अनुसार कोई शुभ या मंगल चिह्न लगाएं।. विनोद शास्त्री
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

कालसर्प का सटीक उपाय-
अमावस्या के दिन यदि शनिचरी अमावस्या हो तो अति उत्तम --5 नारियल ,सवा किलो लकड़ी का कोयला,एक कपूर की बट्टी,एक फूलमाला,माचिस आदि सामग्री लेकर किसी पवित्र नदी के किनारे जाये और स्नान करके एक नारियल में माला लपेटकर उसकी जटा में कपूर रखकर प्रज्वलित करे और ये कहते हुए विसर्जीत करे कि कालसर्प दोष के कारण जिंदगी में आये सारे उतार चढ़ाव ख़त्म (परेशानियाँ)हो और आज से जीवन की एक नई शुरुआत हो और बाकि 4 नारियल एक एक करके विसर्जीत कर दे और अंत में सारा कोयला एक साथ विसर्जीत करके जल ग्रहण करके बाहर आ जाये-
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

 कुछ मूर्ख भारतीयों के बचकाने प्रश्नो के उत्तर!

1-कुछ लोग पूंछते है कि अगर आयुर्वेद सबसे पुराना है तो लोग एलोपैथी क्यों अपनाते है। आयुर्वेद आज हाशिये पर क्यों है?
उत्तर--- क्योंकि भारत सरकार अपने स्वास्थ्य बजट में 97% पैसा एलोपैथी में खर्च करती है और सिर्फ 3% ही आयुर्वेद पर!
2-संस्कृत अगर सबसे प्राचीन और सबसे बेहतरीन भाषा है तो वो हाशिये पर क्यों???
उत्तर--- आप संस्कृत की बात करते है?? हिंदी का हाल बेहाल है ,संस्कृत की तो बात ही इसके बाद कीजिये। आज अंग्रेजी का दबदबा है क्योंकि भारत सरकार ने कभी भी देश की भाषाओ के विकास के लिए कुछ नहीं किया! वर्ना एक नयी खबर ये है की 7th और 8th generation कंप्यूटर संस्कृत भाषा में होंगे!
3-लोग पूंछते है कि वेदो में विज्ञान है तो फिर भारत पीछे क्यों है??
उत्तर--क्योंकि वेदो की शिक्षा आज से 2500 वर्ष पूर्व ही नष्ट हो चुकी है।
विदेशी आक्रमणों ने हमारे तक्षशिला,नालंदा,मितावली इत्यादि विश्वविद्यालयो को नष्ट कर दिया। धीरे धीरे भारत की गुरुकुल प्रणाली समाप्त हो गयी। वर्ना आज भी IIT की तैयारी करने वाले छात्र अथर्ववेद का वैदिक गणित पढ़ते है!
और अमेरिका के NASA में राक्षसराज मयदानव का लिखा ग्रन्थ "सूर्यसिद्धांत" सभी वैज्ञानिको को पढ़ना पड़ता है। ये ग्रन्थ रावण के ससुर और मंदोदरी के पिता मयदानव ने लिखा था। इसमें परमाणु बम और सूर्य से सम्बंधित कई चौकाने वाली जानकारियां है।
4-लोग पूंछते है कि भारत के लोग इतने ही इंटेलीजेंट है तो देश पीछे क्यों है??
उत्तर--क्योंकि वर्तमान समय में भारत में इंटेलीजेंट लोगो की कदर नहीं है।
भारत के इंटेलीजेंट लोग वर्तमान में अमेरिका यूरोप जापान इत्यादि देशो में सेवा दे रहे है। अमेरिका में जितने भी बेहतरीन डॉक्टर है उनमे अधिकतर भारतीय है। वर्तमान में गूगल,माइक्रोसॉफ्ट इत्यादि कंपनियो के CEO भारतीय है। NASA ने "GOD पार्टिकल" खोजने के लिए जिस मशीन का निर्माण किया है उस मशीन का नाम भारत के एक बंगाली वैज्ञानिक डॉ बोस के नाम पर रखा गया है। नासा के अधिकतर वैज्ञानिक भारतीय है।
40% से भी अधिक वैज्ञानिक भारतीय है। विश्व में सबसे ज्यादा सॉफ्टवेयर भारतीय ही बनाते है।
5-अगर भारत पहले सोने की चिड़िया था तो आज गरीब देश क्यों है??
उत्तर-- क्योंकि पहले विश्व की कुल जीडीपी में भारत का हिस्सा 45% से भी अधिक था..भारत के अर्थशास्त्री स्वदेशी निति अपनाते थे। आज भारत की जीडीपी 7% भी नहीं है। और आज भारत के अंदर ही विदेशी कारोबार फल फूल रहा है।
वरना 18वीं सदी तक रुपया डॉलर से ज्यादा ताकतवर था।
कहने का तात्पर्य ये कि महाभारत युद्ध के बाद से ही देश अस्तव्यस्त हुआ है।
कभी विदेशी आक्रमणों ने देश को बर्बाद किया। और आज गांधी, नेहरू, अम्बेडकर आदि धर्मनिरपेक्ष पथभ्रष्ट लोगों के अनुयायी शासक देश को बर्बाद कर रहे है!
कोई संदेह!
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

आइये आपको
*"धरती पर भगवान हैं*
प्रमाणिकता सिद्ध किये गये लोगो के अनुभव देखे व परखे :-
::::::::::~:::::::::×:::::::::~::::::::::

१. "अमरनाथजी" में शिवलिंग अपने आप बनता है।

२. "माँ ज्वालामुखी" में
हमेशा ज्वाला निकलती है।

३. "मैहर माता मंदिर" में रात को आल्हा अब भी आते हैं।

४. सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर में 3000 बम में से एक का भी ना फूटना।

५. इतने बड़े हादसे के बाद भी *"केदारनाथ मंदिर"* का बाल ना बांका होना।

६. पूरी दुनियां मैं आज भी सिर्फ *"रामसेतु के पत्थर" पानी में तैरते* हैं।

७. "रामेश्वरम धाम" में *सागर का कभी उफान न मारना।*

८. *"पुरी के मंदिर"के ऊपर से किसी पक्षी या विमान* का न निकलना।

९. *"पुरी मंदिर" की पताका हमेशा हवा के विपरीत* दिशा में उड़ना।

१०. *उज्जैन में "भैरोंनाथ" का मदिरा पीना।*

११. *गंगा और नर्मदा माँ (नदी) के पानी का कभी खराब* न होना।

१२, *श्री राम नाम धन संग्रह बॆंक में संग्रहीत इकतालीस अरब राम नाम मंत्र पूरित ग्रंथों को (कागज होने पर भी) चूहों द्वारा नहीं काटा जान। जबकि अनेक चूहे अंदर घुमते रहते हॆं।*

13, *चितोडगढ मे बाणमाताजी के मंदिर मे आरती के समय* त्रिशूल का हिलना।।


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)


                    *हिंदू धर्म* में व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक १६ कर्म अनिवार्य बताए गए हैं। इन्हें १६ संस्कार कहा जाता है। इनमें से हर एक संस्कार एक निश्चित समय पर किया जाता है। कुछ संस्कार तो शिशु के जन्म से पूर्व ही कर लिए जाते हैं।

संस्कारों के संबंध में आद्य गुरु शंकराचार्य ने कहा है-

*संस्कारों हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्योषाप नयनेन वा ॥*
-ब्रह्मसूत्र भाष्य १/१/४
अर्थात: व्यक्ति में गुणों का आरोपण करने के लिए जो कर्म किया जाता है,उसे संस्कार कहते हैं।

*संस्कार विधि में लिखा है....✍🏼*

जन्मना जायते शुद्रऽसंस्काराद्द्विज उच्यते।
अर्थात जन्म से सभी शुद्र होते हैं और संस्कारों द्वारा व्यक्ति को द्विज बनाया जाता है।

*संस्कार कितने हैं.....?*☺

गौतम स्मृति शास्त्र में ४० संस्कारों का उल्लेख है। कुछ जगह ४८ संस्कार भी बताए गए हैं। महर्षि अंगिरा ने २६ संस्कारों का उल्लेख किया है।
वर्तमान में महर्षि वेदव्यास स्मृति शास्त्र के अनुसार, १६ संस्कार प्रचलित हैं,उसके अनुसार-

