भारतीय वास्तु शास्त्र (Indian Architecture)


भारतीय वास्तु शास्त्र (Indian Architecture)
घर में पैसा बरसाएगी बांसुरी
 
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर आपके घर में सोने और चांदी की बांसुरी हो तो न केवल धन-धान्य बरसेगा बल्कि पारीवारिक सुख-शांति भी आएगी. वैसे तो कई तरह की बांसुरियां होती है जो अलग- अलग असर दिखाती है लेकिन बांस से बनी बांसुरी और चांदी की बांसुरी विशेष असर दिखाने वाली और कमाल की मानी जाती है. चांदी की बांसुरी अगर आपके घर में होगी तो घर में पैसों से जुड़ी कोई परेशानी नहीं होगी. सोने की बांसुरी घर में रखने से उस घर में लक्ष्मी रहने लगती हैं. ऐसे घर में पैसा ही पैसा होता है. बाँस की बांसुरी शीघ्र उन्नतिदायक प्रभाव देती है. ऐसे में जिन व्यक्तियों को जीवन में पर्याप्त सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही हो, अथवा शिक्षा, व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो, वे अपने बेडरूम के दरवाजे पर दो बांसुरियों को लगाएं.
 
वास्तु दोष भी होगा दूर
 
यदि घर में बहुत ही अधिक वास्तु दोष है, या दो से अधिक दरवाजे एक सीध में है, तो घर के मुख्यद्वार के ऊपर दो बांसुरी लगाने से लाभ मिलता है और वास्तुदोष धीरे धीरे समाप्त होने लगता है.  घर का कोई सदस्य अगर बहुत दिनों से बीमार हो या अकाल मृत्यु का डर या अन्य कोई स्वास्थ्य से सम्बन्धित बड़ी समस्या हो, तो प्रत्येक कमरें के बाहर और बीमार व्यक्ति के सिरहाने पर बांसुरी का प्रयोग करना चाहिए इससे बहुत जल्दी असर होने लगेगा.
 
नकारात्मक ऊर्जा की अचूक काट
 
चांदी या बांस से बनी बांसुरी के बारे में एक जबरदस्त कमाल की बात ये है कि जब ऐसी बांसुरी को हाथ में लेकर हिलाया जाता है, तो बुरी आत्माएं और नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है और जब इसे बजाया जाता है, तो ऐसी मान्यता है कि घरों में शुभ चुम्बकीय प्रवाह का प्रवेश होता है.
जय नगर सेठ बँशिवाले की.राधे राधे⁠⁠⁠⁠

भारतीय वास्तु शास्त्र (Indian Architecture)

घर में सुख-शांति के लिए
 

वास्तुशास्त्र के नियमों के उचित पालन से शरीर की जैव-रासायनिक क्रिया को संतुलित रखने में सहायता मिलती है।
घर या वास्तु के मुख्य दरवाजे में देहरी (दहलीज) लगाने से अनेक अनिष्टकारी शक्तियाँ प्रवेश नहीं कर पातीं व दूर रहती हैं। प्रतिदिन सुबह मुख्य द्वार के सामने हल्दी, कुमकुम व गोमूत्र मिश्रित गोबर से स्वस्तिक, कलश आदि आकारों में रंगोली बनाकर देहरी (दहलीज) एवं रंगोली की पूजा कर परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हे ईश्वर ! आप मेरे घर व स्वास्थ्य की अनिष्ट शक्तियों से रक्षा करें।'

प्रवेश-द्वार के ऊपर नीम,आम, अशोक आदि के पत्ते का तोरण (बंदनवार) बाँधना मंगलकारी है।

वास्तु कि मुख्य द्वार के सामने भोजन-कक्ष, रसोईघर या खाने की मेज नहीं होनी चाहिए।

मुख्य द्वार के अलावा पूजाघर, भोजन-कक्ष एवं तिजोरी के कमरे के दरवाजे पर भी देहरी (दहलीज) अवश्य लगवानी चाहिए।

भूमि-पूजन, वास्तु-शांति, गृह-प्रवेश आदि सामान्यतः शनिवार एवं मंगलवार को नहीं करने चाहिए।

            गृहस्थियों को शयन-कक्ष में सफेद संगमरमर नहीं लगावाना चाहिए| इसे मन्दिर मे लगाना उचित है क्योंकि यह पवित्रता का द्योतक है।

कार्यालय के कामकाज, अध्ययन आदि के लिए बैठने का स्थान छत की बीम के नीचे नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे मानसिक दबाव रहता है।

