ग्रह और राशि (Planet and Horoscope)



ज्योतिष के 15 सच - 
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1. कभी भी उच्च के ग्रहों का दान नहीं करना चाहिए और नीच ग्रहों की कभी पूजा नहीं करनी चाहिए।
 
2 . कुंडली में गुरु दशम भाव में हो या चौथे भाव में हो तो मंदिर निर्माण के लिए धन नहीं देना चाहिए यह अशुभ होता है और जातक को कभी भी फांसी तक पहुंचा सकता है।
 
3. कुंडली के सप्तम भाव में गुरु हो तो कभी भी पीले वस्त्र दान नहीं करने चाहिए।
 
4 . बारहवें भाव में चन्द्र हो तो साधुओं का संग करना बहुत अशुभ होगा। इससे परिवार की वृद्धि रुक सकती है।
 
5 . सप्तम/अष्टम सूर्य हो तो ताम्बे का दान नहीं देना चाहिए, धन की हानि होने लगेगी।
 
6. मंत्रोच्चारण के लिए शिक्षा-दीक्षा लेनी चाहिए क्योंकि अशुद्ध उच्चारण सेलाभ की बजाय हानि अधिक होती है।
 
7. जब भी मंत्र का जाप करें उसे पूर्ण संख्या में करना जरूरी है।
 
8. मंत्र एक ही आसन पर, एक ही समय में सम संख्या में करना चाहिए।
 
9 . मंत्र जाप पूर्ण होने के बाद दशांश हवन अवश्य करना चाहिए तभी पूर्ण फल मिलता है।
 
10. कुछ लोग वार के अनुसार वस्त्र पहनते हैं, यह हर किसी के लिए सही नहीं होता है। कुंडली में जो ग्रह अच्छे हैं उनके वस्त्र पहनना शुभ है लेकिन जो ग्रह शुभ नहीं हैं उनके रंग के वस्त्र पहनना गलत हो सकता है।
 
11. कई बार किसी से सलाह लिए बिना कुछ लोग मोती पहन लेते हैं, यह गलत है अगरकुंडली में चन्द्रमा नीच का है तो मोती पहनने से व्यक्ति अवसाद में आ सकता है।
 
12. अक्सर देखा गया है कि किसी की शादी नहीं हो रही है तो ज्योतिषी बिना कुंडली देखे पुखराज पहनने की सलाह दे देते हैं इसका उल्टा प्रभाव होता है और शादी ही नहीं होती।
 
13. कुंडली में गुरु नीच का, अशुभ प्रभाव में, अशुभ भाव में हो तो पुखराज कभी भी नहीं पहनना चाहिए।
 
14. कई लोग घर में मनी प्लांट लगा लेते हैं यह सुनकर कि इससे घर में धन वृद्धि होगी लेकिन तथ्य तो यह है कि अगर बुध खराब हो तो घर में मनी प्लांट लगाने से घर की बहन-बेटी दुखी रहती हैं।
 
15. कैक्टस या कांटे वाले पौधे घर में लगाने से शनि प्रबल हो जाता है अतः जिनकी कुंडली में शनि खराब हो उन्हें ऐसे पौधे नहीं लगाने चाहिए।

जय शनिदेव महाराज 
भाइयो आपने अक्शर देखा होगा  कि कुछ लोग हमारे ईष्ट शनिदेव महाराज को अपने घर के बहार बुलाकर शनि  महाराज की मूर्ति को बिना देखे मूर्ति समझकर उस पर तेल और पैसे चढ़ाते है।एक बाल्टी में थोडा सा तेल और एक टीन काटकर.लकड़ी पुठ्ठे.लोहे की कोई बस्तु आदि कई तरह की  बस्तु को कही से भी उठाकर .कई लोग कचरे में से उठाकर.यहां तक देखा गया है  अन्य जाति के लोग किसी बस्तु को बाल्टी में रखकर उसपर माला डालकर .माला से  वह बस्तु ढकने के कारण किशी को दिखती नहीं है और लोग समझते है की बाल्टी में शनि महराज की मूर्ति है श्रद्धा से तेल और पैसे चढ़ाते है ।हम उन लोगो को बताना चाहते है की शनि देव कोई छोटे मोटे देव नहीं है जो अपनी पूजा करवाने आप के घर तक पहुँचने के लाचार हो ।कलयुग में आज घर घर में शनि महाराज का प्रकोप इसलिए है और केवल उन्ही लोगो के घर में है जो लोग शनि महाराज क का नाम जपते हुए बाल्टी में पड़ी .कचरे से उठाई किसी भी बस्तु पर तेल.या पैसे चढ़ाते है  रस्ते में.बस.ट्रेन में.बाजार में  आप को अनेक गंदे लोग जो बिना नहाये  धोये गंदे कपडे गन्दी बाल्टी. गन्दा  डब्बा आदि में कचरे कवाडे से उठाकर शनि महाराज के नाम से भीक मांगते है और आप लोग तुरंत उस बाल्टी में पड़ी बस्तु को शनि महाराज समझकर दान देते हो ।परिणाम शनि देव आपसे प्रशन्न होने की बजाय नाराज होजाते है और आपकी मति भ्रस्ट करदेते है  जिससे आपके परिवार में बड़ी बड़ी बीमारी जैसे कैंसर   टीबी ह्रदय घात आदि बीमारी के साथ ब्यापार मे घाटा आदि कस्ट मिलना  प्रारम्भ हो जाता है ।कस्ट  इसलिए मिलते है क्योंकि आप सभी देवी देवताओ को घर के दरवाजे बुलाकर इस गंदे तरीके से नहीं पूजते और नहीं पूजना चाहिए लेकिन संसार के श्रेस्ट देवता जिसके कोप प्रकोप से देवताओं के देवता  भी डरते है ।अच्छे अच्छे राजा महाराज मंदिर में जाकर डोक लगते है और आप तुच्छ मनुष्य शनि देव पर चलते रस्ते या घर पर ही किशी भी गन्दी बस्तु पर शनि देव का नाम लेकर तेल या पैसे चढ़ाते हो बो भी उसका पुजारी पता नहीं किस जाती धर्म बिना नाहे हुए खुद गन्दा रहता है जिसके हात से आप पानी भी नहीं पी सकते आप उसको छु नही सकते इस तरीके से शनि महाराज का दान या पूजा आप लोग करोगे तो शनि महराज आपसे प्रसन्न होने की बजह आप को श्राप देते है और आपके घर कई प्रकार के कास्ट आने लगते है  और गंदे कपडे बिना नहाये हुआ व्यक्ति जो आप के आगे बाल्टी लगाकर दान मागता है उसको तो इतना कास्ट मिलता है कि जिसका आप अंदाज नहीं कर सकते ।इसलिए शनि महाराज का दान नाहा धोकर किसी ब्राह्मण को उसके घर जाकर या शनि देव  मंदिर  में जाकर देना चाहिए ।शनि देव का दान देने के तुरंत बाद ब्राह्मण के पैर छुना न भूले।शनि देव की पूजा करने वाला ब्राह्मण को सदा खुस रखे देखिये आपके सारे कास्ट कुछ ही दिन में दूर न हो जाये तो कहना।यदि आप अपने परिवार में .समाज में.देश.शहर मे अमन चयन शनि महाराज के प्रकोप से बचना चाहते हो तो आज ही प्रण लें की ब्राह्मणों के इस सर्वसक्तशाली देव की पूजा अर्चना सभी देवी देवताओं की तरह करे ।यदि आप ऐसा करेंगे और दान मंदिर में ही करेंगे तो आप सोच भी नही सकते  कि महराज कितनी जल्दी प्रसन्न हो जायेंगे।जय शनि देव ।कृपया इस मेसेज का लाभ हर हिन्दू परिवार को हो ।आप शनि महाराज का प्रचार करेंगे तो महाराज आपसे खुश ही होंगे।

आय तो है पर बचत नहीं... ************************* आज के भौतिक युग में प्रत्येक व्यक्ति की एक ही मनोकामना होती है की उसकी आर्थिक स्थिति सुदृढ रहें तथा जीवन में हर संभव सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती रहे। किसी व्यक्ति के पास कितनी धन संपत्ति होगी तथा उसकी आर्थिक स्थिति तथा आय का योग तथा नियमित साधन कितना तथा कैसा होगा इसकी पूरी जानकारी उस व्यक्ति की कुंडली से जाना जा सकता है। कुंडली में 2 हॉउस दूसरे स्थान से धन की स्थिति के संबंध में जानकारी मिलती है इस स्थान को धनभाव कहा जाता है अत: इस स्थान का स्वामी अगर अनुकूल स्थिति में है या इस भाव में शुभ ग्रह हो तो धन तथा जीवन में खुशियां बनी रहती है तथा जीवनपर्यन्त धन तथा संपत्ति बनी रहती है। 4 हॉउस चतुर्थ स्थान को सुखेश कहा जाता है इस स्थान से सुख तथा घरेलू सुविधा की जानकारी प्राप्त होती है अत: चतुर्थेश या चतुर्थभाव उत्तम स्थिति में हो तो घरेलू सुख तथा सुविधा, खान-पान तथा रहन-सहन उच्च स्तर का होता है तथा घरेलू सुख प्राप्ति निरंतर बनी रहती है। 5 हॉउस यानी पंचमभाव से धन की पैतृक स्थिति देखी जाती है अत: पंचमेश या पंचमभाव उच्च या अनुकूल हो तो संपत्ति सामाजिक प्रतिष्ठा अच्छी होती है। अधिकतर देखने में आता है कि लोगों के आय में बाधा बनी रहती है, या फिर आय तो रही है, बचत नहीं हो पाती आय भाव 11 हॉउस एकादश भाव को कहते हैं व एकादश भाव में बैठे ग्रह को एकादशेश कहते हैं। धन भाव द्वितीय भाव को कहते हैं। आय हो लेकिन बचत न हो तब भी थोड़ी परेशानी रहती है। जितनी परेशानी आय न होने पर रहती है उतनी बचत न होने पर नहीं रहती। जब आय भाव अथवा एकादश का स्वामी अष्टम भाव में हो तो आय के मामलों में बाधा का कारण बनता है। ऐसी स्थिती में एकादश भाव को बलवान किया जाए तो आय के क्षेत्र में बाधा दूर होती है। षष्ट भाव का स्वामी अष्टम में हो तो कर्ज बढ़ता है व कर्ज जल्दी चूकता नहीं। ऐसी स्थिति किसी की पत्रिका में हो तो उन्हें कर्ज नहीं लेना चाहिए। या कर्ज लेने से बचना चाहिये लग्नेश षष्ट भाव में हो तो ऐसा व्यक्ती कर्ज लेता है। और यदि षष्टेश अष्टम में हो तो फिर कर्ज आसानी से नहीं चुका पाता। और अगर किसी कारण से कर्ज लेना पड़ जाए और परेशानी हो तो कुंडली दिखाकर लग्न के स्वामी के रत्न को धारण करना चाहिए।


मारक ग्रह

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मित्रों जैसा की आपको पता है की मृत्यु जीवन का अटल सत्य है जिसे बदला नही जा सकता | ज्योतिष में भी मृत्यु को खास महत्व दिया गया है लेकिन साथ ही ये हिदायत खास रूप से दी गई है की कभी भी किसी को उसकी मृत्यु का अनुमान नही बताना चाहिए | मृत्यु जो केवल उस परमपिता परमात्मा के हाथ में है और जिसके बारे में सायद ही कोई सटीक अनुमान लगा सके |इसमें गलती होने की सम्भावना बहुत रहती है इसिलिय किसी को बताकर वहम नही देना चाहिए ऐसा भी माना गया है |

कुंडली का अस्ठ्म भाव आयु भाव कहलाता है और मृत्यु से बड़ा दुःख किसे नही माना जाता इसिलिय इस भाव को सबसे पापी भाव माना गया है | आयु का निर्यण और मृत्यु किस प्रकार से होगी उसका निर्यण इसी भाव के अनुसार मुख्य रूप से किया जाता है | चूँकि ये आयु का भाव है और सप्तम भाव इससे बारवां भाव होने के कारण इसका व्यय भाव होता है यानी की आयु का छय दुसरे शब्दों में मारक भाव | तीसरा भाव अस्ठ्म से अस्ठ्म होने के कारण आंशिक रूप से आयु को दर्शाता है और उसका बारवां भाव दूसरा भाव होने से दुसरे भाव का मारक भाव की संज्ञा दी गई है इसिलिय इस भाव के मालिक और सप्तम भाव के मालिक को मारकेश भी कहा जाता है | पहला भाव हमारा शरीर को दर्शाता है और बारवा भाव शरीर के छय का इसिलिय इस भाव के मालिक को भी मारकेश माना जा सकता है |

जैसा भी आपको पता है की कोई भी ग्रह अपना फल दशा में देता है ऐसे में यदि मारक ग्रह की दशा हो और जातक का आयु खंड समाप्त हो रहा हो तो मृत्यु हो सकती है वरना शारीरक मानसिक आर्थिक दिक्कत का सामना जातक को करना पड़ता है |

मारकेश ग्रह के निर्यण के लिय पहले सप्तमेश को फिर दिवितियेश को फिर केन्द्राधिप्ती दोष से दूषित शुक्र को फिर केन्द्रेश गुरु को और अंत में व्ययेश को देखें इन में से जो भी मारक भाव में पड़े वो मारकेश होगा | यदि इनमे से कोई मारक भाव में न हो तो जो इनमे से नीच राशि का होगा वो मारक होगा यदि ये भी न हो तो अस्त ग्रह और पापी ग्रहों से युक्त मारक होगा , ये भी न हो तो शत्रु राशि में पापी ग्रह से युक्त ग्रह मारक होगा | इनमे से उपरलिखित ग्रहों में जिसमे सबसे ज्यादा गुण होंगे वो सबसे प्रबल मारक होगा | पापी ग्रह का यहाँ हम अर्थ भावेश के आधार पर पापी को लेंगे |

इसके साथ ही कुछ विद्वानों ने सप्त छिद्र बताये है जिनकी दशा में किसी की मृत्यु सम्भव हो सकती है वो है अस्ठमेष , अस्ठ्म में सिथत ग्रह , अस्ठ्म भाव को देखने वाले ग्रह , अस्ठमेष का अधिश्त्रू ग्रह , जन्म लग्न से बाइसवें द्रेश्कन का स्वामी ,चोसटवें नवमांश का स्वामी , अस्ठ्मेश के साथ ग्रह इन सातों में से जो भी सबसे अधिक जो बलवान होगा उसकी दशा में जातक की मृत्यु होती है |

शनी क्योंकि मृत्यु के कारक माने जाते है इसिलिय उनको विशेष मारकता प्रदान की गई है जब वो किसी अन्य मार्क ग्रह के साथ होंगे तो उस ग्रह की मारकता खुद ग्रहण कर लेते है |

राहू केतु जब दुसरे सातवें अस्ठ्म या फिर बारवें भाव में मारकेश के साथ या मारकेश से सप्तम भाव में हो तो मारक हो जाते है |

ये ध्यान रखे की इनको देखते समय जातक की आयु खंड अवस्य देखें यदि की जातक अल्पायु है मध्यम आयु है या दीर्घायु है | यदि किसी की दीर्घायु है और मध्यम आयु मं मारकेश की दशा आती है तो मृत्यु न होकर जातक को मृत्यु तुल्य कस्ट भोगने पड़ते है |

मित्रों ये आंशिक रूप से कुछ मित्रों के कहने पर लिखने की कोशिस की है | वैसे मारक ग्रह का निर्यण करना बहुत ही मुस्किल कार्य है | और हाँ कृपा करके अब ये पूछने के लिय कमेन्ट न करे की हमारी कुंडली में कौन सा मारक ग्रह है या मेरी आयु कितनी है आयु का मै कभी अनुमान नही लगाता 


चंद्र की युति और उसका फल

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नवग्रहों में चन्द्र को रानी का दर्जा प्राप्त है. सूर्य के समान इसकी भी एक राशि है कर्क राशि जो जल तत्व की राशि होती है. इसे मन और चंचलता का कारक माना जाता है. जहां तक इसकी प्रकृति की बात यह है तो यह शांत व सौम्य ग्रह होता है. इसका रंग सफेद होता है. चन्द्रमा जब कुण्डली में किसी अन्य ग्रह के साथ युति सम्बन्ध बनाता है तो कुछ ग्रहों के साथ इसके परिणाम शुभ फलदायी होते हैं तो कुछ ग्रहों के साथ इसकी शुभता में कमी आती है. आपकी कुण्डली में चन्द्रमा किसी ग्रह के साथ युति बनाकर बैठा है तो इसके परिणामों को आप इस प्रकार देख सकते हैं.

चन्द्र व सूर्य की युति

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अगर आपकी कुण्डली में चन्द्र के साथ सूर्य विराजमान है तो आप कुटनीतिज्ञ होंगे. इस युति के प्रभाव के कारण आपकी वाणी में नम्रता व कोमलता की कमी हो सकती है तथा आप अभिमानी हो सकते हैं जिससे लोगों के प्रति आपका व्यवहार रूखा हो सकता है. इन स्थितियों में सुधार के लिए आपको चन्द्र के उपाय करने चाहिए.

चन्द्र व मंगल की युति

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कुण्डली में मंगल के साथ चन्द्र का स्थित होना यह संकेत देता है कि परिणाम की चिंता किए बगैर आप अपने कार्य में जुट जाते हैं जो कभी-कभी आपके लिए परेशानियों का भी कारण बन जाता है. आपकी कुण्डली में चन्द्र मंगल की युति है तो वाणी पर नियंत्रण रखना आपके लिए बहुत ही आवश्यक होता है क्योंकि, बोल चाल में आप आक्रोशित होकर ऐसा कुछ बोल सकते हैं जिनसे लोग आपसे नाराज़ हो सकते हैं.

चन्द्र व बुध की युति

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चन्द्र के साथ बुध की युति शुभ फल देने वाली होती है. अगर आपकी कुण्डली में इन दोनों ग्रहों की युति बन रही है तो आप कूटनीतिज्ञ हो सकते हैं. अपनी वाणी से लोगों को आसानी से लोगों का दिल जितना आपको अच्छी तरह आता जिससे व्यावसायिक क्षेत्रों में आपको अच्छी सफलता मिलती है.

चन्द्र व गुरू की युति

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कुण्डली में चन्द्र के साथ गुरू की युति होना यह बताता है कि आप ज्ञानी होंगे. आपको शिक्षक एवं सलाहकार के रूप में अच्छी सफलता मिलेगी. लेकिन, आपको इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि मन में अभिमान की भावना नहीं आये. इसके अलावा आपको यह भी ध्यान रखना होगा कि बिना मांगे किसी को सलाह न दें क्योंकि बिना मांगे दी गई सलाह के कारण लोग आपसे दूरियां बनाने की कोशिश करेंगे.

चन्द्र व शुक्र की युति

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ज्योतिषशास्त्र की मान्यता है कि जिस व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्रमा शुक्र के साथ युति सम्बन्ध बनाता है वह सौन्दर्य प्रिय होते हैं. अगर आपकी कुण्डली में भी इन दोनों ग्रहों का युति सम्बन्ध बन रहा है तो हो सकता है कि आप अधिक सफाई पसंद व्यक्ति होंगे. कला के क्षेत्रों से आपका लगाव रहेगा. आप लेखन में भी रूचि ले सकते हैं. अत: अलस्य से दूर रहना चाहिए. दिखावे की प्रवृति से भी आपको बचना चाहिए. सुखों की चाहतों के कारण आप थोड़े आलसी हो सकते हैं

चन्द्र व शनि की युति

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चन्द्रमा के साथ बैठा शनि यह दर्शाता है कि व्यक्ति ईमानदार, न्यायप्रिय एवं मेहनती है. अगर आपकी कुण्डली में चन्द्र व शनि की यह स्थिति बन रही है तो आप भी परिश्रमी होंगे और मेहनत के दम पर जीवन में कामयाबी की तरफ अग्रसर होंगे. न्यायप्रियता के कारण अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने से पीछे नहीं हटेंगे. इस युति के प्रभाव के कारण कभी-कभी आप निराशावादी हो सकते हैं जिससे मन दु:खी हो सकता है अत: आशावादी बने रहना चाहिए.

चन्द्र व राहु की युति

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इन दोनों ग्रहों की युति कुण्डली में होने पर व्यक्ति रहस्यमयी विद्याओं में रूचि रखते हैं. अगर आपकी कुण्डली में यह युति बन रही है तो शिक्षा प्राप्त कर आप वैज्ञानिक बन सकते हैं. शोध कार्यों में भी आपको अच्छी सफलता मिल सकती है.

चन्द्र व केतु की युति

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कुण्डली में चन्द्र के साथ केतु की युति होने पर व्यक्ति को समझ पाना कठिन होता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति कब क्या कर बैठे यह समझना मुश्किल होता है. 


धन लाभ के लिए रोज़ करे शिव पुराण में बताया गया यह आसान उपाय

पैसे की समस्या के लिए शिव पुराण उपाय: इस सृष्टि का निर्माण भगवान शिव की इच्छा मात्र से ही हुआ है । अत: इनकी भक्ति करने वाले व्यक्ति को संसार की सभी वस्तुएं प्राप्त सकती हैं हो। शिवजी अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं। शिवपुराण के अनुसार, नियमित रूप से शिवलिंग का पूजन करने वाले व्यक्ति के जीवन में दुखों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है।

शिवपुराण में एक ऐसा शास्त्र है, जिसमें शिवजी और सृष्टि के निर्माण से जुड़ी रहस्यमयी बातें बताई गई हैं। इस पुराण में कई चमत्कारी उपाय भी बताए गए हैं, जो हमारे जीवन की धन संबंधी समस्याएं को तो खत्म करते हैं। साथ ही, अक्षय पुण्य भी प्रदान करते हैं। इन उपायों से पिछले पापों का नाश होता है और भविष्य सुखद बनता है।

यदि आप भी शिवजी की कृपा से धन संबंधी समस्याओं से छुटकारा पाना चाहते हैं तो यहां बताया गया आसान और उपाय रोज रात को करना चाहिए, शिव पुराण में बताया गया है ... उपाय यह

शिवलिंग के पास रोज रात को लगाएं दीपक

पुराने समय से ही कई ऐसी परंपराएं प्रचलित हैं, जिनका पालन करने पर व्यक्ति को सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इन प्रथाओं का पालन न करने पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शुभ फलों की प्राप्ति के लिए एक परंपरा है कि प्रतिदिन रात्रि के समय शिवलिंग के समक्ष दीपक लगाना चाहिए। इस उपाय के पीछे एक प्राचीन कथा बताई गई है।

कथा

कथा के अनुसार प्राचीन काल में गुणनिधि नामक व्यक्ति बहुत गरीब था और वह भोजन की खोज में लगा हुआ था। इस खोज में रात हो गई और वह एक शिव मंदिर में पहुंच गया। गुणनिधि ने सोचा कि उसे रात्रि विश्राम इसी मंदिर में कर लेना चाहिए। रात के समय वहां अत्यधिक अंधेरा हो गया। इस अंधकार को दूर करने के लिए उसने शिव मंदिर में अपनी कमीज जलायी थी। रात्रि के समय भगवान शिव के समक्ष प्रकाश करने के फलस्वरूप से उस व्यक्ति को अगले जन्म में देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर देव का पद प्राप्त हुआ।

इस कथा के अनुसार ही शाम के समय शिव मंदिर में दीपक लगाने वाले व्यक्ति को अपार धन-संपत्ति एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैं। अत: नियमित रूप से रात्रि के समय किसी भी शिवलिंग के समक्ष दीपक लगाना चाहिए। दीपक लगाते समय ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जप करना चाहिए।

शिवजी के पूजन से श्रद्धालुओं की धन संबंधी समस्याएं भी दूर हो जाती हैं। शास्त्रों में एक अन्य सटीक उपाय बताया गया है जिसे नियमित रूप से अपनाने वाले व्यक्ति अपार धन-संपत्ति प्राप्त हो सकती है। इस उपाय के साथ ही प्रतिदिन सुबह के समय शिवलिंग पर जल, दूध, चावल आदि पूजन सामग्री अर्पित करना चाहिए।

आज बात करते है बुध देव की आज के समय मे बुध और केतू की अधिक खराबी लोगो की कुडंली मे होती जिसे जल्दी से समझ पाना आसान नही है इसका रत्न पन्ना है इससे राहू को शातं किया जाता यदि किसी की कुडंली मे राहू और बुध दोनो खराब हो तो तो आदमी जिदंगी से परेशान रहता है ऐसे ही लोग तगं आकर आत्म हत्या करते है वो भी अचानक उनको देखकर लगता भी नही ऐसा कर सकता है ऐ राहु बुध की अचानक चोट होती है ऐसे ही लोगो का विजनिष अचानक बरबाद हो जाता है और झूठे कोर्ट केस और खासतर पत्नी द्धारा ऐ केस अधिक सामने आते है क्यूकी उनकी शादी राहू की दशा या गोचर मे ही अधिक होती है पन्ना रत्न राहु के प्रभाव को भी ठीक कर देता है पर पहले बुध को सुधारना पडता है बुध और शुक्र की खराबी मे घर मे मनी प्लाटं न ही लगायै इससे उनकी मानसिक और आर्थिक दशा बिगडती जाऐगी ऐसे घर मे पुत्र सतांन अधिक दुखः देती है और भोगती है पढाई करने के बाद भी कोई काम नही मिलता न वो पिता का बिजनिष चला पाता उसमे गलत ब्यसन की लत लग जाती है पिता दुखी रहता है बुध का अस्त होना सुर्य को भी चोट देता है ऐसे आदमी की बहन ससुराल का सुख नी भोग पाती आधा जीवन मायके आकर रहती है बुध स्वभाव से बनिया है यानी चालाक बनिया बुध सुगंध और त्वचा बुद्धी आवाज का ब्यापार का कारक है । चूकी ऐ राजकुमार है पर तो चचंल भी है इसलिए बच्चो मे एक उम्र तक चचंलता पायी जाती है । जिनका बुध शुभ रहता है उनकी सुगंने की शक्ती गजब होती है वह बोलने मे माहिर होते है उनकी बात का असर प्रत्यक्ष पडता है । लेकिन आज के समय मे ऐ अधिकतर खराब होता है यदि जन्म से बुध बच्चे का खराब हो तो या तो वो देर से बोलना शुरू करते है या रूक रूक कर अटक कर तुतलाकर बोलते है । जो बचपन से मदं बुध्दी होते है या कम दिमाग के होते है उनमे बुध और सुर्य की खराबी अधिक होती है । बच्चे चाहे जितने पढाई मे तेज हो गणित मे कमजोर रहते है । खराब बुध न नौकरी करने देता है न ब्यापार मे सफलता देता है मगंल के साथ आने पर यह सभोगं शक्ती को धीरे धीरे खतम कर देता है कन्या सतां ही देता है पुत्र होगा भी उम्र अधिक नही रहती उसकी । खराब बुध हमेशा विचारो मे भटकाव देता रहता है वो जो किसी को कुछ बोलेगा उसका उल्टा असर होता है सामने वाले को फायदा और खुद को नुकसान देगा । ऐसे जातक का विजनिष तो अच्छा शुरू होता है पर अतं मे हाथ कुछ नही आता ऐसे के पैसे को जो लेता है वापस देता अगर बुध राहू से युति करे तो खराब हालाद मे तो ऐसे को विजनिष वार बार बदलना पडता है उसे नुकसान उठाना पडता है या धोखा खाना पडता है ।

-+++आज की ऐस्ट्रो टिप-----यदि बार बार नौकरी छूट जाती हो या बदलनी पड जाती है तो 43 दिन लगातार मिट्टी के छोटे बर्तन मे जौ दूध से धुल कर भरे और 4 बादाम उसमे रखे ढक्कन लगा कर माथे छूकर जल प्रवाह करे ।


