ऐतिहासिक कहानी (Historical Story)



ऐतिहासिक कहानी (Historical Story)

Facts That Prove Ancient Indian Science Was Incredibly Advanced

By Shantanu Prasher The credit for almost all the great inventions and discoveries so far has always rested with the Western world.  We have read about them in

schoolbooks, heard about them on television or in movies and talked about it tirelessly. Sadly,

it’s the knowledge and teaching of our ancient science that has taken a beating. Just because

their achievements were well-documented, it doesn’t mean that they were the first ones to do

that. Here are 10 facts, as found in our written and oral literature, about the supremely

advanced ancient Indian science that you were never taught in school.

1) Sushruta Samhita, The

Oldest Medical And Surgical Encyclopedia Known To Mankind

Written during  the 6th century BC, the Sushruta Samhita contains 184 chapters with

descriptions of 1,120 illnesses, 700 medicinal plants, 64 preparations from mineral sources and

57 preparations based on animal sources. Its author Sushruta is also considered to be the first

ever human to perform medical surgeries on humans. The book also has vast details on

embryology, human anatomy, along with instructions for venesection, the positioning of the

patient for each vein, and the protection of vital structures (marma). The oldest documented

evidence (9000 years) for the drilling of human teeth of a living person was found in Mehrgarh

along with the evidences of orthopedic surgeries. 

2) The First Ones To Acknowledge The

Existence Of The Solar System 

While history credits Copernicus for proposing the heliocentric

model of our solar system, it was the Rig Veda that first noted the central placement of the

sun and other planets orbiting it in the solar system.

Rig Veda 1.164.13

“Sun moves in its orbit

which itself is moving. Earth and other bodies move around sun due to force of attraction,

because sun is heavier than them.”

Rig Veda 1.35.9

“Thesun moves in its own orbit but holding earth and other heavenly bodies in a manner that they do

not collide with each other through force of attraction.”

3) Mahabharata Mentions The Concept Of

Cloning, Test Tube Babies, And Surrogate Mothers Thefact that in the Mahabharata, Gandhari had 100 sons is pretty well known. But what’s unknown is

the scientific explanation behind her giving birth to a 100 kids. Each ‘Kaurava’ was created by  splitting the single embryo into 100 parts and growing each part in a separate kund

(container). This is identical to the cloning process today. The birth of Karan, who was ‘born from the “characteristics adopted from men of her choice” also has striking resemblance to the

present-day test tube baby concept. 

4) ‘Hanuman Chalisa’ Precisely Calculates The  Distance Between Earth And Sun

“Yug sahasra yojana par bhanu,leelyo taahi madhura phal jaanu” The above excerpt is from the Hanuman Chalisa and translates to: ‘[When] Hanuman travelled thousands of kilometers to swallow it thinking of it as a fruit’. The word-to-word translation of the same excerpt reveals the distance that Hanuman

travelled.

1 Yuga = 12000 years. 1 Sahsra Yuga = 12000000 years. Also, 1 Yojan = 8 miles.

Hence, “Yug Sahsra Yojana”, the first 3 words mean 12000*12000000*8 = 96000000 miles or

153,600,000 kilometers. Interestingly, the actual distance from earth to sun is 152,000,000

kms. Bafflingly, there’s error of just around 1%.

5) Indian Vedas Figured Out Gravity Before Yet again, way before Isaac Newton explained gravity, ancient Indian scholars had already figured out how it worked.

Rig Veda 10.22.14

“This earth is devoid of hands and legs, yet it moves ahead. All the objects over the earth also move with it. It moves around the sun.”

6) We Already Knew About The SpeedOf Light

 

Sayana, a vedic scholar from the 14th century once said, "With deep respect, I bow to the sun, who travels 2,202 yojanas in half a nimesha." A yojana is 9 miles; a nimesha is 16/75 of a second. Therefore,

2,202 yojanas x 9 miles x 75/8 nimeshas = 185,794 miles per second or 2,99,000 kilometers per

second. That’s astonishingly close to the real ‘scientifically-proven’ 3,00,000 kilometers per

second figure. It’s often believed that his source was none other than the Vedas.