बीम के नीचे वाले स्थान में भोजन बनाना व करना नहीं चाहिए। इससे आर्थिक हानि हो सकती है। बीम के नीचे सोने से स्वास्थ्य में गड़बड़ होती है तथा नींद ठीक से नहीं आती।

जिस घर, इमारत आदि के मध्य भाग (ब्रह्मस्थान) में कुआँ या गड्ढा रहता है, वहाँ रहने वालों की प्रगति में रूकावट आती है एवं अनेक प्रकार के दुःखों एवं कष्टों का सामना करना पड़ता है।

घर का ब्रह्मस्थान परिवार का एक उपयोगी मिलन स्थल है, जो परिवार को एक डोर में बाँधे रखता है।

यदि ब्रह्मस्थान की चारों सीमारेखाओं की अपेक्षा उसका केन्द्रीय भाग नीचा हो या केन्द्रीय भाग पर कोई वजनदार वस्तु रखी हो तो इसको बहुत अशुभ व अनिष्टकारी माना जाता है। इससे आपकी आंतरिक शक्ति में कमी आ सकती है व इसे संततिनाशक भी बताया गया है।

ब्रह्मस्थान में क्या निर्माण करने से क्या लाभ व क्या हानियाँ होती हैं, इसका विवरण इस प्रकार हैः


बैठक कक्ष- परिवार के सदस्यों में सामंजस्य

भोजन कक्ष- गृहस्वामी को समस्याएँ, गृहनाश

सीढ़ियाँ –मानसिक तनाव व धन नाश

लिफ्ट –गृहनाश

शौचालय –धनहानि एवं स्वास्थ्य हानि

परिभ्रमण स्थान – उत्तम

गृहस्वामी द्वारा ब्रह्मस्थान पर रहने, सोने या फैक्ट्री, दफ्तर, दुकान आदि में बैठने से बाकी सभी लोग उसके कहे अनुसार कार्य करते हैं और आज्ञापालन में विरोध नहीं करते। अपने अधीन कर्मचारी को इस स्थान पर नहीं बैठाना चाहिए, अन्यथा उसका प्रभाव आपसे अधिक हो जायेगा। इस स्थान को कभी भी किराये पर नहीं देना चाहिए।

नैर्ऋत्य दिशा में यदि शौचालय अथवा रसोईघर का निर्माण हुआ हो तो गृहस्वामी को सदैव स्वास्थ्य-संबंधी मुश्किलें रहती हैं। अतः इन्हें सर्वप्रथम हटा लेना चाहिए। चीनी 'वायु-जल' वास्तुपद्धति 'फेंगशुई' के मत से यहाँ गहरे पीले रंग का 0 वाट का बल्ब सदैव जलता रखने से इस दोष का काफी हद तक निवारण सम्भव है।

ईशान रखें नीचा, नैर्ऋत्य रखें ऊँचा।

यदि चाहते हों वास्तु से अच्छा नतीजा।।

शौचकूप (सैप्टिक टैंक) उत्तर दिशा के मध्यभाग में बनाना सर्वोचित रहता है। यदि वहाँ सम्भव न हो तो पूर्व के मध्य भाग में बना सकते हैं परंतु वास्तु के नैर्ऋत्य, ईशान,दक्षिण, ब्रह्मस्थल एवं अग्नि भाग में सैप्टिक टैंक बिल्कुल नहीं बनाना चाहिए।

प्लॉट या मकान के नैर्ऋत्य कोने में बना कुआँ अथवा भूमिगत जल की टंकी सबसे ज्यादा हानिकारक होती है। इसके कारण अकाल मृत्यु, हिंसाचार, अपयश, धन-नाश, खराब प्रवृत्ति, आत्महत्या, संघर्ष आदि की सम्भावना बहुत ज्यादा होती है।

परिवार के सदस्यों में झगड़े होते हों तो परिवार का मुख्य व्यक्ति रात्रि को अपने पलंग के नीचे एक लोटा पानी रख दे और सुबह गुरुमंत्र अथवा भगवन्नाम का उच्चारण करके वह जल पीपल को चढ़ायें। इससे पारिवारिक कलह दूर होंगे, घर में शांति होगी।

झाड़ू और पोंछा ऐसी जगह पर नहीं रखने चाहिए कि बार-बार नजरों में आयें। भोजन के समय भी यथासंभव न दिखें, ऐसी सावधानी रखें।

घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने के लिए रोज पोंछा लगाते समय पानी में थोड़ा नमक मिलायें। इससे नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव घटता है। एक डेढ़ रूपया किलो खड़ा नमक मिलता है उसका उपयोग कर सकते हैं।