विदेश और व्यवसाय

मित्रों आज के आधुनिक समय में हर अधिकतर जातकों की ये इच्छा होती है की वो विदेश में जाकर गुजर बसर करे | विदेशों की भव्यता उनको बहुत लुभाती है | आज हम कुंडली में बनने वाले कारणों की चर्चा करेंगे की कैसे विदेश के योग बनते है |

मित्रों कुंडली का चोथा भाव हमारी मात्रभूमि का कहलाता है | किसी भी जातक के विदेश में सेटल होने के लिय इस भाव का पीड़ित होना जरुरी है | क्योंकि जब ये भाव पीड़ित होगा तो जातक के जन्मभूमि छोड़ने के योग बनते है |

विदेश योग के लिय कुंडली में तीसरा नोवाँ और बारवां भाव मुख्य भूमिका निभाते है | बारवें भाव को विदेश का ही भाव माना गया है इसिलिय तीसरा भाव जो की चोथे से बारवा होता है को विदेश जाने में अहम मना गया है | तीसरा भाव हमारी छोटी मोटी यात्राओं को इंगित करता है और ऐसे स्थान को बताता है जिनकी हमारे जन्मस्थान से ज्यादा दुरी न हो | कुंडली का नवम भाव जिसे भाग्य भाव भी कहते है जो लम्बी दुरी की यात्राओं को बताता है और ऐसे स्थानों को इंगित करता है जो हमारे जन्म स्थान से मध्यम दुरी पर हो | बारवा भाव लम्बी यात्रों और ऐसे स्थानों को बताता है जो हमारे जन्मस्थान से काफी दूर हो |

जैसा की आपको पता है की लग्न और लग्नेश की कुंडली में अहम भूमिका होती है ऐसे में विदेश योग की चर्चा इनके बिना नही हो सकती | जब भी बारवें भाव के स्वामी का सम्वन्ध लग्न या लग्नेश से हो रहा हो तो विदेश जाने के योग बनते है | जैसे बारवें का स्वामी लग्न में और लग्नेश बारवें भाव में हो | यदि लग्नेश बारवें में हो तो भी विदेश के योग बनेगे | इसके साथ चूँकि हमारा कर्म छेत्र का भाव दसम होता है इसिलिय यदि व्ययेश का सम्बन्ध दशमेश से बन रहा हो तो जातक के विदेश जाकर या विदेश से सम्बन्धित व्यवसाय करने के योग बनते है | इसी प्रकार ग्यारवाँ भाव हमारी आय लाभ को दर्शाता है ऐसे में जब व्ययेश का सम्बन्ध आएश से बन रहा हो तो भी विदेश से लाभ के योग बनते है | यदि व्ययेश चोथे भाव में हो तब भी विदेश के योग बनते है |

जब लग्नेश भाग्य भाव में हो और भाग्येश लग्न में हो तब भी विदेह जाने का योग जातक की कुंडली में बनता है |इसी प्रकार जब तृतीयेश का सम्बन्ध लग्नेश से बन रहा हो तो भी विदेश के कुछ योग बनते है |

जब भी विदेश में सेटेल होने की बता हो तो हमे इस बात का ध्यान रखना होता है की व्ययेश चतुर्थेस से बली हो और व्यय भाव चोथे भाव से ज्यादा बली होना चाहिए | चोथे भाव के पीड़ित होने से और व्यय भाव के बली होने से विदेश के योग प्रबल बनते है | जातक के विदेश में सेटेल होने के इन सबके साथ भाग्य भाव और भाग्येश का बली होना जरुरी है क्योंकि जब तक जातक को भाग्य का साथ नही मिलता उसे सफलता नही मिलती चाहे वो विदेश हो या देश | इन सबके साथ दशा महादशा देखना जरूरी है | यदि किसी ऐसे ग्रह की दशा चल रही हो जो आपको विदेश में लाभ दिला सकती है तो उस समय विदेश के लिय किया गया प्रयत्न लाभप्रद सिद्ध होता है | इसिलिय सभी बिन्दुओं पर विचार करके उसके बाद विदेश की तैयारी करे |


राशि अनुसार कुछ गुण संक्षेप में

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मेष राशि : दिल के साफ, मेहनती, जबान से कड़वे, मैच्योरिटी देर से आती है।

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वृषभ राशि : भावुक, कलाकार, सह्रदय मगर आलस और अहंकार इनके मार्ग की रूकावट बनता है।

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मिथुन राशि : डिटर्माइन, हार्डवर्किंग मगर डिसीजन गलत लेते है। हमेशा अनिर्णय की स्थिति में रहते हैं।

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कर्क राशि : भावुक, निश्छल, बुद्धिमान मगर जल्दी इंन्फ्लुएंस में आते हैं और गलत संगत में पड़ते है।

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सिंह राशि : मेहनती, अच्छे स्वभाव के, तेज-तर्रार होते हैं मगर अति अहंकार व स्वयं को सही समझना इनकी परेशानी बन जाता हैं।

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कन्या राशि : समझदार, बुद्धिमान, मेहनती मगर सही निर्णय न लेना और डरपोक, चिड़चिड़े होना इनकी कमी बन जाती है।

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तुला राशि : फोकस्ड, ऑब्जर्वेन्ट और त्वरित निर्णय लेते हैं मगर कई बार भावुकता, अति आत्मविश्वास और दूसरों की न सुनना इन्हें मुश्किल में डालता है।

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वृश्चिक राशि : बदला लेने की परवर्ती , होशियार समझदार होते हैं ब मगर जबान की कड़वाहट, हाईपर होना व जल्दबाजी इन्हें नुकसान देती हैं।

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धनु राशि : समझदार, बुद्धिमान, सह्रदय मगर एक साथ दो-तीन लक्ष्यों पर काम करना और अतिविश्वास इनको परेशानी में डालता है।

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मकर राशि : परिश्रमी, दूरदर्शी व इनोवेटिव, मगर चिड़चिड़े और जबान के तेज... इन्फ्लुएंस में जल्दी आते हैं।

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कुंभ राशि : होशियार, मेहनती मगर मूड स्विंग्स, जबान की तेजी, अहंकार और श्रेष्ठता के भ्रम के शिकार होते हैं। किसी से मुश्किल से बनती है।

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मीन राशि : होशियार, सह्रदय मगर दुविधा वाली मानसिकता व गलत निर्णय के कारण मुश्किल में आते हैं।

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विशेष : अपनी बुराइयों को सुधार कर ग्रहों को ठीक किया जा सकता है।


मेष (Aries)


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राशि चक्र की यह पहली राशि है, इस राशि का चिन्ह ”मेढा’ या भेडा है, इस राशि का विस्तार चक्र राशि चक्र के प्रथम 30 अंश तक (कुल 30 अंश) है। राशि चक्र का यह प्रथम बिन्दु प्रतिवर्ष लगभग 50 सेकेण्ड की गति से पीछे खिसकता जाता है। इस बिन्दु की इस बक्र गति ने ज्योतिषीय गणना में दो प्रकार की पद्धतियों को जन्म दिया है। भारतीय ज्योतिषी इस बिन्दु को स्थिर मानकर अपनी गणना करते हैं। इसे निरयण पद्धति कहा जाता है। और पश्चिम के ज्योतिषी इसमे अयनांश जोडकर ’सायन’ पद्धति अपनाते हैं। किन्तु हमे भारतीय ज्योतिष के आधार पर गणना करनी चाहिये। क्योंकि गणना में यह पद्धति भास्कर के अनुसार सही मानी गई है। मेष राशि पूर्व दिशा की द्योतक है, तथा इसका स्वामी ’मंगल’ है। इसके तीन द्रेष्काणों (दस दस अंशों के तीन सम भागों) के स्वामी क्रमश: मंगल-मंगल, मंगल-सूर्य, और मंगल-गुरु हैं। मेष राशि के अन्तर्गत अश्विनी नक्षत्र के चारों चरण और कॄत्तिका का प्रथम चरण आते हैं। प्रत्येक चरण 3.20' अंश का है, जो नवांश के एक पद के बराबर का है। इन चरणों के स्वामी क्रमश: अश्विनी प्रथम चरण में केतु-मंगल, द्वितीय चरण में केतु-शुक्र, तॄतीय चरण में केतु-बुध, चतुर्थ चरण में केतु-चन्द्रमा, भरणी प्रथम चरण में शुक्र-सूर्य, द्वितीय चरण में शुक्र-बुध, तॄतीय चरण में शुक्र-शुक्र, और भरणी चतुर्थ चरण में शुक्र-मंगल, कॄत्तिका के प्रथम चरण में सूर्य-गुरु हैं।

 

 

नक्षत्र चरणफलसंपादित करें

  • अश्विनी भदावरी ज्योतिष नक्षत्र के प्रथम चरण के अधिपति केतु-मंगल जातक को अधिक उग्र और निरंकुश बना देता है। वह किसी की जरा सी भी विपरीत बात में या कर्य में जातक को क्रोधात्मक स्वभाव देता है, फ़लस्वरूप जातक बात बात मे झगडा करने को उतारू हो जाता है। जातक को किसी की आधीनता पसंद नहीं होती है। वह अपने अनुसार ही कार्य और बात करना पसंद करता है।
  • दूसरे चरण के अधिपति केतु-शुक्र, जातक को ऐसो आराम की जिन्दगी जीने के लिये मेहनत वाले कार्यों से दूर रखता है, और जातक विलासी हो जाता है।
  • तीसरे चरण के अधिपति केतु-बुध जातक के दिमाग में विचारों की स्थिरता लाता है, और जातक जो भी सोचता है, करने के लिये उद्धत हो जाता है।
  • चौथे चरण के अधिपति केतु-चन्द्रमा जातक में भटकाव वाली स्थिति पैदा करता है, वह अपनी जिन्दगी में यात्रा को महत्व देता है, और जनता के लिये अपनी सहायतायें वाली सेवायें देकर पूरी जिन्दगी निकाल देगा।
  • भरणी भदावरी ज्योतिष के प्रथम चरण के अधिपति शुक्र-सूर्य, जातक को अभिमानी और चापलूस प्रिय बनाता है।
  • दूसरा चरण के अधिपति शुक्र-बुध जातक को बुद्धि वाले कामों की तरफ़ और संचार व्यवस्था से धन कमाने की वॄत्ति देता है।
  • तीसरे चरण के अधिपति शुक्र-शुक्र विलासिता प्रिय और दोहरे दिमाग का बनाता है, लेकिन अपने विचारों को उसमे सतुलित करने की अच्छी योग्यता होती है।
  • चौथे चरण के अधिपति शुक्र-मंगल जातक में उग्रता के साथ विचारों को प्रकट न करने की हिम्मत देते हैं, वह हमेशा अपने मन मे ही लगातार माया के प्रति सुलगता रहता है। जीवन साथी के प्रति बनाव बिगाड हमेशा चलता रहता है, मगर जीवन साथी से दूर भी नहीं रहा जाता है।
  • कॄत्तिका नक्षत्र के प्रथम चरण के अधिपति सूर्य-गुरु, जातक में दूसरों के प्रति सद्भावना और सदविचारों को देने की शक्ति देते हैं, वे अपने को समाज और परिवार में शालीनता की गिनती मे आते है।

 

प्रकॄति/स्वभाव


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मेष अग्नि तत्व वाली राशि है, अग्नि त्रिकोण (मेष, सिंह, धनु) की यह पहली राशि है, इसका स्वामी मंगल अग्नि ग्रह है, राशि और स्वामी का यह संयोग इसकी अग्नि या ऊर्जा को कई गुना बढा देती है, यही कारण है कि मेश जातक ओजस्वी, दबंग, साहसी, और दॄढ इच्छाशक्ति वाले होते हैं, यह जन्म जात योद्धा होते हैं। मेश राशि वाले व्यक्ति बाधाओं को चीरते हुए अपना मार्ग बनाने की कोशिश करते हैं।

आर्थिक गतिविधियां


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मेष जातकों के अन्दर धन कमाने की अच्छी योग्यता होती है, उनको छोटे काम पसंद नहीं होते हैं, उनके दिमाग में हमेशा बडी बडी योजनायें ही चक्कर काटा करती है, राजनीति के अन्दर नेतागीरी, संगठन कर्ता, उपदेशक, अच्छा बोलने वाले, कम्पनी को प्रोमोट करने वाले, रक्षा सेवाओं में काम करने वाले, पुलिस अधिकारी, रसायन शास्त्री, शल्य चिकित्सिक, कारखानों ए अन्दर लोहे और इस्पात का काम करने वालेभी होते हैं, खराब ग्रहों का प्रभाव होने के कारण गलत आदतों में चले जाते हैं, और मारकाट या दादागीरी बाली बातें उनके दिमाग में घूमा करतीं हैं, और अपराध के क्षेत्र मे प्रवेश कर जाते हैं।

स्वास्थ्य और रोगसंपादित करें

अधिकतर मेष राशि वाले जातकों का शरीर ठीक ही रहता है, अधिक काम करने के उपरान्त वे शरीर को निढाल बना लेते हैं, मंगल के मालिक होने के कारण उनके खून मे बल अधिक होता है, और कम ही बीमार पडते हैं, उनके अन्दर रोगों से लडने की अच्छी क्षमता होती है। अधिकतर उनको अपनी सिर की चोटों से बच कर रहना चाहिये, मेष से छठा भाव कन्या राशि का है, और जातक में पाचन प्रणाली मे कमजोरी अधिकतर पायी जाती है, मल के पेट में जमा होने के कारण सिरदर्द, जलन, तीव्र रोगों, सिर की बीमारियां, लकवा, मिर्गी, मुहांसे, अनिद्रा, दाद, आधाशीशी, चेचक, और मलेरिया आदि के रोग बहुत जल्दी आक्रमण करते हैं।


वॄष (Taurus) संपादित करें
राशि चक्र की यह दूसरी राशि है, इस राशि का चिन्ह ’बैल’ है, बैल स्वभाव से ही अधिक पारिश्रमी और बहुत अधिक वीर्यवान होता है, साधारणत: वह शांत रहता है, किन्तु क्रोध आने पर वह उग्र रूप धारण कर लेता है। यह स्वभाव वॄष राशि के जातक मे भी पाया जाता है, वॄष राशि का विस्तार राशि चक्र के 30 अंश से 60 अंश के बीच पाया जाता है, इसका स्वामी शुक्र ग्रह है। इसके तीन देष्काणों में उनके स्वामी ’शुक्र-शुक्र”, शुक्र-बुध’, और शुक्र-शनि, हैं। इसके अन्तर्गत कॄत्तिका नक्षत्र के तीन चरण,रोहिणी के चारों चरण, और मॄगसिरा के प्रथम दो चरण आते हैं। इन चरणों के स्वामी कॄत्तिका के द्वितीय चरण के स्वामी सूर्य-शनि, तॄतीय चरण के स्वामी चन्द्रमा-शनि, चतुर्थ चरण के स्वामी सूर्य-गुरु, हैं।रोहिणी नक्षत्र के प्रथम चरण के स्वामी चन्द्रमा-मंगल, दूसरे चरण के स्वामी चन्द्रमा-शुक्र, तीसरे चरण के स्वामी चन्द्रमा-बुध, चौथे चरण के स्वामी चन्द्रमा-चन्द्रमा, है।मॄगसिरा नक्षत्र के पहले चरण के मालिक मंगल-सूर्य, और दूसरे चरण के मालिक मंगल-बुध है। च्च्म्, च्ह्ग्फ्म्म्क्

नक्षत्र चरण फ़ल संपादित करें
कॄत्तिका के दूसरे चरण और तीसरे चरण के मालिक सूर्य-शनि, जातक के जीवन में पिता पुत्र की कलह फ़ैलाने मे सहायक होते है, जातक का मानस सरकारी कामों की तरफ़ ले जाने, और सरकारी ठेकेदारी का कार्य करवाने की योग्यता देते हैं, पिता के पास जमीनी काम या जमीन के द्वारा जीविकोपार्जन का साधन होता है। जातक अधिक तर मंगल के बद हो जाने की दशा में शराब, काबाब और भूत के भोजन में अपनी रुचि को प्रदर्शित करता है।
कॄत्तिका के चौथे चरण के मालिक सूर्य और गुरु का प्रभाव जातक में ज्ञान के प्रति अहम भाव को पैदा करने वाला होता है, वह जब भी कोई बात करता है तो गर्व की बात करता है, सरकारी क्षेत्रों की शिक्षाये और उनके काम जातक को अपनी तरफ़ आकर्षित करते हैं, और किसी प्रकार से केतु का बल मिल जाता है तो जातक सरकार का मुख्य सचेतक बनने की योग्यता रखता है।
रोहिणी के प्रथम चरण का मालिक चन्द्रमा-मंगल है, दोनो का संयुक्त प्रभाव जातक के अन्दर मानसिक गर्मी को प्रदान करता है, कल कारखानों, अस्पताली कामों और जनता के झगडे सुलझाने का काम जातक कर सकता है, जातक की माता आपत्तियों से घिरी होती है, और पिता का लगाव अन्य स्त्रियों से बना रहता है।
रोहिणी के दूसरे चरण के मालिक चन्द्र-शुक्र जातक को अधिक सौन्दर्य बोधी और कला प्रिय बनादेता है। जातक कलाकारी के क्षेत्र मे अपना नाम करता है, माता और पति का साथ या माता और पत्नी का साथ घरेलू वातावरण मे सामजस्यता लाता है, जातक या जातिका अपने जीवन साथी के अधीन रहना पसंद करता है।
रोहिणी के तीसरे चरण के मालिक चन्द्र-बुध जातक को कन्या संतान अधिक देता है, और माता के साथ वैचारिक मतभेद का वातावरण बनाता है, जातक या जातिका के जीवन में व्यापारिक यात्रायें काफ़ी होती हैं, जातक अपने ही बनाये हुए उसूलों पर अपना जीवन चलाता है, अपनी ही क्रियायों से वह मकडी जैसा जाल बुनता रहता है और अपने ही बुने जाल में फ़ंस कर अपने को समाप्त भी कर लेता है।
रोहिणी के चौथे चरण के मालिक चन्द्र-चन्द्र है, जातक के अन्दर हमेशा उतार चढाव की स्थिति बनी रहती है, वह अपने ही मन का राजा होता है।
मॄगसिरा के पहले चरण के मालिक मंगल-सूर्य हैं, अधिक तर इस युति मै पैदा होने वाले जातक अपने शरीर से दुबले पतले होने के वावजूद गुस्से की फ़ांस होते हैं, वे अपने को अपने घमंड के कारण हमेशा अन्दर ही अन्दर सुलगाते रहते हैं। उनके अन्दर आदेश देने की वॄति होने से सेना या पुलिस में अपने को निरंकुश बनाकर रखते है, इस तरह के जातक अगर राज्य में किसी भी विभाग में काम करते हैं तो सरकारी सम्पत्ति को किसी भी तरह से क्षति नहीं होने देते.
मॄगसिरा के दूसरे चरण के मालिक मंगल-बुध जातक के अन्दर कभी कठोर और कभी नर्म वाली स्थिति पैदा कर देते हैं, कभी तो जातक बहुत ही नरम दिखाई देता है, और कभी बहुत ही गर्म मिजाजी बन जाता है। जातक का मन कम्प्यूटर और इलेक्ट्रोनिक सामान को बनाने और इन्ही की इन्जीनियरिंग की तरफ़ सफ़लता भी देता है।
लगन संपादित करें
जब चन्द्रमा निरयण पद्धति से वॄष राशि में होता है तो जातक की वॄष राशि मानी जाती है, जन्म समय में जन्म लगन वॄष होने पर भी यही प्रभाव जातक पर होता है। इस राशि मे पैदा होने वाले जातक शौकीन तबियत, सजावटी स्वभाव, जीवन साथी के साथ मिलकर कार्य करने की वॄत्ति, अपने को उच्च समाज से जुड कर चलने वाले, अपने नाम को दूर दूर तक फ़ैलाने वाले, हर किसी के लिये उदार स्वभाव, भोजन के शौकीन, बहुत ही शांत प्रकॄति, मगर जब क्रोध आजाये तो मरने मारने के लिये तैयार, बचपन में बहुत शैतान, जवानी मे कठोर परिश्रमी, और बुढापे में अधिक चिताओं से घिरे रहने वाले, जीवन साथी से वियोग के बाद दुखी रहने वाले, और अपने को एकांत में रखने वाले, पाये जाते हैं। इनके जीवन में उम्र की 45 वीं साल के बाद दुखों का बोझ लद जाता है, और अपने को आराम में नही रखपाते हैं। वॄष पॄथ्वी तत्व वाली राशि और भू मध्य रेखा से 20 अंश पर मानी गई है, वॄष, कन्या, मकर, का त्रिकोण, इनको शुक्र-बुध-शनि की पूरी योग्यता देता है, माया-व्यापार-कार्य, या धन-व्यापार-कार्य का समावेश होने के कारण इस राशि वाले धनी होते चले जाते है, मगर शनि की चालाकियों के कारण यह लोग जल्दी ही बदनाम भी हो जाते हैं। गाने बजाने और अपने कंठ का प्रयोग करने के कारण इनकी आवाज अधिकतर बुलन्द होती है। अपने सहायकों से अधिक दूरी इनको बर्दास्त नही होती है।

प्रकॄति और स्वभाव संपादित करें
वृष राशि वाले जातक शांति पूर्वक रहना पसंद करते हैं, उनको जीवन में परिवर्तन से चिढ सी होती है, इस राशि के जातक अपने को बार बार अलग माहौल में रहना अच्छा नही लगता है। इस प्रकार के लोग सामाजिक होते हैं और अपने से उच्च लोगों को आदर की नजर से देखते है। जो भी इनको प्रिय होते हैं उनको यह आदर खूब ही देते हैं, और सत्कार करने में हमेशा आगे ही रहते है। सुखी और विलासी जीवन जीना पसंद करते हैं।

आर्थिक गतिविधियां संपादित करें
इस राशि के जातको मे धन कमाने की प्रवॄति और धन को जमा करने की बहुत इच्छा होती है, धन की राशि होने के कारण अक्सर ऐसे जातक खुद को ही धन के प्रयुक्त करते हैं, बुध की प्रबलता होने के कारण जमा योजनाओं मे उनको विश्वास होता है, इस राशि के लोग लेखाकारी, अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, कलाकार, सजावट कर्ता, सौन्दर्य प्रसाधन का कार्य करने वाले, प्रसाधन सामग्री के निर्माण कर्ता, आभूषण निर्माण कर्ता, और आभूषण का व्यवसाय करने वाले, विलासी जीवन के साधनो को बनाकर या व्यापार करने के बाद कमाने वाले, खाद्य सामग्री के निर्माण कर्ता, आदि काम मिलते हैं। नौकरी में सरकारी कर्मचारी, सेना या नौसेना मे उच्च पद, और चेहरे आदि तथा चेहरा सम्भालने वाले भी होते हैं। धन से धन कमाने के मामले में बहुत ही भाग्यवान माने जाते हैं।

स्वास्थ्य और रोग संपादित करें
वॄष राशि वालो के लिये अपने ही अन्दर डूबे रहने की और आलस की आदत के अलावा और कोई बडी बीमारी नही होती है, इनमे शारीरिक अक्षमता की आदत नही होती है, इनके अन्दर टांसिल, डिप्थीरिया, पायरिया, जैसे मुँह और गले के रोग होते हैं, जब तक इनके दांत ठीक होते है, यह लोग आराम से जीवन को निकालते हैं, और दांत खराब होते ही इनका जीवन समाप्ति की ओर जाने लगता है। बुढापे में जलोदर और लकवा वाले रोग भी पीछे पड जाते है।


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

राहु:
1. राहु एक करामाती ग्रह है।
2. राहू वह धमकी है जिससे आपको डर लगता है |
3. जेल में बंद कैदी भी राहू है |
राहू सफाई कर्मचारी है |
4. स्टील के बर्तन राहू के अधिकार में आते हैं।
5. हाथी दान्त की बनी सभी वस्तुए राहू रूप हैं |
6. राहू वह मित्र है जो पीठ पीछे आपकी निंदा करता है।
7. दत्तक पुत्र भी राहू की देन होता है |
8. नशे की वस्तुएं राहू हैं |
9. दर्द का टीका राहू है |
10. राहू मन का वह क्रोध है जो कई साल के बाद भी शांत नहीं हुआ है, न लिया हुआ बदला भी राहू है |
11. शेयर मार्केट की गिरावट राहू है, उछाल केतु है |
12. बहुत समय से ताला लगा हुआ मकान राहू है |
13. बदनाम वकील भी राहू है |
14. मिलावटी शराब राहू है |
15. राहू वह धन है जिस पर आपका कोई हक़ नहीं है या जिसे अभी तक लौटाया नहीं गया है | ना लौटाया गया उधार भी राहू है।
16. उधार ली गयी सभी वस्तुएं राहू खराब करती हैं।
17. यदि आपकी कुंडली में राहू अच्छा नहीं है तो किसी से कोई चीज़ मुफ्त में न लें क्योंकि हर मुफ्त की चीज़ पर राहू का अधिकार होता है |
18. राहू ग्रह का कुछ पता नहीं कि कब बदल जाए जैसे कि आप कल कुछ काम करने वाले हैं लेकिन समय आने पर आपका मन बदल जाए और आप कुछ और करने लगें तो इस दुविधा में राहू का हाथ होता है | किसी भी प्रकार की अप्रत्याशित घटना का दावेदार राहू ही होता है | आप खुद नहीं जानते की आप आने वाले कुछ घंटों में क्या करने वाले हैं या कहाँ जाने वाले हैं तो इसमें निस्संदेह राहू का आपसे कुछ नाता है | या तो राहू लग्नेश के साथ है या लग्न में ही राहू है | यदि आप जानते हैं की आप झूठ की राह पर हैं परन्तु आपको लगता है की आप सही कर रहे हैं तो यह धारणा आपको देने वाला राहू ही है !
19. किसी को धोखा देने की प्रवृत्ति राहू पैदा करता है यदि आप पकडे जाएँ तो इसमें भी आपके राहू का दोष है और यह स्थिति बार बार होगी इसलिए राहू का अनुसरण करना बंद करें क्योंकि यह जब बोलता है तो कुछ और सुनाई नहीं देता |
20. जिस तरह कर्ण पिशाचिनी आपको गुप्त बातों की जानकारी देती है उसी तरह यदि राहू आपकी कुंडली में बलवान होगा तो आपको सभी तरह की गुप्त बातें बैठे बिठाए ही पता चल जायेंगी | यदि आपको लगता है की सब कुछ गुप्त है और आपसे कुछ छुपाया जा रहा है या आपके पीठ पीछे बोलने वाले लोग बहुत अधिक हैं तो यह भी राहू की ही करामात है |
21. राहू रहस्य का कारक ग्रह है और तमाम रहस्य की परतें राहू की ही देन होती हैं | राहू वह झूठ है जो बहुत लुभावना लगता है | राहू झूठ का वह रूप है जो झूठ होते हुए भी सच जैसे प्रतीत होता है | राहू कम से कम सत्य तो कभी नहीं है |
22. जो सम्बन्ध असत्य की डोर से बंधे होते हैं या जो सम्बन्ध दिखावे के लिए होते हैं वे राहू के ही बनावटी सत्य हैं |
23. राहू व्यक्ति को झूठ बोलना सिखाता है बातें छिपाना, बात बदलना, किसी के विशवास को सफलता पूर्वक जीतने की कला राहू के अलावा कोई और ग्रह नहीं दे सकता |
24. राहू वह लालच है जिसमे व्यक्ति को कुछ अच्छा बुरा दिखाई नहीं देता केवल अपना स्वार्थ ही दिखाई देता है |
25. क्यों न हों ताकतवर राहू के लोग सफल? क्यों बुरे लोग तरक्की जल्दी कर लेते हैं | क्यों झूठ का बोलबाला अधिक होता है और क्यों दिखावे में इतनी जान होती है ? क्योंकि इन सबके पीछे राहू की ताकत रहती है|
26. मांस मदिरा का सेवन, बुरी लत, चालाकी और क्रूरता, अचानक आने वाला गुस्सा, पीठ पीछे की वो बुराई, जो ये काम करे ये सब राहू की विशेषताएं हैं| असलियत को सामने न आने देना ही राहू की खासियत है।
 