*गर्भाधानं पुंसवनं सीमंतो जातकर्म च।* *नामक्रियानिष्क्रमणेअन्नाशनं वपनक्रिया:।।*
*कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारंभक्रियाविधि:।*
*केशांत स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रह:।।*
*त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्कारा:षोडश स्मृता:।*
(व्यासस्मृति १/१३-१५)

संस्कारों से हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है। संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा,यज्ञ,मंत्रोच्चारण आदि होता है,उसका वैज्ञानिक महत्व भी होता है।

*इन १६ संस्कारों की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है-* 🌸📖🌸

१. *गर्भाधान संस्कार* 📖
यह ऐसा संस्कार है,जिससे योग्य,गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान के लिए गर्भधारण किस प्रकार करें?इसका विवरण दिया गया है। इस संस्कार से कामुकता का स्थान अच्छे विचार ले लेते हैं। ऐसी मान्यता है।

२. *पुंसवन संस्कार* 📖
यह संस्कार गर्भधारण के दो-तीन महीने बाद किया जाता है। मां को अपने गर्भस्थ शिशु की ठीक से देखभाल करने योग्य बनाने के लिए यह संस्कार किया जाता है। पुंसवन संस्कार के दो प्रमुख लाभ-पुत्र प्राप्ति और स्वस्थ,सुंदर गुणवान संतान है।

३. *सीमन्तोन्नयन संस्कार* 📖
यह संस्कार गर्भ के छठे या आठवें महीने में किया जाता है। इस संस्कार का फल भी गर्भ की शुद्धि ही है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म आएं, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है। महाभक्त प्रह्लाद को देवर्षि नारद का उपदेश तथा अभिमन्यु को चक्रव्यूह प्रवेश का उपदेश इसी समय में मिला था। अत: माता-पिता को चाहिए कि वे इन दिनों विशेष सावधानी के साथ योग्य आचरण करें।

४. *जातकर्म संस्कार* 📖
शिशु का जन्म होते ही इस संस्कार को करने से गर्भस्त्रावजन्य संबंधी सभी दोष दूर हो जाते हैं। नाल छेदन के पूर्व नवजात शिशु को सोने की चम्मच या अनामिका अंगुली (तीसरे नंबर की) से शहद और घी चटाया जाता है। घी आयु बढ़ाने वाला तथा वात व पित्तनाशक है और शहद कफनाशक है। सोने की चम्मच से शिशु को घी व शहद चटाने से त्रिदोष (वात, पित्त व कफ) का नाश होता है।

५. *नामकरण संस्कार* 📖
शिशु के जन्म के बाद ११वें या सौवें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष आधार पर बच्चे का नाम तय किया जाता है। बच्चे को शहद चटाकर सूर्य के दर्शन कराए जाते हैं। उसके नए नाम से सभी लोग उसके उत्तम स्वास्थ्य व सुख-समृद्धि की कामना करते हैं-

*आयुर्वर्चोअभिवृद्धिश्च सिद्धिव्र्यवह्रतेस्तथा।* *नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभि:।।* (स्मृतिसंग्रह)

६. *निष्क्रमण संस्कार* 📖
इस संस्कार का फल विद्वानों ने आयु की वृद्धि बताया है-

*निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युद्दिष्टा मनीषिभि:।*

ये संस्कार शिशु के जन्म के चौथे चा छठे महीने में किया जाता है। सूर्य तथा चंद्रमा आदि देवताओं की पूजा कर शिशु को उनके दर्शन कराना इस संस्कार की मुख्य प्रक्रिया है। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इस संस्कार में इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

७. *अन्नप्राशन संस्कार* 📖
माता के गर्भ में रहते हुए शिशु के पेट में गंदगी चली जाती है, जिससे उस शिशु में दोष आ जाते हैं। अन्नप्राशन संस्कार के माध्यम से उन दोषों का नाश हो जाता है- अन्नाशमान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुध्दयति।
जब शिशु ६-७ मास का हो जाता है और उसके दांत निकलने लगते हैं, पाचनशक्ति तेज होने लगती है, तब यह संस्कार किया जाता है। शुभ मुहूर्त में देवताओं की पूजा के बाद माता-पिता आदि सोने या चांदी की चम्मच से नीचे लिखे मंत्र को बोलते हुए शिशु को खीर चटाते हैं-
*शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमधौ।*
*एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुंचतो अंहस:।।* (अथर्ववेद ८/२/१८)

८. *मुंडन संस्कार* 📖
शिशु की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारे जाते हैं, जिसे वपन क्रिया संस्कार, मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार कहा जाता है। इसके बाद शिशु के सिर पर दही-मक्खन लगाकर स्नान करवाया जाता है व अन्य मांगलिक क्रियाएं की जाती हैं। इस संस्कार का उद्देश्य शिशु का बल, आयु व तेज की वृद्धि करना है।

९. *कर्णवेधन संस्कार* 📖
इस परंपरा के अंतर्गत शिशु के कान छेदें जाते हैं। इसलिए इसे कर्णवेधन संस्कार कहा जाता है। यह संस्कार जन्म के छह माह बाद से लेकर पांच वर्ष की आयु के बीच किया जाता था। मान्यता के अनुसार, सूर्य की किरणें कानों के छेदों से होकर बालक-बालिका को पवित्र करती हैं और तेज संपन्न बनाती हैं। शास्त्रों में कर्णवेधरहित (जिसके कान छीदे न हो) पुरुष को श्राद्ध का अधिकारी नहीं माना गया है। कर्णवेध संस्कार के बाद बालक को कुंडल तथा बालिका को कान के आभूषण पहनाने चाहिए।

१०. *उपनयन संस्कार* 📖
इस संस्कार को व्रतादेश व यज्ञोपवित संस्कार भी कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस संस्कार के द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का दूसरा जन्म होता है। बालक को विधिवत् यज्ञोपवित (जनेऊ) धारण करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। जनेऊ में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार के द्वारा बालक को गायत्री जाप, वेदों का अध्ययन आदि करने का अधिकार प्राप्त होता है।

११. *विद्यारंभ संस्कार* 📖
उपनयन संस्कार हो जाने के बाद बालक को वेदों का अध्ययन करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस संस्कार के अंतर्गत निश्चित समय शुभ मुहूर्त देखकर बालक की शिक्षा प्रारंभ की जाती है। इसे ही विद्यारंभ संस्कार कहा जाता है। इस संस्कार का मूल उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना है। पूर्व में इस संस्कार के बाद बालक को गुरुकुल भेज दिया जाता था, जहां वह अपने गुरु के संरक्षण में वेदों व अन्य शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करता था।

१२. *केशांत संस्कार* 📖
विद्यारंभ संस्कार में बालक गुरुकुल में रहते हुए वेदों का अध्ययन करता है। उस समय वह ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करता है तथा उसके लिए केश और श्मश्रु (दाड़ी) व जनेऊ धारण करने का विधान है। पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद गुरुकुल में ही केशांत संस्कार किया जाता है। इसके बाद श्मश्रु वपन (दाड़ी बनाने) की क्रिया संपन्न की जाती है, इसलिए इसे श्मश्रु संस्कार भी कहा जाता है। यह संस्कार सूर्य के उत्तरायण होने पर ही किया जाता है। कुछ शास्त्रों में इसे गोदान संस्कार भी कहा गया है।

१३. *समावर्तन संस्कार* 📖
समावर्तन का अर्थ है फिर से लौटना। समावर्तन विद्याध्ययन का अंतिम संस्कार है। पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद ब्रह्मचारी अपने गुरु की आज्ञा से अपने घर लौटता है। इसीलिए इसे समावर्तन संस्कार कहा जाता है। इस संस्कार में वेदमंत्रों से अभिमंत्रित जल से भरे हुए ८ कलशों से विधिपूर्वक ब्रह्मचारी को स्नान करवाया जाता है, इसलिए इसे वेद स्नान संस्कार भी कहते हैं। इस संस्कार के बाद ब्रह्मचारी गृहस्थ जीवन में प्रवेश पाने का अधिकारी हो जाता है।