घर में टूटी-फूटी अथवा अग्नि से जली हुई प्रतिमा की पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसी मूर्ति की पूजा करने से गृहस्वामी के मन में उद्वेग या घर-परिवार में अनिष्ट होता है।

(वराह पुराणः 186.43)

50 ग्राम फिटकरी का टुकड़ा घर के प्रत्येक कमरे में तथा कार्यालय के किसी कोने में अवश्य रखना चाहिए। इससे वास्तुदोषों से रक्षा होती है।

किसी दुकान या प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर काले कपड़े में फिटकरी बाँधकर लटकाने से बरकत आती है। दक्षिण भारत व अधिकांशतः दुकानों के मुख्य द्वार पर फिटकरी बाँधने का रिवाज लम्बे समय से प्रचलित है।
 


भारतीय वास्तु शास्त्र (Indian Architecture)

वैदिक काल के देवता

एकशीतिपद वास्तु में जो कि सर्वाधिक प्रचलन में है, 45 देवता विराजमान रहते हैं। मध्य में 13 व बाहर 32 देवता निवास करते हैं, ईशान कोण से क्रमानुसार नीचे के भाग में शिरवी, पर्जन्य, जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य भ्रंश व अंतरिक्ष तथा अग्निकोण में अनिल विराजमान हैं। नीचे के भाग में पूषा, वितथ, वृहत, क्षत, यम, गंधर्व, भृंगराज और मृग विराजमान हैं। नेऋत्य कोण से प्रारंभ करके क्रमानुसार दौवारिक (सुग्रीव), कुसुमदंत, वरुण, असुर, शोष और राजपदमा तथा वायव्य कोण से प्रारम्भ करके तत अनन्त वासुकी, मल्लार, सोम, भुजंग, अदिति व दिति आदि विराजमान हैं। बीच के नौवें पद में ब्रह्मा जी विराजमान हैं। ब्रह्मा की पूर्व दिशा में अर्यमा, उसके बाद सविता दक्षिण में वैवस्वान, इंद्र, पश्चिम में मित्र फिर राजपदमा तथा उत्तर में शोष व आपवत्स नामक देवता ब्रह्मा को चारों ओर से घेरे हुए हैं। आप ब्रह्मा के ईशान कोण में, अग्नि कोण में साविग, नैऋत्य कोण में जय व वायव्य कोण में रूद्र विराजमान हैं। इन वास्तु पुरुष का मुख नीचे को व मस्तक ईशान कोण में है इनके मस्तक पर शिरकी स्थित है। मुख पर आप, स्तन पर अर्यमा, छाती पर आपवत्स हैं। पर्जन्य आदि बाहर के चार देवता पर्जन्य, जयन्त, इन्द्र और सूर्य क्रम से नेत्र, कर्ण, उर स्थल और स्कंध पर स्थित हैं।

सत्य आदि पांच देवता भुजा पर स्थित हैं। सविता और सावित्र हाथ पर विराज रहे हैं। वितथ और बृहन्दात पाश्र्व पर हैं, वैवस्वान उदर पर हैं, सम उरू पर, गंधर्व ाजनु पर, भृंगराज जंघा पर और मृग स्थिक के ऊपर हैं। ये समस्त देवता वास्तु पुरुष के दाईं ओर स्थित हैं। बाएं स्तर पर पृथ्वी, अधर नेत्र पर दिति, कर्ण पर अदिति, छाती पर भुजंग, स्कंध पर सोम, भुज पर भल्लाट मुख्य, अहिरोग व पाप यक्ष्मा, हाथ पर रूद्र व राजयक्ष्मा, पाश्र्व पर शोष असुर, उरू पर वरुण, जानु पर कुसुमदंत, जंघा पर सुग्रीव और स्फिक पर दौवारिक हैं। वास्तु पुरुष के लिंग पर इंद्र व जयंत स्थित हैं। हृदय पर ब्रह्मा व पैरों पर पिता हैं। वराहमिहिर ने यह वर्णन परमशायिका या इक्यासी पद वाले वास्तु में किया है। इसी भांति मंडूक या चौसठ पद वास्तु का विवरण किया गया है। ये सभी देवता अपने-अपने विषय में गृहस्वामी को समृद्धि देते हैं। इन्हें संतुष्ट रखने में श्री वृद्धि होती है, शांति मिलती है। इन देवताओं की उपेक्षा होने से वे अपने स्वभाव के अनुसार पीड़ा देते हैं। बिना येजना के निर्माणादि कार्य होने से कुछ देवताओं की तो तुष्टि हो जाती है, जबकि कुछ देवता उपेक्षित ही रहते हैं। इसका फल यह मिलता है कि गृहस्वामी को कुछ विषयों में अच्छे परिणाम तथा कुछ विषयों में बुरे परिणाम साथ-साथ मिलते रहते
 