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

ग्रहों का प्रभाव नहीं करेगा परेशान, करते रहें ये छोटे-छोटे काम
प्रत्येक प्राणी पर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है ‘यथा पिंडे तथा ब्राह्मणे’ के अनुसार अरिष्टदायक स्थिति को शुभ मंगलमय बनाने के लिए कुछ सरल उपाय करें तो निश्चित ही हमें शुभदायक परिणाम मिलेंगे तथा जीवन में नए कार्य के प्रति बनाई गई योजनाओं में लाभ भी प्राप्त होगा। पुण्य कार्य सुफलम् दायकम हम करें। उपाय सरल एवं सर्वजन हेतु करने योग्य कुछ इस प्रकार हैं :

यथा शक्ति कुछ न कुछ गरीबों को दान देना चाहिए। न प्रत्येक प्राणी पर दया भाव के साथ तन-मन-धन से सहयोग यथा योग्य करना चाहिए। सेवा कर यश प्राप्ति की भावना
न रखें।

अमक्ष्य वस्तुओं को कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए।

यदि आपके शहर, गांव के पास तालाब, नदी या सागर हो तो उसमें कछुए और मछलियों को कुछ आटे की गोलियां बनाकर खिलानी चाहिएं।

किसी भी नए कार्य के लिए प्रस्थान से पूर्व मंगलीक (गुड़) का सेवन जरूर करें।

सदैव ईश्वर की महान शक्ति पर पूर्ण विश्वास करते हुए जीवन जीना चाहिए तथा अधर्म (हिंसा) से डरते हुए यानी बचते हुए धर्म (अहिंसा) की भावना से मानव मात्र का कल्याण हो, ऐसा चिंतन होना चाहिए।

प्रत्येक प्राणी के प्रति यथा शक्ति, दया, स्नेह और सेवा की भावना रखें।

नियमित रूप से घर की प्रथम रोटी गाय को तथा अंतिम रोटी कुत्ते को दें तो घर में रिद्धि-सिद्धि का आगमन एवं भाग्योदय होगा।

प्रत्येक शनिवार को पीपल के वृक्ष पर जल, कच्चा दूध थोड़ा चढ़ा कर सात परिक्रमा करके सूर्य, शंकर पीपल इन तीनों की सविधि पूजा करें। चढ़े जल को नेत्रों में लगाएं और ‘पितृ देवाय नम:’ भी 4 बार बोलें तो राहू, केतु, शनि, पितृ दोष का निवारण होता है।
वास्तु दोष: परेशान‌ियों से बचने के लिए रखें ध्यान
हर व्यक्ति का ख्वाब होता है की उसका अपना एक आशियाना हो। इसके लिए वो जी तोड़ मेहनत करता है। कई बार ऐसी स्थिती हो जाती है की हाथ में पैसा होता है लेकिन चाह कर भी घर समय पर पूरा नहीं हो पाता या बेचने की कगार पर आ जाता है। नए घर में आकर पारिवारिक सदस्यों में मतभेद आरंभ हो जाते हैं एवं सुख चैन में कमी आ जाती है। वास्तु के अनुसार इन सभी कारणों के पीछे वास्तु दोष का बड़ा हाथ हो सकता है। वास्तु दोष से होने वाली परेशान‌ियों से बचने के लिए रखें ध्यान-

घर के दक्षिण-पूर्व में गड्ढा होना घर में रहने वाले लोगों के लिए बड़े रोगों का कारण बन सकता है। वहीं उत्तर-पश्चिम में गड्ढा होना शत्रुता को जन्म दे सकता है, दक्षिण में गड्ढे का होना कार्यों में रुकावट डालता है तथा आर्थिक समस्याएं उत्पन्न करता है। घर के उत्तर-पूर्व में खुला स्थान यश और समृद्धि देता है, दक्षिण-पश्चिम में अधिक खुली जगह छोडऩा हानिकारक है तथा सहयोगियों में झगड़े का कारण हो सकता है। तैयार सामान घर के उत्तर-पश्चिम कोने में रखें। ऐसा करने से सामान बिकने में काफी मदद मिलती है तथा शीघ्र ही धन की वसूली होती है। पानी का साधन प्लाट के उत्तर-पूर्व में होना चाहिए, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम में पानी का साधन होने से गृहस्वामियों को संकट में डाल सकता है तथा उत्तर-पश्चिम में भूमिगत जलकुंड का होना वंश वृद्धि में रुकावट उत्पन्न करता है तथा धन हानि का कारण होता है।

घर या व्यवसाय के उत्तर-पूर्वी कोने को अवरुद्ध कर देने से भगवान की कृपा या आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता तथा घर में सुख-समृद्धि नहीं आती। जिस घर का उत्तर-पूर्व का कोई भाग टूटा हो तो उस घर में अपंग संतान उत्पन्न हो सकती है। असंगत, या विचित्र प्रकृति के प्लाट कोई न कोई समस्या उत्पन्न करते हैं इसमें गोलाकार, त्रिभुजाकार, बहुभुजाकार, चतुर्भुजाकार या आयताकार प्लाट शामिल हैं। रसोई घर, शौचालय, स्नानघर व पूजा का स्थान एक-दूसरे के अगल या बगल *आईये जानते है ग्रहोका स्वभाव**🙏
अपने हुक्म को मजबूती से लागू करवाना ''सूर्य'' का काम है।
माहौल में वात्स्लय घोलना ''चन्द्र'' का काम है।
सटिकता से क्रूरता से अपने लक्ष्य को भेदना मंगल का लक्षण है।
गंभीर वातावरण में हास्य का पुट डालना ''बुध'' के जिम्मे है। फौरी तौर पर समस्या को सुलझा देना भी बुध का काम है।
किसी समस्या को अपने ज्ञान द्वारा सुलझाना ''गुरु'' का काम है।
खूबसूरती से कुछ परोसना ''शुक्र'' पर निर्भर करता है।
धीरज के साथ अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहना ''शनि'' के जिम्मे आता है। १ दिन के काम को ५ दिन में पूरा करना भी शनी का स्वभाव है।
कभी भी संतुष्टि का अनुभव न करना ''राहु'' का काम है।
दिशाहीन हो जाना ''केतु'' का स्वभाव है ।
 


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

वैवाहिक जीवन : दोष एवं निवारण
प्रश्नः किन योगों के कारण विवाह में विलंब या वैवाहिक जीवन में क्लेश, तनाव, मानसिक पीड़ा और तलाक जैसी स्थिति उत्पन्न होती है। इन स्थितियों से बचाव के लिए किए जाने वाले उपायों का वर्णन। विवाह संस्कार भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह मनुष्य को परमात्मा का एक वरदान है। कहते हैं, जोड़ियां परमात्मा द्वारा पहले से ही तय होती हैं। पूर्व जन्म में किए गए पाप एवं पुण्य कर्मों के अनुसार ही जीवन साथी मिलता है और उन्हीं के अनुरूप वैवाहिक जीवन दुखमय या सुखमय होता है। कुंडली में विवाह का विचार मुखयतः सप्तम भाव से ही किया जाता है। इस भाव से विवाह के अलावा वैवाहिक या दाम्पत्य जीवन के सुख-दुख, जीवन साथी अर्थात पति एवं पत्नी, काम (भोग विलास), विवाह से पूर्व एवं पश्चात यौन संबंध, साझेदारी आदि का विचार किया जाता है। यदि कोई भाव, उसका स्वामी तथा उसका कारक पाप ग्रहों के मध्य में स्थित हों, प्रबल पापी ग्रहों से युक्त हों, निर्बल हों, शुभग्रह न उनसे युत हों न उन्हें देखते हों, इन तीनों से नवम, चतुर्थ, अष्टम, पंचम तथा द्वादश स्थानों में पाप ग्रह हों, भाव नवांश, भावेश नवांश तथा भाव कारक नवांश के स्वामी भी शत्रु राशि में, नीच राशि में अस्त अथवा युद्ध में पराजित हों तो उस भाव से संबंधित वस्तुओं की हानि होती है। (उत्तर कालामृत) वैवाहिक जीवन के अशुभ योग यदि सप्तमेश शुभ युक्त न होकर षष्ठ, अष्टम या द्वादश भावस्थ हो और नीच या अस्त हो, तो जातक या जातका के विवाह में बाधा आती है। यदि षष्ठेश, अष्टमेश या द्वादशेश सप्तम भाव में विराजमान हो, उस पर किसी ग्रह की शुभ दृष्टि न हो या किसी ग्रह से उसका शुभ योग न हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा आती है। सप्तम भाव में क्रूर ग्रह हो, सप्तमेश पर क्रूर ग्रह की दृष्टि हो तथा द्वादश भाव में भी क्रूर ग्रह हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा आती है। सप्तमेश व कारक शुक्र बलवान हो, तो जातक को वियोग दुख भोगना पड़ता है। यदि शुक्र सप्तमेश हो (मेष या वृश्चिक लग्न) और पाप ग्रहों के साथ अथवा उनसे दृष्ट हो, या शुक्र नीच व शत्रु नवांश का या षष्ठांश में हो, तो जातक स्त्री कठोर चित्त वाली, कुमार्गगामिनी और कुलटा होती है। फलतः उसका वैवाहिक जीवन नारकीय हो जाता है। यदि शनि सप्तमेश हो, पाप ग्रहों क साथ व नीच नवांश में हो अथवा नीच राशिस्थ हो और पाप ग्रहों से दृष्ट हो, तो जीवन साथी के दुष्ट स्वभाव के कारण वैवाहिक जीवन क्लेशमय होता है। राहु अथवा केतु सप्तम भाव में हो व उसकी क्रूर ग्रहों से युति बनती हो या उस पर पाप दृष्टि हो, तो वैवाहिक जीवन अक्सर तनावपूर्ण रहता है। यदि सप्तमेश निर्बल हो और भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तथा कारक शुक्र कमजोर हो, तो जीवन साथी की निम्न सोच के कारण वैवाहिक जीवन क्लेशमय रहता है। सूर्य लग्न में व स्वगृही शनि सप्तम भाव में विराजमान हो, तो विवाह में बाधा आती आती है या विवाह विलंब से होता है। सप्तमेश वक्री हो व शनि की दृष्टि सप्तमेश व सप्तम भाव पर पड़ती हो, तो विवाह में विलंब होता है। सप्तम भाव व सप्तमेश पाप कर्तरी योग में हो, तो विवाह में बाधा आती है। शुक्र शत्रुराशि में स्थित हो और सप्तमेश निर्बल हो, तो विवाह विलंब से होता है। शनि सूर्य या चंद्र से युत या दृष्ट हो, लग्न या सप्तम भाव में स्थित हो, सप्तमेश कमजोर हो, तो विवाह में बाधा आती है। शुक्र कर्क या सिंह राशि में स्थित होकर सूर्य और चंद्र के मध्य हो और शनि की दृष्टि शुक्र पर हो, तो विवाह नहीं होता है। शनि की सूर्य या चंद्र पर दृष्टि हो, शुक्र शनि की राशि या नक्षत्र में में हो और लग्नेश तथा सप्तमेश निर्बल हों, तो विवाह में बाधा निश्चित रूप से आती है। वैवाहिक जीवन में क्लेश सप्तम भाव, सप्तमेश और द्वितीय भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव वैवाहिक जीवन में क्लेश उत्पन्न करता है। लग्न, सप्तम भाव, सप्तमेश की कारक शुक्र, राहु, केतु या मंगल से दृष्टि या युति के फलस्वरूप दाम्पत्य जीवन में क्लेश पैदा होता है। यदि जातक व जातका का कुंडली मिलान (अष्टकूट) सही न हो, तो दाम्पत्य जीवन में वैचारिक मतभेद रहता है। यदि जातक व जातका की राशियों में षडाष्टक भकूट दोष हो, तो दोनों के जीवन में शत्रुता, विवाद, कलह अक्सर होते रहते हैं। यदि जातक व जातका के मध्य द्विर्द्वादश भकूट दोष हो, तो खर्चे व दोनों परिवारों में वैमनस्यता आती है जिसके फलस्वरूप दोनों के मध्य क्लेश रहता है। यदि पति-पत्नी के ग्रहों में मित्रता न हो, तो दोनों के बीच वैचारिक मतभेद रहता है। जैसे यदि ज्ञान, धर्म, रीति-रिवाज, परंपराओं, प्रतिष्ठा और स्वाभिमान के कारक गुरु तथा सौंदर्य, भौतिकता और ऐंद्रिय सुख के कारक शुक्र के जातक और जातका की मानसिकता, सोच और जीवन शैली बिल्कुल विपरीत होती है। पति-पत्नी के गुणों (अर्थात स्वभाव) में मिलान सही न होने पर आपसी तनाव की संभावना बनती है। अर्थात पति-पत्नी के मध्य अष्टकूट मिलान बहुत महत्वपूर्ण है, जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार कर लेना चाहिए। मंगल दोष भी पति-पत्नी के मध्य तनाव का कारक होता है। स्वभाव से गर्म व क्रूर मंगल यदि प्रथम (अपना), द्वितीय (कुटुंब, पत्नी या पति की आयु), चतुर्थ (सुख व मन), सप्तम (पति या पत्नी, जननेंद्रिय और दाम्पत्य), अष्टम (पति या पत्नी का परिवार और आयु) या द्वादश (शय्या सुख, भोगविलास, खर्च का भाव) भाव में स्थित हो या उस पर दृष्टि प्रभाव से क्रूरता या गर्म प्रभाव डाले, तो पति-पत्नी के मध्य मनमुटाव, क्लेश, तनाव आदि की स्थिति पैदा होती है। राहु, सूर्य, शनि व द्वादशेश पृथकतावादी ग्रह हैं, जो सप्तम (दाम्पत्य) और द्वितीय (कुटुंब) भावों पर विपरीत प्रभाव डालकर वैवाहिक जीवन को नारकीय बना देते हैं। दृष्टि या युति संबंध से जितना ही विपरीत या शुभ प्रभाव होगा उसी के अनुरूप वैवाहिक जीवन सुखमय या दुखमय होगा। द्वितीय भाव में सूर्य के सप्तम, सप्तमेश, द्वादश और द्वादशेश पर (राहु पृथकतावादी ग्रह) प्रभाव से दाम्पत्य जीवन में क्लेश की, यहां तक कि तलाक की नौबत आ जाती है। उदाहरण कुंडली 1 की विवेचना सप्तमेश व द्वादशेश मंगल से राहु की युति, केतु की दृष्टि। द्वितीय भाव में सूर्य (मंगल राहु का प्रभाव लिए हुए है, क्योंकि सूर्य की राशि में मंगल राहु स्थित हैं) विराजमान। सप्तम भाव पर चंद्र की दृष्टि। सप्तमेश मंगल नवमांश में नीच का है। जातक का दाम्पत्य जीवन अति कष्टमय (पत्नी और पति में तनाव) है। दो तीन बार तलाक की नौबत आ चुकी है। मात्र स्वगृही शुक्र, स्वगृही बुध व भाग्येश स्वगृही शनि के के कारण तलाक नहीं हो रहा है। उदाहरण कुंडली-2 की विवेचना द्वादश भाव में मंगल (कुजदोष) तथा सप्तमेश का पीड़ित होना दाम्पत्य जीवन में तनाव पैदा करता है। बारहवें भाव में मंगल (कुज दोष), व सप्तम भाव पर मंगल की आठवीं दृष्टि। शनि की सप्तम भाव पर दशम दृष्टि। सप्तमेश बुध और विवाह कारक शुक्र पाप कर्तरी दोष से पीड़ित है। अष्टम और द्वादश भाव में क्रूर व पापी ग्रह जीवन साथी से विछोह कराते हैं। विवाह में बाधक योग सप्तमेश व द्वितीयेश षष्ठ भाव में, सप्तम भाव पर शनि की नीच दृष्टि व षष्ठेश की दृष्टि, केंद्र में शुभ प्रभाव की कमी इन सभी योगों के फलस्वरूप अत्यधिक विवाह बाधा योग अर्थात अविवाहित योग बनता है। मेलापक में योनिकूट की महत्ता आठ तत्वों का विवेचन मेलापक में करते हैं। ये तत्व हैं- वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी। मेलापक में आज के युग में योनि कूट का विशेष महत्व है। इससे वर और कन्या के काम पक्ष की जानकारी होती है। आज के इस भौतिकवादी युग में 'मेलापक' पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है, जिससे वैवाहिक जीवन निष्फल हो जाता है। 'योनिकूट' के मेल खाने से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। मानव और जानवर में आहार, निद्रा, भय एवं मैथुन ये चार प्रवृत्तियां समान रूप से विद्यमान रहती हैं। किंतु मैथुन का महत्व आज के युग में अत्यधिक है। हमारे द्रष्टा ऋषियों ने नक्षत्रों का वर्गीकरण लिंग के आधार पर किया है। कन्या हो या वर, जिस नक्षत्र में पैदा होता है, उस नक्षत्र का प्रभाव उस पर पड़ता है। उसका मैथुन स्वभाव तत्संबंधित योनि के अनुरूप होता है। कुंडली मेलापन के समय यदि इस बात पर विचार किया जाए, तो निश्चय ही दोनों का शारीरिक संबंध संतोषजनक रहेगा अन्यथा वैवाहिक जीवन में कटुता पैदा होगी। विवाह हेतु मेलापक में योनिकूट का अपना विशेष महत्व है। जिन वर और कन्या के योनिकूट पर ध्यान नहीं दिया जाता, उनका वैवाहिक जीवन कष्टमय हो जाता है। दूसरी तरफ, जिनकी कुंडली मिलान में योनिकूट पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाता है, उनका वैवाहिक जीवन आनंदमय रहता है। इस यूरेनियम युग में शुक्र अति शक्तिशाली हो रहा है। इससे भविष्य में सेक्स की प्रधानता रहेगी। ऐसे में योनिकूट का महत्व और अधिक बढ़ गया है, जिस पर ध्यान देना ही चाहिए, ताकि तलाक की स्थिति से बचा जा सके। इसी में नवदम्पति का कल्याण है। पति-सुख की प्राप्ति हेतु मंगल दोष परिहार मंत्र : विवाह में विलंब से बचने के विविध मंत्रों, स्तोत्रों तथा उनकी जप और पाठ विधियों का विवरण इस प्रकार है। मंगल दोष से ग्रस्त जातका को 108 दिनों तक नियमित रूप से एक पंचमुखी दीप प्रज्वलित कर निम्नोक्त श्री मंगल चंडिका स्तोत्र का 7 अथवा 21 बार निष्ठापूर्वक पाठ करना चाहिए। ''रक्ष-रक्ष जगन्मात देवि मंगल चंडिके। हारिके विपदा राशे हर्ष मंगल कारिके॥ हर्ष मंगल दक्षे च हर्ष मंगल दायिके। शुभे मंगलदक्षे च शुभे मंगल चंडिके॥ मंगले मंगलाहे च सर्व मंगल मंगले। यदा मंगलवे देवि सर्वेषा मंगलालये॥'' पति-सुख की प्राप्ति का मंत्र इस मंत्र का 48 दिन तक नित्य 108 बार जप करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। '' सिन्धुर पत्र रतिकामदेह, दिव्याम्बर सिन्धु समीहिताङ्गम॥ सान्ध्यारूण धनुः पंकजपुष्पबाण पंचायुध भुवन मोहन मोक्ष गार्थम्॥ फलै मन्मथाय महाविष्णु स्वरूपाय, महाविष्णु पुत्राय, महापुरुषाय। पति सुखं मोहे शीघ्र देहि देहि॥ विधि : पाठ और जप पीत वस्त्र धारण कर, ललाट पर तिलक लगाकर उत्तर अथवा पूर्व दिशाभिमुख बैठकर करना चाहिए। जप की संपूर्ण अवधि में शुद्ध घी से पीतल अथवा चांदी का दीप प्रज्वलित करना चाहिए। हर बार हाथ में जल लेकर मंत्रोच्चारण कर जल को भूमि पर छोड़ देना चाहिए। किशमिश का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। कुयोगों को काटने के लिए उक्त पाठ और जप के अतिरिक्त शिव-पार्वती का अनुष्ठान, मां दुर्गा की पूजा-अर्चना, दुर्गा सप्तशती के प्रयोग कारक ग्रहों के रत्न धारण, कुयोगदायक ग्रहों से संबंधित मंत्र का जप, पूजा अनुष्ठान, दाना आदि करना चाहिए। अनुभूत उपाय : उचित समय पर विवाह हेतु कन्या को कम से कम सवा पांच रत्ती का पुखराज सोने की अंगूठी में गुरुवार को बायें हाथ की तर्जनी में और कम से कम सात रत्ती का फीरोजा चांदी की अंगूठी में शुक्रवार को बायें हाथ की कनिष्ठिका में धारण कराना चाहिए। इनके अतिरिक्त उपाय व निवारण में यंत्र की पूजा भी करनी चाएि। यदि कुंडली में वैधव्य योग हो, तो शादी से पहले घट विवाह, अश्वत्थ विवाह, विष्णु प्रतिमा या शालिग्राम विवाह विवाह कराना तथा प्रभु शरण में रहना चाहिए। वैवाहिक जीवन में सुखानुभूति हेतु सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए निम्नलिखित मंत्र का जप विधि विधानपूर्वक करना चाहिए। मंत्र : ऐं श्रीं क्लिम् नमस्ते महामाये महायोगिन्धीश्वरी। सामान्जस्यम सर्वतोपाहि सर्व मंगल कारिणीम्॥ शुक्ल पक्ष के गुरुवार को स्नान करके शाम के समय पूजा प्रारंभ करें। पूजा के समय मुख-पश्चिम की ओर होना चाहिए। दुर्गा जी का चित्र सामने रखकर गाय के घी का दीप जलाएं। समान वजन की सोने की दो अंगूठियां देवी मां के चरणों में अर्पित करें। गुलाब के 108 पुष्प 108 बार मंत्र पढ़कर अर्पित करें। लाल चंदन की माला से 21 दिन तक प्रतिदिन एक माला जप करें। 21 दिन बाद मां के चरणों में अर्पित अंगूठियां लेकर एक किसी योग्य और कर्मनिष्ठ ब्राह्मण को दे दें और दूसरी स्वय पहन लें। यह पूजा-अर्चना निष्ठापूर्वक करें, दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा। इसके अतिरिक्त श्री दुर्गा-सप्तशती का स्वयं पाठ करें। अष्टकवर्ग के नियमानुसार यदि सर्वाष्टक वर्ग में सातवें विवाह भाव में शुभ बिंदुओं की संखया जितनी कम हो, दाम्पत्य जीवन उतना ही दुखद होता है। वर्ग में बिंदुओं की संखया 25 से कम होने की स्थिति में वैवाहिक जीवन अत्यंत दुखद होता है। लाल किताब के योग एवं उपाय शुक्र एवं राहु की किसी भी भाव में युति वैवाहिक जीवन के लिए दुखदायी होती है। यह युति पहले भाव 4 या 7 में हो, तो पति-पत्नी में तलाक की नौबत आ जाती है या अकाल मृत्यु की संभावना रहती है। उपाय यदि ऐसा विवाह हो चुका हो, तो चांदी के गोल वर्तन में काजल या बहते दरिया का पानी और शुद्ध चांदी का टुकड़ा डालकर किसी धर्मस्थान में देना चाहिए। साथ ही एक चांदी के बर्तन में गंगाजल या किसी अन्य बहते दरिया का पानी और चांदी का टुकड़ा डालकर अपने पास रखना चाहिए। यह उपाय विवाह से पूर्व या बाद में कर सकते हैं। यदि सातवें भाव में राहु हो, तो विवाह के संकल्प के समय बेटी वाला चांदी का एक टुकड़ा बेटी को दे। इससे बेटी के दाम्पत्य जीवन में क्लेश की संभावना कम रहती है। यह उपाय लग्न में राहु रहने पर भी कर सकते हैं, क्योंकि इस समय राहु की दृष्टि सातवें भाव पर होती है। यदि भाव 1 या 7 में राहु अकेला या शुक्र के साथ हो, तो 21 वें वर्ष या इससे पूर्व विवाह होने पर वैवाहिक जीवन दुखमय होता है। अतः उपाय के तौर पर विवाह 21 वर्ष के पश्चात ही कुंडली मिलान करके करें। सूर्य और बुध के साथ शुक्र की युति किसी भी भाव में होने पर वैवाहिक जीवन में कुछ न कुछ दोष अवश्य ही उत्पन्न होता है, जिससे दाम्पत्य जीवन दुखमय रहता है। उपाय तांबे के एक लोटे में साबुत मूंग भरकर विवाह के संकल्प के समय हाथ लगाकर रखना चाहिए और इसे जल में प्रवाहित करना चाहिए। यदि यह उपाय विवाह के समय न हो सके, तो जिस वर्ष उक्त तीनों ग्रह लाल किताब के वर्षफलानुसार आठवें भाव में आएं, उस वर्ष कर सकते हैं। शुक्र यदि आठवें भाव में हो, तो जातक की पत्नी सखत स्वभाव की होती है, जिससे आपसी सामंजस्य का अभाव रहता है। इस योग की स्थिति में विवाह 25 वर्ष की उम्र के बाद ही करना चाहिए। इसके पहले विवाह करने पर पत्नी के स्वास्थ्य के साथ-साथ गृहस्थ सुख पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। उपाय आठवें भाव में स्थित शुक्र के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए नीले रंग के फूल घर से बाहर जमीन में दबा दें या गंदे नाले में डाल दें। सर्वजन हितार्थ उपाय जातक या जातका की जन्मपत्री में किसी भी प्रकार का दोष या कुयोग होने के कारण विवाह में बहुत बाधाएं आती हैं। इन बाधाओं के फलस्वरूप न केवल लड़का या लड़की बल्कि समस्त परिवार तनावग्रस्त रहता है। यहां कुछ उपाय प्रस्तुत हैं, जिनका उपयोग करने से इन बाधाओं से बचाव हो सकता है। ये उपाय जन्मपत्री नहीं होने की स्थिति में भी किए जा सकते हैं। वर प्राप्ति हेतु मंत्र गुरुवार को किसी शुभ योग में उक्त मंत्र का फीरोजा की माला से पांच माला जप करें। यह क्रिया ग्यारह गुरुवार करें, विवाह शीघ्र होगा। सोमवार को पारद शिवलिंग के सम्मुख उक्त मंत्र का 21 माला जप करें। फिर यह जप सात सोमवार को नियमित रूप से करें, शीघ्र विवाह के योग बनेंगे। भुवनेश्वरी यंत्र के सम्मुख उक्त मंत्र का सवा लाख जप करें, शीघ्र विवाह योग बनेंगे। मंत्र : कात्यायनी महामाये महायोगिनी धीश्वरी। नन्द गोपसुतं देवि पतिं ते कुरु ते नमः । मां पार्वती के चित्र के सामने, पूजा करने के पश्चात उक्त मंत्र का ग्यारह माला जप करें। यह क्रिया 21 दिनों तक नियमित रूप से करें, मां पार्वती मनोवांछित वर प्रदान करेंगी। गुरुवार का व्रत करें और पीले पुष्प, पीले प्रसाद व पीले फल मां लक्ष्मी व भगवान विष्णु को अर्पित कर उक्त मंत्र का 11 मला जप करें। यह क्रिया हर गुरुवार को करें, विवाह शीघ्र होगा। (नहाते समय जल में तीन चुटकी हल्दी अवश्य मिलाएं) वर वशीकरण यंत्र 115 155 156 132 154 153 127 138 116 151 131 152 126 137 133 134 117 130 125 135 136 139 140 124 118 141 142 143 144 123 145 129 119 146 147 122 148 149 128 150 120 121 ऊपर चित्रित यंत्र को गुरुवार को शुभ योग में अनार की कलम से हल्दी के रस से भोजपत्र पर लिखकर चांदी के ताबीज में कन्या को गले में धारण कराएं, संबंध तय करने या कन्या को देखने जो भी व्यक्ति आएगा, कन्या उसे पसंद आएगी और संबंध तय हो जाएगा। यदि कन्या के विवाह का संयोग न बन पा रहा हो, या विवाह की बात चलाते समय कोई न कोई बाधा सामने आ जाती हो, तो निम्नलिखित यंत्र का उपयोग करें। विधि : यंत्र गुरुवार को शुभ योग में भोजपत्र पर अनार की कलम और हल्दी की स्याही से लिखें। फिर कन्या यंत्र की पूजा करे एवं प्रतिदिन ऊपर वर्णित मंत्र का यंत्र के सामने 1008 बार जप करे। यह क्रिया गुरुवार से अगले गुरुवार तक करे एवं अगले गुरुवार को यंत्र को तावीज में बंद कर अपनी बांह या गले में धारण करे, शीघ्र विवाह के योग बनेंगे। पत्नी प्राप्ति के लिए मंत्र पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानु सारिणीम्। तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम॥ (दुर्गा सप्तसती) प्रत्येक शुक्रवार को पवित्र मन से स्फटिक की माला से उक्त मंत्र का 11 माला जप करें। इस प्रकार ग्यारह शुक्रवार जप करें तथा अंतिम शुक्रवार को ग्यारह विवाहित स्त्रियों को यथाशक्ति चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, साड़ी या कपड़ा दान करें। यह क्रिया निष्ठापूर्वक करें, शीघ्र ही मनोवांछित पत्नी की प्राप्ति होगी। मंत्र : कामोऽनंगः पंचशराः कन्दर्यो मीन वेतनः। श्री विष्णुतनयो देवः प्रसन्नो भवतु प्रभो॥ शुभ मुहूर्त में उक्त मंत्र का ग्यारह माला जप करें और फिर प्रत्येक शुक्रवार को तीन माला जप करें। ऐसा इक्कीस शुक्रवार तक करें, विवाह शीघ्र होगा। किसी शुभ योग या मुहूर्त में भोजपत्र पर अनार की कलम और अष्टगंध से ऊपर चित्रित यंत्र लिखकर उसे पूजा स्थल पर रखें और प्रतिदिन पूजा करें। पूजा के पश्चात ऊपर वर्णित मंत्र का ग्यारह माला जप करें। इक्कीस दिनों के बाद यंत्र को चांदी के तावीज में धारण करें। कुछ समय के पश्चात धन लक्ष्मी, यश लक्ष्मी व गृह लक्ष्मी (पत्नी) की प्राप्ति होगी। लक्ष्मी यंत्र की पूजा करें। फिर नियमित रूप से यंत्र के सामने कनकधारा स्तोत्र का 11 बार पाठ करें। यह प्रयोग शुक्रवार से तीसरे शुक्रवार तक करें, विवाह शीघ्र होगा। सर्व कामना सिद्धि यंत्र ऊपर चित्रित यंत्र को सर्वार्थ सिद्धि योग में भोजपत्र पर अनार की कलम और अष्टगंध से लिखकर उसे चंदन लगाएं। फिर अगरबत्ती दिखाकर चांदी के तावीज में धारण करें, शीघ्र विवाह के योग बनेंगे। (सीतेत्यभिभाषणमः) मंत्र : स देवि नित्यं परितप्य मानस्त्वामेव दृढ़व्रतो राजसुतो महात्मा तवैव लाभाय कृतप्रयत्नः। इस मंत्र का 3 माला जप तीन महीने तक प्रतिदिन करें अथवा किसी योग्य ब्राह्मण से करएं। जन्म र्जितपाप विघ्वं सनाय । पुरुषार्थचतुष्ठयलाभाय च पत्नीं देही कुरु-कुरु स्वाहा॥ सोमवार को व्रत करें और पारद शिव लिंग का दूध, दही, घी, शहद तथा शक्कर से अभिषेक करें। फिर उक्त मंत्र का पांच माला जप करें। यह क्रिया सोलह सोमवार को नियमित रूप से करें, जन्मकुंडली का हर दोष हो दूर होगा व शीघ्र विवाह के योग बनेंगे। पति वशीकरण मंत्र : पत्नी सिद्ध योग में निम्नलिखित मंत्र का 1100 जप कर प्रेमपूर्वक पति को पान खिलाए, पति वश में रहेगा। पत्नी वशीकरण मंत्र : पति सिद्ध योग में निम्नोक्त मंत्र का 1100 बार जाप कर पत्नी को पान खिलाए, पत्नी वश में रहेगी। (पत्नी का नाम) जय जय सर्वव्यान्नमः स्वाहा। डॉल्फिन मछलियां अपने जीवनसाथी को भेंट में देने से वैवाहिक जीवन में मधुरता एवं सद्भाव की वृद्धि होती है। डॉल्फिन मछलियों का चित्र या मूर्ति शयन कक्ष में पूर्व या पश्चिम दिशा में रखनी चाहिए। फेंग शुई के अनुसार मेंडेरियन बत्तख का जोड़ा नवविवाहित जोड़े के शयन कक्ष में रखने से जीवनपर्यंत एक दूसरे के प्रति प्रेम बना रहता है। जिस वर या कन्या की शादी नहीं हो रही हो, उसके शयन कक्ष में दक्षिण-पश्चिम दिशा में लव बर्ड्स (प्रेमी परिंदों) का चित्र या मूर्ति रखें, विवाह शीघ्र होगा। कन्या की शादी नहीं हो पा रही हो, तो उसके शयन कक्ष की दक्षिण या पश्चिम दिशा में पियोनिया पुष्प की तस्वीर लगाएं, अच्छे रिश्ते आने लगेंगे और विवाह शीघ्र होगा। विवाह योग्य कन्या को पीले या हल्के गुलाबी रंग के कपड़े पहनाने चाहिए। विवाह योग्य लड़के या लड़कियों को अपने कक्षों में जोड़ों में विचरण करते हुये सुंदर पक्षियों के या भगवान शंकर व पार्वती के सुंदर युगल चित्र लगाने चाहिए। कभी-कभी जन्मकुंडली में द्विविवाह योग होता है, जिसके फलस्वरूप जातक या जातका का वैवाहिक जीवन कष्टमय हो जाता है। ऐसे में दोनों को पुनः छोटे से रूप में पंडित से विवाह रस्म करवाना चाहिए। विवाह शुभ मुहूर्त या लग्न में ही करना चाहिए, अन्यथा दाम्पत्य जीवन के कलहपूर्ण होने की प्रबल संभावना रहती है। यदि ऐसा नहीं हुआ हो अर्थात यदि विवाह शुभ मुहूर्त या शुभ लग्न में नहीं हुआ हो, तो विवाह की तिथि व समय का विद्वान ज्योतिषाचार्य से विश्लेषण करवाना चाहिए और शुभ मुहूर्त या लग्न में पुनः विवाह करना चाहिए। पारिवारिक सुख की प्राप्ति हेतु यदि पति-पत्नी के संबंधों में कटुता आ जाए, तो पति या पत्नी, या संभव हो, तो दोनों, ऊपर वर्णित मंत्र का पांच माला जप इक्कीस दिन तक प्रतिदिन करें। जप निष्ठापूर्वक करें, तनाव दूर होगा और वैवाहिक जीवन में माधुर्य बढ़ेगा। मंगल दोष के कारण वैवाहिक जीवन में कलह या तनाव होने की स्थिति में निम्नोक्त क्रिया करें। पति या पत्नी, या फिर दोनों, मंगलवार का व्रत करें और हनुमान जी को लाल बूंदी, सिंदूर व चोला चढ़ाएं। तंदूर की मीठी रोटी दान करें। मंगलवार को सात बार एक-एक मुट्ठी रेवड़ियां नदी में प्रवाहित करें। गरीबों को मीठा भोजन दान करें। मंगल व केतु के दुष्प्रभाव से मुक्ति हेतु रक्त दान करें। चांदी का जोड़ विहीन छल्ला धारण करें |
 