१४. *विवाह संस्कार* 📖
वि यानी विशेष रूप से, वहन यानी ले जाना। विवाह का अर्थ है पुरुष द्वारा स्त्री को विशेष रूप से अपने घर ले जाना। सनातन धर्म में विवाह को जन्म-जन्मांतर का बंधन माना गया है। यह धर्म का साधन है। विवाह के बाद पति-पत्नी साथ रहकर धर्म का पालन करते हुए जीवन यापन करते हैं। विवाह के द्वारा सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी से व्यक्ति पितृ ऋण से मुक्त होता है। पुराणों के अनुसार, ब्राह्म आदि उत्तम विवाहों से उत्पन्न पुत्र पितरों को तारने वाला होता है।
विवाह का यही फल बताया गया है-

*ब्राह्माद्युद्वाहसंभूत: पितृणां तारक: सूत:।*
*विवाहस्य फलं त्वेतद् व्याख्यातं परमर्षिभि:।।*
(स्मृतिसंग्रह)

१५. *विवाह अग्नि संस्कार* 📖
विवाह संस्कार में होम आदि क्रियाएं जिस अग्नि में की जाती हैं, उसे आवसथ्य नामक अग्नि कहते हैं। इसी को विवाह अग्नि भी कहा जाता है। विवाह के बाद वर-वधू उस अग्नि को अपने घर में लाकर किसी पवित्र स्थान पर स्थापित करते हैं व प्रतिदिन अपने कुल की परंपरा के अनुसार सुबह-शाम हवन करते हैं। प्रतिदिन किए जाने वाले इस हवन को ब्राह्मणों के लिए आवश्यक बताया गया है। इसी अग्नि में सभी देवताओं के निमित्त आहुति दी जाती है।
महर्षि याज्ञवल्क्य ने लिखा है कि-

*कर्म स्मार्तं विवाहाग्नौ कुर्वीत प्रत्यहं गृही।*
याज्ञवल्क्य स्मृति, आचाराध्याय (२/१७)

१६. *अंत्येष्टि संस्कार* 📖
इसका अर्थ है अंतिम यज्ञ। आज भी शवयात्रा के आगे घर से अग्नि जलाकर ले जाई जाती है। इसी से चिता जलाई जाती है। आशय है विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी, उसी से उसके अंतिम यज्ञ की अग्नि जलाई जाती है। मृत्यु के साथ ही व्यक्ति स्वयं इस अंतिम यज्ञ में होम हो जाता है। हमारे यहां अंत्येष्टि को इसलिए संस्कार कहा गया है कि इसके माध्यम से मृत शरीर नष्ट होता है। अंत्येष्टि संस्कार को पितृमेध, अन्त्यकर्म व श्मशानकर्म आदि भी कहा जाता है।

*🌸 जय श्री कृष्ण 🌸*
 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

#सिद्ध_और_बुद्ध

सिद्ध और बुद्ध को अक्सर पर्यायवाची मान लिया जाता है जो कि तकनीकी रूप से सही नहीं है।

बुद्ध चेतना का परम विकास है। सिद्ध एक कदम पीछे है।

किंतु सिद्ध अधिक आदरणीय है क्योंकि वो जानबूझकर अपने को अटकाता है।
सिद्ध को बौद्ध परंपरा के वज्रयान तंत्र में बोधिसत्व और तिब्बत में तुलकू कहा जाता है।

वज्रयान तंत्र का जब पतन हुआ तो ८४ सिद्धों के साथ मीनपा अर्थात् मत्स्येंद्रनाथजी ने नाथपंथ का शंखनाद किया।

प्राचीन शैव शाक्त परंपरा के तंत्रमार्ग को बुद्ध के पुत्र राहुल ने बौद्ध मत में स्वीकार किया था और तिब्बत में इसकी प्रयोगशाला बनी जो कालांतर में वज्रयान बौद्ध तंत्र के रूप में प्रचलित हो गई।

वज्रयान बौद्ध तंत्र बहुत अच्छा चल रहा था पर इनसे वही गलती हो गई जो शैव शाक्त परंपरा से हुई थी।

वामदेव शिव से उपदिष्ट वाममार्गी तंत्रमार्ग का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन।

भगवान शिव ने वामतंत्र को प्रज्ञावान प्रशस्य योगी का पथ बताया है। इसलिए इसे जनसामान्य से दूर रखना उचित समझा गया।

एक पुरुष एक स्त्री के साथ संभोगरत होते हुए ऊर्जा को ऊर्ध्व कर सकता है। किंतु ये सब लोगों के साथ संभव नहीं है।

जब जब वामतंत्र को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया, करने वाले धरती से निर्ममता पूर्वक हटाए गए। पाशुपत परंपरा से ओशो तक प्रमाण हैं।

वज्रयान बौद्ध तंत्र भी इस मायाजाल में उलझ कर समाप्त हो गया।

मीनपा वज्रयान बौद्ध तंत्र में ८४ सिद्धों में एक हैं, और दत्तात्रेयनाथ रससिद्ध उन्मुक्त अवधूत उनके गुरु।
दत्तात्रेय भगवान के आदेश पर मीनपा ने वज्रयान त्यागकर नाथपंथ का आधार रखा और मत्स्येंद्रनाथ नाम से जाने गए।

यदि बौद्ध तंत्र के मीनपा और नाथपंथ के मत्स्येंद्रनाथ का जीवन पढ़ें तो अद्भुत साम्य मिलते हैं। इसके अलावा ८४ सिद्धों में अधिकतर वज्रयान में और नाथपंथ में कॉमन हैं।

नाथ संप्रदाय अपने पारंपरिक इतिहास में संभवतः इसका उल्लेख नहीं करता। और वे सही भी हैं क्योंकि प्राचीन शैव शाक्त परंपरा ही वज्रयान से होकर नाथ सिद्धों के रूप में प्रकट हुई है।

नाथ संप्रदाय के उदय के साथ ही बुद्ध शब्द धीरे धीरे चलन से बाहर हुआ क्योंकि इसी बीच आद्यशंकराचार्य आ चुके थे और बौद्ध धर्म को पराभूत कर चुके थे।

मुस्लिम आक्रमण आरंभ हो चुके थे। ब्राह्मण वर्ग अपने बौद्धिक अहं से ही स्वभक्षी हो गया था। इस समय एक ऐसा उन्मेष आवश्यक था जो जनसामान्य को आकर्षित करने के साथ स्वीकार भी करे।
हठयोग, तंत्र और रसायन विज्ञान पर जबरदस्त पकड़ के साथ महागुरु मत्स्येंद्रनाथजी ने अपने प्रिय शिष्य गोरक्षनाथजी को आदेश किया।

कुछ ही समय में नाथों के सिद्ध सब जगह छा गए और सब पर भारी पड़ गए।

सिद्ध एक ऐसा आश्वासन हो गया जिससे हर जाति का हिंदू जुड़कर अभय पा सकता था।

इनका योगदान अतुलनीय है। पर फिर मत्स्येंद्रनाथजी के ही एक अन्य शिष्य ज्वालेंद्रनाथ या जलंधरनाथ के अनुगमन में उसी प्रशस्य वामतंत्र का साधन आरंभ हो गया और शक्तिशाली अघोर पंथ सामने आ गया। वामतंत्र को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने के कारण फिर एक बार महाकाल का क्रोध जागा और नाथपंथ का ध्वंस हो गया।

पर फिर भी मध्ययुगीन संत आंदोलन को आरंभ देने का श्रेय नाथ सिद्धों को जाता है।

मध्ययुगीन संत परंपराओं में यदि कोई पूज्यनीय है तो नाथ संप्रदाय है। क्योंकि सामर्थ्यवान होते हुए भी सिद्धों ने अपने को सर्वोच्च घोषित कर सनातन की हानि नहीं की।

आज भी आप किसी कबीरपंथी, राधास्वामी वाले या अन्य से तुलना कीजिए, नाथ संप्रदाय का व्यक्ति सनातन धर्म से प्रेम से अधिक गहराई से जुड़ा हुआ मिलेगा।

ये सिद्ध परंपरा का लक्षण है। सनातन का सम्मान। व्यक्ति निष्ठा से परे शक्ति निष्ठा।