भारतीय वास्तु शास्त्र (Indian Architecture)

★ वास्तु-विस्मय - llll
•• आजकल समय और परिस्तिथियाँ ऐसे हो गए हैं कि - अपना घर लेना और उसे अपनी इच्छा अनुसार बनाना आसान काम नहीं है । मत्स्य-पुराण, भविष्य-पुराण और स्कन्द-पुराण में वास्तु विषयक सामग्री मिलती है । परंतु महानगरों व् नगरों में सभी को वास्तु का लाभ मिल जाये, ऐसा असंभव सा होता जा रहा है । अथवा समस्या होता जा रहा है । शहरों की स्थिति ऐसी हो गई है कि - जहाँ जगह मिले निवास कर लो । ऐसे में वास्तु-सिद्धांत कैसे अपनाये जायें । अगर कोई किराये पे रहता है तो ये और भी जटील समस्या हो जाती है । व्यक्ति सदा इस बात से चिंतित रहता है कि - मेरा घर, मेरे लिये शुभ है कि नहीं ।
लेकिन हमारे शास्त्रों ने, ग्रंथो ने और विभिन्न पुस्तकों ने हमें कई उपाय सुझाएं हैं । जैसे एक ये है कि - जिस नक्षत्र में आप जन्मे है उससे संबंधित सामग्री से घर की सजावट करें तो आपका घर आपके लिये बहुत अनुकूल हो सकता है । कई दोषों का निवारण भी होगा ।
जैसे - अगर आप अश्विनी, मघा अथवा मुला नक्षत्र में जन्मे है तो ध्यान रखे कि - आप केतु के नक्षत्र में जन्मे हैं ।
घर के पर्दे और बेदशीट्स का रंग धूम्र अथवा मटमैला सा हो तो सार्थक होगा । बैठक में एक ड्रैगन का चित्र अला-बला, जादू-टोने और भूत-प्रेत के डर से रक्षा करेगा । घर में गुलाब अथवा चन्दन की सुगंध फैली हो और चन्दन की लकड़ी की कोई सुन्दर वस्तु हो तो शक्ति मिलती है । बैडरूम में कांसे की कोई प्रतिमा याँ पंच-धातु का कोई आभूषण अवश्य रखें ।
लेकिन पहले कुछ छोटी-छोटी बातों का ध्यान अवश्य रखें ।
बैडरूम की दीवारों पर ज्यादा कीलें ना ठुकी हो, नहीं तो चैन की नींद मुश्किल हो जाती है । घर का फर्नीचर बहेड़ा, पीपल, बरगद और करंज की लकड़ी से ना बना हो अन्यथा अशांति, क्लेश और प्रेतबाधा तक हो सकती है । बैडरूम में सांप, ड्रैगन के चित्र ना लगायें, ये चित्र यौनजीवन में विसंगतियां लाते हैं । पूर्व दिशा याँ उत्तर दिशा में स्टोर अथवा कबाड़खाना नहीं होना चाहिये । घर में इन दिशाओं में जितना कम भार होगा गृहस्थी उतनी ही सुखपूर्वक चलेगी । पानी का संग्रह उत्तर-पूर्व दिशा में करें । पश्चिम और उत्तर दिशा में सर करके सोने से रोग और अशांति होती है । खिड़कियों के कांच टूटे-फूटे हो तो छोटी-मोटी समस्यायें घर में लगी ही रहती हैं । खिड़कियां घर में अंदर की तरफ खुलती हो तो शुभ होता है ।
वास्तु-शास्त्री खिड़कियों को वास्तु की आँख कहते हैं, ये ज्ञान प्राप्ति का माध्यम है ।
उस कमरे में कदापि नहीं सोना चाहिये जिस कमरे की छत ना हो । घर में सीलन ना हो और प्रवेश द्वार का रंग उखड़ा ना हो, ये दरिद्रता और रोग के सूचक माने जाते हैं । घर के मुख्य द्वार के पास कूड़ा-करकट अशुभ फल देता है ।
 


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🌹🌹 *वास्तु शास्त्र द्वारा रोग उपाय*🌹🌹