 कुण्डली मे यदी, चन्द्र -मंगल या गुरू-मंगल योग हो तो, केवल यही एक योग कुण्डली को एक विशेष बल प्रदान कर कुण्डली को एक उच्च स्तर प्रतिष्ठित कर देता हैं l इसे अलग योग के नाम से भी परिभाषित किया गया हैं l अब इस योग के फल को मैं आप के सम्मुख रख रहा हूँ l जो की शास्त्र से ही लिया गया हैं l चन्द्र - मंगल योग -
चन्द्रामा -मन का कारक ग्रह हैं l जो जातक / जातिका का मन को प्रभावित करता हैं l जिसके अनुसार जातक / जातिका का मानसिक स्तर या मानसिक स्थिती को नियंतृत होता हैं l
मंगल - जो साहस, पराक्रम,शक्ती, धर्य, विर्य और कठीण परीश्रमी का प्रतिक हैं l इसलिये मंगल ग्रह व्यक्ती को यह सब गुणो से प्रभावित करता हैं l
अब दोनो ग्रह जब एक साथ हो तो, व्यक्ती के मन मे मंगल के उन गुणों के कारण, कैसी भी परिस्थिती होने पर आसानी से टुटता नहीं l और उसपर विजय पाने के लिये मंगल के सारे गुणों को झोंक देता हैं l और अंत तक कठीण परी -श्रमी और ना हार मानने की शक्ती के कारण ही जातक / जातिका को किसी भी परीस्थिती में अपने को परिस्थीती अनुसार ढाल लेने के शक्ती के कारण जीत जाता हैं l यही गुण के कारण इस योग के व्यक्ती को दुसरों से अलग कर देता हैं l
गुरू - मंगल योग -
गुरू -शिक्षा, ग्याण, विद्या-बुद्धी,स
्त्याप्रीय, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, शालीनता और षिस्टाचार का कारक ग्रह हैं l अतः कुण्डली मे गुरू- मंगल एक साथ होने पर, गुरू के गुण और मंगल के गुण दोनो मिलकर जातक /जातिका को एक अलग गुणो को प्रदान कर दुसरों से अलग कर देता l और केवल यही दोनो योग कुण्डली में होने के कारण, कुण्डली एक अलग स्तर पर पोहूँच जाता हैं l
कुण्डली मे चन्द्र - मंगल या गुरू -मंगल कोई भी योग हो ऐसा व्यक्ती कभी भी ज़्यादा दीन तक खाली नही बैठा रहता l अर्थात एक काम छूटने पर तुरंत दुसरा काम मिल जाता हैं l

★ॐमहामायाबालासुन्दरी नमः★ज्योतिष - विमर्श भाग2★सूर्य ग्रह की जानकारी★ आप सभी को।पंडित गौतम गुरु का 🙏।
◆बिभिन्न भावों में सूर्य ◆
1:-भाव एक (लग्न):-अ:-लग्न में बैठा सूर्य एक जातक को स्वाभाव से अशांत वनाता है।नेतृत्वता के गुण देता हैं,कभी कभी जातक अहंकारी और घमंडी हो सकता है।जातक को आत्मा केंद्रित बनाता है।
गंजापन:-यदि सूर्य 5,9,11,राशियों में से एक में हो।
अधिक कन्या:-यदि सूर्य 12 ,मीन में हो।
ह्रदय रोग:-यदि सूर्य 11,कुम्भ राशि में हो।
सफ़ेद बाल:-समय से पूर्व सफ़ेद बाल यदि सूर्य लग्न में पीड़ित हो तब।
आँखों की समस्या:-यदि सूर्य 1,4 राशियों में हो।
निर्धनता:-यदि सूर्य तुला में 7 अंशों से 13 अंशो तक हो (ध्यान रखें की सूर्य यहाँ परम नीच का होगा)
आ:-लग्न में सूर्य और राहु की युति उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर)देती है।और आँखों में दोष देती है।
इ:-लग्न में सूर्य चन्द्रमा की युति जातक को चंचल बुद्धि बनाती है ।ऐसे जातक का जन्म अमावस्या के आसपास होता है।
2:-द्वितीय भाव में सूर्य:-जातक धन और खनिज वस्तुयों के प्रवन्ध में सक्षम होता है।
बुद्धि का वेज्ञानिक झुकाव,स्व अर्जित धन संपत्ति,मुकदमों की उलझने, चिड़चिड़ाहट,बड़ों का उल्लंघन,अस्वस्थता और उसके ऊपर होनेवाला खर्चा।
3:-तृतीय भाव:-व्यथित होने के बाद सफलता मिलती हैं। बौद्धिक घमण्ड,अपने सगे संबंधियों से मित्रता पूर्ण ना होना,धनवान ,साहसी होते हैं।
4:-चतुर्थ भाव में सूर्य:-अ:-हृदय हिन्,स्वार्थी,छली,या कपटी जातक रक्त चाप का रोगी होता है।
आ:-चौथे भाव में या दशमें भाव में कुम्भ राशि का शनि हो तो पिता को ह्रदय रोग देता है।
इ:-जातक को हमेशा पेट की तकलीफ रहती है।
ई:-स्त्रियो की कुंडली में यह स्थिति विवाह को हानि पंहुचाती है।
उ,:-जातक को उत्तराधिकारी के रूप में सम्पति प्राप्त होती है अर्थात जातक बहुत कुछ खोकर ही सम्पति प्राप्त करता हैं।
5:-पंचम भाव:-अपने बड़ो की मान सम्मान की चिंता,बोधिकस्तर अच्छा,युक्ति पूर्ण व्यवहार कुशल।
6:-अच्छी प्रशाशनिक क्षमता,साहसी,अपने सगे संबंधियों से अच्छे संबंध बनाकर नहीं रखते हैं।कठोर परिश्रम के द्वारा अपनी पहिचान बनाता हैं।
7:-सप्तम भाव:-अपने साझेदार और पत्नी/पति को दंड देने का प्रयाश करता है,बुरे स्वाभाव की पत्नी/पति,परन्तु महत्वाकांक्षा वाला जीवन साथी,अश्नतोष जानक वैवाहिक जीवन होता है।
8:-अष्टम भाव:-पतला ,दुबला शारीर,रोगी जैसा,आँखों की दृष्टि में खरावी,घटना शून्य जी वन,गूढ़ विद्या का शौक, तीव्र लैंगिक और भावनात्क बंधन,आयु में कमी,स्त्रियो की कुंडली में विधवापन।शोभग्य की हानि मिलती है।
9:-नवम भाव:-अपने बड़ों के प्रति चिंता, बुद्धि का धार्मिक झुकाव ।
10:-दसम भाव:-सूर्य को इस भाव में दिशा बल मिलता हैं।
अ:-सर्वाधिक मेहनत, न्यूनतम लाभ मिलता है।
आ:-कठिन कार्य या प्रयाश के उपरांत सफलता।
इ:- कुछ सीखने हेतू एक बौद्धिक इच्छा।
ई:-शाशन का प्रिय ,धनाड्य और प्रसन्नता युक्त,आज्ञाकारी पुत्र,जीवन में नाम,यश कीर्ति,शक्तिशाली माता पिता ।
उ:-यदि राहु के द्वारा ग्रहण हो तो राजनितिक जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ता है, जातक को अतिवादी बनाता है,कार्य क्षेत्र में विरोधता और कार्य का आकस्मिक अंत,बेचेंन बुद्धि, घटना शून्य कार्य शैली एवं जीवन होता हैं।
11:-एकादश भाव:-अ:-दीर्घायु,धन संपत्ति, उच्च पद को सँभालने की जिम्मेदारी,प्रभावशाली, मित्र जैसा व्यवहार ।
आ:-सर्वाधिक आय और न्यूनतम मेहनत होती है।
इ:-ग्यारहवे भाव का सूर्य वहुत से दोषों को दूर करता हैं।
12:-द्वादस भाव:-अ:- पिता से दूरी,आँखों की दृष्टि प्रभावित धन संपत्ति के लिए अच्छा नहीं।
आ:-अन्य के अधीन कार्य करने की क्षमता ,शक्तिशाली गुप्त शशत्रु होते हैं।
इ:-मीन राशि का सूर्य दाई आँख में परेशानी देता है।
ई:-यदि सूर्य ,शनि या राहु से पीड़ित नहीं हो और ना ही राहु के नक्षत्र में हो तो यह तुला लग्न के जातक को दीर्घायु देता है,एकांतवास करने का स्वाभाव,पारिवारिक सहायता की कमी, शाशन के साथ समस्याएं।
उ:-उपचय भावो:-3/6/10/11का सूर्य जातक को चरित्रवान और दूसरों से श्रेष्ठ बनाता है।
 


आज आपको बता रहा हूँ की किस ग्रह के लिए कोनसा दान लाभकारी एवं कोनसा हानिकारक है
दरअसल यह सब निर्भर करता है हमारी जन्मकुँडली में बैठे ग्रहों पर, जो यह संकेत करते हैं कि किस वस्तु का दान या त्याग करना अथवा कौन से कार्य हमारे लिए लाभदायक होगें और कौन सी चीजों के दान/त्याग अथवा कार्यों से हमें हानि का सामना करना पडेगा. इसकी जानकारी निम्नानुसार है.
जो ग्रह जन्मकुंडली में उच्च राशि या अपनी स्वयं की राशि में स्थित हों, उनसे सम्बन्धित वस्तुओं का दान व्यक्ति को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए.

सूर्य मेष राशि में होने पर उच्च तथा सिँह राशि में होने पर अपनी स्वराशि का होता है. अत: आपकी जन्मकुंडली में उक्त किसी राशि में हो तो:-
* लाल या गुलाबी रंग के पदार्थों का दान न करें.
* गुड, आटा, गेहूँ, ताँबा आदि किसी को न दें.
* खानपान में नमक का सेवन कम करें. मीठे पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए.

चन्द्र वृष राशि में उच्च तथा कर्क राशि में स्वगृही होता है. यदि आपकी जन्मकुंडली में ऎसी स्थिति में हो तो :-
* दूध, चावल, चाँदी, मोती एवं अन्य जलीय पदार्थों का दान कभी नहीं करें.
* माता अथवा मातातुल्य किसी स्त्री का कभी भूल से भी दिल न दुखायें अन्यथा मानसिक तनाव, अनिद्रा एवं किसी मिथ्या आरोप का भाजन बनना पडेगा.
* किसी नल, टयूबवेल, कुआँ, तालाब अथवा प्याऊ निर्माण में कभी आर्थिक रूप से सहयोग न करें.

मंगल मेष या वृश्चिक राशि में हो तो स्वराशि का तथा मकर राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:--
* मसूर की दाल, मिष्ठान अथवा अन्य किसी मीठे खाद्य पदार्थ का दान नहीं करना चाहिए.
* घर आये किसी मेहमान को कभी सौंफ खाने को न दें अन्यथा वह व्यक्ति कभी किसी अवसर पर आपके खिलाफ ही कडुवे वचनों का प्रयोग करेगा.
* किसी भी प्रकार का बासी भोजन( अधिक समय पूर्व पकाया हुआ) न तो स्वयं खायें और न ही किसी अन्य को खाने के लिए दें.

बुध मिथुन राशि में तो स्वगृही तथा कन्या राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में बुध उपरोक्त वर्णित किसी स्थिति में है तो :--
* हरे रंग के पदार्थ और वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए.
* साबुत मूँग, पैन-पैन्सिल, पुस्तकें, मिट्टी का घडा, मशरूम आदि का दान न करें अन्यथा सदैव रोजगार और धन सम्बन्धी समस्यायें बनी रहेंगी.
* न तो घर में मछलियाँ पालें और न ही मछलियों को कभी दाना डालें.

बृहस्पति जब धनु या मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा कर्क राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में :--
* पीले रंग के पदार्थों का दान वर्जित है.
* सोना, पीतल, केसर, धार्मिक साहित्य या वस्तुएं आदि का दान नहीं करना चाहिए. अन्यथा "घर का जोगी जोगडा, आन गाँव का सिद्ध" जैसी हालात होने लगेगी अर्थात मान-सम्मान में कमी रहेगी.
* घर में कभी कोई लतादार पौधा न लगायें.

शुक्र जब जन्मपत्रिका में वृष या तुला राशि में हो स्वराशि तथा मीन राशि में हो तो उच्च भाव का होता है. अत ऎसी स्थिति में:--
* ऎसे व्यक्ति को श्वेत रंग के सुगन्धित पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यक्ति के भौतिक सुखों में न्यूनता पैदा होने लगती है.
* नवीन वस्त्र, फैशनेबल वस्तुएं, कास्मेटिक या अन्य सौन्दर्य वर्धक सामग्री, सुगन्धित द्रव्य, दही, मिश्री, मक्खन, शुद्ध घी, इलायची आदि का दान न करें अन्यथा अकस्मात हानि का सामना करना पडता है.

शनि यदि मकर या कुम्भ राशि में हो तो स्वगृही होता है तथा तुलाराशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी दशा में :--
* काले रंग के पदार्थों का दान न करें.
* लोहा, लकडी और फर्नीचर, तेल या तैलीय सामग्री, बिल्डिंग मैटीरियल आदि का दान/त्याग न करें.
* भैंस अथवा काले रंग की गाय, काला कुत्ता आदि न पालें.

राहु यदि कन्या राशि में हो तो स्वराशि का तथा वृष(ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं मिथुन(क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:--
* नीले, भूरे रंग के पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए.
* मोरपंख, नीले वस्त्र, कोयला, जौं अथवा जौं से निर्मित पदार्थ आदि का दान किसी को न करें अन्यथा ऋण का भार चढने लगेगा.
* अन्न का कभी भूल से भी अनादर न करें और न ही भोजन करने के पश्चात थाली में झूठन छोडें.

केतु यदि मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा वृश्चिक(ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं धनु (क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में केतु उपरोक्त स्थिति में है तो :--
* घर में कभी पक्षी न पालें अन्यथा धन व्यर्थ के कामों में बर्बाद होता रहेगा.
* भूरे, चित्र-विचित्र रंग के वस्त्र, कम्बल, तिल या तिल से निर्मित पदार्थ आदि का दान नहीं करना चाहिए.
* नंगी आँखों से कभी सूर्य/चन्द्रग्रहण न देंखें अन्यथा नेत्र ज्योति मंद पड जाएगी अथवा अन्य किसी प्रकार का नेत्र सम्बन्धी विकार उत्पन होने लगेगा
आप की कोई भी समस्या या सुझाव है
 


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

*घर में बार बार मृत्यु होना*
🙏🏻 *यदि किसीे के भी घर में कम उम्र में लोग मर जाते हों तो वो बड़ा कटोरा लेकर उस में पानी भर के उस* *कटोरे में धातु का (मेटल का) कछुआ रखें l महामृत्युंजय मंत्र का जप करें और कछुए को तिलक कर के कटोरा* *ईशान कोण में रख दे ........ऐसा ७ या ११ अमावस्या तक करें ......लोटा पानी से भर के रखें ....७ वें या ११ वीं अमावस्या को गीता के ७ वें अध्याय का पाठ करें .....छत पे जाकर सूर्य भगवान को प्रार्थना करें कि.......यमराज आप का बेटा है, आप हमारी प्रार्थना उन तक पहुंचा दीजिये ....हमारे घर में ऐसी मृत्यु होती है.......दुबारा ऐसा ना हो इसलिए जो गुजर गए, उन को गीता पाठ का पुण्य अर्पण करते हैं.......ऐसा ७ या ११ अमावस्या तक करें ।*
 


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

राजयोग
दोस्तों यह शबद हर कोई चाहता है वो ज्योतिषी के मुह से सुने वो बोले आपकी कुंडली में राजयोग है राजयोग का मतलब होता है जिस भाव जिस स्थान में यह योग बन रहा है उस चीज़ की आपके पास कमी नहीं होगी जैसे मान लो यह राजयोग आपके 4 भाव में बना तो आपके पास सुख साधन की कमी नहीं होगी आपके पास गाडी आलिशान मकान होगा अब यह राजयोग पंचमेश और चोथे घर के मालिक न साथ मिलकर बनाया 5 भाव या 4 भाव में तो आपकी संतान भी आपके लिए राजयोग का काम करेगी आपके बच्चे इतना नाम कर देगे आपका आप सोच नहीं सकते वो भी ऐशो आराम में रहेंगे और आप के पास भी ऐशो आराम पूरा होगा
अब यह ही राजयोग नवमेश कर्मेश अगर नवम भाव या दशम भाव में हो दोनों के बीच सम्बन्ध बहुत अच्छे हो इससे बड़ा कोई राजयोग नहीं होगा
भाग्य +कर्म की युति दोनों में राशि परिवर्तन यह युति आप अगर झोपडी में भी पैदा होंगे तो खुद को राजा बना लोगे पराशर ऋषि कहते है भाग्येश और कर्मेश के बीच राजयोग इंसान अपनी किस्मत खुद लिखता है और एक दिन अपनी मेहनत से जीवन में उच्चाइयो को प्राप्त कर लेता है क्योकि भाग्य और उसकी मेहनत दोनों का भरपूर साथ उसके साथ होता है इसको अखंड साम्राजय योग भी कहते है जो बहुत बड़ा राजयोग है।

दोस्तों अब सवाल यह है कीराजयोग कब फलित होगा जरुरी नहीं बचपन में मिल।जाय जवानी में मिल जाय हो सकता है यह राजयोग बुढ़ापे में फलित हो या तो इनकी दशा अन्तर्दशा में फलित होगा या जिन ग्रहो की इन पर दृष्टि है उन की दशाओ में फलित हो सकता है पर वो उनके मित्र और शुभ गृह होने चहिये या फिर गोचर का कोई बहुत बड़ा प्रभाव राजयोग को फलित कर देगा

अब सवाल यह भी है जिन की कुंडली में राजयोग बने है ऐसा क्यों उनको कभी फलित ही नहीं हुआ

1

अगर कुंडली में कोई प्रबल राजयोग बन रहा है और उस पर नीच सूर्य की दृष्टि है राजयोग भंग हो जायगा यह याद रखना राजयोग फलित नहीं होगा अगर नीच का सूर्य राजयोग बने ग्रहो के साथ है राजयोग भंग होगा

2
अगर ग्रहो के पास डिग्री नहीं है उनपर पाप प्रभाव है वो मरे पड़े है कुंडली में और वो गृह और वो अस्त है राजयोग फलित नहीं होगा भंग हो जायगा

जिस जगह राजयोग बना है अगर वहा अष्टक वर्ग में 28 से कम शुब बिंदु है 19 20 है तो वो भाव बली नहीं होगा उस भाव के कमजोर होने की वजह से राजयोग भंग हो जायगा

गृह के पास अपनी पूरी रेशमिया नहीं है प्रकाश नहीं है बुरे ग्रहो के बीच फसे है राजयोग भंग हो जायगा

दोस्तों राजयोग तभी फलित होगा जिन्होंने राज योग बनाया है वो गृह शुभ प्रभाव में है तभी फलित होगा

देखो एक बहुत अच्छा उदहारण देता हूँ

विरिश्चिक लगन का
चंद्रमा नवमेश है
सूर्य कर्मेश है
सूर्य चंद्रमा की युति लोग बोलेंगे राजयोग है पर यह फलित नहीं होगा कारण है सूर्य चंद्रमा अगर साथ होंगे अमावस्या होगी जिसकी वजह से चंद्रमा दूषित होगा और उसके पास कलाये भी नहीं है इसलिए सूर्य चंद्रमा की युति राजयोग कारक नहीं है

पर अगर इस लगन में शुब स्थान पर सूर्य चंद्रमा आमने सामने होंगे तो पूर्णिमा होगी चंद्रमा बली होगा नवमेश कंर्मेश के दृष्टि सम्बन्ध जबदस्त राजयोग बना देंगे

