नीतिशास्त्र (Ethics)

1.0  कोईकामशुरूकरनेसेपहले,स्वयंसेतीनप्रश्नकीजिये–मैंयेक्योंकररहाहूँ,इसकेपरिणामक्याहोसकतेहैंऔरक्यामैंसफलहोऊंगा.औरजबगहराईसेसोचनेपरइनप्रश्नोंकेसंतोषजनकउत्तरमिलजायें,तभीआगेबढिए.

2.0  व्यक्तिअकेलेपैदाहोताहैऔरअकेलेमरजाताहै;औरवोअपनेअच्छेऔरबुरेकर्मोंकाफलखुदहीभुगतताहै;औरवहअकेलेहीनर्कयास्वर्गजाताहै.

3.0  भगवानमूर्तियोंमेंनहींहै.आपकीअनुभूतिआपकाइश्वरहै.आत्माआपकामंदिरहै.

4.0  अगरसांपजहरीलानाभीहोतोउसेखुदकोजहरीलादिखानाचाहिए.

5.0  इसबातकोव्यक्तमतहोनेदीजियेकिआपनेक्याकरनेकेलिएसोचाहै,बुद्धिमानीसेइसेरहस्यबनायेरखियेऔरइसकामकोकरनेकेलिएदृढरहिये.

6.0  शिक्षासबसेअच्छीमित्रहै.एकशिक्षितव्यक्तिहरजगहसम्मानपाताहै.शिक्षासौंदर्यऔरयौवनकोपरास्तकरदेतीहै.

7.0  जैसेहीभयआपकेकरीबआये,उसपरआक्रमणकरउसेनष्टकरदीजिये.

8.0  किसीमूर्खव्यक्तिकेलिएकिताबेंउतनीहीउपयोगीहैंजितनाकिएकअंधेव्यक्तिकेलिएआईना.

9.0  जबतकआपकाशरीरस्वस्थऔरनियंत्रणमेंहैऔरमृत्युदूरहै,अपनीआत्माकोबचानेकिकोशिशकीजिये;जबमृत्युसरपरआजायेगीतबआपक्याकरपाएंगे?

10.0    कोईव्यक्तिअपनेकार्योंसेमहानहोताहै,अपनेजन्मसेनहीं.

11.0    सर्प,नृप,शेर,डंकमारनेवालेततैया,छोटेबच्चे,दूसरोंकेकुत्तों,औरएकमूर्ख:इनसातोंकोनीदसेनहींउठानाचाहिए.

12.0    जिसप्रकारएकसूखेपेड़कोअगरआगलगादीजायेतोवहपूराजंगलजलादेताहै,उसीप्रकारएकपापीपुत्रपुरेपरिवारकोबर्वादकरदेताहै.

13.0    सबसेबड़ागुरुमन्त्रहै:कभीभीअपनेराज़दूसरोंकोमतबताएं.येआपकोबर्वादकरदेगा.

14.0    पहलेपांचसालोंमेंअपनेबच्चेकोबड़ेप्यारसेरखिये.अगलेपांचसालउन्हेंडांट-डपटकेरखिये.जबवहसोलहसालकाहोजायेतोउसकेसाथएकमित्रकीतरहव्यवहारकरिए.आपकेवयस्कबच्चेहीआपकेसबसेअच्छेमित्रहैं.

15.0    फूलोंकीसुगंधकेवलवायुकीदिशामेंफैलतीहै.लेकिनएकव्यक्तिकीअच्छाईहरदिशामेंफैलतीहै.

16.0    दुनियाकीसबसेबड़ीशक्तिनौजवानीऔरऔरतकीसुन्दरताहै.

17.0    मेंभूतकेबारेमेंपछतावानहींकरनाचाहिए,नाहीभविष्यकेबारेमेंचिंतितहोनाचाहिए;विवेकवानव्यक्तिहमेशावर्तमानमेंजीतेहैं.

 

18.0    हरमित्रताकेपीछेकोईनाकोईस्वार्थहोताहै.ऐसीकोईमित्रतानहींजिसमेस्वार्थनाहो.यहकड़वासचहै.

19.0    वेश्याएंनिर्धनोंकेसाथनहींरहतीं,नागरिककमजोरसंगठनकासमर्थननहींकरते,औरपक्षीउसपेड़परघोंसलानहींबनातेजिसपेफलनाहों.