👉 *जब हम वास्तु शास्त्र के द्वारा जीवन की अनेकों समस्याए ठीक कर सकने में सक्षम है तो शारीरिक व्याधियों या रोगों को ठीक नहीं कर सकते हें.? क्या???*

👉 *व्यक्ति वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार यदि निवास करता है तो समस्त बाधाए समाप्त हो जाती है. वास्तु शास्त्र प्राचीन वैज्ञानिक जीवन शैली है वास्तु विज्ञान सम्मत तो है ही साथ ही वास्तु का सम्बन्ध ग्रह नक्षत्रों एवम धर्म से भी है ग्रहों के अशुभ होने तथा वास्तु दोष विद्यमान होने से व्यक्ति को बहुत भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ता है. वास्तु शास्त्र अनुसार पंच तत्वों*

👉 *पृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश और वायु तथा वास्तु के आठ कोण दिशाए एवम ब्रह्म स्थल केन्द्र को संतुलित करना अति आवश्यक होता है जिससे जीवन हमारा एवं परिवार सुखमय रह सके.*

👉 *वास्तु शास्त्र के कुछ नियम रोग निवारण में भी सहायक सिद्ध होते है… आपको विस्मय होना स्वाभाविक है जो रोग राजसी श्रेणी में आ कर फिर की समाप्त नहीं होता बल्कि केवल दवाईयों के द्वारा नियंत्रित हो कर जीवन भर हमें दंड देता रहता है वही मधुमेह को हमारे ऋषि मुनिओं ने वास्तु शास्त्र के द्वारा नियंत्रण की बात तो दूर है पूरी तरह से सफाया करने पर अग्रसित हो रहा है दुर्भाग्य कि बात है कि हम विशवास नहीं करते आपकी बात बिलकुल सही है इससे पहले मै भी कभी विशवास नहीं रखता था लेकिन जब से वास्तु शास्त्र के नियम मेने अपने घर एवं अपने व अपने परिवार के लोगों पर लगाए तो कुछ समय बाद मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा मै शत प्रतिशत सफल हुआ आज में समाज की भलाई के लिए साथ ही यह भी बताने का पूरा प्रयास करूँगा की आधुनिक दौड़ में अपने पीछे कि सभ्यता को भी याद रखे जो कि सटीक व हमारे जीवन में शत प्रतिशत कारगर सिद्ध होती आई है. वास्तु सही रूप से जीवन की एक कला है क्योंकि हर व्यक्ति का शरीर उर्जा का केन्द्र होता है. जंहा भी व्यक्ति निवास करता है वहाँ कि वस्तुओं की उर्जा अपनी होती है और वह मनुष्य की उर्जा से तालमेल रखने की कोशिश करती है. यदि उस भवन/स्थान की उर्जा उस व्यक्ति के शरीर की उर्जा से ज्यादा संतुलित हो तो उस स्थान से विकास होता है शरीर से स्वस्थ रहता है सही निर्णय लेने में समर्थ होता है सफलता प्राप्त करने में उत्साह बढता है,धन की वृद्धि होती है जिससे समृधि बढती है यदि वास्तु दोष होने एवं उस स्थान की उर्जा संतुलित नहीं होने से अत्यधिक मेहनत करने पर भी सफलता नहीं मिलती. वह व्यक्ति अनेक व्याधियो व रोगों से दुखी होने लगता है अपयश तथा हानि उठानी पडती है.राधेय शर्मा*

👉 *भारत में प्राचीन काल से ही वास्तु शास्त्र को पर्याप्त मान्यता दी जाती रही है। अनेक प्राचीन इमारतें वास्तु के अनुरूप निर्मित होने के कारण ही आज तक अस्तित्व में है। वास्तु के सिद्धांत पूर्ण रूप से वैज्ञानिक हैं, क्योंकि इस शास्त्र् में हमें प्राप्त होने वाली सकारात्मक ऊर्जा शक्तियों का समायोजन पूर्ण रूप से वैज्ञानिक ढंग से करना बताया गया है।राधेय शर्मा*

👉 *वास्तु के सिद्धांतों का अनुपालन करके बनाए गए गृह में रहने वाले प्राणी सुख, शांति, स्वास्थ्य, समृद्धि इत्यादि प्राप्त करते हैं। जबकि वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत बनाये गए गृह में रहने वाले समय-असमय प्रतिकूलता का अनुभव करते हैं एवं कष्टपद जीवन व्यतीत करते हैं। कई व्य-क्तियों के मन में यह शंका होती है कि वास्तु शास्त्रब का अधिकतम उपयोग आर्थिक दृष्टि से संपन्न वर्ग ही करते हैं। मध्यम वर्ग के लिए इस विषय का उपयोग कम होता है। निस्संदेह यह धारणा गलत है। वास्तु विषय किसी वर्ग या जाति विशेष के लिये ही नहीं है, बल्कि वास्तु शास्त्रत संपूर्ण मानव जाति के लिये प्रकृति की ऊर्जा शक्तियों को दिलाने का ईश्वैर प्रदत्त एक अनुपम वरदान है।राधेय शर्मा*