दोस्तों राजयोग तिथि करण वार नक्षत्र में किसके है इन पर भी बहुत डिपेंड करता है
 राजयोग

 

राजयोग कैसे कब फलित होगा और किस की कुंडली से होगा और क्यों होगा

आपकी कुंडली तब तक अधूरी है जब तक आपके साथ आपकी पत्नी आपकी संतान नहीं जुड़ जाती है

हमारे पूरे परिवार  की किस्मत भी हमारे साथ काम करती है

अब कई लोगो की पत्नी है जो काम नहीं करती है

तो क्या उसके गृह उसको कुछ नहीं दे रहे होते

वो उसके गृह उसके पति को प्रभावित कर रहे होते है

कई लोग बोलते है मेरी पत्नी तो लक्ष्मी है जब से उसके पैर मेरे घर में पड़े है मेरी तो किस्मत ही बदल गई है में शादी से पहले 20हजार की नोकरी करता था आज मेरा खुद का व्यपार है और शादी के बाद लाखो में खेल गया

और कुछ लोगो के मुह से आपने यह भी सुना होगा मेरी बेटी लक्ष्मी है जब से उसका जन्म हुआ है मैंने पीछे पलट कर नहीं देखा है में आगे बढ़ता जा रहा हूँ

दोस्तों मान लो किसी का नवम भाव बहुत स्ट्रांग हो और किसी बच्चे को जन्म लेते ही नवम भाव की दशा मिल जाय

नवम भाव पिता का होता है पर उस बच्ची की कुंडली में नवम भाव जबरदस्त हो वो बच्चा अपने पिता का भाग्य उदय कर देगा क्योकि नवम भाव का सम्बन्ध पिता से होता है बच्चे के गृह अपने पिता को प्रभावित कर देंगे

कुछ लोगो के घर बच्ची पैदा हुई उसकी किस्मत पलट गई

पर जैसे ही उस बच्ची की शादी हो जाती है वो फिर धीरे धीरे गरीबी में चला जाता है

इसका कारण है उसकी बेटी की कुंडली में कोई प्रबल राजयोग था जो उसके पिता को प्रभावित कर रहा था

उस बच्ची का राजयोग अब भी है पर जैसे ही उसके पिता ने अपनी बेटी का कन्यादान दिया

राजयोग ने अपनी दिशा को बदल लिया

अब यह राजयोग उसके पिता को प्रभावित न करके उसके पति को प्रभावित करेगा

इसका कारण यह है कि पिता ने अपनी बेटी का कन्यादान कर दिया की मेरी बेटी आज से आपकी हुई

तो उसके गृह उसके पति को प्रभावित करने लगे

आपको उच्चाई तक ले जाने में आपके परिवार के ग्रहों का भी बहुत बड़ा योगदान होता है

जो बच्ची नोकरी नहीं करती जिनकी पत्नी नोकरी नहीं करती असल में उनके गृह भी आपको प्रभावित करके अपनी किस्मत के बल पर आप से अपना राजयोग फलित करवा लेती है

ज्योतिष को समझना आसान भी नहीं और नामुमकिन भी नहीं

बस असल जिंदगी में हो रही घटना को आप कुंडली और ज्योतिष में खोजने की कोशिश करे

अपने बच्चो अपनी पत्नी से प्रेम करे

न जाने किसकी किस्मत आप से जुडी हुई हो

 

आप जब किसी  ज्योतिषी के पास जाते हो वो आपको बोलता है आपकी कुंडली में राजयोग है

यह क्या होता है राजयोग

राजयोग दो शब्दों से मिलकर बना है

राज+योग

राजयोग का मतलब होता है राजा के सामान जीने वाला

राजसी सुख को भोगने वाला

अब्यह जरुरी नहीं है कि आपको राजयोग बचपन से ही मिल जायेगा

यह कुंडली पर निर्भर करता है कि कब वो समय आयेगा

आपकी दशा अंतर्दशा यह निर्धारित करेगी की

आपको अपने जीवन के किस पड़ाव में राजयोग का फल प्राप्त हो सकता है

कोई बच्चा बचपन में पैदा ही ऐसे घर में हो जाय जहा किसी चीज़ की कमी न हो और बचपन में ही उसको सोने चांदी का पालना मिल जाय

कई घर ऐसे भी है जिनके पास जीवन में कुछ नहीं होता पर जैसे ही उनके घर संतान पैदा होती होती है उनकी तकदीर बदल जाती है

कारण है कि उस बच्चे की कुंडली में वो राजयोग होता है जो अपने माता पिता के ग्रहों को काट रहा होता है

बच्चा पैदा होते ही अपने माँ बाप को प्रभावित कर देता है

अगर बच्चे की कुंडली में राजयोग है और और वो बचपन में ही मिलना है तो मिलेगा उसको अपने माँ बाप के जरिये ही उस बच्चे की कुंडली के गृह अपने परिवार को प्रभावित करते है और उनके जरिये अपने राजयोग को फलित कर लेते है

कई माँ बाप की कुंडली में राजयोग ही पंचम भाव से बना होता है

वो गृह उसको यह प्रॉमिस कर रहे होते है जब इसके घर संतान होगी तब इसको राजयोग का फल मिलेगा

हमारे जीवन में कई बार ऐसा भी होता है हम आधा जीवन संघर्ष में गुजार देते है बहुत गरीबी में पर जब हम पड़ लिख जाते है उसके बाद जीवन में जब हम नोकरी या व्यपार करते है तब हमें  जीवन में बहुत उच्चाई मिलती है

कुंडली में नवम भाव और करम भाव में सम्बन्ध वो भी 10भाव में हमारे जीवन के उस पड़ाव में जब हम अपना  भाग्य कर्म से परिवर्तन करते है हमको राजयोग प्राप्त होता है

राजयोग आपको बचपन से ही मिल सकता है

जवानी से भी

और बुढ़ापे से भी

कई बार हमारी संतान ही इतनी लायक निकल जाती हैकि वो हमारा नाम रोशन कर देती है

हमारा बुढ़ापा सवार देती है

हमको अपने हाथों पर रखती है

कुंडली में केंद्र और त्रिकोण सबसे ताकतवर भाव होते है जब भी इनमे सम्बन्ध होगा और इन पर शुभ प्रभाव होगा तभी हमें राजयोग का सुख प्राप्त होगा

त्रिकोण

1

5

9

इसको लक्ष्मी कहते है

1

4

7

10

 

केंद्र भाव को

विष्णु कहते है

इनके अंदर जब भी सम्बन्ध केंद्र और त्रिकोण में शुभ प्रभाव में होंगे तभी आपको राजयोग फलित हो जाएगा

अब कुछ लोग बोलते है हमारा गुरु कुंडली में बहुत अच्छा था पर हमको उसने कुछ नहीं दिया

दोस्तों एक चीज़ याद करना यह मेरा अनुभव है

गुरु की दृष्टि बहुत बढ़िया है

अगर कही शुभ ग्रह हो और गुरु की दृष्टि उन पर है

मतलब गुरु की जिन ग्रहों का दृष्टि होती है मैंने जीवन में कई बार देखा है उन ग्रहों की दशा और अंतर्दशा बाहर बढ़िया काम कर जाती है

इसलिए यह भी ध्यान रखो गुरु किस ग्रहों को देख रहा है अगर वो गृह कुंडली में अच्छे है शुभ प्रभाव में है गुरु की दृष्टि बल में है वो गृह भी कमाल कर सकते है पर उनकी स्थति कुंडली में अच्छी होनी चाहिए


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

 कुंडली में ऐसा क्यों है कि सूर्य से पिता का विचार किया जाता है।
जिस तरह से इस ब्रम्हांड में प्रकाश का कारक सूर्य होता है ऐसे ही हमारे शरीर में प्रकाश का कारक हमारी आंख होती है अगर हम लंबे समय तक अपनी आंखों को बंद रखें मान कर चलिए बहुत लंबे समय तक योग ध्यान करने के बाद तो हमारी आंख से प्रकाश बहुत तेज मात्रा में निकलता है जब भी हम आंख खोलते हैं यह एक घटना है जो आप कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं जैसे की महाभारत में गांधारी ने जब अपनी आंखों से पट्टी खोली थी तो उसकी आंखों से बहुत तेज प्रकाश निकला था और उस तेज प्रकाश में बहुत ज्यादा ताकत थी , हम सभी की आँखों से भी एक ऐसा प्रकाश निकलता है जो सिर्फ प्रकाश ही नही बल्कि एक हमारी इछ्छा ष्षक्ति का एक रूप है,
अगर हम दिल से किसी को दुआ देते है, तो अपने आप हमारी आंहो से एक गुप्त प्रकाश निकालकर उर व्यक्ति या जीव या निर्जीव चाहे वो कोई कार मोबाइल आदि क्यों न हो,को आशिर्वाद के रूप में मिलता है,

आशीर्वाद ही नही जैसी भावना से उसके बारे में सोचा गया वैसा फल।
हम जो दुआ बद्दुआ की बात करते है वो क्या हैं वो हमारी कुंडली का सूर्य ही तो है, जो हमारी कुंडली के 9 भाव से प्रेरित होता है।

इसी तरीके से हर इंसान की आंखों में एक तेज होता है एक प्रकाश होता है जो हर वक्त निकलता रहता है लेकिन हम को दिखता नहीं है दूसरी तरफ इस दुनिया को देखने के लिए हमारी आंखें एक तरह से प्रकाश की तरह काम करते हैं उसके बाद हमारी आंखों के अंदर हमारी आत्मा का स्वरूप सबसे ज्यादा दिखाई देता है जैसे की हम अंतरात्मा से कितने खुश हैं कितने दुखी है उसका सबसे बड़ा असर सबसे ज्यादा असर हमारी आंखों पर पड़ता है उदाहरण के लिए जब भी आप किसी वजह से अंतरात्मा से बहुत परेशान हो गए तो आपकी आंखें सबसे ज्यादा कमजोर पड़ जाती है जब भी आप खुश हो गई आपकी आंखें बहुत जल्दी उस खुशी को बयान करते ह

प्यार का इज्ज़हार सबसे ज्यादा आँख ही तो करती है,

कोई व्यक्ति दिल से क्या सोचता वो उसकी आँखे जरूर बोलती है,

जैसे की मुझे 17 साल से लोगो की कुंडली के साथ उनके चेहरे हाव भाव उनकी आवाज की tone आदि को गहराई से सझने का काफी अनुभवहै,
इसीलिए ही तो मैं ज्योतिष के किसी बजी पहलु को ज्यादा से ज्यादा आसनी से रखना चाहता हु।
कुल मिलाकर अंतर आत्मा के ऊपर जो भी बदलाव होता है उसका सीधा असर हमारे शरीर में सबसे ज्यादा आंखों पर पड़ता है इसीलिए हमारी आंखें भी आत्मा के स्वरूप को दिखाने के लिए एक खिड़की है यह समझ ले कि इस दुनिया को देखने के लिए इस दुनिया को अपने नजरिए से समझने के लिए आंखें एक खिड़की की तरह होती हैं उसके बाद बात करते हैं कि सूर्य पिता का कारक क्यों होता है इसको समझने के लिए मैं बताना चाहूंगा कि सूर्य सिर्फ पिता का कारक ही नहीं होता है सूर्य हमेशा उन सब लोगों का कारक होता है जो हमें हमेशा कुछ न कुछ नियम के अनुसार चल कर हमें हमेशा हमारे ऊपर एक बोस की तरह एक बड़े भाई की तरह हम पर हुक्म चलते है।

जिस तरह से हम किसी नौकरी में होते हैं और हमारे ऊपर हमारा मालिक हुकुम चलाता है तो कुल मिलाकर हर कोई व्यक्ति जो हुक्म चलाना चाहता है हमारे ऊपर वह सूर्य का कारक है । चलते चलते रस्ते में।कोई मिल गया और किसी कारण आपको कुछ बोलने लव अगर आपका सूर्य कमजोर होगा तो अधजल गगरी छलकत जाए के तरह से आपकी आत्मा अगर कमजोर होगी तो बहुत जल्दी आपमें अहम् आ जायेगा और आप सहन नही कर पाएंगे कि इस अंजान की हिम्मत कैसे हो गयी मुझे कुछ बोलने की।
मई तो एक तोप हूं, मुझे कोई एरा गेरा ऐसे कैसे बोल सकता है, ये बाते इंसान तभी सोचता है जब उसका सूर्य कमजोर होता है।
एक बात मुखे बतानी जरूरी है कि सभी ग्रह अछे या बुरे किसी दूर अछे या बुरे गृह के प्रभाव में आकर ही ऐसे बनते है, चाहे भाव का ही प्रभावक्यू न हो जैसे सूर्य अछे राहु के साथ ऐसी कहानी बनाकर अपना प्रभाव अधिकार दिखता है, कि उसका मकसद दुसो को लाभ देने है, जरुरी नही सूर्य के साथ राहु हमेशा बुरा होता , ये तो हमारे कुछ ज्योतिषी ने ज्यादातर योगों को डरावना ही बताया है, क्याकि वो बजी इस बताकर अपना प्रभाव बढ़ाकर रखना छाते है कि वो भी कुछ है अगर कुंडली में कोई ज्योतिषी इस बोले की कुंडली अछि है टेंसीओ न लो, तो सामने वाला भी ज्यादातर ये ही सोचता है कि इस ज्योतिषी को कुछन्हि आता , लवकिन जो ज्योतिषी ज्यादा डरता है लोग उसको असली ज्योतिषी मानते है, कुल मिलाकर सभी ज्योतिषी बुरे नही न ही , वो कुछ गलत करते ह् , असल म कुछें लोग ही उन्हें मजबूर करते है उल्टा सीधा फलित करने को ,

हर कोई व्यक्ति जो हमसे किसी भी कारण से बड़ा है हो सकता है कि उम्र में छोटा हो लेकिन वह पद और अधिकार के मामले में हम से बड़ा हो जैसे कि आप किसी कंपनी में नौकरी करते हैं तो वहां पर आपका मालिक या आपसे ऊपर कोई भी समझ लीजिए कि आपकी कंपनी में आप से ऊपर सो लोग हैं वह सभी लोग आपके लिए सूर्य का कारक बन जाते हैं चाहे आपके गांव का प्रधान हो या आपके शहर में कोई भी व्यक्ति यह समझ लीजिए कि आप जब कभी कहीं पर भी है किसी भी परिस्थिति में है तो ऐसे सभी व्यक्ति जो आपसे ज्यादा अधिकार वाले हो आप से बड़े पद वाले हो वह सभी सूर्य का कारक बन जाते हैं इसी वजह से कुंडली में पिता को भी सूर्य का कारक कहा गया है तो हमेशा याद रखें कि सिर्फ पिता ही सूर्य का कारक नहीं है वह सभी व्यक्ति जो अधिकार और पद में आप से बड़े हो सूर्य का कारक होते हैं इसके अलावा सूर्य का कारक मैं बताना चाहूंगा कि हमारे अंदर आरोग्यता हमारे अंदर इच्छा शक्ति भी सूर्य का कारक होती है ऐसा क्यों है ऐसा इसलिए है क्योंकि जब हमारे ऊपर कोई भी व्यक्ति हमें अपने अधिकार के कारण दबाता नहीं है प्रताड़ित नहीं करता है तो हमारे अंदर एक स्वतंत्रता की भावना होती है हमारे अंदर डर नहीं होता है हम स्वच्छंद विचार के होते हैं हमारे अंदर एक खुशी होती है और उसी वजह से हमारे अंदर एक आत्म शक्ति आ जाती है जो हमें स्वास्थ्य में मदद करती है इसी वजह से बोला गया है कि सूर्य आरोग्यता का कारक होता है सूर्य को सीधी आंख का कारक भी बताया गया है ऐसा इसलिए है क्योंकि ब्रह्मांड हमारे शरीर से सीधे दिमाग से जुड़ा होता है इसी वजह से सीधे दिमाग को सीधी आंख पर सबसे ज्यादा पिछले जन्म से जुड़े हुए उन गहरे कर्मों का फल पड़ता है क्या फर्क पड़ता है जो हमें एक आत्मशक्ति देते हैं उसके बाद बताना चाहूंगा कि हमारे कुंडली में हमारे पद और प्रतिष्ठा सरकारी नौकरी आदि का कारक सूर्य क्यों होता है ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर हमारे अंदर इच्छा शक्ति कितनी भी परेशानी आए फिर भी हम इच्छाशक्ति रखते हैं कि मैं यह काम कर दूंगा मुझे करना है मुझे सरकारी नौकरी पानी है समझ लीजिए कि सरकारी नौकरी ही नहीं कोई भी पद प्रतिष्ठा वाला कोई भी ऐसा काम जिसमें आपका नाम हो जिसमें आपको खेती मिले जिसमें आपको कुछ अच्छा महसूस हो जिसमें आप भीड़ से अलग हटकर कुछ ऐसा कर पाए बड़ा कर पाए वह सभी बातें सूर्य के कारक होते हैं जरूरी नहीं है कि सिर्फ सरकारी नौकरी ही सूर्य का कारक होते हैं प्राइवेट नौकरी में भी या फिर ऐसी प्राइवेट नौकरी जहां पर आस-पास लोगों में एक पहचान होगी इस नौकरी पर बहुत ही किस्मत वालों को मिलती है या फिर बहुत अच्छी नौकरी है तो वह नौकरी भी सूर्य के अंदर आती है
इसके अलावा जन्म कुंडली में लग्न का कारक सूर्य क्यों होता है इसका कारण भी सीधा है कि आप जब इस दुनिया में आए तो आपने इस दुनिया में एक शरीर ग्रहण किया आप पहले आत्मा के रूप में थे और आत्मा से शरीर में आने के लिए एक इच्छा शक्ति चाहिए एक विल पावर चाहिए एक कारण चाहिए उसका जुड़ाव आपके आत्मशक्ति से होता है और आत्मशक्ति जितनी ज्यादा होगी उतनी आसानी से आप इस दुनिया में जन्म लेते हैं जैसे की बहुत सारी आत्माएं इस वायुमंडल में होती हैं जो चाहती हैं शरीर में ग्रहण करना जन्म लेना पैदा होना लेकिन उन सभी में से वही आत्मा जन्म ले पाती है जिनके अंदर इच्छा शक्ति बहुत ज्यादा होती है यह जिनका सूर्य अच्छा होता है कुल मिलाकर लग्न का कारक सूर्य होने का कनेक्शन पिछले जन्म से भी जुड़ा है दूसरी बात लग्न शरीर का कारक होता है और अगर सूर्य अच्छा है तो हमारे शरीर में हमेशा एक हिम्मत बनी होती है इस को मैं एक उदाहरण से बताना चाहूंगा जैसे कि जब कोई व्यक्ति बीमार होता है जब कोई व्यक्ति समझ लीजिए कि बहुत ही खतरनाक बीमारी से ग्रसित होता है उस वक्त अगर वह खुद हिम्मत हार जाए वह खुद इच्छा शक्ति कम हो से डर लगे कि शायद मेरी जिंदगी खत्म हो गई है तो समझ लेना कि वह सच में जल्दी ही अपनी और परेशानी बढ़ा लेगा लेकिन उस व्यक्ति का सूर्य अगर अच्छा है इच्छा शक्ति इतनी मजबूत है कि वह ऐसा सोचता है कि उसकी बहुत बड़ी बीमारी भी वह सिर्फ सोचने से ठीक कर सकता है बहुत ही दिलदार है बहुत ही मजबूत इरादे वाला है बहुत ही अच्छी सी हिम्मत से अपने अंदर एक इच्छा शक्ति है आत्म शक्ति है जिंदा रहने की आगे बढ़ने की कुछ करने की तो समझ लेना कि उसकी बीमारी को डॉक्टर से ज्यादा वह खुद ठीक कर देगा हमारे शरीर में सभी बीमारियों को ठीक करने में सबसे ज्यादा जो योगदान है वह सूर्य का है जो व्यक्ति का सूर्य बहुत अच्छा होता है उनको या तो बीमारी आती नहीं है आती है तो वह सूर्य अच्छा होने की वजह से वह जल्दी बीमारी ठीक हो जाती है समझ लीजिए कि सूर्य जो है हमारे शरीर में बहुत ज्यादा आवश्यक अवयवों का करक होता है, जैसे की हड्डी, आँखे, मजबूत इरादे, ।
सूर्य कमजोर तो हड्डी कमजोर होती है, मतलब हड्डी भी धीरे धीरे हमारी इच्छा शक्ति के अच्छे होने मजबूत होती है।
हड्डी की चोट लगे तो अपने आप से हमेशा यही कहना कोई बात नही मई जल्दी ठीक हो जाऊंगा, हड्डी की चोट ही नही कुछ भी परेशानी हो , शारीरिक मानसिक जैसा सोचेंगे वासी हमारी आत्मा की शक्ति हो जायेगी, फिर आत्मा तो परमात्मा से जुडी होती, मोबाइल के नेटवर्क की तरह, तो मतलब आपके दिल की बात जो आप अंतर आत्मा से बार बार सोचते हो वो एक शक्ति होतो है जो वैसे ही करने लगती है, इसलिए कभी भी ड्रॉ मत, हिम्मत मत हरो बड़े इरादे रखो, कुछ बनने के नही कुछ करने के लोगो की मदद, तभी आपका सूर्य और मजबूत होगा, जैसे की आप किसी की मदद करते है, आप जब सामने वाला अछे से बात करता है आपकी आत्मा को एक सुकून मिलता ही, वो सुकून ही तो आपके कमजोरो सूर्य को मजबूत बना देता है, इसलिए सूर्य की तरह दुसरो को देना सीखो, जा की तरह, देना मतलब अछे शब्द ज्ञान, पैसे आदि नही, दिल से आत्मा से की हुई बात ही आपको फायदा करेंगी, आप किसी को पैसे देकर खुद को महआन मत समझना , 
मैं आपको कुछ और उदाहरण से भी बताना चाहूंगा जैसे कि कोई व्यक्ति एक्सीडेंट के कारण कोमा में चला गया है तो समझ लीजिए कि उस समय उस व्यक्ति का कॉन्शस माइंड काम नहीं कर रहा फिर भी उस व्यक्ति का आत्मा उसके शरीर के पास सुपर कॉन्शस माइंड लेवल पर काम करता है।

जो उसको उसी तरीके से बचाने की कोशिश करती है जैसे कि आप अपनी आंखों के सामने किसी को बहुत ज्यादा परेशान देखते हो या फिर आप अपने परिवार के किसी सदस्य को बचाने की कोशिश करते हो उसी तरीके से आपके आत्मा भी आपको हमेशा बचाने की पूरी कोशिश करती है अगर आत्मा ही बहुत कमजोर हो आपका सूर्य ही कमजोर हो जाए तो आपकी आत्मा आप को बचाने की कोशिश तो करेगी लेकिन उतनी कोशिश करने के बावजूद भी फल में कमी आ जाएगी।
सभी विद्वानों से सभी साथियों से मेरी विनती है कि आप लोग इस लेख को पढ़कर हमेशा मुझे अपने विचारों से अवगत करा कर मेरे सूर्य को मजबूत कर सकते हैं क्योंकि आपके कमैंट्स आपके शब्द मेरे लिए एक सूर्य का काम करेंगे जो मेरी सूर्य रूपी आत्मशक्ति को बढ़ाएंगे दूसरी बात मुझे कभी-कभी लगता है कि इतने लंबे लेख आज के समय में कौन पढ़ता होगा इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में किसके पास इतना टाइम होगा जो मेरे लेख पढ़ेगा।
 


अंक नौ के प्रभाव से आपकी विशेषताएँ

अंक नौ के प्रभाव से आपकी विशेषताएँ सबसे पहले हम अंक नौ की विशेषताओ की बात करेगें. अंक नौ में सभी अंको का समावेश माना जाता है इसलिए आपके भीतर अंक एक का नेतृत्व करने का गुण शामिल होगा. अंक दो के प्रभाव से आपके अंदर सहयोग की भावना होगी, अंक तीन की कल्पना व प्रेरणाशक्ति आपके अंदर होगी और चार के प्रभाव से आप में आदेश और निर्माण करने के गुण होगें. अंक पांच के गुण से वृद्धि व उन्नति करेगें. आपके अंदर छ्: के प्रभाव से सभी से प्रेम व जिम्मेदारियों के प्रति जागरुक रहेगें. सात से बुद्धिमत्ता व पूर्णता मिलेगी और अंक आठ के प्रभाव से सत्ता पाने वाले व न्याय करने वाले होगें. सभी अंको की विशेषताएँ तो होती ही है, साथ में इस अंक में अपनी स्वयं की विशेषताएँ जैसे भाईचारा, बंधुओ से प्यार व देवत्व का भी गुण होता है. आपको जीवन में बहुत सी निराशाएँ हाथ लगती हैं लेकिन जब आपको अपने खुद की पहचान होती है और जब आप भीतर से मजबूत होते हैं तब आप ईश्वर के प्रति प्रेम से जुड़ जाते हैं. आप जीवन में मिलने वाले दुखो व तकलीफों से मजबूत बनते हैं. आपके इरादे जब अपने लिए कुछ करने के होते है तब आपको दर्द ही मिलता हैं चाहे वह धन संबंधित मामला हो या घरेलू बात हो या सत्ता हो या प्रेम संबंधित कोई बात हो. जीवन के बाद के वर्षो में आप स्वयं के लिए सोचना ही बंद कर देते हैं. आपकी सबसे अच्छी बात यह होती है कि आप बहुत देर तक दुखो के बारे में सोचते नहीं रहते हैं और अपने दुखो से आप स्वयं ही जल्दी उबर जाते है क्योकि आपका यह गुण भगवान की ही देन होती है. आपका भाग्य खुद चमकता है और धन भी आपके पास आ ही जाता है और आप अपने काम में भी सफल हो जाते हैं चाहे यह सफलता स्वदेश में मिले या विदेशो से इसका संबंध बनता हो. आप अपने जीवन में बहुत से लोगो से मिलते हैं और उनमें प्रेम बांटते हैं, दूसरो की देखभाल करने व प्रेम से आप प्रेम बांटने की एक वस्तु बन जाते हैं क्योकि आप निजी जीवन में इतने दुख उठा लेते हैं कि बाद में आपको अपने लिए कुछ भावनाएँ ही महसूस नही होती हैं लेकिन दूसरों की तकलीफ आपसे देखी नहीं जाती है
अंक नौ के प्रभाव से आपका निजी जीवन

अंक नौ के प्रभाव से आपका निजी जीवन अंत में हम अंक नौ के निजी जीवन के बारे में जानने का प्रयास करते हैं. आप खुशमिजाज व्यक्तित्व के स्वामी होते है और आप रोमांटिक मिजाज के व्यक्ति भी होते हैं. आप भरोसेमंद और विश्वसनीय होते हैं इसलिए लोग आप पर आंख मूदकर भी विश्वास कर लेते हैं. आप अपने साथी से प्रेम व स्नेह पाने के लिए सदा लालायित रह सकते हैं और अपने साथी को खुश रखने के लिए आप कुछ भी करने को तैयार रह सकते हैं. आप एक अच्छे साथी सिद्ध होते हैं, लोगो द्वारा आपको पसंद किया जाता है और आपको जिन्दगी में मौज - मस्ती करना अच्छा लगता है हालांकि आपका निजी जीवन ज्यादा अच्छा नहीं होता है. फिर भी आप जिन्दगी को जिन्दादिली से जीना चाहते हैं. आपके जीवन का आरंभिक समय परेशानियों से घिरा रहता है और आप खुद भी एक हद तक इसके लिए जिम्मेवार होते हैं. बढ़ती उम्र के साथ धीरे - धीरे आपका अवैयक्तिक (impersonal) रुप निखरने लगता है और आपका व्यक्तित्व पहले से सुंदर हो जाता है. आपके प्रेम संबंध विफल ही रहते हैं लेकिन आप अपनी घरेलू जिन्दगी में एक आदर्श व्यक्ति के रुप में पहचाने जाते हैं. शादी, घर - परिवार व मित्रो के लिए आप आदर्श ही होते हैं. आपके जीवन में कोई भी रिश्ता तभी कामयाब हो सकता है जब आप उसके साथ अपना गहरा लगाव न रखें. ईश्वर की कृपा से आपको जीवन में स्वत: ही बहुत सारे अवसर मिलते हैं और लोगो का सहयोग मिलता है जो आपको आगे बढ़ने के लिए सहायक होते हैं. आप अपने परिवार के वरिष्ठ सदस्य से प्रभावित रहते हैं विशेषतौर से अपने पिता से. आप उनके गुण तथा अवगुण दोनो से ही प्रभावित होते हैं.
 