20.0    सांपकेफन,मक्खीकेमुखऔरबिच्छुकेडंकमेंज़हरहोताहै;परदुष्टव्यक्तितोइससेभराहोताहै.

21.0    वहजोअपनेपरिवारसेअत्यधिकजुड़ाहुआहै,उसेभयऔरचिंताकासामनाकरनापड़ताहै,क्योंकिसभीदुखोंकिजड़लगावहै.इसलिएखुशरहनेकिलिएलगावछोड़देनाचाहिए.

22.0    वहजोहमारेचिंतनमेंरहताहैवहकरीबहै,भलेहीवास्तविकतामेंवहबहुतदूरहीक्योंनाहो;लेकिनजोहमारेह्रदयमेंनहींहैवोकरीबहोतेहुएभीबहुतदूरहोताहै.

23.0    अपमानितहोकेजीनेसेअच्छामरनाहै.मृत्युतोबसएकक्षणकादुःखदेतीहै,लेकिनअपमानहरदिनजीवनमेंदुःखलाताहै.

24.0    कभीभीउनसेमित्रतामतकीजियेजोआपसेकमयाज्यादाप्रतिष्ठाकेहों.ऐसीमित्रताकभीआपकोख़ुशीनहींदेगी.

25.0    जबआपकिसीकामकीशुरुआतकरें,तोअसफलतासेमतडरेंऔरउसकामकोनाछोड़ें.जोलोगईमानदारीसेकामकरतेहैंवोसबसेप्रसन्नहोतेहैं.

26.0    सेवककोतबपरखेंजबवहकामनाकररहाहो,रिश्तेदारकोकिसीकठिनाईमें,मित्रकोसंकटमें,औरपत्नीकोघोरविपत्तिमें.

27.0    संतुलितदिमागजैसीकोईसादगीनहींहै,संतोषजैसाकोईसुखनहींहै,लोभजैसीकोईबीमारीनहींहै,औरदयाजैसाकोईपुण्यनहींहै.

28.0    यदिकिसीकास्वभावअच्छाहैतोउसेकिसीऔरगुणकीक्याजरूरतहै?यदिआदमीकेपासप्रसिद्धिहैतोभलाउसेऔरकिसीश्रृंगारकीक्याआवश्यकताहै.

29.0    हेबुद्धिमानलोगों!अपनाधनउन्हीकोदोजोउसकेयोग्यहोंऔरकिसीकोनहीं.बादलोंकेद्वारालियागयासमुद्रकाजलहमेशामीठाहोताहै.

30.0    पृथ्वीसत्यकीशक्तिद्वारासमर्थितहै;येसत्यकीशक्तिहीहैजोसूरजकोचमकऔरहवाकोवेगदेतीहै;दरअसलसभीचीजेंसत्यपरनिर्भरकरतीहैं.

31.0    वोजिसकाज्ञानबसकिताबोंतकसीमितहैऔरजिसकाधनदूसरोंकेकब्ज़ेमैंहै,वोज़रुरतपड़नेपरनाअपनाज्ञानप्रयोगकरसकताहैनाधन.

32.0    जोसुख-शांतिव्यक्तिकोआध्यात्मिकशान्तिकेअमृतसेसंतुष्टहोनेपेमिलतीहैवोलालचीलोगोंकोबेचैनीसेइधर-उधरघूमनेसेनहींमिलती.

33.0    एकअनपढ़व्यक्तिकाजीवनउसीतरहसेबेकारहैजैसेकीकुत्तेकीपूँछ,जोनाउसकेपीछेकाभागढकतीहैनाहीउसेकीड़े-मकौडोंकेडंकसेबचातीहै.

34.0    एकउत्कृष्टबातजोशेरसेसीखीजासकतीहैवोयेहैकिव्यक्तिजोकुछभीकरनाचाहताहैउसेपूरेदिलऔरज़ोरदारप्रयासकेसाथकरे.

35.0    सारसकीतरहएकबुद्धिमानव्यक्तिकोअपनीइन्द्रियोंपरनियंत्रणरखनाचाहिएऔरअपनेउद्देश्यकोस्थानकीजानकारी,समयऔरयोग्यताकेअनुसारप्राप्तकरनाचाहिए.