7) Vedas Explained The Science Behind The Rather ‘Feared’ Eclipses While the world feared the eclipses and associated all types of paranormal occurrences with the phenomenon, Vedas already had a very proper and

scientific explanation. The below excerpt is also proof that they knew that the moon wasn’t self illuminated.  

Rig Veda 5.40.5

“O Sun! When you are blocked by the one whom you gifted your

own light (moon), then earth gets scared by sudden darkness.”

8) They Knew The Exact Length Of A Year

Ancient Indians used 4 ways to measure the length of a year namely ‘Nakshatra’, ‘Savana’, ‘Lunar’ and ‘Saura’. Saura was one method based on the tropical zodiac that defines the seasons: equinoxes, solstices, year-halves, and months

in relation to the (six) seasons. As unbelievable as it sounds, Saura estimates the length of a

year to be exactly 365 days, 6 hours 12 mins and 30 seconds.

9) Aryabhatta’s Deduction Of The Value Of PiIncredibly Advanced Ancient Indian Science

According to documented history, the irrationality of pi was proved in Europe only in 1761 by Lambert. The great Indian mathematician Aryabhata worked on the approximation of the value of pi ( ), and concluded that  is irrational and its value is approximately 3.1416. He did this in 499 Common Era at the age of 23.

10) First Ones To Measure The Circumference Of Earth Sadly, the Greeks enjoy the credit for this discovery while it was actually Aryabhata, who deduced a formulation proving that the Earth is rotating on an axis.

Then, by estimating the value of pi to be 3.1416, he concluded that the circumference of Earth was approximately 39736 kilometers. The actual circumference of Earth, as deduced by scientists today, is 40,075 kilometers.


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मांस का मूल्य

मगध सम्राट बिंन्दुसार ने एक बार अपनी सभा मे पूछा :

देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए *सबसे सस्ती वस्तु क्या है ?*
मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये ! चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो, ऎसी हालत में अन्न तो सस्ता हो ही नहीं सकता !

तब शिकार का शौक पालने वाले एक सामंत ने कहा :
राजन, *सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है,*

इसे पाने मे मेहनत कम लगती है और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है । सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन प्रधान मंत्री चाणक्य चुप थे ।
तब सम्राट ने उनसे पूछा : आपका इस बारे में क्या मत है ?

चाणक्य ने कहा : मैं अपने विचार कल आपके समक्ष रखूंगा !

रात होने पर प्रधानमंत्री उस सामंत के महल पहुंचे, सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर घबरा गया ।

प्रधानमंत्री ने कहा : शाम को महाराज एकाएक बीमार हो गये हैं, राजवैद्य ने कहा है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाए तो राजा के प्राण बच सकते हैं,

इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय 💓 का सिर्फ दो तोला मांस लेने आया हूं । इसके लिए आप एक लाख स्वर्ण मुद्रायें ले लें ।

यह सुनते ही सामंत के चेहरे का रंग उड़ गया, उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी मांगी और *उल्टे एक लाख स्वर्ण मुद्रायें देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें ।

प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामंतों, सेनाधिकारियों के यहां पहुंचे और *सभी से उनके हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ, उल्टे सभी ने अपने बचाव के लिये प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख, पांच लाख तक स्वर्ण मुद्रायें दीं ।

इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले वापस अपने महल पहुंचे और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें रख दीं ।

सम्राट ने पूछा : यह सब क्या है ? तब प्रधानमंत्री ने बताया कि दो तोला मांस खरिदने के लिए *इतनी धनराशि इकट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला

राजन ! अब आप स्वयं विचार करें कि मांस कितना सस्ता है ?

जीवन अमूल्य है, हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी जीवों को भी अपनी जान उतनी ही प्यारी है । किंतु अंतर बस इतना है कि मनुष्य अपने प्राण बचाने हेतु हर सम्भव प्रयास कर सकता है । बोलकर, रिझाकर, डराकर, रिश्वत देकर आदि आदि ।

पशु न तो बोल सकते हैं, न ही अपनी व्यथा बता सकते हैं । तो क्या बस इसी कारण उनस जीने का अधिकार छीन लिया जाय ।

हिन्दू धर्म के अनुसार हर किसी को स्वेच्छा से जीने का अधिकार है, प्राणी मात्र की रक्षा हमारा धर्म है..!