👉 *वास्तु विषय में दिशाओं एवं पंच-तत्त्वों की अत्यधिक उपयोगिता है। ये तत्त्वं जल-अग्नि-वायु-पृथ्वी-आकाश है। भवन निर्माण में इन तत्त्वों का उचित अनुपात ही, उसमें निवास करने वालों का जीवन प्रसन्नए एवं समृद्धिदायक बनाता है। भवन का निर्माण वास्तु के सिद्धांतों के अनुरूप करने पर, उस स्थल पर निवास करने वालों को प्राकृतिक एवं चुम्बकीय ऊर्जा शक्ति एवं सूर्य की शुभ एवं स्वास्थ्यपद रश्मियों का शुभ प्रभाव पाप्त होता है। यह शुभ एवं सकारात्मक प्रभाव, वहाँ पर निवास करने वालों के सोच-विचार तथा कार्यशैली को विकासवादी बनाने में सहायक होता है, जिससे मनुष्य की जीवनशैली स्वस्थ एवं प्रसन्नचित रहती है और बौद्धिक संतुलन भी बना रहता है। ताकि हम अपने जीवन में उचित निर्णय लेकर सुख-समृद्धिदायक एवं उन्नतिशील जीवन व्यतीत कर सकें। राधेय शर्मा*

 *इसके विपरीत यदि भवन का निर्माण का कार्य वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत करने पर, उस स्थान पर निवास एवं कार्य करने वाले व्यक्तियों के विचार तथा कार्यशैली निश्चित ही दुष्प्रभावी होंगी और मानसिक अशांति एवं परेशानियाँ बढ़ जायेंगी। इन पांच तत्त्वोंष के उचित संतुलन के अभाव में शारीरिक स्वास्थ्य तथा बुद्धि भी विचलित हो जाती है। इन तत्वों का उचित संतुलन ही, गृह में निवास करने वाले पाणियों को मानसिक तनाव से मुक्त करता है। ताकि वह उचित-अनुचित का विचार करके, सही निर्णय लेकर, उन्नतिशील एवं आनंददायक जीवन व्यतीत कर सकें। ब्रह्माण्ड में विद्यमान अनेक ग्रहों में से जीवन पृथ्वी पर ही है। क्योंकि पृथ्वी पर इन पंच-तत्त्वों का संतुलन निरंतर बना रहता है। हमें सुख और दुःख देने वाला कोई नहीं है। हम अपने अविवेकशील आचरण और प्रकृति के नियमों के विरुद्ध आहार-विहार करने से समस्याग्रस्त रहते हैं। पंच-तत्त्वों के संतुलन के विपरीत अपना जीवन निर्वाह करने से ही हमें दुःख और कष्ट भोगने पड़ते हैं। राधेय शर्मा*

 *जब तक मनुष्य के ग्रह अच्छे रहते हैं वास्तुदोष का दुष्प्रभाव दबा रहता है पर जब उसकी ग्रहदशा निर्बल पड़ने लगती है तो वह वास्तु विरुध्द बने मकान में रहकर अनेक दुःखों, कष्टों, तनाव और रोगों से घिर जाता है। इसके विपरीत यदि मनुष्य वास्तु शास्त्र के अनुसार बने भवन में रहता है तो उसके ग्रह निर्बल होने पर भी उसका जीवन सामान्य ढंग से शांति पूर्ण चलता है।राधेय शर्मा*

 शास्तेन सर्वस्य लोकस्य परमं सुखम्

 चतुवर्ग फलाप्राप्ति सलोकश्च भवेध्युवम्

 शिल्पशास्त्र परिज्ञान मृत्योअपि सुजेतांव्रजेत्

 परमानन्द जनक देवानामिद मीरितम्

 शिल्पं बिना नहि देवानामिद मीरितम्

 शिल्पं बिना नहि जगतेषु लोकेषु विद्यते।

 जगत् बिना न शिल्पा च वतंते वासवप्रभोः॥

 