36.0    जोलोगपरमात्मातकपहुंचनाचाहतेहैंउन्हेंवाणी,मन,इन्द्रियोंकीपवित्रताऔरएकदयालुह्रदयकीआवश्यकताहोतीहै.

37.0    जोव्यक्तिधनकालालचीहैउसेपैसादेकर,घमंडीयाअभिमानीव्यक्तिकोहाथजोड़कर,मूर्खकोउसकीबातमानकरऔरविद्वानव्यक्तिकोसचसेवशमेंकियाजासकताहै।


नीतिशास्त्र (Ethics)
सफलता
 
दूर से हमें आगे के सभी रास्ते बंद नजर आते हैं क्योंकि सफलता के रास्ते हमारे लिए तभी खुलते जब हम उसके बिल्कुल करीब पहुँच जाते है|
मेहनत
 
हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां हमारा भाग्य लिख देंगी|
असंभव*
 
इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं| हम वो सब कर सकते है, जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है, जो आज तक हमने हार ना मानना*
 
बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है|

नीतिशास्त्र (Ethics)
*🚩तथास्तु परिवार🚩* 
के सभी विद्वानों को *सुमेर दाधिच* का सादर अभिवादन
 
🙏🏻🙏🏻🌹🌹🙏🏻🙏🏻
 
दोस्तों 
 
अक्सर हम कहते हैं कि गुरुमंत्र गुप्त होना चाहिए, इसे किसी को बताना नही चाहिए 
 
लेकिन क्यों
 
आज इसी विषय पर एक छोटा सा आलेख 
 
*गुरुमंत्र गुप्त क्यों*
 
गुरु कान में फूंकता है मंत्र। उसका मतलब यह होता है कि गुरु जब शब्द में कहता है तो बड़े संकोच से कहता है। क्योंकि वह जानता है, अब गलती हो रही है। और जब मैं कह रहा हूं, वहीं ही आधा हो जाता है सत्य। फिर तुम्हारे कान में पड़ेगा, फिर तुम अपने मन को उसमें मिलाओगे, और टूट जायेगा। फिर तुम किसी से कहोगे। क्योंकि बहुत मुश्किल है उसे सम्हाल कर रखना। 
 
इसलिए पुरानी परंपरा है कि गुरु जब मंत्र दे, तो तुम उसे किसी से कहना मत। वह इसीलिए है कि कुछ तो सत्य वहीं खराब हो गया है, जब उसने शब्द बनाया। शून्यता तथा अस्थिरता बनी। फिर उसने तुम्हें कही। फिर तुम किसी और को कहोगे, फिर वह कोई और किसी और को कहेगा। वंही उस मन्त्र के मूल में जो गंगोत्री थी वह अंत में एक गंदा डिब्बा हो जायेगी।
 
और मनुष्य के मन और शरीर का एक ढंग है। वह ढंग यह है कि अगर तुम भोजन करोगे तो मलमूत्र से उसे निकालना पड़ेगा। तुम उसे कैसे खींचोगे? उसे शरीर के बाहर से लाये हो, बाहर भेजना पड़ेगा। अगर तुमसे कोई कोई बात कह दे, तो तुम्हें तब तक चैन न मिलेगा, जब तक तुम किसी और से न कह दो। क्योंकि जो भी भीतर गया, उसे बाहर निकालना पड़ेगा। इसलिए तुम सुनते भी नहीं हो पूरा कि गये और किसी को बताया। मन और शरीर जो भी चीज भीतर लेंगे, उनको बाहर करना पड़ेगा।
 
ध्यान रखो
इसलिए गुरु जब मंत्र देता है वह कहता है, इसे बाहर मत करना। इसे भीतर रहने देना। बड़ी बेचैनी होगी इससे। और अगर तुमने हिम्मत रखी और तुमने सम्हाला अपने को और न कहा किसी को, तो धीरे-धीरे जो शब्द में दिया है, अगर तुमने बाहर शब्द में न दिया, तो धीरे-धीरे भीतर शब्द भी पिघल कर बह जाएगा और शून्यता निर्मित हो जायेगी। लेकिन सदगुरु से जब भी तुम सुनते हो, तुम जाकर किसी को कहने की कोशिश करने हो। तुम शायद सुनते ही इसीलिए हो कि किसी के सामने जाकर ज्ञान प्रगट कर दो। वहीं तुम भूल कर रहे हो। वहीं भीतर लिया, बाहर गया, सब व्यर्थ हो गया।
 