अंक आठ के प्रभाव से व्यक्ति की विशेषता अंक आठ एक ऎसा अंक है जिसमें अंक चार की क्वालिटी - मैनेजमेँट के साथ काम करना - भी पाई जाती है. इस अंक में दो की खासियत - चीजों की तह तक जाना - भी मौजूद होती है. इस अंक के प्रभाव से आपके अंदर जागरुकता होती है और आपके भीतर लोगो को जांचने की अच्छी समझ भी होती है. जिस प्रकार पृथ्वी व स्वर्ग में संतुलन है और स्त्री-पुरुष में संतुलन होता है ठीक वैसे ही दोहरे व्यक्तित्व को लिए हुए आप दो बिन्दुओ को मिलाकर एक क्षेत्र बनाने का प्रतिनिधित्व करते हैं. आप अपने जीवन में मानवता के विकास व उन्नति के लिए काम करते हैं. आप बड़े-बड़े प्रोजेक्ट को अकेले संभालने की क्षमता रखते हैं और बडे़ उद्यमो (venture) में उपलब्धियाँ(accomplishments) पाने के लिए प्रयास करते रहते हैं और आपके यह प्रयास सफलता भी पाते हैं. कायदे से देखा जाए तो आठ का अंक भाग्यशाली नहीं माना जाता है क्योकि इन्हें हर चीज को पाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है तब कहीं जाकर कुछ मिलता है या यूँ कह सकते हैं कि यह अंक शनि का है और शनि व्यक्ति को तपाकर ही फल प्रदान करते हैं. आपको धन पाना हो या पद पाना हो, दोनो ही आपके पास आसानी से नहीं आती है क्योकि जैसा कि अभी बताया है कि यह सब शनि के द्वारा दिए फलों के कारण होता है. इस अंक के प्रभाव से आप कभी संतुलित नहीं रह पाएंगे, सफलता की चरम सीमा पर हो सकते हैं या फिर आप बिलकुल ही असफल हो सकते हैं. इसलिए आपको जीवन में सतर्कता के साथ आगे बढ़ना चाहिए. आपकी सफलता या असफलता आपकी जजमेंट पर भी निर्भर करती है कि आपने लोगों और घटनाओ को किस तरह से लिया है. जीवन में निरंतर संघर्ष करते हुए आपकी अंदरुनी शक्ति बली हो जाती है और अन्तत: आप एक निष्पक्ष लीडर बन जाते हैं.
अंक आठ के सकारात्मक पहलू ैं. आप बहुत ही दृढ़ व कठोर व्यक्ति होगें और आप अपने इरादो के पक्के व्यक्ति होगें. आपके अंदर एग्जक्यूटिव क्वालिटी भी होगी और आप अच्छे सुपरवाईजर होते हैं. आपके भीतर हरेक काम करने की क्षमता होगी. कोई भी और कैसा भी काम दिया जाए आप उसे बखूबी करने की क्षमता रखते हैं. आप संगठन अथवा किसी संस्था को बड़ी ही कुशलता से चलाने में सक्षम होते हैं. आप कोई काम अगर करते हैं तो उसके पीछे कोई मकसद अवश्य होता है क्योकि आप कोई भी काम बिना कारण के नही करते हैं. आप बहुत ही महत्वाकांक्षी और भौतिकतावदी व्यक्ति होते हैं. बहुत सी अभिलाषाओं को पूरा करने की आप चाह रखते हैं. आपके भीतर पुरुष तथा महिला दोनों की ही विशेषताएँ एक साथ दिखाई देती हैं.


 ज्योतिष व शास्त्रो के अनुसार नौ आदते आपके जीवन में अवशय होनी चाईए – पढ़े और सभी को बताए
१)::
अगर आपको कहीं पर भी थूकने की आदत है तो यह निश्चित है
कि आपको यश, सम्मान अगर मुश्किल से मिल भी जाता है तो कभी टिकेगा ही नहीं . wash basin में ही यह काम कर आया करें ! यश,मान-सम्मान में अभिवृध्दि होगी।
२)::
जिन लोगों को अपनी जूठी थाली या बर्तन वहीं उसी जगह पर छोड़ने की आदत होती है उनको सफलता कभी भी स्थायी रूप से नहीं मिलती.!
बहुत मेहनत करनी पड़ती है और ऐसे लोग अच्छा नाम नहीं कमा पाते.! अगर आप अपने जूठे बर्तनों को उठाकर उनकी सही जगह पर रख आते हैं तो चन्द्रमा और शनि का आप सम्मान करते हैं ! इससे मानसिक शांति बढ़ कर अड़चनें दूर होती हैं।
३)::
जब भी हमारे घर पर कोई भी बाहर से आये, चाहे मेहमान हो या कोई काम करने वाला, उसे स्वच्छ पानी ज़रुर पिलाएं !
ऐसा करने से हम राहु का सम्मान करते हैं.!
जो लोग बाहर से आने वाले लोगों को हमेशा स्वच्छ पानी पिलाते हैं उनके घर में कभी भी राहु का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता.! अचानक आ पड़ने वाले कष्ट-संकट नहीं आते।
४)::
घर के पौधे आपके अपने परिवार के सदस्यों जैसे ही होते हैं, उन्हें भी प्यार और थोड़ी देखभाल की जरुरत होती है.!
जिस घर में सुबह-शाम पौधों को पानी दिया जाता है तो हम बुध, सूर्य और चन्द्रमा का सम्मान करते हुए परेशानियों का डटकर सामना कर पाने का सामर्थ्य आ पाता है ! परेशानियां दूर होकर सुकून आता है।
जो लोग नियमित रूप से पौधों को पानी देते हैं, उन लोगों को depression, anxiety जैसी परेशानियाँ नहीं पकड़ पातीं.!
५)::
जो लोग बाहर से आकर अपने चप्पल, जूते, मोज़े इधर-उधर फैंक देते हैं, उन्हें उनके शत्रु बड़ा परेशान करते हैं.!
इससे बचने के लिए अपने चप्पल-जूते करीने से लगाकर रखें, आपकी प्रतिष्ठा बनी रहेगी।
६)::
उन लोगों का राहु और शनि खराब होगा, जो लोग जब भी अपना बिस्तर छोड़ेंगे तो उनका बिस्तर हमेशा फैला हुआ होगा, सिलवटें ज्यादा होंगी, चादर कहीं, तकिया कहीं, कम्बल कहीं ?
उसपर ऐसे लोग अपने पुराने पहने हुए कपडे़ तक फैला कर रखते हैं ! ऐसे लोगों की पूरी दिनचर्या कभी भी व्यवस्थित नहीं रहती, जिसकी वजह से वे खुद भी परेशान रहते हैं और दूसरों को भी परेशान करते हैं.!
इससे बचने के लिए उठते ही स्वयं अपना बिस्तर समेट दें.! जीवन आश्चर्यजनक रूप से सुंदर होता चला जायेगा।
७)::
पैरों की सफाई पर हम लोगों को हर वक्त ख़ास ध्यान देना चाहिए, जो कि हम में से बहुत सारे लोग भूल जाते हैं ! नहाते समय अपने पैरों को अच्छी तरह से धोयें, कभी भी बाहर से आयें तो पांच मिनट रुक कर मुँह और पैर धोयें.!
आप खुद यह पाएंगे कि आपका चिड़चिड़ापन कम होगा, दिमाग की शक्ति बढे़गी और क्रोध
धीरे-धीरे कम होने लगेगा.! आनंद बढ़ेगा।
८)::
रोज़ खाली हाथ घर लौटने पर धीरे-धीरे उस घर से लक्ष्मी चली जाती है और उस घर के सदस्यों में नकारात्मक या निराशा के भाव आने लगते हैं.!
इसके विपरीत घर लौटते समय कुछ न कुछ वस्तु लेकर आएं तो उससे घर में बरकत बनी रहती है.!
उस घर में लक्ष्मी का वास होता जाता है.! हर रोज घर में कुछ न कुछ लेकर आना वृद्धि का सूचक माना गया है.!
ऐसे घर में सुख, समृद्धि और धन हमेशा बढ़ता जाता है और घर में रहने वाले सदस्यों की भी तरक्की होती है.!
९)..
जूठन बिल्कुल न छोड़ें । ठान लें । एकदम तय कर लें। पैसों की कभी कमी नहीं होगी।
अन्यथा नौ के नौ गृहों के खराब होने का खतरा सदैव मंडराता रहेगा। कभी कुछ कभी कुछ । करने के काम पड़े रह जायेंगे और समय व पैसा कहां जायेगा पता ही नहीं चलेगा।
 


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

★वैदिक ज्योतिष विचार विमर्श भाग 2(फलित खंड★फलित के सिद्धांत ★ मित्रो आज भाव के स्वामित्व के बारे में जानेंगे।। न 1:- पहले ,पांचवे, और नवमें भाव के स्वामी व्यवहारिक शुभ ग्रह होते हैं।। न 2:-चौथे,सातवे,और दशवे भावके स्वामी यदि नेशर्गिक अशुभ ग्रह हैं तो बह अशुभ नहीं रहते हैं। न 3:-यदि चौथे,सातवे,दशवे भाव के स्वामी यदि नेशर्गिक शुभ ग्रह हैं तो बह शुभ परिणाम नहीं देते हैं। न4:-तीसरे,छटवे और ग्यारहवे भाव के स्वामी अशुभ होते हैं और इनकी अशुभता इसी क्रम में होती हैं अर्थात 3रा अधिक अशुभ,6वां उससे कम ,11 वां उससे कम अशुभ समंझें।। न 5:-बारहवे,दूसरे,और आठवे के स्वामियों की दुष्टता भी इसी बढ़ते हुए क्रम में होती है ।अर्थात 12वां सबसे खराव ,फिर 8वां ,फिर 2 रा भाव खराव होता हैं। न 6:- यदि अष्टमेश तीसरे,सातवे,या ग्यारहवे भाव का स्वामित्व भी रखता है तो बह हानिकारक सिद्ध होगा,लेकिन यदि बह एक त्रिकोण का स्वामी भी हैं तो मंगलकारी प्रभाव देगा। न 7:-दूसरे और बारहवें के स्वामी अपने से सम्बंधित ग्रहों के अनुसार व्यव्हार करते हैं ।। न 8:-शुभ ग्रह पहले,पांचवे,और नवें भाव के स्वामी होकर पहले,चौथे, सातवे और दशवे भाव में बैठे हों तो अति लाभकारी होते हैं। न9:-अशुभ ग्रह पहले,चौथे ,सातवे,दशवे भाव के स्वामी होकर पहले, पांचवे,और नवें भाव में बैठे हों तो अति लाभकारी होते हैं।। न 10:- लग्नेश जिस भाव में बैठता हैं और जिस भाव को देखता हैं उस भाव को समृद्ध करता हैं ।यदि लग्नेश एक अशुभ भाव में हो तो उस भाव की अशुभता को मिटा देगा और स्वयं निर्बली हो जाता हैं।

 8भाव में राहु वाले व्यक्ति के जीवन में तन्त्र का प्रवेश होता हैं यह मेरा अभी तक का अनुभव हैं चाहे कारण कुछ भी बने और सामान्यतः वह व्यक्ति अपने जीवन में तन्त्र और ऊपरी बाधा से व्यथित भी होता हैं ,वह संघरसशील होता हैं और जीवन में एक बार मृत्यु का अनुभव भी करता हैं ,8भाव का राहु जीवन में मकान का  और व्यवसाय का परिवर्तन भी करवाता हैं यह अभी तक मेरे अनुभव में आया हैं ऐसे व्यक्ति को राहु की सरन में अवस्य जाना चाइये  और राहु और काल भैरव जी का विधिवत पूजन करवाना चाइए 🌹


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

जब नीचे इनसे बिगड़े रिश्ते तो
      ऊपर ये ग्रह खराब हो जायेंगे!

दोस्तो,

    प्रकृति ने हमे सब कुछ दिया,उसका आनन्द हम सब अपने अपने अनुसार ले रहे हैं । लेकिन प्रकृति के द्वारा दिये गए सम्बन्धो को हम कितना निभा रहे ये हमारे ऊपर निभर्र करता है ।

ज्योतिषी शास्त्र मैं किसी भी समस्या को दूर करने के हजारों उपाय बताए गए है, किसी वस्तु का दान से लेकर, उसे किसी जानवर को खिलाने और बहाने तक । पर इन सबके साथ ज्योतिष शास्त्र ये भी कहता है कि हम जब पारिवारिक रिश्तों की अवहेलना करते हैं तो सब उपाय भी कर ले तो भी जब तक आप उन रिश्तो का सम्मान नही करोगे तब तक कोई ग्रह आपकी पूजा,पाठ, हवन, दान आदि स्वीकार नही करेगा ।

हम आगे चर्चा करते है कि सारे नवग्रह हमारे इर्द गिर्द हमारे रिश्तेदारों की भूमिका मैं हैं। लेकिन हम उनसे अपने काम के समय या स्वार्थवश ही बात करते हैं ।

अक्सर हम अपने रिश्तेदारों पर बेवजह का दोषारोपण करते हैं, कई महिलाओं को देखा कि ससुराल मैं सास ,ससुर,ननद, देवर,किसी से नही बनती सुबह से शाम उनकी बुराई करती,और कुछ समय बाद बीमारी, डिप्रेशन,आदि समस्याओं से घिर जाती है।

बात सम्मान की आती हैं तो हम भी आजकल बढ़ो का सम्मान करना तकरीबन भूल से गये ,सम्मान की परिभाषा ये नही की आप उनको भोजन करवाकर कोई अहसान कर रहे हों ।

किसी भी रिश्ते के गहरे होने की पहली शर्त होती है सम्मान। सिर्फ पति-पत्नी ही नहीं, तमाम रिश्तों से लेकर यारी-दोस्ती तक में एक-दूसरे के प्रति सम्मान बेहद अहम् है।हम जब रिश्तो मैं अहंकारवश,मोह ,मद, लोभ आदि के कारण सम्मान भूल जाते तब ऐसी स्थिति मैं उन रिश्तेदारों से सम्बंधित ग्रह अपना बुरा असर हमारे जीवन पर डालना शुरू कर देते हैं ।

अब यंहा एक सोचने वाली बात है कि आप कहोगे की हम तो सब अच्छा करते हैं, सामने वाला रिश्तेदार ही हमारे साथ गलत करता है तो यदि आप किसी के चाचा हो तो कोई आपका भतीजा भी होगा , अब चाचा हेतु और भतीजे हेतु अलग अलग ग्रह होते हैं।

जब हम बेवजह अपनो को मानसिक, शारीरिक पीड़ा देते हैं तो ऐसी स्थिति मैं अपनो की निकली आह, टीस या बद्दुआ का असर ग्रहों तक पहुचता हैं और फिर धीरे धीरे उसका असर हम तक पहुच कर जीवन के उस सुख को वंचित कर देता हैं कुंडली के जिस घर मैं वह ग्रह विराजित हैं।
अब इसके बारे मैं पृथक से समझाऊँगा ।

अभी ये समझते हैं कि हमारे जीवन के कौन से रिश्तेदार किस ग्रह की भूमिका निभाते है ।

1. सूर्य : पिता, ताऊ और पूर्वज।
2. चंद्र : माता और मौसी।
3. मंगल : भाई और मित्र।
4. बुध : बहन, बुआ, बेटी, साली और ननिहाल पक्ष।
5. गुरु : पिता, दादा, गुरु, देवता। स्त्री की कुंडली में इसे पति का प्रतिनिधित्व प्राप्त है।
6. शुक्र : पत्नि या स्त्री।
7.शनि : काका, मामा, सेवक और नौकर।
8. राहु : साला और ससुर। हालाँकि राहु को दादा का प्रतिनि‍धित्व प्राप्त है।
9. केतु : संतान और बच्चे। हालाँकि केतु को नाना का प्रतिनि‍धी माना जाता है।

अब आप समझ ले कि यदि आपकी जन्म पत्रिका मैं बुध नीच स्थिति मैं है, कमजोर है या पीढ़ीत हैं तब ऐसी स्थिति मैं आपको ज्योतिष पन्ना पहनने की सलाह या श्री गणेश जी या देवी पूजा हेतु सलाह देगा । लेकिन आपने बुध कारक रिश्तेदार याने बहन, बेटी,बुआ और साली से सम्बन्ध खराब किये या उनसे कोई छल कपट किया, दुख तकलीफ दी या अपमान किया तो कितने ही जप,तप,हवन,दान, करवा ले स्थिति पूर्ण रुप से नही सुधर सकती।


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

#कुंडली_में_दो_ग्रहों_की_युती_के_फल ======================

 १. सूर्य+बुध
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 विद्या , बुद्धि देता है, सरकारी नौकरी, ज्योतिष , अपने प्रयास से धनवान , बचपन में कष्ट ।

२. सूर्य+शुक्र
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कला, साहित्य, यांत्रिक कला का ज्ञान , क्रोध, प्रेम सम्बन्ध , बुरे, गृहस्थ बुरा , संतान में देरी , तपेदिक , पिता के लिए अशुभ।

३. सूर्य+गुरू
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मान-मर्यादा , श्रेष्टता , उच्च पद तथा यश में वृद्धि करता है, स्वयं की मेहनत से सफलता।

४. सूर्य+ मंगल
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साहसी , अग्नि से सम्बंधित कामों में सफलता , सर्जन , डॉक्टर , अधिकारी , सर में चोट, का निशान , दुर्घटना , खुद का मकान बनाये।

५. सूर्य+चन्द्र
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राजकीय ठाठ - बाठ , अधिकार, पद, उत्तम राजयोग , डॉक्टर , दो विवाह , गृहस्थ जीवन हल्का , स्त्रीयों द्वारा विरोध, बुढ़ापा उत्तम।

६. सूर्य+शनि
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पिता-पुत्र में बिगाड़ अथवा जुदाई। युवावस्था में संकट, राज दरबार बुरा। स्वास्थ कमजोर। पिता की मृत्यु , गरीबी। घरेलू अशांति। पत्नी का स्वास्थ कमजोर।

७. सूर्य+राहू
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सरकारी नौकरी में परेशानी। चमड़ी पर दाग , खर्च हो। घरेलू अशांति , परिवार की बदनामी का डर। श्वसुर की धन की स्थिति कमजोर। सूर्य को ग्रहण।

८. सूर्य+केतू
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सरकारी काम अथवा सरकारी नौकरी में उतार-चढ़ाव। संतान का फल बुरा।

९. चन्द्रमा+मंगल
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मन की स्थिति डांवाडोल। दुर्घटना। साहसिक कामों से धन लाभ' उत्तम धन।

१०. चन्द्र+बुध
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उत्तम वक्ता। बुद्धिमत्ता। लेखन शक्ति। गहन चिंतन। स्वास्थ में गड़बड़। दो विवाह योग। मानसिक असंतुलन।

११. चन्द्र+गुरू
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उत्तम स्थिति। धन प्राप्ति। बैंक में अधिकारी। उच्च पद। मान-सम्मान। धनी। यदि पाप दृष्टी हो तो विद्द्या में रूकावट।

१२. चन्द्र+शुक्र
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उतम प्रेमी, अन्य स्त्री से सम्बन्ध। विलासी। शान-शौकत का प्रेमी। रात का सुख।

१३. चन्द्र+शनि
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दुःख। मानसिक तनाव। नज़र की खराबी। माता तथा धन के लिए ठीक नहीं। हर काम में रूकावट। गरीबी। उदास ,सन्यासी। स्त्री सुख में कमी।

१४. चन्द्र+राहू
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पानी से डर। शरीर पर दाग। विदेश यात्रा। जिस भाव में स्थित हो उसकी हानी। भूत-प्रेत बाधा

१५. चन्द्र+केतू
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विद्या में रूकावट। मूत्र वीकार। जोड़ों में दर्द। केमिष्ट। माता को हानि

१६ मंगल+शनि
~~~~~~~~~
दुर्घटना। इंजीनियर। डॉक्टर। भाइयों से अनबन। धन संग्रह में रूकावट। चमड़ी तथा खून में वीकार। साहसिक कार्यों में सफलता। धन-दौलत चोरी। डाकू। ड्राइवर। सरकारी अधिकारी।

१७. मंगल+बुध
~~~~~~~~~
साहसिक कार्यो से लाभ। बुद्धी और साहस का योग। खोजी निगाह। स्पष्ट वक्ता। इंजीनियर। डाक्टर। दुर्घटना आदि।

१८. मंगल+गुरू
~~~~~~~~~
गणितज्ञ , विद्वान , ज्योतिषी, खगोल शास्त्री , पीलिया, धनवान , अगुआ, तथा नेता।

१९. मंगल+शुक्र
~~~~~~~~~~
व्यापार में कुशल। धातु शोधक। विमान चालक। साहसी। अंतराष्ट्रीय व्यापार। ऑटोमोबाइल। कार। फर्नीचर। पत्नी का स्वास्थ कमजोर।

२०. मंगल+राहू
~~~~~~~~~
कम बोले। उत्साही। चुस्त। फसादी। दिमाग तेज। शाही सवारी। अधिकारी। रसोई में होशियार।

२१. मंगल+केतू
~~~~~~~~~
संतान का फल शुभ। पुत्र साहसी। तपेदिक। चमड़ी तथा पैरों में रोग। जोड़ों का सूजन। आत्महत्या आदि।

२२. बुध+गुरू
~~~~~~~~~
विद्वान। कवि। काव्य रचियता। माता-पिता दुखिया। कभी अमीर , कभी गरीब। अकाउंटेंट। बैंक में अधिकारी। एजेंट। वकील।

२३. बुध+शुक्र
~~~~~~~~
अर्द्ध सरकारी नौकरी। सरकारी नौकरी। घरेलू सुख। कला कौशल। शिल्प कला। तेल। मिट्टी। प्रेम सम्बन्ध खराब। मशीनरी। नीलामी करने वाला। क्लर्क।

२४. बुध+शनि
~~~~~~~~~
कम बोलने वाला। गंभीर स्वभाव। बीमा व्यवसाय। शराबी। स्त्रीयों का मिलनसार। पिता के लिए बुरा।

२५. बुध+राहू
~~~~~~~~~
पागल खाना। जेल। हस्पताल। जानवरों का शिकारी। दिमाग में विकार। मानसिक तनाव। शिकारी।

२६. बुध+केतू
~~~~~~~~~
यात्रा लगी रहे। कमर, पेशाब, एवं रीढ़ की हड्डी में वीकार तथा दुःखी। पैरों में विकार। अन्वेषक। जादू टोना।

२७. गुरू+शुक्र
~~~~~~~~~~
सुखी। बलवान। चतुर. नीतिवान। पत्नी या पिता एक सहायक। घरेलू अशांति। अध्यापिका।

२८. गुरू + शनि
~~~~~~~~~~
कार्यों में निपुण। धनी। तेजस्वी। विद्या में रूकावट। पत्नी तथा पिता के लिये अशुभ। बीमारी। चिंतन शक्ति उत्तम। आध्यात्मिकता

२९. गुरू +राहू
~~~~~~~~~
विद्या में रूकावट। पिता के लिये खराब। सोच खराब

३०. गुरू+केतू
~~~~~~~~~
विद्या के लिये उत्तम , शत्रु परेशान करे। पिता -पुत्र में अनबन। अन्वेषक। आध्यात्मिकता

३१. शनि+राहू
~~~~~~~~~
शरीर पर काला दाग। तिल। पत्नी से सम्बन्ध खराब। घरेलू अशांति। डॉक्टर।

३२. शुक्र+राहू
~~~~~~~~
दो विवाह योग। घरेलू अशांति। प्रेम सम्बन्ध। बिजली विभाग में नौकरी। सेना में नौकरी। पत्नी से अनबन।

३३. शुक्र+केतू
~~~~~~~~~
संतान के लिये बुरा। कामी। पत्नी से शिकायतl 


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

ज्योतिष ज्ञान
ग्रह-दशा फल नियम
(1) ग्रह कब ? कैसे ? कितना ? फल देते हैं इस बात का निर्णय दशा अन्तर्दशा से किया जाता है।
(2) दशा कई प्रकार की हैं, परन्तु सब में शिरोमणि विंशोत्तरी ही है।
(3) सबसे पहले कुंडली में देखिये की तीनो लग्नों ( चंद्र लग्न, सूर्य लग्न, और लग्न ) में कौन- सी दो लग्नों के स्वामी अथवा तीनो ही लग्नों के स्वामी परस्पर मित्र हैं। कुंडली के शुभ अशुभ ग्रहों का निर्णय बहुमत से निश्चित लग्नों के आधार पर करना चाहिए । उदाहरण के लिए यदि लग्न कुंभ है; सूर्य धनु में चंद्र वृश्चिक में है तो ग्रहों के शुभ-अशुभ होने का निर्णय वृश्चिक अथवा धनु लग्न से किया जायेगा अर्थात गुरु, सूर्य, चंद्र और मंगल ग्रह शुभ अथवा योगकारक होंगे और शुक्र , बुध तथा शनि अनिष्ट फलदायक होंगे।
(4) यदि उपर्युक्त नियमानुसार महादशा का ग्रह शुभ अथवा योगकारक बनता है तो वह शुभ फल करेगा । इसी प्रकार यदि अन्तर्दशा का ग्रह भी शुभ अथवा योगकारक बनता है तो फल और भी शुभ होगा।
(5) स्मरण रहे की अन्तर्दशा के स्वामी का फल दशानाथ की अपेक्षा मुख्य है- अर्थात यदि दशानाथ शुभ ग्रह न भी हो परंतु भुक्तिनाथ शुभ है तो फल शुभ होगा।
(6) यदि भुक्तिनाथ दशानाथ का मित्र हो और दशानाथ से शुभ भावों ( दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवें, दशवें और ग्यारहवें ) में स्थित हो तो और भी शुभ ही फल देगा।
(7) यदि दशानाथ निज शुभ स्थान से भी अच्छे स्थान ( दूसरे, चौथे आदि ) में स्थित है तो और भी शुभ फल करेगा।
(8) परंतु सबसे आवश्यक यह है की शुभ भुक्तिनाथ में अच्छा बल होना चाहिए। यदि शुभ भुक्तिनाथ केंद्र स्थान में स्थित है, उच्च राशि अथवा स्वक्षेत्र में स्थित है अथवा मित्र राशि में स्थित है और भाव मध्य में है, किसी पापी ग्रह से युक्त या दृष्ट नहीं, बल्कि शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट है, वक्री है तथा राशि के बिलकुल आदि में अथवा बिल्कुल अंत में स्थित नहीं है, नवांश में निर्बल नहीं है , तो भुक्तिनाथ जिस शुभ भाव का स्वामी है उसका उत्तम फल करेगा अन्यथा यदि ग्रह शुभ भाव का स्वामी है परंतु छठे, आठवे, बारहवें आदि नेष्ट (अशुभ) स्थानों में स्थित है, नीच अथवा शत्रु राशि का है, पापयुक्त अथवा पापदृष्ट है, राशि के आदि अथवा अंत में है, नवांश में निर्बल है, भाव संधि में है, अस्त है, अतिचारी है तो शुभ भाव का स्वामी होता हुआ भी बुरा फल करेगा।
(9) जब तिन ग्रह एकत्र हों और उनमे से एक नैसर्गिक पापी तथा अन्य दो नैसर्गिक शुभ हों और यदि दशा तथा भुक्ति नैसर्गिक शुभ ग्रहों की हो तो फल पापी ग्रह का होगा। उदाहरण के लिए यदि लग्न कर्क हो , मंगल, शुक्र तथा गुरु एक स्थान में कहीं हों, दशा गुरु की भुक्ति शुक्र की हो तो फल मंगल का होगा। यह फल अच्छा होगा क्यों की मंगल कर्क लग्न वालों के लिए योगकारक होता है।
(10) जब दशानाथ तथा भुक्तिनाथ एक भाव में स्थित हों तो उस भाव सम्बन्धी घटनाये देते हैं
(11) जब दशानाथ तथा भुक्ति नाथ एक ही भाव को देखते हों तो दृष्ट भाव सम्बन्धी घटनाये देते हैं।
(12) जब दशानाथ तथा भुक्ति नाथ परस्पर शत्रु हों, एक दूसरे से छठे, आठवें स्थित हों और भुक्तिनाथ लग्न से भी छठे , आठवें, बारहवें स्थित हो तो जीवन में संघर्ष, बाधायें, विरोध, शत्रुता, स्थान च्युति आदि अप्रिय घटनाएं घटती हैं।
(13) लग्न से दूसरे, चौथे, छठे, आठवें, ग्यारहवें तथा बारहवें भावों के स्वामी अपनी दशा भुक्ति में शारीरिक कष्ट देते हैं यदि महादशा नाथ स्वामी इनमे से किसी भाव का स्वामी होकर इन्ही में से किसी अन्य के भाव में स्थित हो अपनी महादशा में रोग देने को उद्धत होगा ऐसा ही भुक्ति नाथ के बारे में समझना चाहिए। ऐसी दशा-अन्तर्दशा आयु के मृत्यु खंड में आये तो मृत्यु हो जाती है।
(14) गुरु जब चतुर्थ तथा सप्तम अथवा सप्तम तथा दशम का स्वामी हो तो इसको केंद्राधिपत्य दोष लगता है। ऐसा गुरु यदि उपर्युक्त द्वितीय, षष्ठ आदि नेष्ट भावों में निर्बल होकर स्थित हो अपनी दशा भुक्ति में शारीरिक कष्ट देता है।
(15) राहु तथा केतु छाया ग्रह हैं। इनका स्वतंत्र फल नहीं है। ये ग्रह यदि द्वितीय, चतुर्थ, पंचम आदि शुभ भावों में स्थित हों और उन भावों के स्वामी भी केंद्रादि स्थिति तथा शुभ प्रभाव के कारण बलवान हों तो ये छाया ग्रह अपनी दशा भुक्ति में शुभ फल देते हैं।
(16) राहु तथा केतु यदि शुभ अथवा योगकारक ग्रहों के प्रभाव में हों और वह प्रभाव उनपर चाहे युति अथवा दृष्टि द्वारा पड़ रहा हो तो छाया ग्रह अपनी दशा- अन्तर्दशा में उन शुभ अथवा योगकारक ग्रहों का फल करेंगे।