*शुद्ध आहार, शाकाहार !*
*मानव आहार, शाकाहार !*

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सुदामा को गरीबी क्यों मिली?

।।श्री कृष्णाय गोविन्दाय नमो नम:।।
सुदामा को गरीबी क्यों मिली?- अगर अध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो सुदामा जी बहुत धनवान थे। जितना धन उनके पास था किसी के पास नही था । लेकिन अगर भौतिक दृष्टि से देखा जाये तो सुदामाजी बहुत निर्धन थे ।
क ब्राह्मणी थी जो बहुत गरीब निर्धन थी। भिच्छा माँग कर जीवन यापन करती थी। एक समय ऐसा आया कि पाँच दिन तक उसे भिच्छा नही मिली वह प्रति दिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी। छठवें दिन उसे भिच्छा में दो मुट्ठी चना मिले । कुटिया पे पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी। ब्राह्मणी ने सोंचा अब ये चने रात मे नही खाऊँगी प्रात:काल वासुदेव को भोग लगाकर तब खाऊँगी । यह सोंचकर ब्राह्मणी चनों को कपडे में बाँधकर रख दिय। और वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गयी ।

देखिये समय का खेल:
कहते हैं –
पुरुष बली नही होत है
समय होत बलवान
ब्राह्मणी के सोने के बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया मे आ गये।
इधर उधर बहुत ढूँढा चोरों को वह चनों की बँधी पुटकी मिल गयी चोरों ने समझा इसमे सोने के सिक्के हैं इतने मे ब्राह्मणी जग गयी और शोर मचाने लगी । गाँव के सारे लोग चोरों को पकडने के लिए दौडे। चोर वह पुटकी लेकर भगे। पकडे जाने के डर से सारे चोर संदीपन मुनि के आश्रम में छिप गये। (संदीपन मुनि का आश्रम गाँव के निकट था जहाँ भगवान श्री कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे)


गुरुमाता को लगा की कोई आश्रम के अन्दर आया है गुरुमाता देखने के लिए आगे बढीं चोर समझ गये कोई आ रहा है चोर डर गये और आश्रम से भगे ! भगते समय चोरों से वह पुटकी वहीं छूट गयी।और सारे चोर भग गये ।
इधर भूख से व्याकुल ब्राह्मणी ने जब जाना ! कि उसकी चने की पुटकी चोर उठा ले गये । तो ब्राह्मणी ने श्राप दे दिया की ” मुझ दीनहीन असह।य के जो भी चने खायेगा वह दरिद्र हो जायेगा ” ।
उधर प्रात:काल गुरु माता आश्रम मे झाडू लगाने लगी झाडू लगाते समय गुरु माता को वही चने की पुटकी मिली गुरु माता ने पुटकी खोल के देखी तो उसमे चने थे। सुदामा जी और कृष्ण भगवान जंगल से लकडी लाने जा रहे थे। (रोज की तरह )
गुरु माता ने वह चने की पुटकी सुदामा जी को दे दी। और कहा बेटा ! जब वन मे भूख लगे तो दोनो लोग यह चने खा लेना । सुदामा जी जन्मजात ब्रह्मज्ञानी थे। ज्यों ही चने की पुटकी सुदामा जी ने हाथ मे लिया त्यों ही उन्हे सारा रहस्य मालुम हो गया।
सुदामा जी ने सोंचा ! गुरु माता ने कहा है यह चने दोनो लोग बराबर बाँट के खाना। लेकिन ये चने अगर मैने त्रिभुवनपति श्री कृष्ण को खिला दिये तो सारी सृष्टि दरिद्र हो जायेगी। नही-नही मै ऐसा नही करुँगा मेरे जीवित रहते मेरे प्रभु दरिद्र हो जायें मै ऐसा कदापि नही करुँगा । मै ये चने स्वयं खा जाऊँगा लेकिन कृष्ण को नही खाने दूँगा।
और सुदामा जी ने सारे चने खुद खा लिए। दरिद्रता का श्राप सुदामा जी ने स्वयं ले लिया। चने खाकर । लेकिन अपने मित्र श्री कृष्ण को एक भी दाना चना नही दिया।