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

🙏 *"श्रीकृष्णम् शरणम् मम्:"*🙏
🌘श्राद्ध के बारेमें कुछ विशेष 🌒

🌸🍀🌸🍀🌸🍀🌸


श्राद्ध कर्म करते समय कुछ बातों का ध्यान रखें ।

☘★★ पितृ-पक्ष - श्राद्ध★★☘
• इस सृष्टि में हर चीज का अथवा प्राणी का जोड़ा है । जैसे - रात और दिन, अँधेरा और उजाला, सफ़ेद और काला, अमीर और गरीब अथवा नर और नारी इत्यादि बहुत गिनवाये जा सकते हैं । सभी चीजें अपने जोड़े से सार्थक है अथवा एक-दूसरे के पूरक है । दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं ।

इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है । दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है और अदृश्य जगत वो है जो हमें नहीं दिखता । ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं । पितृ-लोक भी अदृश्य-जगत का हिस्सा है और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है ।

☘•• धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है

☘•• पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।

☘•• श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।

☘•• श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं--

1-🔘 श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।

2- 🔘श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।

3- 🔘श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।

4-🔘 ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।

5-🔘 जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।

6-🔘 श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।

7- 🔘श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटरसरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।

8-🔘 दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।

9- 🔘चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।

10- 🔘जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।

11- 🔘श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।

12-🔘 शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।

13- 🔘श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।

14- 🔘रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।

15- 🔘श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोने, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।

16- 🔘★★★★तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।

17- 🔘रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।

18- 🔘चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।

19-🔘 भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ

20- 🔘श्राद्ध के प्रमुख अंग इस प्रकार :🔘

तर्पण-☘ इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।
भोजन व पिण्ड दान-- पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।

वस्त्रदान-☘ वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।
दक्षिणा दान-☘ यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।

21 - 🔘श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।

22-🔘 पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।

23-🔘 तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।

24- 🔘कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।

25-🔘 ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।

26-🔘 पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राध्दकर्म करें या सबसे छोटा ।

★★★★यहाँ एक बात का खास ध्यान रखें :-
🔹पिण्ड पूजा तुलसि पत्र से करने पर पितृ प्रसन्न होते हैं, लेकिन ब्राह्मणों को परोसे हुए भोजन पात्र में तुलसिपत्र निषिद्ध है |
अगर भोजन पात्र में तुलसि पत्र पडा हो तो *"निराशा: पितरो गता :"* पितृ निराश होकर बिना भोजन किये चले जाते हैं |
वो इस लिये कि पितृ ऐसा मानते हैं कि जिस पर तुलसि पत्र रखा वो भोजन देवताओं के लिए ही है, हमारे लिए नहीं है |
☘🌺🌺🌺🌻🌻 


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

बिहार के प्राचीन नाम
-अरुण कुमार उपाध्याय
१. पौराणिक इतिहास भूगोल-(१) कालमान (क) ज्योतिषीय काल-बिहार के प्राचीन नामों को जानने के लिये पुराणों का प्राचीन इतिहास भूगोल समझना पड़ेगा। अभी २ प्रकार से ब्रह्मा का तृतीय दिन चल रहा है। ज्योतिष में १००० युगों का एक कल्प है जो ब्रह्मा का एक दिन है। यहां युग का अर्थ है सूर्य से उसके १००० व्यास दूरी (सहस्राक्ष क्षेत्र) तक के ग्रहों (शनि) का चक्र, अर्थात् १ युग में इनकी पूर्ण परिक्रमायें होती हैं। आधुनिक ज्योतिष में भी पृथ्वी गति का सूक्ष्म विचलन जानने के लिये शनि तक के ही प्रभाव की गणना की जाती है। भागवत स्कन्ध ५ में नेपचून तक के ग्रहों का वर्णन है जिसे १०० कोटि योजन व्यास की चक्राकार पृथ्वी कहा गया है। इसका भीतरी ५० कोटि योजन का भाग लोक = प्रकाशित है, बाहरी अलोक भाग है। इसमें पृथ्वी के चारों तरफ ग्रह-गति से बनने वाले क्षेत्रों को द्वीप कहा गया है जिनके नाम वही हैं जो पृथ्वी के द्वीपों के हैं। पृथ्वीके द्वीप अनियमित आकार के हैं, सौर-पृथ्वी के द्वीप चक्राकार (वलयाकार) हैं। द्वीपों के बीच के भागों को समुद्र कहा गया है। पृथ्वी का गुरुत्व क्षेत्र जम्बूद्वीप, मंगल तक के ठोस ग्रहों का क्षेत्र दधि समुद्र आदि हैं। १००० युगों के समय में प्रकाश जितनी दूर तक जा सकता है वह तप लोक है तथा वह समय (८६४ कोटि वर्ष) ब्रह्मा का दिन रात है। इस दिन से अभी तीसरा दिन चल रहा है अर्थात् १७२८ कोटि वर्ष के २ दिन-रात बीत चुके हैं तथा तीसरे दिन के १४ मन्वन्तरों (मन्वन्तर = ब्रह्माण्ड या आकाश गंगा का अक्षभ्रमण काल) में ६ बीतचुके हैं, ७वें मन्वन्तर के ७१ युगों में २७ बीत चुके हैं तथा २८ वें युग के ४ खण्डों में ३ बीत चुके हैं-सत्य, त्रेता, द्वापर (ये ४३२,००० वर्ष के कलि के ४, ३, २ गुणा हैं)। चतुर्थ पाद युग कलि १७-२-३१०२ ई.पू. से चल रहा है।
(ख) ऐतिहासिक काल-ऐतिहासिक युग चक्र ध्रुवीय जल प्रलय के कारण होता है जो १९२३ के मिलांकोविच सिद्धान्त के अनुसार २१६०० वर्षों का चक्र है। यह २ गतियों का संयुक्त प्रभाव है-१ लाख वर्षों में पृथ्वी की मन्दोच्च गति तथा विपरीत दिशा में २६,००० वर्ष में अयन गति (पृथ्वी अक्ष की शंकु आकार में गति-ब्रह्माण्ड पुराण का ऐतिहासिक मन्वन्तर-स्वायम्भुव मनु से कलि आरम्भ तक )। भारत में मन्दोच्च गति के दीर्घकालिक अंश ३१२,००० वर्ष चक्र को लिया गया है। इसमें २४,००० वर्षों का चक्र होता है, जिसमें १२-१२ हजार वर्षों का अवसर्पिणी (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि क्रम में) तथा उत्सर्पिणी (विपरीत क्रम में युग खण्ड) भाग हैं। प्रति अवसर्पिणी त्रेता में जल प्रलय तथा उत्सर्पिणी त्रेता में हिम युग आता है। तृतीय ब्रह्माब्द का अवसर्पिणी वैवस्वत मनु काल से आरम्भ हुआ, जिसके बाद ४८०० वर्ष का सत्य युग, ३६०० वष का त्रेता तथा २४०० वर्ष का द्वापर १७-२-३१०२ ई.पू में समाप्त हुये। अर्थात् वैवस्वत मनु का काल १३९०२ ई.पू. था। अवसर्पिणी कलि १२०० वर्ष बाद १९०२ ई.पू. में समाप्त हुआ। उसके बाद उत्सर्पिणी का कलि ७०२ ई.पू. में, द्वापर १६९९ ई. में पूर्ण हुआ। अभी १९९९ ई. तक उत्सर्पिणी त्रेता की सन्धि थी अभी मुख्य त्रेता चलरहा है। त्रेता को यज्ञ अर्थात् वैज्ञानिक उत्पादन का युग कहा गया है। १७०० ई. से औद्योगिक क्रान्ति आरम्भ हुयी, अभी सूचना विज्ञान का युग चल रहा है। इसी त्रेता में हिमयुग आयेगा। विश्व का ताप बढ़ना तात्कालिक घटना है, दीर्घकालिक परिवर्तन ज्योतिषीय कारणों से ही होगा।

 