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

ज्योतिष ज्ञान
ग्रह-दशा फल नियम
(1) ग्रह कब ? कैसे ? कितना ? फल देते हैं इस बात का निर्णय दशा अन्तर्दशा से किया जाता है।
(2) दशा कई प्रकार की हैं, परन्तु सब में शिरोमणि विंशोत्तरी ही है।
(3) सबसे पहले कुंडली में देखिये की तीनो लग्नों ( चंद्र लग्न, सूर्य लग्न, और लग्न ) में कौन- सी दो लग्नों के स्वामी अथवा तीनो ही लग्नों के स्वामी परस्पर मित्र हैं। कुंडली के शुभ अशुभ ग्रहों का निर्णय बहुमत से निश्चित लग्नों के आधार पर करना चाहिए । उदाहरण के लिए यदि लग्न कुंभ है; सूर्य धनु में चंद्र वृश्चिक में है तो ग्रहों के शुभ-अशुभ होने का निर्णय वृश्चिक अथवा धनु लग्न से किया जायेगा अर्थात गुरु, सूर्य, चंद्र और मंगल ग्रह शुभ अथवा योगकारक होंगे और शुक्र , बुध तथा शनि अनिष्ट फलदायक होंगे।
(4) यदि उपर्युक्त नियमानुसार महादशा का ग्रह शुभ अथवा योगकारक बनता है तो वह शुभ फल करेगा । इसी प्रकार यदि अन्तर्दशा का ग्रह भी शुभ अथवा योगकारक बनता है तो फल और भी शुभ होगा।
(5) स्मरण रहे की अन्तर्दशा के स्वामी का फल दशानाथ की अपेक्षा मुख्य है- अर्थात यदि दशानाथ शुभ ग्रह न भी हो परंतु भुक्तिनाथ शुभ है तो फल शुभ होगा।
(6) यदि भुक्तिनाथ दशानाथ का मित्र हो और दशानाथ से शुभ भावों ( दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवें, दशवें और ग्यारहवें ) में स्थित हो तो और भी शुभ ही फल देगा।
(7) यदि दशानाथ निज शुभ स्थान से भी अच्छे स्थान ( दूसरे, चौथे आदि ) में स्थित है तो और भी शुभ फल करेगा।
(8) परंतु सबसे आवश्यक यह है की शुभ भुक्तिनाथ में अच्छा बल होना चाहिए। यदि शुभ भुक्तिनाथ केंद्र स्थान में स्थित है, उच्च राशि अथवा स्वक्षेत्र में स्थित है अथवा मित्र राशि में स्थित है और भाव मध्य में है, किसी पापी ग्रह से युक्त या दृष्ट नहीं, बल्कि शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट है, वक्री है तथा राशि के बिलकुल आदि में अथवा बिल्कुल अंत में स्थित नहीं है, नवांश में निर्बल नहीं है , तो भुक्तिनाथ जिस शुभ भाव का स्वामी है उसका उत्तम फल करेगा अन्यथा यदि ग्रह शुभ भाव का स्वामी है परंतु छठे, आठवे, बारहवें आदि नेष्ट (अशुभ) स्थानों में स्थित है, नीच अथवा शत्रु राशि का है, पापयुक्त अथवा पापदृष्ट है, राशि के आदि अथवा अंत में है, नवांश में निर्बल है, भाव संधि में है, अस्त है, अतिचारी है तो शुभ भाव का स्वामी होता हुआ भी बुरा फल करेगा।
(9) जब तिन ग्रह एकत्र हों और उनमे से एक नैसर्गिक पापी तथा अन्य दो नैसर्गिक शुभ हों और यदि दशा तथा भुक्ति नैसर्गिक शुभ ग्रहों की हो तो फल पापी ग्रह का होगा। उदाहरण के लिए यदि लग्न कर्क हो , मंगल, शुक्र तथा गुरु एक स्थान में कहीं हों, दशा गुरु की भुक्ति शुक्र की हो तो फल मंगल का होगा। यह फल अच्छा होगा क्यों की मंगल कर्क लग्न वालों के लिए योगकारक होता है।
(10) जब दशानाथ तथा भुक्तिनाथ एक भाव में स्थित हों तो उस भाव सम्बन्धी घटनाये देते हैं
(11) जब दशानाथ तथा भुक्ति नाथ एक ही भाव को देखते हों तो दृष्ट भाव सम्बन्धी घटनाये देते हैं।
(12) जब दशानाथ तथा भुक्ति नाथ परस्पर शत्रु हों, एक दूसरे से छठे, आठवें स्थित हों और भुक्तिनाथ लग्न से भी छठे , आठवें, बारहवें स्थित हो तो जीवन में संघर्ष, बाधायें, विरोध, शत्रुता, स्थान च्युति आदि अप्रिय घटनाएं घटती हैं।
(13) लग्न से दूसरे, चौथे, छठे, आठवें, ग्यारहवें तथा बारहवें भावों के स्वामी अपनी दशा भुक्ति में शारीरिक कष्ट देते हैं यदि महादशा नाथ स्वामी इनमे से किसी भाव का स्वामी होकर इन्ही में से किसी अन्य के भाव में स्थित हो अपनी महादशा में रोग देने को उद्धत होगा ऐसा ही भुक्ति नाथ के बारे में समझना चाहिए। ऐसी दशा-अन्तर्दशा आयु के मृत्यु खंड में आये तो मृत्यु हो जाती है।
(14) गुरु जब चतुर्थ तथा सप्तम अथवा सप्तम तथा दशम का स्वामी हो तो इसको केंद्राधिपत्य दोष लगता है। ऐसा गुरु यदि उपर्युक्त द्वितीय, षष्ठ आदि नेष्ट भावों में निर्बल होकर स्थित हो अपनी दशा भुक्ति में शारीरिक कष्ट देता है।
(15) राहु तथा केतु छाया ग्रह हैं। इनका स्वतंत्र फल नहीं है। ये ग्रह यदि द्वितीय, चतुर्थ, पंचम आदि शुभ भावों में स्थित हों और उन भावों के स्वामी भी केंद्रादि स्थिति तथा शुभ प्रभाव के कारण बलवान हों तो ये छाया ग्रह अपनी दशा भुक्ति में शुभ फल देते हैं।
(16) राहु तथा केतु यदि शुभ अथवा योगकारक ग्रहों के प्रभाव में हों और वह प्रभाव उनपर चाहे युति अथवा दृष्टि द्वारा पड़ रहा हो तो छाया ग्रह अपनी दशा- अन्तर्दशा में उन शुभ अथवा योगकारक ग्रहों का फल करेंगे।


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

आज चन्द्रमा के दर्शन न करे।
         कलंक चतुर्थी है-

         ***********
शास्त्रों में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को कलंक चतुर्थी कहकर संबोधित किया गया है। इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना निषेध माना गया है क्योंकि इस गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा के दर्शन करने से किसी को भी कलंक लग सकता है। गणेश पुराण में वर्णित अभिशप्त चंद्रमा की कथा के अनुसार गणेश जी द्वारा चंद्रमा को श्रापित किया गया है।

चंद्रमा क्यों हुए श्रापित:-
     ************
पौराणिक कथा के अनुसार एक दिन कैलाश पर ब्रह्म देव महादेव के दर्शन हेतु गए तभी वहां देवर्षि नारद ने प्रकट होकर अतिस्वादिष्ट फल भगवान शंकर को अर्पित किया। तभी कार्तिकेय व गणेश दोनों महादेव से उस फल की मांग करने लगे। तब ब्रह्म देव ने महादेव को परामर्श देते हुए कहा के फल को छोटे षडानन अर्थात कार्तिकेय को दे दें। अत: महादेव ने वह फल कार्तिकेय को दे दिया। इससे गजानन ब्रह्म देव पर कुपित होकर उनकी सृष्टि रचना के कार्य में विध्न ड़ालने लगे। गणपति के उग्र रूप के कारण ब्रह्म देव भयभीत हो गए। इस दृश्य को देखकर चंद्र देव हंस पड़े।

चंद्रमा की हंसी सुन कर गणेशजी क्रोधित हो उठे तथा उन्होंने चंद्र को श्राप दे दिया। श्राप के अनुसार चंद्र देव किसी को देखने के योग्य नहीं रहे तथा किसी द्वारा देखे जाने पर वह व्यक्ति पाप का भागी हो जाता। श्रापित चंद्र ने बारह वर्ष तक गणेश जी का तप किया जिससे गणपति जी ने प्रसन्न होकर चंद्र देव के श्राप को मंद कर दिया तथा मंद श्राप के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी जो व्यक्ति चंद्रमा को देखता है, वह निश्चय ही अभिशाप का भागी होता है तथा उस पर मिथ्यारोपण लगते हैं।

श्री कृष्ण भगवान पर भी लगा
था मिथ्यारोप:-

भगवान श्री कृष्ण पर द्वारकापुरी में सूर्य भक्त सत्राजित ने स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप लगाया था। स्वयं श्रीकृष्ण ने भागवत-10/56/31 में इसे “मिथ्याभिशाप” कहकर मिथ्या कलंक का ही संकेत दिया था। देवर्षि नारद ने भी श्रीकृष्ण को भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन चंद्र दर्शन करने के फलस्वरूप व्यर्थ कलंक लगने की बात कही थी। नारद पुराण के अनुसार ये श्लोक इस प्रकार है -

“त्वया भाद्रपदे शुक्लचतुर्थ्यां चन्द्रदर्शनम्। कृतं येनेह भगवन्! वृथा शापमवाप्तवान्”।

स्कंदपुराण के अनुसार:-
***********
स्कंदपुराण में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि भादव के शुक्लपक्ष के चंद्र दर्शन मैंने गोखुर के जल में किया जिसके फलस्वरूप मुझ पर मणि की चोरी का कलंक लगा। “मया भाद्रपदे शुक्लचतुर्थ्यां चंद्रदर्शनं गोष्पदाम्बुनि वै राजन् कृतं दिवमपश्यता”।

रामचरितमानस के अनुसार:-
************
रामचरितमानस के सुंदरकांड
में गोस्वामी जी के अनुसार-

“सो परनारि लिलार गोसाईं।
तजउ चौथि के चंद की नाईं”

अर्थात भादवा की शुक्लचतुर्थी के चंद्रदर्शन से लगे कलंक का सत्यता से कोई संबंध नहीं होता परंतु इसका दर्शन त्याज्य है।

विष्णुपुराण के अनुसार:-
************
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रदर्शन से कलंक लगने के
शमन हेतु विष्णुपुराण में वर्णित स्यमंतक मणि का उल्लेख है, जिसके सुनने या पढऩे से यह दोष समाप्त होता है। इसका वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध में 57वें अध्याय में है।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी के सिद्धि विनायक स्वरूप की पूजा होती है. शास्त्रों के अनुसार इस दिन गणेश जी दोपहर में अवतरित हुए थे. इसीलिए यह गणेश चतुर्थी विशेष फलदायी बताई जाती है।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है।
जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों का निर्देश है। यह अनुभूत भी है।
इस गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले व्यक्तियों को उक्त परिणाम अनुभूत हुए, इसमें संशय नहीं है। यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाए तो निम्न मंत्र का पाठ अवश्य कर लेना चाहिए-

'सिहः प्रसेनम्‌ अवधीत्‌, सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः॥'

श्रीमद्भागवत्‌ में एक कथा आती है जिसके अनुसार इस दिन चांद देखने से ही भगवान कृष्ण को मिथ्या कलंक का दोष लगा था जिससे मुक्ति पाने के लिए उन्होंने विधिवत गणेश चतुर्थी का व्रत किया था. भविष्य पुराण में इस तिथि को शिवा, शांत और सुखा चतुर्थी भी कहा है।

।। जय श्री गणेश ।।
✍☘💕 


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

चंद्रमा :: वैदिक ज्योतिष का आधार
MOON transit through 27 constellation


पाराशर होरा शास्त्र में चंद्रमा गोचर को #ज्योतिष_की_आत्मा कहा गया है। सूर्य के बाद धरती के उपग्रह चन्द्र का प्रभाव धरती पर पूर्णिमा के दिन सबसे ज्यादा रहता है। जिस तरह मंगल के प्रभाव से समुद्र में मूंगे की पहाड़ियां बन जाती हैं और लोगों का खून दौड़ने लगता है उसी तरह चन्द्र से समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पत्न होने लगता है। जितने भी दूध वाले वृक्ष हैं सभी चन्द्र के कारण उत्पन्न हैं। चन्द्रमा बीज, औषधि, जल, मोती, दूध, अश्व और मन पर राज करता है। लोगों की बेचैनी और शांति का कारण भी चन्द्रमा है।

"मानव योनि में कर्म रूपी वृछ निर्माण हेतु #विचार_रूपी_बीज का जनक होने का श्रेय चन्द्रउर्जा को ही प्राप्त है।"
चन्द्रमा माता का सूचक और मन का कारक है। कुंडली में चन्द्र के अशुभ होने पर मन और माता पर प्रभाव पड़ता है। ज्योतिष शाश्त्र "फलदीपिका" के अनुसार कुंडली में चन्द्र के दोषपूर्ण या खराब होने की स्थिति के बारे में विस्तार से बताया गया है।

👉 कैसे होता है चन्द्र खराब ?
* घर का वायव्य कोण दूषित होने पर भी चन्द्र खराब हो जाता है।
* घर में जल का स्थान-दिशा यदि दूषित है तो भी चन्द्र अशुभ फल देता है।
* पूर्वजों का अपमान करने और श्राद्ध कर्म नहीं करने से भी चन्द्र दूषित हो जाता है।
* माता या मातातुल्य का अपमान करने या उससे विवाद करने पर चन्द्र अशुभ प्रभाव देने लगता है।
* शरीर में जल यदि दूषित हो गया है तो भी चन्द्र का अशुभ प्रभाव पड़ने लगता है।
* गृह कलह करने और पारिवारिक सदस्य को धोखा देने से भी चन्द्र प्रतिकूल फल देता है।
* राहु, केतु या शनि के साथ होने से तथा उनकी दृष्टि चन्द्र पर पड़ने से चन्द्र खराब फल देने लगता है।
* सूर्यअस्त के पश्चात् दूध या दूध निर्मित चीजो का लगातार सेवन करने से।

शुभ चन्द्र व्यक्ति को धनवान और दयालु बनाता है। सुख और शांति देता है। भूमि और भवन के मालिक चन्द्रमा से चतुर्थ में शुभ ग्रह होने पर या लग्न से केंद्र में स्वग्रही चन्द्र द्वारा यामिनिनाथ योग से घर संबंधी शुभ फल मिलते हैं।

👉 कैसे जानें कि चन्द्र खराब या दूषित है ?..
* दूध देने वाला जानवर मर जाए।
* यदि घोड़ा पाल रखा हो तो उसकी मृत्यु भी तय है, किंतु आमतौर पर अब लोगों के यहां ये जानवर नहीं होते।
* माता का बीमार होना या घर के जलस्रोतों का सूख जाना भी चन्द्र के अशुभ होने की निशानी है।
* महसूस करने की क्षमता क्षीण हो जाती है।
* राहु, केतु या शनि के साथ होने से तथा उनकी दृष्टि चन्द्र पर पड़ने से चन्द्र अशुभ हो जाता है।
* मानसिक रोगों का कारण भी चन्द्र को माना गया है।
* भावनात्मक असंतुलन की स्तिथि को प्राप्त होना।
* अनिर्णय स्तिथि को प्राप्त होना।
* एकाग्रचित होने में कठिनाई का अनुभव हो।

👉 चंद्र ग्रह उर्जा असंतुलन से होती ये बीमारी:
* चन्द्र में मुख्य रूप से दिल, बायां भाग से संबंध रखता है।
* मिर्गी का रोग।
* पागलपन।
* बेहोशी।
* फेफड़े संबंधी रोग।
* मासिक धर्म गड़बड़ाना।
* स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है।
* मानसिक तनाव और मन में घबराहट।
* तरह-तरह की शंका और अनिश्चित भय।
* सर्दी-जुकाम बना रहता है।
* व्यक्ति के मन में आत्महत्या करने के विचार बार-बार आते रहते हैं।
* किसी विशेष कर्म को करने में असहजता।

👉 चंद्र ग्रह के उपाय:
* प्रतिदिन माता के पैर छूना। (#भूलना_मत)
* शिव की भक्ति।
* सोमवार का व्रत।
* पानी या दूध को साफ चांदी पात्र में सिरहाने रखकर सोएं और सुबह कीकर के वृक्ष की जड़ में डाल दें।
* चावल, सफेद वस्त्र, शंख, वंशपात्र, सफेद चंदन, श्वेत पुष्प, चीनी, बैल, दही और मोती दान करना चाहिए।
* मोती युक्त चांदी निर्मित #प्रतिष्ठित एवं अभिमंत्रित "चंद्रयंत्र" गले में धारण करना।
* कुंडली के छठे भाव में चन्द्र हो तो दूध या पानी का दान करना मना है।
* सोमवार को सफेद वस्तु जैसे दही, चीनी, चावल, सफेद वस्त्र,1 जोड़ा जनेऊ, दक्षिणा के साथ दान करना।
* "ॐ सोम सोमाय नमः'' का 108 बार नित्य जाप करना श्रेयस्कर होता है।
* "चन्द्र अष्टोत्तर शतनामावली" का जप या पलाश समिधा द्वारा हवन करना।
* यदि चन्द्र 12वां हो तो धर्मात्मा या साधु को भोजन न कराएं और न ही दूध पिलाएं।
* नवरात्र में नौ दिन तक गोधुली बेला में घी का दीपक जला कर निहारना।
* #हस्त_रोहिणी_श्रवण नक्षत्र विचार कर सूर्योदय से सूर्यास्त तक नमक एवं जलसेवन वर्जित रखना।
* गंगाजल रुद्राभिषेक विधि विधान द्वारा।

👉 नोट :
इनमें से कुछ उपाय चंद्रमा की विशेष स्तिथि वश #विपरीत_फल देने वाले भी हो सकते हैं। अपनी जन्म कुंडली, हस्तरेखा की पूरी जांच किए बगैर उपाय नहीं करना चाहिए। किसी जानकार, विशेषज्ञ या ज्योतिष विचारक को कुंडली दिखाकर ही ये उपाय करें। 


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

*🌷आइये जाने उच्च तथा नीच राशि के ग्रह—🌷*

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*ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगों के मन में उच्च तथा नीच राशियों में स्थित ग्रहों को लेकर एक प्रबल धारणा बनी हुई है कि अपनी उच्च राशि में स्थित ग्रह सदा शुभ फल देता है तथा अपनी नीच राशि में स्थित ग्रह सदा नीच फल देता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह को तुला राशि में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है तथा इसीलिए तुला राशि में स्थित शनि को उच्च का शनि कह कर संबोधित किया जाता है और अधिकतर ज्योतिषियों का यह मानना है कि तुला राशि में स्थित शनि कुंडली धारक के लिए सदा शुभ फलदायी होता है।*

*किंतु यह धारणा एक भ्रांति से अधिक कुछ नहीं है तथा इसका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है और इसी भ्रांति में विश्वास करके बहुत से ज्योतिष प्रेमी जीवन भर नुकसान उठाते रहते हैं क्योंकि उनकी कुंडली में तुला राशि में स्थित शनि वास्तव में अशुभ फलदायी होता हैतथा वे इसे शुभ फलदायी मानकर अपने जीवन में आ रही समस्याओं का कारण दूसरे ग्रहों में खोजते रहते हैं तथा अपनी कुंडली में स्थित अशुभ फलदायी शनि के अशुभ फलों में कमी लाने का कोई प्रयास तक नहीं करते। इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए एक नज़र में ग्रहों के उच्च तथा नीच राशियों में स्थित होने की स्थिति पर विचार कर लें।नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह को किसी एक राशि विशेष में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है जिसे इस ग्रह की उच्च की राशि कहा जाता है। इसी तरह अपनी उच्च की राशि से ठीक सातवीं राशि में स्थित होने पर प्रत्येक ग्रह के बल में कमी आ जाती है तथा इस राशि को इस ग्रह की नीच की राशि कहा जाता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह की उच्च की राशि तुला है तथा इस राशि से ठीक सातवीं राशि अर्थात मेष राशि शनि ग्रह की नीच की राशि है तथा मेष में स्थित होने से शनि ग्रह का बल क्षीण हो जाता है। इसी प्रकार हर एक ग्रह की 12 राशियों में से एक उच्च की राशि तथा एक नीच की राशि होती है।*

*किंतु यहां पर यह समझ लेना अति आवश्यक है कि किसी भी ग्रह के अपनी उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का संबंध केवल उसके बलवान या बलहीन होने से होता है न कि उसके शुभ या अशुभ होने से। तुला में स्थित शनि भी कुंडली धारक को बहुत से अशुभ फल दे सकता है जबकि मेष राशि में स्थित नीच राशि का शनि भी कुंडली धारक को बहुतसे लाभ दे सकता है। इसलिए ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगों को यह बात भली भांति समझ लेनी चाहिए कि उच्च या नीच राशि में स्थित होने का प्रभाव केवल ग्रह के बल पर पड़ता है न कि उसके स्वभाव पर। पारम्परिक भारतीय ज्योतिष कभी यह नहीं कहती कि उच्च का ग्रह हमेशा अच्छे परिणाम देगा और नीच का ग्रह हमेशा खराब परिणाम देगा। लेकिन हेमवंता नेमासा काटवे की मानें तो उच्च ग्रह हमेशा खराब परिणाम देंगे और नीच ग्रह अच्छे परिणाम देंगे। इसके पीछे उनका मंतव्य मुझे यह नजर आता है कि जब कोई ग्रह उच्च का होता है तो वह इतनी तीव्रता से परिणाम देता है कि व्यक्ति की जिंदगी में कर्मों से अधिक प्रभावी परिणाम देने लगता है। यानि व्यक्ति कोई एक काम करना चाहे और ग्रह उसे दूसरी ओर लेकर जाएं। इस तरह व्यक्ति की जिंदगी में संघर्ष बढ़ जाता है। इसी वजह से काटवे ने उच्च के ग्रहों को खराब कहा होगा।कुछ परिस्थितियां ऐसी भी होती हैं जब नीच ग्रह उच्च का परिणाम देते हैं। यह मुख्य रूप से लग्न में बैठे नीच ग्रह के लिए कहा गया है। मैंने तुला लग्न में सूर्य और गुरू की युति अब तक चार बार देखी है।तुला लग्न में सूर्य नीच का हुआ और गुरू अकारक।अगर टर्मिनोलॉजी के अनुसार गणना की जाए तो सबसे निकृष्ट योग बनेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता। लग्न में सूर्य उच्च का परिणाम देता है और वास्तव में देखा भी यही गया। लग्न में उच्च का सूर्य गुरू के साथ हो तो जातक अपने संस्थान में शीर्ष स्थान पर पहुंचता है॥*

*आइए कुछ तथ्यों की सहायता से इस विचार को समझने का प्रयास करते हैं। शनि नवग्रहों में सबसेधीमी गति से भ्रमण करते हैं तथा एक राशि में लगभग अढ़ाई वर्ष तक रहते हैं अर्थात शनि अपनी उच्च की राशि तुला तथा नीच की राशि मेष में भी अढ़ाई वर्ष तक लगातार स्थित रहते हैं। यदि ग्रहों के अपनी उच्च या नीच राशियों में स्थित होने से शुभ या अशुभ होने की प्रचलित धारणा को सत्य मान लिया जाए तो इसका अर्थ यह निकलता है कि शनि के तुला में स्थित रहने के अढ़ाई वर्ष के समय काल में जन्में प्रत्येक व्यक्ति के लिए शनि शुभ फलदायी होंगे क्योंकि इन वर्षों में जन्में सभी लोगों की जन्म कुंडली में शनि अपनी उच्च की राशि तुला में ही स्थित होंगे। यह विचार व्यवहारिकता की कसौटी पर बिलकुल भी नहीं टिकता क्योंकि देश तथा काल के हिसाब से हर ग्रह अपना स्वभाव थोड़े-थोड़े समय के पश्चात ही बदलता रहता है तथा किसी भी ग्रह का स्वभाव कुछ घंटों के लिए भी एक जैसा नहीं रहता,फिर अढ़ाई वर्ष तो बहुत लंबा समय है।*