ध्यान दीजिये दोस्तों
अगर कंही कुछ महत्वपूर्ण मिल रहा हो, तो उसे सम्हाल लेना गर्भ की तरह भीतर। उसे किसी को मत देना। तो धीरे-धीरे अगर तुमने न दिया, न दिया, न दिया; बहुत बार मन कहेगा दे दो किसी को, समझा दो किसी को, बता दो। नहीं दिया, नहीं दिया, नहीं दिया, धीरे-धीरे ऊपर जो शब्द की पर्त है वह पिघल कर टूट जायेगी। और भीतर जो शून्यता गुरु ने जो दी थी, वह प्रगट हो जायेगी। 
 
और जब तुम्हारे भीतर शून्यता पैदा हो जाये तब तुम हकदार हो। तब तुम शब्द से किसी को दे देना, क्योंकि अब यह शब्द उधार न होगा। फिर गंगोत्री से आयेगा। और जिसको दो उसको भी कह देना, कि सम्हालना। इसको ऐसे ही मत दे देना--उधार का उधार। इसको जीवंत बना लेना। यह नगद हो जाये तुम्हारे भीतर, तब देना।
 
इसलिए गुरु योग्य चेला ढूंढते हैं जो उनकी गंगोत्री को सम्हाल सकें।
 
🙏🏻🙏🏻
 
नमस्कार
 
सबका अपना💞💕
 
*सुमेर दाधिच*
*ज्योतिषाचार्य एवं दार्शनिक*



नीतिशास्त्र (Ethics)
समझौता मात्र एक अच्छा छाता बन सकता है किन्तु एक अच्छी छत नही,
 
समझोतों से व्यापार अच्छा हो सकता है किन्तु रिश्ते नही |
 
किसी भी रिश्ते को जीवंत रखने के लिये हृदय से प्रेम अति आवश्यक है ||"

नीतिशास्त्र (Ethics)
पितामह भीष्म के जीवन का एक ही पाप था कि उन्होंने समय पर क्रोध नहीं किया...
 
और
 
जटायु के जीवन का एक ही पुण्य था कि उसने समय पर क्रोध किया...
 
परिणामस्वरुप ...
 
एक को बाणों की शैय्या मिली और एक को प्रभु श्री राम की गोद.
 
अतः क्रोध भी तब पुण्य बन जाता है जब वह धर्म और मर्यादा के लिए किया जाए.
 
और सहनशीलता भी तब पाप बन जाती है जब वह धर्म और मर्यादा को ना बचा पाये।
 
स्वंय विमर्श करीएगा..

नीतिशास्त्र (Ethics)

गुरु ज्ञान से गुरु मंत्र तक
प्रथम अवस्था गुरु के साथ एकनिष्ठ रहे , गुरु से झूठ न बोले , क्यों की गुरु ही मार्गदर्शक होता हैं , अगर गुरु के प्रति सच्ची भक्ति और निष्ठां हो तो वो दिन दूर नहीं , के एक दिन एक परिपक्व साधक बन सकते हो ,गुरु से कभी जबान न लड़ाए, कभी गुरु को नाराज न करे , क्यों की गुरु की अवस्था उच्च कोटि की होती हैं , आपके सोच पे भी निर्भर करता हैं के आप गुरु का कितना आदर करते हों , सिद्धि आपको तभी प्राप्त होसकती हैं जब गुरु सेवा में आप लीन हो। क्यों की काफी तपिश के बाद एक गुरु की निर्मिति होती हैं। .