(२) आकाश के लोक-आकाश में सृष्टि के ५ पर्व हैं-१०० अरब ब्रह्माण्डों का स्वयम्भू मण्डल, १०० अरब तारों का हमारा ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल, चन्द्रमण्डल (चन्द्रकक्षा का गोल) तथा पृथ्वी। किन्तु लोक ७ हैं-भू (पृथ्वी), भुवः (नेपचून तक के ग्रह) स्वः (सौरमण्डल १५७ कोटि व्यास, अर्थात् पृथ्वी व्यास को ३० बार २ गुणा करने पर), महः (आकाशगंगा की सर्पिल भुजा में सूर्य के चतुर्दिक् भुजा की मोटाई के बराबर गोला जिसके १००० तारों को शेषनाग का १००० सिर कहते हैं), जनः (ब्रह्माण्ड), तपः लोक (दृश्य जगत्) तथा अनन्त सत्य लोक।
(३) पृथ्वी के तल और द्वीप-इसी के अनुरूप पृथ्वी पर भी ७ तल तथा ७ लोक हैं। उत्तरी गोलार्द्ध का नक्शा (नक्षत्र देख कर बनता है, अतः नक्शा) ४ भागों में बनता था। इसके ४ रंगों को मेरु के ४ पार्श्वों का रंग कहा गया है। ९०-९० अंश देशान्तर के विषुव वृत्त से ध्रुव तक के ४ खण्डों में मुख्य है भारत, पश्चिम में केतुमाल, पूर्व में भद्राश्व, तथा विपरीत दिशा में उत्तर कुरु। इनको पुराणों में भूपद्म के ४ पटल कहा गया है। ब्रह्मा के काल (२९१०२ ई.पू.) में इनके ४ नगर परस्पर ९० अंश देशान्तर दूरी पर थे-पूर्व भारत में इन्द्र की अमरावती, पश्चिम में यम की संयमनी (यमन, अम्मान, सना), पूर्व में वरुण की सुखा तथा विपरीत में चन्द्र की विभावरी। वैवस्वत मनु काल के सन्दर्भ नगर थे, शून्य अंश पर लंका (लंका नष्ट होने पर उसी देशान्तर रेखा पर उज्जैन), पश्चिम में रोमकपत्तन, पूर्व में यमकोटिपत्तन तथा विपरीत दिशा में सिद्धपुर। दक्षिणी गोलार्द्ध में भी इन खण्डों के ठीक दक्षिण ४ भाग थे। अतः पृथ्वी अष्ट-दल कमल थी, अर्थात् ८ समतल नक्शे में पूरी पृथ्वी का मानचित्र होता था। गोल पृथ्वी का समतल नक्शा बनाने पर ध्रुव दिशा में आकार बढ़ता जाता है और ठीक ध्रुव पर अनन्त हो जायेगा। उत्तरी ध्रुव जल भाग में है (आर्यभट आदि) अतः वहां कोई समस्या नहीं है। पर दक्षिणी ध्रुव में २ भूखण्ड हैं-जोड़ा होने के कारण इसे यमल या यम भूमि भी कहते हैं और यम को दक्षिण दिशा का स्वामी कहा गया है। इसका ८ भाग के नक्शे में अनन्त आकार हो जायेगा अतः इसे अनन्त द्वीप (अण्टार्कटिका) कहते थे। ८ नक्शों से बचे भाग के कारण यह शेष है।
भारत भाग में आकाश के ७ लोकों की तरह ७ लोक थे। बाकी ७ खण्ड ७ तल थे-अतल, सुतल, वितल, तलातल, महातल, पाताल, रसातल।
वास्तविक भूखण्डों के हिसाब से ७ द्वीप थे-जम्बू (एसिया), शक (अंग द्वीप, आस्ट्रेलिया), कुश (उत्तर अफ्रीका), शाल्मलि (विषुव के दक्षिण अफ्रीका), प्लक्ष (यूरोप), क्रौञ्च (उत्तर अमेरिका), पुष्कर (दक्षिण अमेरिका)। इनके विभाजक ७ समुद्र हैं।
(४) धाम-आकाश के ४ धाम हैं-अवम (नीचा) = क्रन्दसी-सौरमण्डल, मध्यम = रोदसी-ब्रह्माण्ड, उत्तम या परम (संयती)-स्वयम्भू मण्डल, परात्पर-सम्पूर्ण जगत् का अव्यक्त मूल। इनके जल हैं-मर, अप् या अम्भ, सलिल (सरिर), रस। इनके ४ समुद्र हैं-विवस्वान्, सरस्वान्, नभस्वान्, परात्पर। इनके आदित्य (आदि = मूल रूप) अभी अन्तरिक्ष (प्रायः खाली स्थान) में दीखते हैं-मित्र, वरुण, अर्यमा, परात्पर ब्रह्म। इसी के अनुरूप पृथ्वी के ४ समुद्र गौ के ४ स्तनों की तरह हैं जो विभिन्न उत्पाद देते हैं-स्थल मण्डल, जल मण्डल, जीव मण्डल, वायुमण्डल। इनको आजकल ग्रीक में लिथो, हाइड्रो, बायो और ऐटमो-स्फियर कहा जाता है। शंकराचार्य ने ४८३ ई.पू. में इसके अनुरूप ४ धाम बनाये थे-पुरी, शृङ्गेरी, द्वारका, बदरी। ७०० ई. में गोरखनाथ ने भी ४ तान्त्रिक धाम बनाये-कामाख्या, याजपुर (ओडिशा), पूर्णा (महाराष्ट्र), जालन्धर (पंजाब) जिसके निकट गुरुगोविन्द सिंह जी ने अमृतसर बनाया।
(५) भारत के लोक-भारत नक्शे के ७ लोक हैं-भू (विन्ध्य से दक्षिण), भुवः (विन्ध्य-हिमालय के बीच), स्वः (त्रिविष्टप = तिब्बत स्वर्ग का नाम, हिमालय), महः (चीन के लोगों का महान् = हान नाम था), जनः (मंगोलिया, अरबी में मुकुल = पितर), तपः (स्टेपीज, साइबेरिया), सत्य (ध्रुव वृत) इन्द्र के ३ लोक थे-भारत, चीन, रूस। आकाश में विष्णु के ३ पद हैं-१०० व्यास तक ताप क्षेत्र, १००० व्यास तक तेज और उसके बाद प्रकाश (जहां तक ब्रह्माण्ड से अधिक है) क्षेत्र। विष्णु का परमपद ब्रह्माण्ड है जो सूर्य किरणों की सीमा कही जाती है अर्थात् उतनी दूरी पर सूर्य विन्दुमात्र दीखेगा, उसके बाद ब्रह्माण्ड ही विन्दु जैसा दीखेगा। पृथ्वी पर सूर्य की गति विषुव से उत्तर कर्क रेखा तक है, यह उत्तर में प्रथम पद है। विषुव वृत्त तक इसके २ ही पद पूरे होते हैं, तीसरा ध्रुव-वृत्त अर्थात् बलि के सिर पर है।
२. भारत के नाम-(१) भारत-इन्द्र के ३ लोकों में भारत का प्रमुख अग्रि (अग्रणी) होने के कारण अग्नि कहा जाता था। इसी को लोकभाषा में अग्रसेन कहते हैं। प्रायः १० युग (३६०० वर्षों) तक इन्द्र का काल था जिसमें १४ प्रमुख इन्द्रों ने प्रायः १००-१०० वर्ष शासन किया। इसी प्रकार अग्रि = अग्नि भी कई थे। अन्न उत्पादन द्वारा भारत का अग्नि पूरे विश्व का भरण करता था, अतः इसे भरत कहते थे। देवयुग के बाद ३ भरत और थे-ऋषभ पुत्र भरत (प्रायः ९५०० ई.पू.), दुष्यन्त पुत्र भरत (७५०० ई.पू.) तथा राम के भाई भरत जिन्होंने १४ वर्ष (४४०८-४३९४ ई.पू.) शासन सम्भाला था।
(२) अजनाभ-विश्व सभ्यता के केन्द्र रूप में इसे अजनाभ वर्ष कहते थे। इसके शासक को जम्बूद्वीप के राजा अग्नीध्र (स्वयम्भू मनु पुत्र प्रियव्रत की सन्तान) का पुत्र नाभि कहा गया है।
(३) भौगोलिक खण्ड के रूप में इसे हिमवत वर्ष कहा गया है क्योंकि यह जम्बू द्वीप में हिमालय से दक्षिण समुद्र तक का भाग है। अलबरूनी ने इसे हिमयार देश कहा है (प्राचीन देशों के कैलेण्डर में उज्जैन के विक्रमादित्य को हिमयार का राजा कहा है जिसने मक्का मन्दिर की मरम्मत कराई थी)
(४) इन्दु-आकाश में सृष्टि विन्दु से हुयी, उसका पुरुष-प्रकृति रूप में २ विसर्ग हुआ-जिसका चिह्न २ विन्दु हैं। विसर्ग का व्यक्त रूप २ विन्दुओं के मिलन से बना ’ह’ है। इसी प्रकार भारत की आत्मा उत्तरी खण्ड हिमालय में है जिसका केन्द्र कैलास विन्दु है। यह ३ विटप (वृक्ष, जल ग्रहण क्षेत्र) का केन्द्र है-विष्णु विटप से सिन्धु, शिव विटप (शिव जटा) से गंगा) तथा ब्रह्म विटप से ब्रह्मपुत्र। इनको मिलाकर त्रिविष्टप = तिब्बत स्वर्ग का नाम है। इनका विसर्ग २ समुद्रों में होता है-सिन्धु का सिन्धु समुद्र (अरब सागर) तथा गंगा-ब्रह्मपुत्र का गंगा-सागर (बंगाल की खाड़ी) में होता है। हुएनसांग ने लिखा है कि ३ कारणों से भारत को इन्दु कहते हैं-(क) उत्तर से देखने पर अर्द्ध-चन्द्राकार हिमालय भारत की सीमा है, चन्द्र या उसका कटा भाग = इन्दु। (ख) हिमालय चन्द्र जैसा ठण्ढा है। (ग) जैसे चन्द्र पूरे विश्व को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार भारत पूरे विश्व को ज्ञान का प्रकाश देता है। ग्रीक लोग इन्दु का उच्चारण इण्डे करते थे जिससे इण्डिया शब्द बना है।
(५) हिन्दुस्थान-ज्ञान केन्द्र के रूप में इन्दु और हिन्दु दोनों शब्द हैं-हीनं दूषयति = हिन्दु। १८ ई. में उज्जैन के विक्रमादित्य के मरने के बाद उनका राज्य १८ खण्डों में भंट गया और चीन, तातार, तुर्क, खुरज (कुर्द) बाह्लीक (बल्ख) और रोमन आदि शक जातियां। उनको ७८ ई. में विक्रमादित्य के पौत्र शालिवाहन ने पराजित कर सिन्धु नदी को भारत की पश्चिमी सीमा निर्धारित की। उसके बाद सिन्धुस्थान या हिन्दुस्थान नाम अधिक प्रचलित हुआ। देवयुग में भी सिधु से पूर्व वियतनाम तक इन्द्र का भाग था, उनके सहयोगी थे-अफगानिस्तान-किर्गिज के मरुत्, इरान मे मित्र और अरब के वरुण तथा यमन के यम।
(६) कुमारिका-अरब से वियतनाम तक के भारत के ९ प्राकृतिक खण्ड थे, जिनमें केन्द्रीय खण्ड को कुमारिका कहते थे। दक्षिण समुद्र की तरफ से देखने पर यह अधोमुख त्रिकोण है जिसे शक्ति त्रिकोण कहते हैं। शक्ति (स्त्री) का मूल रूप कुमारी होने के कारण इसे कुमारिका खण्ड कहते हैं। इसके दक्षिण का महासागर भी कुमारिका खण्ड ही है जिसका उल्लेख तमिल महाकाव्य शिलप्पाधिकारम् में है। आज भी इसे हिन्द महासागर ही कहते हैं।
(७) लोकपाल संस्था-२९१०२ ई.पू. में ब्रह्मा ने ८ लोकपाल बनाये थे। यह उनके स्थान पुष्कर (उज्जैन से १२ अंश पश्चिम बुखारा) से ८ दिशाओं में थे। यहां से पूर्व उत्तर में (चीन, जापान) ऊपर से नीचे, दक्षिण पश्चिम (भारत) में बायें से दाहिने तथा पश्चिम में दाहिने से बांये लिखते थे जो आज भी चल रहा है। बाद के ब्रह्मा स्वायम्भुव मनु की राजधानी अयोध्या थी, और लोकपालों का निर्धारण भारत के केन्द्र से हुआ। पूर्व से दाहिनी तरफ बढ़ने पर ८ दिशाओं (कोण दिशा सहित) के लोकपाल हैं-इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, मरुत्, कुबेर, ईश। इनके नाम पर ही कोण दिशाओं के नाम हैं-अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान। अतः बिहार से वियतनाम और इण्डोनेसिया तक इन्द्र के वैदिक शब्द आज भी प्रचलित हैं। इनमें ओड़िशा में विष्णु और जगन्नाथ सम्बन्धी, काशी (भोजपुरी) में शिव, मिथिला में शक्ति, गया (मगध) में विष्णु के शब्द हैं। शिव-शक्ति (हर) तथा विष्णु (हरि) क्षेत्र तथा इनकी भाषाओं की सीमा आज भी हरिहर-क्षेत्र है। इन्द्र को अच्युत-च्युत कहते थे, अतः आज भी असम में राजा को चुतिया (च्युत) कहते हैं। इनका नाग क्षेत्र चुतिया-नागपुर था जो अंग्रेजी माध्यम से चुटिया तथा छोटा-नागपुर हो गया। ऐरावत और ईशान सम्बन्धी शब्द असम से थाइलैण्ड तक, अग्नि सम्बन्धी शब्द वियतनाम. इण्डोनेसिया में हैं। दक्षिण भारत में भी भाषा क्षेत्रों की सीमा कर्णाटक का हरिहर क्षेत्र है। उत्तर में गणेश की मराठी, उत्तर पूर्व के वराह क्षेत्र में तेलुगु, पूर्व में कार्त्तिकेय की सुब्रह्मण्य लिपि तमिल, कर्णाटक में शारदा की कन्नड़, तथा पश्चिम में हरिहर-पुत्र की मलयालम।