*इसलिए ग्रहों के उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का मतलब केवल उनके बलवान या बलहीन होने से समझना चाहिए न कि उनके शुभ या अशुभ होने से। मैने अपने ज्योतिष अभ्यास के कार्यकाल में ऐसी बहुत सी कुंडलियां देखी हैं जिनमें अपनी उच्च की राशि में स्थित कोई ग्रह बहुत अशुभ फल दे रहा होता है।क्योंकि अपनी उच्च की राशि में स्थित होने से ग्रह बहुत बलवान हो जाता है, इसलिए उसके अशुभ होने की स्थिति में वह अपने बलवान होने के कारण सामान्य से बहुत अधिक हानि करता है।इसी तरह मेरे अनुभव में ऐसीं भी बहुत सी कुंडलियां आयीं हैं जिनमें कोई ग्रह अपनी नीच की राशि में स्थित होने पर भी स्वभाव से शुभ फल दे रहा होता है किन्तु बलहीन होने के कारण इन शुभ फलों में कुछ न कुछ कमी रह जाती है। ऐसे लोगों को अपनी कुंडली में नीच राशि में स्थित किन्तु शुभ फलदायी ग्रहों के रत्न धारण करने से बहुत लाभ होता है क्योंकि ऐसे ग्रहों के रत्न धारण करने से इन ग्रहों को अतिरिक्त बल मिलता है तथा यह ग्रह बलवान होकर अपने शुभ फलों में वृद्धि करने में सक्षम हो जाते हैं।हर ग्रह अपनी उच्च राशि में तीव्रता से परिणाम देता है और नीच राशि में मंदता के साथ। अगर वह ग्रह आपकी कुण्डली में अकारक है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उच्च का है या नीच का। सूर्य मेष में, चंद्र वृष में, बुध कन्या में,गुरू कर्क में, मंगल मकर में, शनि तुला में और शुक्र मीन राशि में उच्च के परिणाम देते हैं।यानि पूरी तीव्रता से परिणाम देते हैं।इसी तरह सूर्य तुला में, चंद्रमा वृश्चिक में, बुध मीन में, गुरू मकर में, मंगल कर्क में, शुक्र कन्या में और शनि मेष में नीच का परिणाम देते हैं।*

*अब हम ग्रह एवं राशियों के कुछ वर्गीकरण को जानेंगे जो कि फलित ज्योतिष के लिए अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं।पहला वर्गीकरण शुभ ग्रह और पाप ग्रह का इस प्रकार है -*

*शुभ ग्रह: चन्द्रमा, बुध, शुक्र, गुरू हैं॥*

*पापी ग्रह: सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु हैं।*

*साधारणत चन्द्र एवं बुध को सदैव ही शुभ नहीं गिना जाता। पूर्ण चन्द्र अर्थात पूर्णिमा के पास का चन्द्र शुभ एवं अमावस्या के पास का चन्द्र शुभ नहीं गिना जाता। इसी प्रकार बुध अगर शुभ ग्रह के साथ हो तो शुभ होता है और यदि पापी ग्रह के साथ हो तो पापी हो जाता है।यह ध्यान रखने वाली बात है कि सभी पापी ग्रह सदैव ही बुरा फल नहीं देते। न ही सभी शुभ ग्रह सदैव ही शुभ फल देते हैं। अच्छा या बुरा फल कई अन्य बातों जैसे ग्रह का स्वामित्व, ग्रह की राशि स्थिति,दृष्टियों इत्यादि पर भी निर्भर करता है।जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।जैसा कि उपर कहा गया एक ग्रह का अच्छा या बुरा फल कई अन्य बातों पर निर्भर करता है और उनमें से एक है ग्रह की राशि में स्थिति। कोई भी ग्रह सामान्यत अपनी उच्च राशि, मित्र राशि, एवं खुद की राशि में अच्छा फल देते हैं। इसके विपरीत ग्रह अपनी नीच राशि और शत्रु राशि में बुरा फल देते हैं।*

*ग्रहों की उच्चादि राशि स्थिति इस प्रकार है —-*

*ग्रह उच्च राशि नीच राशि स्वग्रह राशि*
*1 सूर्य,मेष तुला सिंह*
*2 चन्द्रमा,वृषभ वृश्चिक कर्क*
*3 मंगल, मकर कर्क मेष, वृश्चिक*
*4 बुध, कन्या मीन मिथुन, कन्या*
*5 गुरू, कर्क मकर धनु, मीन*
*6 शुक्र, मीन कन्या वृषभ, तुला*
*7 शनि, तुला मेष मकर, कुम्भ*
*8 राहु, धनु मिथुन*
*9 केतु मिथुन धनु*

*उपर की तालिका में कुछ ध्यान देने वाले बिन्दु इस प्रकार हैं -1 ग्रह की उच्च राशि और नीच राशि एक दूसरे से सप्तम होती हैं। उदाहरणार्थ सूर्य मेष में उच्च का होता है जो कि राशि चक्र की पहली राशि है और तुला में नीच होता है जो कि राशि चक्र की सातवीं राशि है।2 सूर्य और चन्द्र सिर्फ एक राशि के स्वामी हैं।*

*राहु एवं केतु किसी भी राशि के स्वामी नहीं हैं। अन्य ग्रह दो-दो राशियों के स्वामी हैं।3 राहु एवं केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती। राहु-केतु की उच्च एवं नीच राशियां भी सभी ज्योतिषी प्रयोग नहीं करते हैं।*

*सभी ग्रहों के बलाबल का राशि और अंशों के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। एक राशि में 30ए अंश होते हैं।ग्रहों के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए ग्रह किस राशि में कितने अंश पर है यह ज्ञान होना अनिवार्य है।सभी नौ ग्रहों की स्थिति का विश्लेषणइस प्रकार है-*

*सूर्य- सूर्य सिंह राशि में स्वग्रही होता है। 1ए से 10ए अंश तक उच्च का माना जाता है। तुला के 10ए अंश तक नीच का होता है। 1ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ माना जाता है। सिंह में ही 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।*

*चंद्र- कर्क राशि मेंचंद्रमा स्वग्रही अथवा स्वक्षेत्री माना जाता है,परन्तु वृष राशि में 3ए अंश तक उच्च का और वृश्चिक राशि में 3ए अंश तक नीच का होता है। वृष राशि में ही 4ए से 30ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ तथा कर्क राशि में 1ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है।*

*मंगल- मंगल मेष तथा वृश्चिक राशियों में स्वग्रही होता है। मकर राशि में 1ए से 28ए अंश तक उच्च का तथा कर्क राशि में 1ए से 28ए अंश तक नीच का माना जाता है। मेष राशि में 1ए से 18ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ होता है और 19ए से 20ए अंश तक स्वक्षेत्री कहा जाता है।*

*बुध- बुध ग्रह कन्या और मिथुन राशियों में स्वग्रही होता है परंतु कन्या राशि में 15ए अंश तक उच्च का और मीन राशि में 15ए अंश तक नीच का होता है। कन्या राशि में ही 16ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ और इसी राशि में 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री कहलाता है।*

*गुरू- गुरू धनु और मीन राशियों में स्वग्रही या स्वक्षेत्री होता है।कर्क राशि में 5ए अंश तक उच्च का और मकर राशि में 5ए अंश तक नीच का होता है। 1ए से 10ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ तथा धनु राशि में ही 14ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है।*

*शुक्र- शुक्र ग्रह अपनी दो राशियों वृष और तुला में स्वग्रही होता है। मीन राशि में 27ए अंश तक उच्च का और कन्या राशि में 27ए अंश तक नीच का होता है। तुला राशि में 1ए से 10ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ और उसी राशि में 11ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।*

*शनि- शनि अपनी दो राशियों कुंभ और मकर में स्वग्रही होता है। तुला में 1ए से 20ए अंश तक उच्च का और मेष में 20ए अंश तक नीच का होता है। कुंभ राशि में ही शनि 1ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोण का होता है। उसके बाद 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।*

*राहू- कन्या राशि का स्वामी मिथुन और वृष में उच्च का होता है। धनु में नीच का कर्क में मूल त्रिकोस्थ माना जाता है।*

*केतु- केतु मिथुन राशि का स्वामी है। 15ए अंश तक धनु और वृश्चिक राशि में उच्च का होता है। 15ए अंश तक मिथुन राशि में नीच का, सिंह राशि में मूल त्रिकोण का और मीन में स्वक्षेत्री होता है।वृष राशि में ही यह नीच का होता है।*

*जन्म कुंडली का विश्लेषण अंशों के आधार पर करने पर ही ग्रहों के वास्तविक बलाबल को ज्ञात किया जाता है। उदाहरण के लिए सिंह लग्न की जन्म कुंडली में सूर्य लग्न में बैठे होने से वह स्वग्रही है। यह जातक को मान सम्मान, धनधान्य बचपन से दिला रहा है। दशम भाव में वृष का चंद्रमा होने से जातक उत्तरोत्तर उन्नति करता रहेगा। अत: यह दो ग्रह ही उसके भाग्यवर्धक होंगे।*

*नीच भंग राज योग —–ग्रह अगर नीच राशि में बैठा हो या शत्रु भाव में तो आम धारणा यह होती है कि जब उस ग्रह की दशा आएगी तब वह जिस घर में बैठा है उस घर से सम्बन्धित विषयों में नीच का फल देगा. लेकिन इस धारणा से अगल एक मान्यता यह है कि नीच में बैठा ग्रह भी कुछ स्थितियों में राजगयोग के समान फल देता है. इस प्रकार के योग को नीच भंग राजयोग के नाम से जाना जाता है.*

*नीच भंग राजयोग के लिए आवश्यक स्थितियां——ज्योतिषशास्त्र के नियमों में बताया गया है कि नवमांश कुण्डली में अगर ग्रह उच्च राशि में बैठा हो तो जन्म कुण्डली में नीच राशि में होते हुए भी वह नीच का फल नहीं देता है. इसका कारण यह है कि इस स्थिति में उनका नीच भंग हो जाता है.जिस राशि में नीच ग्रह बैठा हो उस राशि का स्वामी ग्रह उसे देख रहा हो अथवा जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा हो उस राशि का स्वामी स्वगृही होकर साथ में बैठा हो तो स्वत: ही ग्रह का नीच भंग हो जाता है।*

 *नीच भंग के संदर्भ में एक नियम यह भी है कि नीच राशि में बैठा ग्रह अगर अपने सामने वाले घर यानी अपने से सातवें भाव में बैठे नीच ग्रह को देख रहा है,तो दोनों नीच ग्रहों का नीच भंग हो जाता है.अगर आपकी कुण्डली में ये स्थितियां नहीं बनती हों तो इन नियमों से भी नीच भंग का आंकलन कर सकते हैं जैसे जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठे हों उस राशि के स्वामी अपनी उच्च राशि में विराजमान हों तो नीच ग्रह का दोष नहीं लगता है।*

*एक नियम यह भी है कि जिस राशि में ग्रह नीच का होकर बैठा है उस ग्रह का स्वामी जन्म राशि से केन्द्र में विराजमान है साथ ही जिस राशि में नीच ग्रह उच्च का होता है उस राशि का स्वामी भी केन्द्र में बैठा हो तो सर्वथा नीच भंग राज योग बनता है. अगर यह स्थिति नहीं बनती है तो लग्न भी इस का आंकलन किया जा सकता है।यानी जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा उस राशि का स्वामी एवं जिस राशि में नीच ग्रह उच्च का होता है।उसका स्वामी लग्न से कहीं भी केन्द्र में स्थित हों तो नीच भंग राज योग का शुभ फल देता है.अगर आपकी कुण्डली में ग्रह नीच राशियों में बैठे हैं तो इन स्थितियों को देखकर आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि आपकी कुण्डली में नीच राशि में बैठा ग्रह नीच का फल देगा अथवा यह नीच भंग राजयोग बनकर आपको अत्यंत शुभ फल प्रदान करेगा.*

*नीच भंग राजयोग का फल—–नीच भंग राज योग कुण्डली में एक से अधिक होने पर भी उसी प्रकार फल देता है जैसे एक नीच भंग राज योग होने पर .आधुनिक परिवेश में ज्योतिषशास्त्री मानते है कि ऐसा नहीं है कि इस योग के होने से व्यक्ति जन्म से ही राजा बनकर पैदा लेता है. यह योग जिनकी कुण्डली में बनता है उन्हें प्रारम्भ में कुछ मुश्किल हालातों से गुजरना पड़ता है जिससे उनका ज्ञान व अनुभव बढ़ता है तथा कई ऐसे अवसर मिलते हैं जिनसे उम्र के साथ-साथ कामयाबी की राहें प्रशस्त होती जाती हैं.यह योग व्यक्ति को आमतौर पर राजनेता, चिकित्सा विज्ञान एवं धार्मिक क्षेत्रों में कामयाबी दिलाता है जिससे व्यक्ति को मान-सम्मान व प्रतिष्ठा मिलती है. वैसे इस योग के विषय में यह धारणा भी है कि जिस व्यक्ति की कुण्डली में जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा है उस राशि का स्वामी एवं उस ग्रह की उच्च राशि का स्वामी केन्द्र स्थान या त्रिकोण में बैठा हो तो व्यक्ति महान र्धमात्मा एवं राजसी सुखों को भोगने वाला होता है.इसी प्रकार नवमांश में नीच ग्रह उच्च राशि में होने पर भी समान फल मिलता है.*
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ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

ज्योतिष में फलकथन का आधार मुख्यतः ग्रहों, राशियों और भावों का स्वाभाव, कारकत्‍व एवं उनका आपसी संबध है।

ग्रहों को ज्योतिष में जीव की तरह माना जाता है - राशियों एवं भावों को वह क्षेत्र मान जाता है, जहाँ ग्रह विचरण करते हैं। ग्रहों का ग्रहों से संबध, राशियों से संबध, भावों से संबध आदि से फलकथन का निर्धारण होता है।

ज्योतिष में ग्रहों का एक जीव की तरह 'स्‍वभाव' होता है। इसके अलाव ग्रहों का 'कारकत्‍व' भी होता है। राशियों का केवल 'स्‍वभाव' एवं भावों का केवल 'कारकत्‍व' होता है। स्‍वभाव और कारकत्‍व में फर्क समझना बहुत जरूरी है।

सरल शब्‍दों में 'स्‍वभाव' 'कैसे' का जबाब देता है और 'कारकत्‍व' 'क्‍या' का जबाब देता है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। माना की सूर्य ग्रह मंगल की मेष राशि में दशम भाव में स्थित है। ऐसी स्थिति में सूर्य क्‍या परिणाम देगा?

नीचे भाव के कारकत्‍व की तालिका दी है, जिससे पता चलता है कि दशम भाव व्यवसाय एवं व्यापार का कारक है। अत: सूर्य क्‍या देगा, इसका उत्‍तर मिला की सूर्य 'व्‍यवसाय' देगा। वह व्‍यापार या व्‍यवसाय कैसा होगा - सूर्य के स्‍वाभाव और मेष राशि के स्‍वाभाव जैसा। सूर्य एक आक्रामक ग्रह है और मंगल की मेष राशि भी आक्रामक राशि है अत: व्‍यवसाय आक्रामक हो सकता है। दूसरे शब्‍दों में जातक सेना या खेल के व्‍यवयाय में हो सकता है, जहां आक्रामकता की जरूरत होती है। इसी तरह ग्रह, राशि, एवं भावों के स्‍वाभाव एवं कारकत्‍व को मिलाकर फलकथन किया जाता है।

दुनिया की समस्त चल एवं अचल वस्तुएं ग्रह, राशि और भाव से निर्धारित होती है। चूँकि दुनिया की सभी चल एवं अचल वस्तुओं के बारे मैं तो चर्चा नहीं की जा सकती, इसलिए सिर्फ मुख्य मुख्य कारकत्‍व के बारे में चर्चा करेंगे।

सबसे पहले हम भाव के बारे में जानते हैं। भाव के कारकत्‍व इस प्रकार हैं -
प्रथम भाव : प्रथम भाव से विचारणीय विषय हैं - जन्म, सिर, शरीर, अंग, आयु, रंग-रूप, कद, जाति आदि।


द्वितीय भाव: दूसरे भाव से विचारणीय विषय हैं - रुपया पैसा, धन, नेत्र, मुख, वाणी, आर्थिक स्थिति, कुटुंब, भोजन, जिह्य, दांत, मृत्यु, नाक आदि।


तृतीय भाव : तृतीय भाव के अंतर्गत आने वाले विषय हैं - स्वयं से छोटे सहोदर, साहस, डर, कान, शक्ति, मानसिक संतुलन आदि।


चतुर्थ भाव : इस भाव के अंतर्गत प्रमुख विषय - सुख, विद्या, वाहन, ह्दय, संपत्ति, गृह, माता, संबंधी गण,पशुधन और इमारतें।


पंचव भाव : पंचम भाव के विचारणीय विषय हैं - संतान, संतान सुख, बुद्धि कुशाग्रता, प्रशंसा योग्य कार्य, दान, मनोरंजन, जुआ आदि।


षष्ठ भाव : इस भाव से विचारणीय विषय हैं - रोग, शारीरिक वक्रता, शत्रु कष्ट, चिंता, चोट, मुकदमेबाजी, मामा, अवसाद आदि।


सप्तम भाव : विवाह, पत्‍नी, यौन सुख, यात्रा, मृत्यु, पार्टनर आदि विचारणीय विषय सप्तम भाव से संबंधित हैं।


अष्टम भाव : आयु, दुर्भाग्य, पापकर्म, कर्ज, शत्रुता, अकाल मृत्यु, कठिनाइयां, सन्ताप और पिछले जन्म के कर्मों के मुताबिक सुख व दुख, परलोक गमन आदि विचारणीय विषय आठवें भाव से संबंधित हैं।


नवम भाव : इस भाव से विचारणीय विषय हैं - पिता, भाग्य, गुरु, प्रशंसा, योग्य कार्य, धर्म, दानशीलता, पूर्वजन्मों का संचि पुण्य।


दशम भाव : दशम भाव से विचारणीय विषय हैं - उदरपालन, व्यवसाय, व्यापार, प्रतिष्ठा, श्रेणी, पद, प्रसिद्धि, अधिकार, प्रभुत्व, पैतृक व्यवसाय।


एकादश भाव : इस भाव से विचारणीय विषय हैं - लाभ, ज्येष्ठ भ्राता, मुनाफा, आभूषण, अभिलाषा पूर्ति, धन संपत्ति की प्राप्ति, व्यापार में लाभ आदि।


द्वादश भाव : इस भाव से संबंधित विचारणीय विषय हैं - व्यय, यातना, मोक्ष, दरिद्रता, शत्रुता के कार्य, दान, चोरी से हानि, बंधन, चोरों से संबंध, बायीं आंख, शय्यासुख, पैर आदि।

इस बार इतना ही। ग्रहों का स्‍वभाव/ कारकत्‍व व राशियों के स्‍वाभाव की चर्चा हम अगले पाठ में करेंगे।


ग्रह और राशि  (Planet and Horoscope)

पंचक

अपने जीवन में कभी न कभी हम सभी पंचक के बारे में जरूर सुनते हैं। भारतीय ज्योतिष में इसे अशुभ समय माना गया है। पंचक के दौरान कुछ विशेष कार्य करने की मनाही है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार जब चन्द्रमा कुंभ और मीन राशि पर रहता है, तब उस समय को पंचक कहते हैं। यानी घनिष्ठा से रेवती तक जो पांच नक्षत्र (धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद एवं रेवती) होते हैं, उन्हें पंचक कहा जाता है।


क्या होता है पंचक?


पांच नक्षत्रों के समूह को पंचक कहते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार राशिचक्र में 360 अंश एवं 27 नक्षत्र होते हैं। इस प्रकार एक नक्षत्र का मान 13 अंश एवं 20 कला या 800 कला का होता है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार जब चन्द्रमा 27 नक्षत्रों में से अंतिम पांच नक्षत्रों अर्थात धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, एवं रेवती में होता है तो उस अवधि को पंचक कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जब चन्द्रमा कुंभ और मीन राशि पर रहता है तब उस समय को पंचक कहते हैं। क्योंकि चन्द्रमा 27 दिनों में इन सभी नक्षत्रों का भोग कर लेता है। अत: हर महीने में लगभग 27 दिनों के अन्तराल पर पंचक नक्षत्र आते ही रहते हैं। 


पंचक अर्थात (पांच नक्षत्रों का समूह) यह एक ऐसा(ज्योतिष) का विशेष मुहूर्त दोष है जिसमें बहुत सारे कामों को करने की मनाही की जाती क्या यह वाकई हानिकारक होता है या फिर यह एक भ्रांति है।


नक्षत्रों का प्रभाव


- धनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि का भय रहता है।

- शतभिषा नक्षत्र में कलह होने के योग बनते हैं।

- पूर्वाभाद्रपद रोग कारक नक्षत्र होता है।

- उतरा भाद्रपद में धन के रूप में दण्ड होता है।

- रेवती नक्षत्र में धन हानि की संभावना होती है।


1- पंचक के दौरान जिस समय घनिष्ठा नक्षत्र हो उस समय घास, लकड़ी आदि ईंधन एकत्रित नही करना चाहिए, इससे अग्नि का भय रहता है।


2- पंचक में चारपाई बनवाना भी अशुभ माना जाता है। विद्वानों के अनुसार ऐसा करने से कोई बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।


3- पंचक के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नही करनी चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी गई है। इन नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा करना हानिकारक माना गया है।


4- पंचक के दौरान जब रेवती नक्षत्र चल रहा हो, उस समय घर की छत नहीं बनाना चाहिए, ऐसा विद्वानों का मत है। इससे धन हानि और घर में क्लेश होता है।


5- पंचक में शव का अंतिम संस्कार नही करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि पंचक में शव का अंतिम संस्कार करने से उस कुटुंब में पांच मृत्यु और हो जाती है।


यदि परिस्थितीवश किसी व्यक्ति की मृत्यु पंचक अवधि में हो जाती है, तो शव के साथ पांच पुतले आटे या कुश (एक प्रकार की घास) से बनाकर अर्थी पर रखें और इन पांचों का भी शव की तरह पूर्ण विधि-विधान से अंतिम संस्कार करें, तो पंचक दोष समाप्त हो जाता है। ऐसा गरुड़ पुराण में लिखा है।


पंचक कितने शुभ ओर अशुभ


क्या पंचक वास्तव में इतने अशुभ होते हैं कि इसमें कोई भी कार्य करना अशुभ होता है?


ऐसा बिल्कुल नहीं है। बहुत सारे विद्वान इन पंचक संज्ञक नक्षत्रों को पूर्णत: अशुभ मानने से इन्कार करते हैं। कुछ विद्वानों ने ही इन नक्षत्रों को अशुभ माना है इसलिए पंचक में कुछ कार्य विशेष नहीं किए जाते हैं। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि इन नक्षत्रों में कोई भी कार्य करना अशुभ होता है। इन नक्षत्रों में भी बहुत सारे कार्य सम्पन्न किए जाते हैं। 


पंचक के इन पांच नक्षत्रों में से धनिष्ठा एवं शतभिषा नक्षत्र चर संज्ञक नक्षत्र हैं अत: इसमें पर्यटन, मनोरंजन, मार्केटिंग एवं वस्त्रभूषण खरीदना शुभ होता है। पूर्वाभाद्रपद उग्र संज्ञक नक्षत्र है अत: इसमें वाद-विवाद और मुकदमे जैसे कामों को करना अच्छा रहता है। जबकि उत्तरा-भाद्रपद ध्रुव संज्ञक नक्षत्र है इसमें शिलान्यास, योगाभ्यास एवं दीर्घकालीन योजनाओं को प्रारम्भ किया जाता है। वहीं रेवती नक्षत्र मृदु संज्ञक नक्षत्र है अत: इसमें गीत, संगीत, अभिनय, टी.वी. सीरियल का निर्माण एवं फैशन शो आयोजित किये जा सकते हैं। इससे ये बात साफ हो जाती है कि पंचक नक्षत्रों में सभी कार्य निषिद्ध नहीं होते। किसी विद्वान से परमर्श करके पंचक काल में विवाह, उपनयन, मुण्डन आदि संस्कार और गृह-निर्माण व गृहप्रवेश के साथ-साथ व्यावसायिक एवं आर्थिक गतिविधियां भी संपन्न की जा सकती हैं।


क्या पंचक के दौरान पूजा पाठ या धार्मिक क्रिया कलाप नहीं करने चाहिए?


बहुतायत में यह धारणा जगह बना चुकी है कि पंचक के दौरान हवन-पूजन या फिर देव विसर्जन नहीं करना चाहिए। जो कि गलत है शुभ कार्यों, खास तौर पर देव पूजन में पंचक का विचार नहीं किया जाता। अत: पंचक के दौरान पूजा पाठ या धार्मिक क्रिया कलाप किए जा सकते हैं। शास्त्रों में पंचक के दौरान शुभ कार्य के लिए कहीं भी निषेध का वर्णन नहीं है। केवल कुछ विशेष कार्यों को ही पंचक के दौरान न करने की सलाह विद्वानों द्वारा दी जाती है।


पंचक के दौरान कौन-कौन से काम नहीं करने चाहिए?


पंचक के दौरान मुख्य रूप से इन पांच कामों को वर्जित किया गया है-


1-घनिष्ठा नक्षत्र में घास लकड़ी आदि ईंधन इकट्ठा नही करना चाहिए इससे अग्नि का भय रहता है।

2-दक्षिण दिशा में यात्रा नही करनी चाहिए क्योंकि दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी गई है इन नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा करना हानिकारक माना गया है।

3-रेवती नक्षत्र में घर की छत डालना धन हानि और क्लेश कराने वाला होता है।

4-पंचक के दौरान चारपाई नही बनवाना चाहिए।

5-पंचक के दौरान किसी शव का अंतिम संस्कार करने की मनाही की गई है क्योकि ऐसा माना जाता है कि पंचक में शव का अन्तिम संस्कार करने से उस कुटुंब या गांव में पांच लोगों की मृत्यु हो सकती है। अत: शांतिकर्म कराने के पश्चात ही अंतिम संस्कार करने की सलाह दी गई है।


यदि किसी काम को पंचक के कारण टालना मुमकिन न हो तो उसके लिए क्या उपाय करना चाहिए?


आज का समय प्राचीन समय से बहुत अधिक भिन्न है वर्तमान में समाज की गति बहुत तेज है इसलिए आधुनिक युग में उपरोक्त कार्यो को पूर्ण रूप से रोक देना कई बार असम्भव हो जाता है| परन्तु शास्त्रकारों ने शोध करके ही उपरोक्त कार्यो को पंचक काल में न करने की सलाह दी है| जिन पांच कामों को पंचक के दौरान न करने की सलाह प्राचीन ग्रन्थों में दी गयी है अगर उपरोक्त वर्जित कार्य पंचक काल में करने की अनिवार्यता उपस्थित हो जाये तो निम्नलिखित उपाय करके उन्हें सम

 

1-लकड़ी का समान खरीदना जरूरी हो तो खरीद ले किन्तु पंचक काल समाप्त होने पर गायत्री माता के नाम पर हवन कराए, इससे पंचक दोष दूर हो जाता है|

2-पंचक काल में अगर दक्षिण दिशा की यात्रा करना अनिवार्य हो तो हनुमान मंदिर में फल चढा कर यात्रा आरम्भ करनी चाहिए।

3-मकान पर छत डलवाना अगर जरूरी हो तो मजदूरों को मिठाई खिलने के पश्चात ही छत डलवाने का कार्य करे|

4-पंचक काल में अगर पलंग या चारपाई लेना जरूरी हो तो उसे खरीद या बनवा तो सकते हैं लेकिन पंचक काल की समाप्ति के पश्चात ही इस पलंग या चारपाई का प्रयोग करना चाहिए|

5-शव दाह एक आवश्यक काम है लेकिन पंचक काल होने पर शव दाह करते समय पाँच अलग पुतले बनाकर उन्हें भी अवश्य जलाएं|

 

यदि पंचक काल में कार्य करना जरूरी है तो धनिष्ठा नक्षत्र के अंत की, शतभिषा नक्षत्र के मध्य की, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र के आदि की, उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र की पांच घड़ी के समय को छोड़कर शेष समय में कार्य किए जा सकते हैं। रेवती नक्षत्र का पूरा समय अशुभ माना जाता है। पंचक में मृत्यु होने पर शव पर पांच पुतले रखे जाते हैं और पंचक दोषों का शांति विधान किया जाता है।


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