गुरुजनो से प्राप्त ज्ञान
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1• गुरु से कपट और मित्र से चोरी कभी नहीं करना वरना निर्धन या कोढ़ी होते है
2• कभी किसीका दिल नहीं दुखाना चाहिए वरना वह व्यक्ति जीवन में कभी सुख नहीं पाता |
3• बिना स्नान किये पूजन करना या उसकी तैयारी करने से पूजन का फल नहीं मिलता
4• रविवार को दूर्वा नही तोडनी चाहिए।
5• कभी किसी से सन्धया की बेला में उधार नहीं लेना चाहिए वरना कभी कर्ज मुक्त नहीं होते।
6• मंदिर में कभी किसी की बुराई ना करे अन्यथा उसका अपयश होता है।
7• भगवान के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नही चाहिए।
8• पूजन के समय शारीर के अंगो को बार बार स्पर्स ना करे अन्यथा चर्म रोग होता है।
9• जो मूर्ति स्थापित हो उसमे आवाहन और विसर्जन नही होता।
10• तुलसीपत्र को मध्याहोंन्त्तर ग्रहण न करें।
11• पूजा करते समय यदि गुरुदेव ,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें।
12• मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है। जोकि सनातन धर्म में किया जाता है।
13• कमल को पांच रात ,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है।
14• पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से अभिषेक करने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है।
15• सूर्य गृह शांति हेतु लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है।
16• हाथ में धारण किये पुष्प , तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल भी अपवित्र हो जाते हैं।
17• पिघला हुआ घृत और पतला चन्दन नही चढ़ाना चाहिए।
18• दीपक से दीपक को जलाने से प्राणी दरिद्र और रोगी होता है | दक्षिणाभिमुख दीपक को न रखे | देवी के बाएं और दाहिने दीपक रखें। दीपक से अगरबत्ती जलाना भी दरिद्रता का कारक होता है।
19• द्वादशी , संक्रांति , रविवार , पक्षान्त और संध्याकाळ में पुष्प ना चढ़ाये।
20• प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढाएं।
21• आसन , शयन , दान , भोजन , वस्त्र संग्रह , ,विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गयी है।
22• जो मलिन वस्त्र पहनकर , मूषक आदि के काटे वस्त्र , केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है वह हमेशा दरिद्र रहता है।
23• मिट्टी , गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को एकत्रित न करें।
24• मूर्ती स्नान में मूर्ती को अंगूठे से न रगड़े ।
25• प्रातः बेला में कभी घर में लड़ाई झगड़ा नहीं करना चाहिए ऐसा करने से घर में कभी लछमी नहीं आते।
26• जहाँ अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है , उस स्थान पर दुर्भिक्ष , मरण , और भय उत्पन्न होता है।
27• पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि , चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें।
28• कृष्णपक्ष में , रिक्तिका तिथि में , श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें।
29• अपराह्नकाल में , रात्रि में , कृष्ण पक्ष में , द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें।
30• मंडप के नव भाग होते हैं , वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है। अर्थात् टेढ़ा नही होता।
31• जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नही होती वह यजमान का नाश करता है।
 


                     –चाणक्यनीति
विद्वान व्यक्ति को चाहिए की वे गधे से तीन गुण सीखें । जिस प्रकार अत्यधिक थका होने पर भी वह बोझ ढोता रहता है, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को भी आलस्य न करके अपने लक्ष्य की प्राप्ति और सिद्धि के लिए सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिए । कार्य सिद्धि में ऋतुओं के सर्द और गर्म होने का भी चिंता नहीं करना चाहिए और जिस प्रकार गधा संतुष्ट होकर जहाँ-तहाँ चर लेता है, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को भी सदा सन्तोष रखकर स्व-कर्म में प्रवृत्त रहना चाहिए ।🌹🕉🌷🙏🏼🌷
 


नीतिशास्त्र (Ethics)

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अथार्त-⬇
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1⃣ यज्ञ करने वाले,
2⃣ पुरोहित,
3⃣ आचार्य,
4⃣अतिथियों,
5⃣माता,
6⃣पिता,
7⃣मामा आदि संबंधियों,
8⃣भाई,
9⃣बहन,
🔟 पुत्र,
1⃣1⃣पुत्री,
1⃣2⃣पत्नी,
1⃣3⃣पुत्रवधू,
1⃣4⃣दामाद तथा
1⃣5⃣गृह सेवकों यानी नौकरों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।
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1⃣. यज्ञ करने वाला
यज्ञ करने वाला ब्राह्मण सदैव सम्मान करने योग्य होता है। यदि उससे किसी प्रकार की कोई चूक हो जाए तो भी उसके साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसा करेंगे तो इससे आपकी प्रतिष्ठा ही धूमिल होगी। अतः यज्ञ करने वाले वाले ब्राह्मण से वाद-विवाद न करने में ही भलाई है।