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शेष अगली बार


भारत में परम्परा विज्ञान (Indian Tradition Science)

देवता सोम पान करते थे

 

देवता सोम पान करते थे

सोम पान करना देवताओं का विशेष आनन्द का विषय रहा था। यज्ञ मे सोम की आहुति दी जाती है देवताओं को सोम पान करने के लिये विशेष निमन्त्रण दिया जाता है। ऋग्वेद में कई मन्त्र हैं जो सोम की प्रशंसा में लिखे हैं, तथा सोम को मनुष्य के लिये अमृत भी कहा है। यज्ञ के समय यज्ञवेदी के चारों ओर सोम से भरे हुये कलश भी रखे जाते थे, आदि आदि कई सोम सम्बन्धी विशेषताएँ हैं, इसीलिये सोम देवताओं को प्रिय है सोमपान करके ही देवताओं ने अमृत्व प्राप्त किया था।  वर्तमान में जितने भी सड़क छाप निम्नस्तरीय मूर्ख नशेड़ी हैं, उन्हें जब मदिरा पीने हेतु मना किया जाता है, अथवा हिन्दू विरोधी मानसिकता वाले म्लेच्छ हैं वे इस विषय पर तुरन्त कह उठते हैं  कि देवता भी सोम पान करते थे। अब देवता सोम पान कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं? अथवा देवताओं में भी मदिरा पान का प्रचलन था। फिर प्रारम्भ होता है कुतर्क व देवताओं के अपमान का एक निम्नस्तरीय विसंवाद तथा इसका परिणाम होता है जो हमारा विद्वान् इन तथ्यों को समझाना चाहता है वह विफल हो जाता है अथवा वेा भी निर्दोष इन मदिरापेयी व्यसनियों हिन्दू विरोधी म्लेच्छों से अपमानित होकर चुप बैठ जाता है। तो क्या ये सोम मदिरा नहीं है? उत्तर है सोम मदिरा नहीं है।तो फिर सोम क्या है? और सोम देवताओं को क्यों पसन्द है ? इन्द्र को सोमपा क्यों कहा जाता है ? आदि कई प्रश्न व संदेह हमारे मन में उत्पन्न होने लगते हैं। इन सभी का बहुत ही साधारण सा उत्तर है कि सोम एक औषधी है न कि मदिरा।मदिरा को अन्न का मल कहा है इसीलिये उसे ग्रहण नहीं करना चाहिये ये सभी स्मृतियो व पुराणों तथा सभी धार्मिक पुस्तकों में बारम्बार लिखा गया है।