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स्थान -श्रीनगर (कशमीर)
समय - 1965 का युद्ध


शत्रू तेज गति से आगे बढ रहे थे कशमीर को शीघ्र सैन्य मदद चाहिए थी।

दिल्ली के सेना कार्यालय से श्रीनगर को संदेश प्राप्त हुआ कि किसी भी परिस्थिति में श्रीनगर के हवाई अड्डे पर शत्रु का कब्जा नहीं होना चाहिए।शत्रु नगर को जीत ले ,तो भी चलेगा,किन्तु हवाई अड्डा बचना चाहिए। हम हवाई जहाज से सेना के दस्ते भेज रहे है।
''हवाई अड्डे पर सर्वत्र हिम के ढेर लगे हैं।हवाई जहाज उतारना अत्यंत कठिन है।" श्रीनगर सें यह प्रतिउतर आया।

"मजदुर लगाकर तुरन्त हटाइए।चाहे कितनी भी मजदूरी देनी पड़े और इस काम के लिए कितने भी मजदूर लगाने पड़े,व्यवस्था कीजिए।"

'मजदूर नही मिल रहे हैं।मुसलमान मजदूरो पर इस समय भरोसा नही किया जा सकता।'

और ऐसे समय में सेना के प्रमुखों को संघ याद आया ।

रात्रि के ग्यारह बजे थे। एक सैन्य जीप संघ- कार्यालय के आगे आकर रूकी ।उसमें से एक अधिकारी उतरे।

कार्यालय में प्रमुख स्वंय सेवकों की बैठक चल रही थी।प्रेमनाथ डोगरा व अर्जुन जीं वही बैठे थें।

सेनाधिकारी ने गंभीर स्थिति का संदेश दिया।फिर उसने पूछा- "आप हवाई अड्डे पर लगे हिम के ढेर हटानें का कार्य कर सकेंगे क्या?"

अर्जुन जी ने कहा- "अवश्य!कितने व्यक्ति सहायता के लिए चाहिए।"

'कम से कम डेढ़ सौ,जिससे तीन-चार घंटों में सारी बरफ हट जाये।"

अर्जुन जी ने कहा - "हम छः सौ स्वयंसेवक देते है।"

"इतनी रात्रि में आप इतने.....?" सैन्य अधिकारी ने आश्चर्य से कहा

"आप हमें ले जाने के लिए वाहनों की व्यवस्था कीजिए।४५ मिनट में हम तैयार है ।"

संघ कि पद्धति का कमाल था कि तय समय पर सभी 600 स्वयंसेवक कार्यालय पर एकत्र होकर साथ साथ चले गये।

दिल्ली को संदेश भेजा गया-"बरफ हटाने का काम प्रारंम्भ हो गया है।हवाई जहाज कभी भी आने दें।"

"इतनी जल्दी मजदूर मिल गये क्या"

'हाँ, पर वे मजदूर नही ,सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं।'

रात्रि के डे़ढ बजे वे काम पर लग गये।२७अक्टुम्बर को प्रातः के समय प्रथम सिख रेजीमेन्ट के ३२९ सैनिक हवाई जहाज से श्रीनगर उतरे और उन्होने बड़े प्रेम से स्वंय सेवको को गले लगाया । फिर क्या था एक के बाद एक ऐसे आठ हवाई जहाज उतरे।

उन सभी में प्रयाप्त मात्रा में शस्त्रास्त्र थे। सभी स्वंयसेवको ने वे सारे शस्त्रास्त्र भी उतार कर ठिकाने पर रख दिये ।

हवाई अड्डा शत्रु के कब्जे में जाने से बच गया। जिसका सामरिक लाभ हमें प्राप्त हुआ।

हवाई पट्टी चौड़ी करने का कार्य भी तुरन्त करना था, इसलिए विश्राम किये बिना ही स्वंयसेवक काम में जुट गये।

संदर्भ पुस्तक :-
न फूल चढे न दीप जले।

।। *नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे*।।

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