2⃣. पुरोहित
यज्ञ, पूजन आदि धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए एक योग्य व विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता है, जिसे पुरोहित कहा जाता है। भूल कर भी कभी पुरोहित से विवाद नहीं करना चाहिए। पुरोहित के माध्यम से ही पूजन आदि शुभ कार्य संपन्न होते हैं, जिसका पुण्य यजमान (यज्ञ करवाने वाला) को प्राप्त होता है। पुरोहित से वाद-विवाद करने पर वह आपका काम बिगाड़ सकता है, जिसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए पुरोहित से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

3⃣. आचार्य
प्राचीनकाल में उपनयन संस्कार के बाद बच्चों को शिक्षा के लिए गुरुकुल भेजा जाता था, जहां आचार्य उन्हें पढ़ाते थे। वर्तमान में उन आचार्यों का स्थान स्कूल टीचर्स ने ले लिया है। मनु स्मृति के अनुसार आचार्य यानी स्कूल टीचर्स से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। वह यदि दंड भी दें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आचार्य (टीचर्स) हमेशा अपने छात्रों का भला ही सोचते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर विद्यार्थी का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

4⃣. अतिथि
हिंदू धर्म में अतिथि यानी मेहमान को भगवान की संज्ञा दी गई है इसलिए कहा जाता है मेहमान भगवान के समान होता है। उसका आवभगत ठीक तरीके से करनी चाहिए। भूल से भी कभी अतिथि के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। अगर कोई अनजान व्यक्ति भी भूले-भटके हमारे घर आ जाए तो उसे भी मेहमान ही समझना चाहिए और यथासंभव उसका सत्कार करना चाहिए। अतिथि से वाद-विवाद करने पर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लग सकती है।

5⃣. माता
माता ही शिशु की सबसे प्रथम शिक्षक होती है। माता 9 महीने शिशु को अपने गर्भ में धारण करती है और जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाती है। यदि वृद्धावस्था या इसके अतिरिक्त भी कभी माता से कोई भूल-चूक हो जाए तो उसे प्यार से समझा देना चाहिए न कि उसके साथ वाद-विवाद करना चाहिए। माता का स्थान गुरु व भगवान से ही ऊपर माना गया है। इसलिए माता सदैव पूजनीय होती हैं। अतः माता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

6⃣. पिता
पिता ही जन्म से लेकर युवावस्था तक हमारा पालन-पोषण करते हैं। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पिता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। पिता भी माता के ही समान पूज्यनीय होते हैं। हम जब भी किसी मुसीबत में फंसते हैं, तो सबसे पहले पिता को ही याद करते हैं और पिता हमें उस समस्या का समाधान भी सूझाते हैं। वृद्धावस्था में भी पिता अपने अनुभव के आधार पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए पिता के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

7⃣. मामा आदि संबंधी
मामा आदि संबंधी जैसे- काका-काकी, ताऊ-ताईजी, बुआ-फूफाजी, ये सभी वो लोग होते हैं, जो बचपन से ही हम पर स्नेह रखते हैं। बचपन में कभी न कभी ये भी हमारी जरूरतें पूरी करते हैं। इसलिए ये सभी सम्मान करने योग्य हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर समाज में हमें सभ्य नहीं समझा जाएगा और हमारी प्रतिष्ठा को भी ठेस लग सकती है। इसलिए भूल कर भी कभी मामा आदि सगे-संबंधियों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति बने तो भी समझा-बूझाकर इस मामले को सुलझा लेना चाहिए।

8⃣. भाई
हिंदू धर्म के अनुसार बड़ा भाई पिता के समान तथा छोटा भाई पुत्र के समान होता है। बड़ा भाई सदैव मार्गदर्शक बन कर हमें सही रास्ते पर चलने के प्रेरित करता है और यदि भाई छोटा है तो उसकी गलतियां माफ कर देने में ही बड़प्पन है। विपत्ति आने पर भाई ही भाई की मदद करता है। बड़ा भाई अगर परिवार रूपी वटवृक्ष का तना है तो छोटा भाई उस वृक्ष की शाखाएं। इसलिए भाई छोटा हो या बड़ा उससे किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