जबकि सोम एक वनस्पति के पंचांग का रस है। हमारी कई प्रकार की वनस्पतियाँ लुप्त हो चुकी हैं। जैसे पशु—पक्षियों की कई प्रकार की जातियाँ लुप्त हो गई हैं वैसे ही प्राचीन युग में जिन वनस्पतियों, तृण (घास—फूस) का वर्णन करते हैं वर्तमान में वे उपलब्ध नहीं हेाती।

वैदिक काल में एक वनस्पति प्राप्त होती थी, जिसे सोम वल्लरी कहा जाता था। इस सोम वल्लरी का पंचांग, ( पत्र, पुष्प, तना, फल, और मूल यानि जड़) को समान मात्रा में पीस कर उसका रस निकाला जाता था। इस प्रकार सोम का रस निकालने के विशेष प्रकार के पत्थर के बने हुये पात्र होते थे। जिनमें इन पंचांगों को डालकर कूटा जाता था और उनमें इस प्रकार की व्यवस्था होती थी कि पर्याप्त मात्रा कूटने के उपरान्त उसमें से गाढ़ा द्रव रूप में सोम उस पाषाण पात्र के नीचे बने  एक निकास मार्ग से बाहर निकलता था और उसे विशेष कर स्वर्ण पात्रों में एकत्रित किया जाता था। ये अत्यन्त सान्र्  रस होता था। जिसे यज्ञ के अवसर पर यज्ञवेदी के चारों कोणों पर चार कलशों में भरकर रखा जाता था। और इन्द्र का आह्वान किया जाता था कि वे यज्ञ में पधार कर इस सोम का पान करें तथा यजमान व ऋत्विजों को आशीर्वाद प्रदान करें।

सोम का आयुर्वेदिक प्रयोगसोम का आयुर्वेदिक प्रयोग अत्यधिक सावधानी पूर्वक राजाओं द्वारा किया जाता था। सोम एक आयुर्वेदिक औषधि है। इसीलिये इसका प्रयोग राजा लोग ही करते थे। जब राजा अपने राज्य को स्थिरता प्रधान कर देते थे, अथवा जब राजकुमार तथा अन्य बालक अपने ब्रह्मचर्य और विद्याप्राप्ति का समय पूर्ण करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। तब उनका शरीर अत्यन्त कृश होता था क्योंकि लगातार तपस्या से शरीर सूख जाता था। ऐसे में उन्हें गृहस्थाश्रम

के दायित्वों के निर्वाह हेतु एक आयुर्वेदिक प्रयोग किया जाता था। बहुधा ये प्रयोग गुरूकुलों में ही किया जाता था। इसके अन्तर्गत विभिन्न यज्ञों के द्वारा प्रथम अपनी आध्यात्मिक योग्यता को प्राप्त करते थे। फिर अपने गुरूजनों के निर्देशन में वे पूर्वोलिखित सोम वनस्पति के पंचांग द्रव को तनु मात्रा ( गाढ़े रस मे दूध अथवा जल अथवा विभिन्न फलों के रस प्रत्येक ब्रह्मचारी के शरीर की प्रकृति के अनुसार) में ग्रहण करते थे। ऐसा वे लगातार पन्द्रह दिवस तक किया करते थे, ऐसा करने से उनका शरीर पूरी तरह ही सूख जाता था, शरीर के सारे बाल झड़ जाते थे यहाँ तक कि नाखून भी उखड़ जाते थे। बहुधा ये प्रयोग पूर्णिमा से प्रारम्भ होता था। अमावस्या तक अत्यन्त कृशता को प्राप्त हो जाते थे। अमावस्या के दिवस से दूसरा प्रयोग प्रारम्भ होता था, यद्यपि औषधि रूप में इसे ही प्रयोग में  लिया जाता था, किन्तु अब उनकी देह का पेाषण प्रारम्भ होता था। तथा शरीर में सौन्दर्य,बलव निखार आने लगता था। केश, नाखुन, त्वचा सभी का पोषण व नवसृजन होता है।

जैसा कि स्मृतियों में आदेश है कि ब्रह्मचारी के लिये आवश्यक है कि वह शरीर पर तेल मर्दन, सौन्दर्य प्रसाधन आदि पर ध्यान नहीं देना चाहिये। मात्र शुद्ध जल से दिन में दो बार स्नान करना, व्यायाम करना निश्चित मात्रा में भोजन करना आदि। ऐसे में ब्रह्मचारियों का शरीर गृहस्थाश्रम के अनुकूल नहीं हेाता था। किन्तु सोम औषधि के द्वितीय प्रयोग से जो कि शुक्ल

पक्ष में प्रारम्भ होता है तब उसके देह की पूरी शुद्धि हो चुकी होती है। और ब्रह्मचारियों के अंग अत्यन्त कोमल और सभी प्रकार के सम्भावित रोगों से सुरक्षित तथा  भावी पीढ़ि के लिये भी उपयोगी रहती है। इस औषधि के प्रयोग का मुख्य उद्देश्य ही ये है कि हमारी आने वाली पीढ़ि पुष्ट ओरस्वस्थ हो।

सोमरस के सेवन के दौरान उपयोग कर्त्ता को किंचित् नशे का अनुभव होता है। इसलिये कुछ मूर्खों को ये भान होने लगता है कि इसमें नशा है। खैर वस्तुत: इसका प्रयोग शारीरिक बल व सौन्दर्य प्राप्ति हेतु होता है। इस औषधि का एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव हमारे मन व मस्तिष्क पर पड़ता है जो कि गृहस्थ धर्म निभाने वाले को दायित्व का बोध कराने तथा दायित्व वहन करने में सहायक सिद्ध होता है।

ये सोम आखिर है क्या तथा इस सोमवल्लरी की क्या विशेषता है? सोमवल्लरी का सम्बन्ध चन्द्रमा से है जैसे कमल के पुष्प की कुछ जाति विशेष रात्रि में चन्द्रोदय के समय खिलती हैं उन्हें कुमुदनी कहा गया है। अत: ये सोमवल्लरी चन्द्रमा से पोषित होती है तथा इसमें 15 पत्तियों का समूह होता है जो कि पूर्णिमा के द्वितीय दिवस यानि कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से एक—एक पत्ती कम होने लगती है इस प्रकार अमावस्या को पूर्णत: सभी पत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। तथा अमावस्या के द्वितीय दिवस अर्थात्शु क्ल पक्ष की प्रतिपदा से  उसमें एक—एक पत्ती पुन: उगने लगती है और पूर्णिमा को पुन: पूरी पत्तियाँ हो जाती हैं। इसी के अनुरूप उपचार में इसके पंचांग रस का प्रयोेग किया  जाता है। सोम का वेदाधारित वैज्ञानिक विवेचन पुराणों में इन्द्र को सोम का लोभी तथा सोम को चुराने वाला आदि कहा गया है। तो वैदिक विज्ञान के अनुसार सोम तत्त्व क्या है? यह जानना आवश्यक है।वस्तुत: हमारे भोज्य पदार्थों में सभी पदार्थ प्रकृति प्रदत्त होते हैं। और प्रकृति में जो कृषि द्वारा उपज होती है उसी से हम अपने लिये भोजनपकाते हैं। यह सर्वविदित है कि सूर्य के द्वारा ही हमारी उपज पकती हैं प्रत्येक अन्न की बालियों को पकने में सूर्य की महत्ती भूमिका होती है, किन्तु इन सभी प्रकार कृषि में रस अथवा जिसे  स्वाद स्वाद कहा जाय वहचन्द्रमा की चाँदनी के कारण उत्पन्न होता है। यही कारण है कि चन्द्रमा को औषधियों को राजा कहा गया है, चन्द्रमा की चाँदनी अमृत वर्षण करती है ये लोक कहावत भी इसी कारण प्रचलित हुई है। ये चन्द्रमा न केवल औषधियों में अन्न में अपितु फलों और सभी प्रकार की वनस्पति में रस को उत्पन्न करता है। और शुक्ल पक्ष की अष्टमी से कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तक रस सर्वाधिक होता है। इसीलिये पुराने लोग इन तिथियों पर पेड नहीं काटते थे क्योंकि इन दिनों काटे गये पेड़ में रस की मात्रा अधिक होने से दीमक व गुन अत्यन्त शीघ्र लग जाता है।