👉 *विश्व के प्रथम विद्वान वास्तुविद् विश्वकर्मा के अनुसार शास्त्र सम्मत निर्मित भवन विश्व को सम्पूर्ण सुख, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। वास्तु शिल्पशास्त्र का ज्ञान मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कराकर लोक में परमानन्द उत्पन्न करता है, अतः वास्तु शिल्प ज्ञान के बिना निवास करने का संसार में कोई महत्व नहीं है। जगत और वास्तु शिल्पज्ञान परस्पर पर्याय हैं।


भारतीय वास्तु शास्त्र (Indian Architecture)

गहरा संबंध है वास्तुशास्त्र और खुशबू में
मानव समाज आदिकाल से ही अपने आसपास के वातावरण को खुशनुमा बनाने के लिए  विभिन्न प्रकार की खुशबुओं का इस्तेमाल करता रहा है। वास्तुशास्त्र में भी इनके इस्तेमाल का  विशेष महत्व बताया गया है।

इस मामले में प्रकृति ने भी हमारी खूब मदद की है और हमें विभिन्न प्रकार के सुगंधित  पेड़-पौधे, जड़ी-बूटियां, फल-फूल उपहार में दिए हैं और इनके माध्यम से तरह-तरह की सुगंधियां  प्रदान की हैं। इनमें से कुछ विशिष्ट सुगंधियों का उपयोग विश्व की लगभग सभी संस्कृतियों में  अलग-अलग आयोजनों पर होता रहा है।

 

प्राचीनकाल में राजा-महाराजाओं द्वारा अपने महल, वस्त्रों, विभिन्न कक्षों, मुख्य द्वार आदि पर  अलग-अलग अवसरों के अनुरूप इत्र एवं सुगंधित तेलों के प्रयोग का वर्णन मिलता है। इसमें  कोई संदेह नहीं कि किसी खुशबू विशेष का प्रयोग कर आप अपने आसपास के वातावरण को  सजीव बना सकते हैं।

 

वास्तुशास्त्र के अनुसार गेंदा, पियोनिया या अन्य पीले फूलों को विवाहयोग्य कन्याओं के कक्ष के  सामने सजाने से उनके विवाह के अच्‍छे प्रस्ताव आते हैं। इसी प्रकार अमन, शांति व प्रेम का  प्रतीक गुलाब अपनी मादक सुगंध से मलीनता को दूर करता है, स्वभाव में मिठास घोलता है  एवं अपनेपन का अहसास दिलाता है।

 

घर या परिसर में विभिन्न प्रकार की खुशबुओं का इस्तेमाल कर उसके ऊर्जा स्तर में वृद्धि की  जा सकती है और उस घर में नकारात्मक ऊर्जा की उपस्थिति, मात्रा व हानिकारक प्रभाव को  नियंत्रित व परिवर्तित किया जा सकता है।

 

इसी प्रकार व्यावसायिक भवनों में हानिकारक ऊर्जा के मार्ग को बदलकर उसके स्थान पर नई व  मनोवांछित ऊर्जा को बनाए रखने में भी विभिन्न प्रकार की खुशबुओं का अपना महत्वपूर्ण  स्थान है, जैसे सुबह की पूजा-अर्चना के लिए चंदन-गुलाब आदि की भीनी-भीनी खुशबू वाली धूप  व अगरबत्ती का प्रयोग ज्यादा अच्‍छा रहता है।
 

घर के अंदर देसी घी के दीये जलाने से भी सात्विक व नैसर्गिक ऊर्जा मिलती है, जो वहां रहने वालों के लिए अनूठी होती है।

 

सुबह की पूजा के समय मोगरे व लैवेंडर की तीखी खुशबू वाली धूप-अगरबत्तियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि मोगरे की तेज खुशबू में मस्त करने वाला प्रभाव होता है इसीलिए दुल्हनों  का गजरा मोगरे के फूलों का बनाया जाता है। 

सुबह की पूजा में जब आप मोगरे या लैवेंडर की खुशबू वाली धूप-अगरबत्तियों का प्रयोग करेंगे तो उसके प्रभाव से आपकी इच्छा करने आराम करने की हो सकती है। इस खुशबू का रोजाना इस्तेमाल आपको आलस्य व निद्रा का अहसास दिला सकता है अत: किसी भवन, खासकर औद्योगिक इकाई में, जहां कई लोग एकसाथ मशीनों आदि पर कार्य करते हों, वहां इन खुशबुओं का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सायंकालीन पूजा में इनका प्रयोग किया जा सकता है। 