9⃣. बहन
भारतीय सभ्यता में बड़ी बहन को माता तथा छोटी बह न को पुत्री माना गया है। बड़ी बहन अपने छोटे भाई-बहनों को माता के समान ही स्नेह करती है। संकट के समय सही रास्ता बताती है। छोटे भाई-बहनों पर जब भी विपत्ति आती है, बड़ी बहन हर कदम पर उनका साथ देती है।
छोटी बहन पुत्री के समान होती है। परिवार में जब भी कोई शुभ प्रसंग आता है, छोटी बहन ही उसे खास बनाती है। छोटी बहन जब घर में होती है तो घर का वातावरण सुखमय हो जाता है। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि बहन के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

🔟. पुत्र
हिंदू धर्म ग्रंथों में पुत्र को पिता का स्वरूप माना गया है यानी पुत्र ही पिता के रूप में पुनः जन्म लेता है। शास्त्रों के अनुसार पुत्र ही पिता को पुं नामक नरक से मुक्ति दिलाता है। इसलिए उसे पुत्र कहते हैं-
पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्रः
पुत्र द्वारा पिंडदान, तर्पण आदि करने पर ही पिता की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। पुत्र यदि धर्म के मार्ग पर चलने वाला हो तो वृद्धावस्था में माता-पिता का सहारा बनता है और पूरे परिवार का मार्गदर्शन करता है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पुत्र से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

1⃣1⃣. पुत्री
भारतीय संस्कृति में पुत्री को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। कहते हैं कि भगवान जिस पर प्रसन्न होता है, उसे ही पुत्री प्रदान करता है। संभव है कि पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता का पालन-पोषण न करे, लेकिन पुत्री सदैव अपने माता-पिता का साथ निभाती है। परिवार में होने वाले हर मांगलिक कार्यक्रम की रौनक पुत्रियों से ही होती है। विवाह के बाद भी पुत्री अपने माता-पिता के करीब ही होती है। इसलिए पुत्री से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

1⃣2⃣. पत्नी
हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पति के शरीर का आधा अंग। किसी भी शुभ कार्य व पूजन आदि में पत्नी का साथ में होना अनिवार्य माना गया है, उसके बिना पूजा अधूरी ही मानी जाती है। पत्नी ही हर सुख-दुख में पति का साथ निभाती है। वृद्धावस्था में यदि पुत्र आदि रिश्तेदार साथ न हो तो भी पत्नी कदम-कदम पर साथ चलती है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पत्नी से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

1⃣3⃣. पुत्रवधू
पुत्र की पत्नी को पुत्रवधू कहते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार पुत्रवधू को भी पुत्री के समान ही समझना चाहिए। पुत्रियों के अभाव में पुत्रवधू से ही घर में रौनक रहती है। कुल की मान-मर्यादा भी पुत्रवधू के ही हाथों में होती है। परिवार के सदस्यों व अतिथियों की सेवा भी पुत्रवधू ही करती है। पुत्रवधू से ही वंश आगे बढ़ता है। इसलिए यदि पुत्रवधू से कभी कोई चूक भी हो जाए तो भी उसके साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

1⃣4⃣. गृह सेवक यानी नौकर
मनु स्मृति के अनुसार गृह सेवक यानी नौकर से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि पुराने सेवक आपकी व आपके परिवार की कई गुप्त बातें जानता है। वाद-विवाद करने पर वह गुप्त बातें सार्वजनिक कर सकता है। जिससे आपके परिवार की प्रतिष्ठा खराब हो सकती है। इसलिए नौकर से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

1⃣5⃣. दामाद
पुत्री के पति को दामाद यानी जमाई कहते हैं। धर्म ग्रंथों में दामाद को भी पुत्र के समान माना गया है। पुत्र के न होने पर दामाद ही उससे संबंधित सभी जिम्मेदारी निभाता है तथा ससुर के उत्तर कार्य (पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध आदि) करने का अधिकारी भी होता है। दामाद से इसलिए भी विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर आपकी पुत्री के दांपत्य जीवन पर भी पढ़ सकता है।।।।।
 


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