 हमारे द्वार बनाये गये भोजन में ये चन्द्रप्रदत्त सोमतत्त्व ही स्वाद का कारण बनता है। जब ये भोजन खुला पड़ा रहता है, अथवा भोजन बनाये जाने के बाद छ: घण्टे या उससे अधिक समय तक पड़ा रहता है तो शनै: शनै: उसमें से ये स्वाद रूप सोम तत्त्व समाप्त होकर पुन: प्रकृति में मिल जाता है। प्रकृति में होने वाली इस प्रक्रिया को ही इन्द्र द्वारा सोम हरण के रूप में कही गर्इ् है। प्रकृति, प्रत्येक पदार्थ के स्वरूप को बदलने की  क्षमता रखती है।  हम देखते हैं नित्य परिवर्तन हो रहा है प्रत्येक वस्तु उत्पन्न होने के साथ क्षय की ओर बढ़ने लगती है। ऐसे में बने  हुये भोजन को यदि ग्रहण नहीं किया जाय तो उसमें स्वयं ही नष्ट होने की प्रक्रिया प्रारम्भ हेा जाती है। उसमें सर्वप्रथम स्वाद में न्यूनता आने प्रारम्भ हो जाती है। वह स्वाद ही सोम है और जो शक्ति उस स्वाद को समाप्त कर देती है, वही इन्द्र है। इसीलिये वैदिक इन्द्र के पौराणिक स्वरूप को समझाने के दृष्टि से उसे सोमपा व सोम का हरण करने वाला कहा है।

 ये है सोम का स्वरूप जिन लोगों को स्वयं नशा करने के लिये मदिरा पान करना था, उन्होंने ये मिथ्या प्रचार किया है कि देवता भी सोमरस पीते थे यदि हमने मदिरा पी ली तो क्या अन्तर पड़ता है। अब उन कुतर्कियों से पूछो कि देवताओं ने असुरों से युद्ध किया सारे स्थान पर धर्म की स्थापना की उन्होंने नित्य भगवदोपासना की वो तुमने कुछ किया नहीं अब बचा मदिरापान करने का ठेका वो तुम ले आये । द्वितीय जो हिन्दू धर्म के विरोध मे कुत्तेां की तरह भौंकने वाले हैं उन्हें ही ऐसे विषय मिलते हैं और उनके लिये मेरा ये आलेख एक थप्पड़ है किे वे विश्व के सर्वश्रेष्ठ महान् धर्म के बारे में अनर्गल प्रलाप बन्द कर दें।

 


श्री हरि ज्योतिष केन्द्र
कैथल
पंडित सतबीर वत्स
 


इस का हिंदी में रूपांतर जबकि है ज्योतिष विद्या संबंधी नहीं है परंतु इस पोस्ट से हमें अपनी संस्कृति और जो हमारे वेदों की ही भाषा है संस्कृत उसकी हम भारतीय लोग तो इतनी कदर नहीं करते परंतु बाहर के लोग कितनी कदर करते हैं जब ग्रामोफोन शुरू हुआ तब जो पहला शब्द रिकॉर्ड किया गया था वह हमारी संस्कृत भाषा में ही किया गया था तो उस विषय पर यह पोस्ट है
 
'उनके मास्टर्स वॉयस' (एचएमवी) ने एक बार ग्रामोफोन रिकार्ड का इतिहास देने वाला एक पुस्तिका प्रकाशित की थी।
 
1 9वीं सदी में थॉमस अल्वा एडीसन द्वारा ग्रामोफोन का आविष्कार किया गया था।
 
एडिसन, जिसने कई अन्य गैजेट्स जैसे विद्युत प्रकाश और मोशन पिक्चर कैमरा का आविष्कार किया था, अपने समय में भी एक किंवदंती बन गए थे।
 
जब उन्होंने ग्रामोफोन रिकॉर्ड का आविष्कार किया, जो भावी पीढ़ी के लिए मानव आवाज रिकॉर्ड कर सकता है, वह अपने पहले टुकड़े पर एक प्रख्यात विद्वान की आवाज रिकॉर्ड करना चाहता था।
 
इसके लिए उन्होंने इंग्लैंड के प्रोफेसर मैक्स मुलर को चुना (एक जर्मन जातीयता), 1 9वीं सदी के एक और महान व्यक्तित्व।
 
उन्होंने मैक्स मल्लर को लिखा,
 
"मैं आपको मिलना चाहता हूं और तुम्हारी आवाज़ रिकॉर्ड करना चाहता हूं। मुझे कब आना चाहिए?"
 
एडिसन के लिए महान सम्मान वाले मैक्स मुलर ने उन्हें उपयुक्त समय पर आने के लिए कहा जब यूरोप के अधिकांश विद्वान इंग्लैंड में इकट्ठा होंगे।
 
 तदनुसार, एडीसन ने एक जहाज ले लिया और इंग्लैंड गए वह दर्शकों के लिए पेश किया गया था। सभी ने एडीसन की उपस्थिति को खुश किया
 
एडिसन के अनुरोध पर बाद में, मैक्स मुलर मंच पर आया और साधन के सामने बात की।
 
तब एडीसन अपनी प्रयोगशाला में वापस चला गया और दोपहर तक एक डिस्क के साथ वापस आया और ग्रामोफोन पर इसे खेला।
 
दर्शक मैक्स मुलर की वादन से आवाज सुनने के लिए रोमांचित थे।
 
वे खुश थे कि मैक्स मुलर जैसे महान व्यक्तियों की आवाज भावी पीढ़ी के लाभ के लिए संग्रहित की जा सकती है।
 
थॉमस एडीसन को प्रशंसा और बधाई के कई दौरों के बाद, मैक्स मुलर मंच पर आया और विद्वानों को संबोधित किया और उनसे पूछा,
 
"आपने सुबह मेरी मूल आवाज सुनाई है। फिर आप दोपहर में इस उपकरण से एक ही आवाज़ आ रहे हैं। क्या आप समझते हैं कि सुबह क्या कहा था या दोपहर में आपने क्या सुना?
 
दर्शकों को चुप हो गया क्योंकि वे उस भाषा को समझ नहीं सका, जिसमें मैक्स मुलर ने बात की थी।
 
वे 'ग्रीक और लैटिन' थे, जैसा कि वे कहते हैं।
 
लेकिन यह ग्रीक या लैटिन था, वे निश्चित रूप से समझ गए होंगे क्योंकि वे यूरोप के विभिन्न भागों से थे।
 
यह ऐसी भाषा थी जिसमें यूरोपीय विद्वानों ने कभी नहीं सुना था।
 
मैक्स मुलर ने बताया कि उसने क्या बात की थी।
 
उन्होंने कहा कि जो भाषा उन्होंने बोलती थी वह संस्कृत थी और यह ऋग्वेद का पहला स्लोक था, जो "अग्नि मीले पुरोहितम"
 
ग्रामोफोन प्लेट पर यह पहला रिकॉर्ड किया गया सार्वजनिक संस्करण था
 
अग्निमीले पुरोहित का यज्ञ्शी देवं रत्वीजम
तीव्र रत्नधाताम ..
(ऋग वेद 1.001.01)
 
मैक्स मुलर ने यह क्यों चुना?
 
दर्शकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा,
 
"वेद ही मानव जाति का सबसे पुराना पाठ है और "अग्नि मीले पुरोहितम्" ऋग वेद की पहली कविता है
 
सबसे प्रारंभिक समय में, जब लोग नहीं जानते कि कैसे अपने शरीर को कवर करने और शिकार और गुफाओं में रहते हैं, भारतीयों ने उच्च सभ्यता प्राप्त की थी और उन्होंने वेदों के रूप में विश्व को सार्वभौमिक दर्शन दिए। "
 
जब "अग्नि मीले पुरोहिताम" को दोबारा दिखाया गया, तो पूरे दर्शकों ने सम्मान के निशान के रूप में चुप्पी में खड़ा किया।
 
कविता का अर्थ है:
 
"ओ अग्नि, आप जो अंधेरे में चमचमाते हैं, आप के लिए हम दिन-ब-दिन आते हैं, भक्ति और असीम श्रद्धा के साथ। तो हमारे लिए आसान पहुँच हो, अग्नि, अपने बेटे के पिता के रूप में, हमारे साथ हमारे साथ रहें। "
 
एक गौरवशाली प्राचीन सभ्यता का हिस्सा बनने के लिए गर्व है हमें ।


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