इसी प्रकार किसी घर के सदस्य यदि किसी कारणवश तनाव या डिप्रेशन अनुभव करते हों, तो  घर में हर हफ्ते में कम से कम एक बार हवन सामग्री को जलाने व घर से सभी हिस्सों में  धूनी देने से राहत मिलती है। हवन सामग्री के विकल्प के रूप में लोहबान या गुग्गल का  उपयोग किया जा सकता है। घर में यदि कोई जगह ऐसी हो, जहां धूप न पहुंचती हो तो उस  स्‍थान को कपूर की टिकिया रखकर सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण किया जा सकता है।

 

वास्तुशास्त्र के अनुसार आवासीय या व्यावसायिक भवन बनाने के लिए भूखंड का चयन करते  समय इस बात का ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए कि उस पर बनने वाला भवन पूर्व या  उत्तरमुखी हों, क्योंकि इस स्थिति में भवन व उसमें रहने वाले सभी प्राणियों को पूर्व व उत्तर  से आने वाली सकारात्मक ब्रह्मांडीय ऊर्जा की प्राप्ति होगी तथा उनका जीवन सुखमय रहेगा।

 

आपका घर यदि पूर्व या उत्तरमुखी न हो तो इस दिशा में खाली छोड़ी गई जगह पर तुलसी के  पौधे लगाएं ताकि दोनों सकारात्मक दिशाओं को और अधिक शुद्ध ऊर्जा प्राप्त हो सके। इस  स्थान पर श्यामा (काली) तुलसी का प्रयोग बेहतर रहता है।

 

यह एक वैज्ञानिक तथ्‍य है कि वायु जब औष‍धीय पौधों के बीच से होकर गुजरती है तो उसके  जीवनदायिनी ऊर्जा के प्रभाव में वृद्धि हो जाती है। यह शोधित व सुगंधित वायु जब घर के  आंगन, ड्योढ़ी, लॉबी आदि स्थानों तक पहुंचती है, तो वहां रहने वालों का स्वास्थ्य उत्तम रहता  है। 

 

तुलसी के पौधों में मरकरी या पारा नामक सूक्ष्म तत्व पर्याप्त मात्रा में विद्यमान रहता है, जो  इस सृष्टि का सबसे भारी तत्व है और इसमें नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने की अद्भुत  क्षमता होती है।

 

पारे के शिवलिंग, पिरामिड, माला, अंगूठी आदि दुष्ट ग्रह-नक्षत्रों के प्राणघातक व नकारात्मक  प्रवाह को समाप्त कर सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यही पारा तुलसी के पौधे का एक  मूलभूत सूक्ष्म तत्व है।

 

मिट्टी की प्राकृतिक खुशबू ने सृष्टि में कुछ उपयोगी गुण प्रदान किए हैं। हमारे आसपास  नैसर्गिक खुशबुओं की कमी नहीं है, जैसे मिट्टी पर बारिश की बूंदों से उत्पन्न भीनी-भीनी खुशबू  हर प्रकार के तनाव को दूर करने का अद्भुत गुण रखती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी नकसीर  फूटने पर मिट्टी को पानी में भिगोकर सुंघाया जाता है। ओस पड़ने के बाद सुबह के समय खेतों  से उठने वाली प्राकृतिक खुशबू आंखों की रोशनी बढ़ाने व शिथिलता दूर करने में सक्षम है। 

 

विभिन्न प्रकार की खुशबुओं व उनके उपयोग पर शोध कर चुके ब्रिटिश शरीरक्रिया-विज्ञानी डॉ.  एडवर्ड बैच के अनुसार फूलों की खुशबू में वह गुण है, जो एक प्राकृतिक औषधि की तरह  नुकसान पहुंचाए बिना हर प्रकार के रोगों को ठीक करने में सक्षम है। 

 

भारतीय परंपरा में प्राचीनकाल से ही प्रियजनों को पुष्प-गुच्छ भेंट करना, बुके के रूप में  फूलों-पत्तियों को सजाकर देना, किसी अतिविशिष्ट व्यक्ति को सम्मानस्वरूप फूलों का गुच्छा  भेंट करना आदि प्रचलित रहा है। 

 

वास्तुशास्त्र की शब्दावली में केवल उन सुगंधों की ही सिफारिश की जाती है, जो प्रथम प्रभाव में  आपके मन को अच्‍छी लगें। जिस सुगंध से आपको एलर्जी हो या जो आपके मन को न भाती  हो, उससे दूर ही रहें। हो सके तो तीव्र खुशबुओं का प्रयोग करने से बचें और भीनी-भीनी सुगंधों  का प्रयोग करें।


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